प्रश्न अहमद पटेल की जय पराजय का नहीं प्रश्नचिन्ह गांधी परिवार के भविष्य पर |

कांग्रेस पार्टी हर संभव प्रयत्न कर रही है कि श्रीमती सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल गुजरात से राज्यसभा चुनाव हर हाल में जीतें |...



कांग्रेस पार्टी हर संभव प्रयत्न कर रही है कि श्रीमती सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव अहमद पटेल गुजरात से राज्यसभा चुनाव हर हाल में जीतें | क्योंकि अहमद पटेल की हार का मतलब है, सोनिया जी की व्यक्तिगत पराजय | 

इसीलिए 8 अगस्त को होने वाले राज्यसभा चुनाव में पटेल की जीत सुनिश्चित करने के लिए कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी गुजरात पहुँचने वाले हैं | 

अहमद पटेल भले ही गांधी परिवार के अंग नहीं हैं, किन्तु उनकी हैसियत इंदिरा गांधी के जमाने से परिवार के सदस्य जैसी ही है | राजनैतिक गलियारों में तो उन्हें इंदिरा जी का दत्तक पुत्र ही कहा जाने लगा था । वे परिवार के कितने नजदीक हैं, इसका अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि वीवीआईपी अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर सौदे के मध्यस्थ गिडो हाशके के दस्तावेजों में उल्लेखित एपी, अहमद पटेल ही माने जाकर आरोपित होते रहे हैं । हालांकि उन्होंने हमेशा इन आरोपों का खंडन ही किया है, किन्तु यह तथ्य भी जाना माना है कि पिछले दस सालों में वे सदैव कांग्रेस की महत्वपूर्ण हस्ती रहे हैं । सोनिया ने सभी संवेदनशील राजनीतिक फैसले लेते समय उनकी सलाह को तरजीह दी है |

पटेल राज्यसभा सदस्य चुने तो जाते हैं, लेकिन किसी ने शायद ही कभी उन्हें वहां बोलते सुना हो । हाँ वह समय जरूर अपवाद था, जब डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने उन्हें अगस्ता वेस्टलैंड मामले में उनका नाम लिया था। स्वाभाविक ही उस समय पटेल ने पूरी दमखम से साथ खुद का बचाव किया था । 

सोनिया और राहुल गांधी को उम्मीद थी कि इसी वर्ष नवंबर में होने जा रहे गुजरात विधानसभा चुनाव में अहमद पटेल एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। शक्तिशाली पटेल समुदाय के वोट को विभाजित करने के लिए हार्दिक पटेल को स्थापित करने में अहमद पटेल की मुख्य भूमिका रही है । इन लोगों का मानना था कि नरेंद्र मोदी को उनके घरेलू मैदान पर कमजोर करने से ही मोदी के विजय अभियान को रोका जा सकता है । किन्तु फिलहाल तो उल्टे बांस बरेली वाली कहावत चरितार्थ हो रही है | अहमद पटेल के स्वयं के पांवों के नीचे से धरती खिसक रही है |

राष्ट्रीय परिद्रश्य में भी मार्च 2017 में हुए उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड और मणिपुर चुनावों के बाद सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया है । कहाँ तो अरविंद केजरीवाल धूम मचाये हुए थे, किन्तु गोवा और पंजाब में हुई किरकिरी के बाद उनकी बोलती बंद हो गई है । उनका आत्मबल कितना कमजोर हो गया है, इसका अनुमान तो इससे ही लगता है कि उन्होंने गुजरात में जाकर चुनाव लड़ने से ही तौबा कर ली है | इसके साथ ही कांग्रेस की उस आशा पर भी पलीता लग गया, जिसमें वे आशा कर रहे थे कि केजरीवाल भाजपा के वोटों में सेंध लगा सकते हैं | बेचारे आक्रामक केजरीवाल का राजनीतिक अस्तित्व दिल्ली में ही शून्य हो गया हैं । केजरीवाल की ही तरह हार्दिक पटेल भी कांग्रेस के लिए अब बेमतलब के हैं । कांग्रेस उन्हें अपनी पार्टी में तो लाने से रही, और तीसरी पार्टी कोई बची नहीं, जो भाजपा के वोटों को काट सके |

