अर्थ पिपासा में टूटते बिखरते झगड़ते बड़े घराने - बुजुर्गों की दुर्दशा |

बच्चे ने देखा कि उसके पिता अपने पिता अर्थात बच्चे के बाबा को मिट्टी के बर्तन में खाना दे रहे हैं, जबकि परिवार के अन्य सदस्य स्टील के बर्...



बच्चे ने देखा कि उसके पिता अपने पिता अर्थात बच्चे के बाबा को मिट्टी के बर्तन में खाना दे रहे हैं, जबकि परिवार के अन्य सदस्य स्टील के बर्तनों में भोजन करते हैं, तो उस बच्चे ने लकड़ी का एक कटोरा बनाना शुरू कर दिया । जब पिता ने बेटे से इसकी वजह पूछी तो जबाब मिला कि जब आप बूढ़े हो जाएंगे तो मैं आपको इसमें खाना दिया करूंगा। मैं जल्दी और बार बार टूट जाने वाले मिट्टी के बर्तनों पर पैसा बर्बाद नहीं करूंगा।

ये कथाएं कहानियाँ अक्सर लोग पढ़ते हैं, किन्तु उनसे कोई सीख नहीं लेता | इसीलिए देश में वृद्धाश्रम बढ़ रहे हैं | पूरे विश्व में आदर्श समझी जाने वाली भारतीय परिवार व्यवस्था आज के तथाकथित पढेलिखे उच्च वर्ग में तो अंतिम साँसे गिन रही है | अर्थ संचय और येन केन प्रकारेण पैसा बटोरना ही मानो जीवन ध्येय बन गया है | यह अलग बात है कि इसके भयावह परिणाम भी उन्हें ही भोगना पड़ रहे हैं | 

इसी तथ्य को रेखांकित करने वाली एक व्यथा कथा विगत दिनों नया इण्डिया समाचार पत्र में श्री विवेक सक्सेना के लोकप्रिय कोलम रिपोर्टर डायरी में प्रकाशित हुई |

जाने माने उद्योगपति विजयपत सिंघानिया कानुपर के प्रसिद्ध जुग्गीलाल कमलापत घराने के बेटे थे, जिनको उस समय टाटा व बिड़ला के बाद देश का तीसरा सबसे बड़ा औद्योगिक घराना माना जाता था । इस परिवार ने हमारे कानपुर शहर में जो मंदिर बनवाया वह अपनी भव्यता व सुंदरता में ताजमहल को भी मात करता है। इस शहर में इस परिवार ने कमला रिट्रीट बनाई, जो कि प्राकृतिक जंगल में बना चिड़ियाघर है। 

जुग्गीलाल राजस्थान के शेखावटी इलाके के सिंघाना गांव के थे जो कि बहुत पहले कानपुर आकर बस गए थे। वे पहले गांठ का काम करते थे। उनके बेटे का नाम कमलापत था। बाद में उन्होंने जेके समूह स्थापित किया। जो कि कपड़ा से लेकर टीवी तक बनाने लगा। कमलापत के तीन बेटे पद्मपत, कैलाशपत व रमेशपत थे। कैलाशपत के दो बेटो अजयपत व विजयपत थे। उन्होंने आजादी के तीन साल पहले मुंबई में रेमंड कंपनी को खरीदा जो कि की वाडिया द्वारा स्थापित की गई थी। उन्होंने जब इसे एक यहूदी से खरीदा तो उसका नाम ईडी एंड कंपनी था। इस कंपनी के दो निदेशकों के नाम अलबर्ट व अब्राहम रेमंड थे। उनके नाम पर ही इस कंपनी का नाम रेमंड रखा गया। 

जब इस घराने में बंटवारा हुआ तो मुंबई का यह समूह उनके बेटों विजयपत व अजयपत के हिस्से में आ गया। इस कंपनी ने जो कि गर्म सूट से लेकर रेडीमेड कपड़े बनाती थी, जबरदस्त प्रगति की। उन्होंने आस्ट्रेलिया से लाई जाने वाली भेड़ों के ऊन से सूटिंग तैयार की, जिससे बनाया गया कपड़ा बेहद नर्म व गर्म होता था। बाद में वे आस्ट्रेलिया से ये भेड़ें भारत लाए और उनकी नस्ल यहां पैदा कर उससे यह ऊन बनाने लगे। आज देश का 60 फीसदी सूट का कपड़ा रेमंड तैयार करती है जो कि अपनी उच्च क्वालिटी के कारण हर देशों को निर्यात किया जाता है।
विजयपत सिंघानिया को विमान उड़ाने का बहुत शौक था। उन्होंने माइक्रोलाइट एयर क्राफ्ट में ब्रिटेन से भारत तक की 34 हजार किलोमीटर की यात्रा अकेले करके विश्व रिकार्ड बनाया था। उन्होंने 67 साल की उम्र में गुब्बारे से सबसे ऊंचाई पर उड़ान भर कर विश्व रिकार्ड बनाया। उन्हें पद्म भूषण व वायुसेना में ऑनरेरी कमोडोर के खिताब से सम्मानित किया गया। मुंबई में देश के सबसे महंगे इलाके मलाबार हिल्स, जहां जिन्ना का भी घर है वहां उनकी भी जमीन थी। वहां उन्होंने 36 मंजिला इमारत बनवाई जो कि मुकेश अंबानी के घर एंटीला से भी कहीं ज्यादा ऊंची है। 