ऐसे में अहमद पटेल जब पांचवी बार राज्यसभा में अपनी किस्मत आजमाने जा रहे हैं, यह न केवल उनके लिए बल्कि कांग्रेस के लिए भी एक प्रकार से अग्नि परीक्षा है । अहमद पटेल की पराजय का अर्थ है पार्टी के भीतर स्वयं सोनिया के अधिकार का कमजोर होना । क्योंकि अभी तक तो कांग्रेसी नेता हर चुनाव में पार्टी के खराब प्रदर्शन के लिए राहुल गांधी को दोषी ठहराते थे, किन्तु अब तो खुद सोनिया गांधी के नेतृत्व पर ही प्रश्नचिन्ह लगने वाला है ।

इसीलिए भाजपा ने जानबूझकर 8 अगस्त के राज्यसभा चुनाव को सोनिया विरुद्ध शाह में बदल दिया है | गुजरात से मोदी ने इसीलिए दूरी बनाकर रखी हुई है | अब सोनिया को अगर अपनी तुलना अमित शाह से होती दिखेगी, तो वे कितना प्रसन्न या दुखी होंगी ?

यदि पटेल राज्यसभा चुनाव हार जाते हैं, तो 2019 के लोकसभा चुनाव में आत्मविश्वास से लबरेज भाजपा रायबरेली में भी एक मजबूत उम्मीदवार खड़ा करके सोनिया गांधी को तगड़ी टक्कर देगी । राहुल को तो पिछले चुनाव में ही अमेठी में वर्तमान केन्द्रीय सूचना प्रसारण मंत्री स्मृती ईरानी से कड़ी चुनौती का सामना करना पडा था ।

प्रियंका गांधी के चुनावी पदार्पण को लेकर गांधी परिवार अभी दुविधा में ही है । फरवरी-मार्च 2017 विधानसभा चुनाव में प्रियंका ने उत्तर प्रदेश के प्रचार अभियान में भाग लिया था । अतः संभव है कि स्वास्थ्य के आधार पर सोनिया स्वयं को पीछेकर 2019 में प्रियंका को रायबरेली सीट से चुनाव लड़वायें । किन्तु आज की परिस्थिति में तो ऐसा होना, स्वयं सोनिया का मैदान छोड़ना माना जाएगा, और डूबती कांग्रेस के आम कार्यकर्ता के मनोबल को और पेंदे में ले जायगा ।

राहुल का उत्तराधिकारी के रूप में कांग्रेस अध्यक्ष बनना लगातार दो साल से खटाई में पड़ा हुआ है । बिहार में आरजेडी-जेडी (यू) -कांग्रेस महागठबंधन के पतन के बाद तो कांग्रेस में अन्दर से ही राहुल के भविष्य पर सवालिया निशान लगने लगे हैं | उन्हें बोझ मानने वालों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है ।

दशकों से कांग्रेस में दो धाराएं चलती आ रही हैं | ग्रामीण भारत में गांधी परिवार एक राजवंश के समान स्थापित है, जिसका प्रतिनिधित्व कांग्रेस नेताओं की पुरानी पीढी करती रही | किन्तु अब धीरे धीरे युवा किन्तु जमीन से कटे और महत्वाकांक्षी लोगों की जमात ने सीधे राहुल गांधी तक पहुँच बनाकर इस जुड़ाव को धीरे-धीरे लुप्तप्राय कर दिया है। अब हालत यह है कि कांग्रेस शासित एकमात्र बड़ा राज्य कर्नाटक शेष है, अन्य सभी राज्यों से वह सत्ता से बाहर है | अगले मंगलवार को अहमद पटेल की चुनावी सफलता या असफलता यह तय कर सकती है कि गांधी परिवार का गोंद और कितने समय तक कांग्रेस को एकजुट रख पायेगा । बिखराव तो सब दूर हो ही रहा है | इस प्रक्रिया में तेजी आयेगी या यह मंद होगी यह देखना दिलचस्प है |

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क्रांतिदूत: प्रश्न अहमद पटेल की जय पराजय का नहीं प्रश्नचिन्ह गांधी परिवार के भविष्य पर |
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