विजयपत के भागीदार और उनके सगे भाई अजयपत की मृत्यु जल्दी ही हो गई। इस परिवार को जानने वाले कहते हैं कि उनके न रहने के बाद विजयपत ने पूरे धंधे पर कब्जा जमा लिया और कभी अपनी विधवा भाभी व भतीजों की मदद नहीं की। उलटे इस परिवार ने 2007 में एक पारिवारिक समझौता किया था, जिसके तहत मलाबार हिल्स स्थित बहुमंजिली इमारत में उनके भाई अजयपत की विधवा व दो बेटों व उन्हें एक-एक डुप्लेक्स दिया जाना था। इस वादे को पूरा नहीं किया गया और उनके समेत चार लोगों ने इसे हासिल करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया है। 

उनका अपने बाकी सगे भाईयों के साथ भी जुहू स्थित बेशकीमती संपत्ति को लेकर मुकदमेबाजी है, अदालत के आदेश के बावजूद उन्होंने इस संपत्ति को नहीं छोड़ा। बाद में वे सात लाख रुपए महीने पर किराए का घर लेकर रहने लगे व इस राशि का भुगतान रेमंड कंपनी कर रही थी। 

तभी ऊपर वाले की बेआवाज लाठी घूमी और वह उक्ति चरितार्थ हो गई - जो जस करहिं सो तस फल चाखा | 

विजयपत सिंघानिया के दो बेटों में से बडा बेटा करीब 17 साल पहले अपने पिता से संबंध समाप्त कर सिंगापुर चला गया। उसने उन पर आरोप लगाया था कि वे उसे व उसकी मां को छोटे भाई के सामने अपमानित करते हैं। वे उसके रहते हुए छोटे भाई की कंपनी का अध्यक्ष व प्रबंध निदेशक बनाना चाहते हैं। वह सिंगापुर में बस गया और उसने वहां अपना अलग साम्राज्य खड़ा कर लिया। उधर विजयपत ने बाद में अपनी सारी संपत्ति व शेयर जो कि आज करीब 10 अरब रुपए के हैं अपने छोटे बेटे गौतम हरि सिंघानिया के नाम कर दिए।

समय का चक्र घूमा और हालत यह हुई कि दो साल पहले पिता ने मुंबई हाईकोर्ट में मुकदमा दायर करके बेटे पर आरोप लगाया कि उसने उन्हें कौड़ी-कौड़ी का मोहताज बना दिया है। उसने उनका ड्राइवर व कार वापस ले ली है, जिस फ्लैट में वे रहते हैं वो उसका किराया भी नहीं देता है। इससे पहले वे जहां रहते थे उसने उसका किराया भी देना बंद कर दिया था। बेटे ने उनके हिस्से का मलाबार हिल्स का डुप्लेक्स फ्लैट भी उन्हें नहीं दिया। इसके साथ ही उनकी बड़ी दाढ़ी वाली मैली कुचैली जींस पहनी तस्वीर सोशल मीडिया पर आ गई। जिसे देख कर किसी का दिल द्रवित हो जाए। 

जब मामला खबरों में आया तो अरबपति बेटे ने जवाब दिया कि जो कुछ भी किया गया है, वह रेमंड कंपनी के प्रबंधन मंडल और शेयरधारकों का फैसला था। उसने यहां तक कहा कि मेरे पिता को यह नहीं भूलना चाहिए कि जो पेड़ झुकने को तैयार नहीं होते हैं वे टूट जाते हैं। 

कुछ साल पहले सिंगापुर में बस गए उनके बड़े बेटे के चार बच्चों, तीन बेटियों व एक बेटे ने भी रेमंड कंपनी पर अपने हिस्से का दावा कर दिया। उन्होंने अपने मां-बाप को भी पार्टी बनाते हुए कहा कि यह संपत्ति उनके परदादा ने अर्जित की थी इसलिए उनके पिता के न चाहने के बावजूद भी उनका इस पर अधिकार बनता है। पूरा परिवार अरबों रुपए का मालिक होते हुए भी मुकदमेबाजी में फंसा हुआ है। विजयपत ने पहले भाइयों के साथ झगड़ा किया और अब दोनों ही बेटों के साथ उनकी मुकदमेबाजी चल रही है। 

जानने वाले कहते हैं कि उन्होंने जो कुछ किया था वहीं अब उनके सामने आ रहा है। उनकी हालत देख कर दो बातें याद आती हैं। पहली यह कि पूत-कपूत तो क्यों धन संचय व पूत सपूत तो क्यों धन संचय। व दूसरी यह कि हर व्यक्ति को यह ध्यान रखना चाहिए कि एक दिन उसे भी बूढ़ा होना है व उसके बच्चे यह देख रहे हैं कि वह अपने बड़ों व करीबियों के साथ कैसा बरताव कर रहा है। 

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क्रांतिदूत: अर्थ पिपासा में टूटते बिखरते झगड़ते बड़े घराने - बुजुर्गों की दुर्दशा |
अर्थ पिपासा में टूटते बिखरते झगड़ते बड़े घराने - बुजुर्गों की दुर्दशा |
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