ब्लू व्हेल गेम बाल मन की संवेदना का अपहरण - डॉ. अर्चना तिवारी

आभासी दुनिया के एक खेल ने तबाह कर दिया है। रोज रोज कोई न कोई बच्चा मर रहा है और दुनिया की साड़ी ताकतें मिल कर भी इसे रोक नहीं पा रही है...


आभासी दुनिया के एक खेल ने तबाह कर दिया है। रोज रोज कोई न कोई बच्चा मर रहा है और दुनिया की साड़ी ताकतें मिल कर भी इसे रोक नहीं पा रही हैं। तकनीक का ऐसा भय पहली बार पैदा हुआ है। ऐसा पहली बार आभास हो रहा है की जिस तकनीक के लिए सारी दुनिया में होड़ मची है , वह मनुष्यता के लिए कितनी घातक है। सभी खुद को सक्षम कहते हैं लेकिन ब्लू ह्वेल नाम के इस  दानव को कोई सम्हाल नहीं पा रहा। यह सच में अब बहुत बड़ी चिंता का विषय है। वास्तव में  ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’ एक गेम नहीं मौत का कुआं है। खासकर भावनात्मक रूप से कमजोर किशोरों और युवाओं के लिए यह और भी ज्यादा घातक है। ऐसे भावुक युवा एक बार इसके जाल में फंस जाते हैं तो फिर उनका वापस निकल पाना नामुमकिन सा नजर आने लगता है। लखनऊ , कानपुर ,मुंबई, तिरुवनंतपुरम, इंदौर, दिल्ली, पीलीभीत हो या पठानकोट युवा लगातार इसके जाल में फंसकर मौत को गले लगा रहे हैं। पूरी दुनिया परेशान है। लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कोई इस गेम को छोड़कर बाहर नहीं निकल सकता। दरअसल यह पूरा खेल मनोवैज्ञानिक है जिसमे बाल मन की संवेदना का अपहरण कर लिया जाता है। एक बार इसकी गिरफ्त में आने वाला बच्चा पूर्णतया उन्ही के नियंत्रण में होकर रह जाता है। 


 शुभम के साहस  ने काम किया 

अभी तक इस खेल का शिकार बन चुके बच्चो में से एक तो ऐसा निकला है जिसने इससे खुद को बचाया भी है और इस जंजाल को बता भी रहा है। यह कारनामा कर दिखाया है बरेली के 17 वर्षीय शुभम ने। शुभम ने मौत के इस खेल का चक्रव्यूह तोड़ डाला है। अपनी हिम्मत के दम पर शुभम ने इस खूनी खेल को बीच में ही छोड़ दिया। शुभम का कहना है कि खेल को कुछ इस तरह गढ़ा गया है कि वह खेलने वाले के दिमाग पर हावी हो जाता है। हालांकि, यह सिर्फ भ्रम और दबाव पर टिका है। मजबूत इच्छा शक्ति और मानसिक दृढ़ता से यह खेल आसानी से छोड़ा जा सकता है।‘ब्लू व्हेल चैलेंज’ से पीछा छुड़ाने वाले शुभम ने इस बारे में  सिलसिलेवार ढंग से बताया कि कैसे उन्हें टास्क मिलते थे और कैसे उन्होंने इस खूनी खेल से पीछा छुड़ाया।यहाँ शुभम को दिए जाने वाले तीन टास्क के बारे में उल्लेख करना उचित होगा -



टॉस्क 01 : शुभम ने बताया कि उन्होंने ब्लू व्हेल चैलेंज खेलने के लिए डाउनलोड किया और चार अगस्त को पहला टास्क ‘0079046583964’ मोबाइल नंबर से मैसेज के जरिए मिला। इसमें कलाई पर अच्छे दोस्त को गाली लिखकर 24 घंटे खुली बांह कर टहलना था। टास्क पूरा होने पर पांच अगस्त को शुभकामना का मैसेज आया।

टॉस्क 02 : दूसरा टास्क छह अगस्त को मिला। इसमें सुबह 4.20 बजे हॉरर मूवी ‘हॉन्टेड इन कनेक्टिकट’ ऑनलाइन दिखाई और वीडियो कॉलिंग के जरिए शुभम के चेहरे पर आने वाले भावों पर नजर रखी गई। टास्क पूरा होने पर सात अगस्त को शुभकामना मैसेज मिला।


टॉस्क 03 : आठ अगस्त को तीसरा टास्क बांह पर व्हेल की टेल की आकृति ब्लेड से काट कर बनाने का मिला। शर्त यह रखी कि लाइव मूवमेंट के जरिए इसे दिखाना होगा। इस पर शुभम ने मोबाइल स्विच ऑफ कर दिया। दोपहर 12 बजे के करीब मोबाइल ऑन किया तो उकसाते हुए ‘यू कैन डन’ के मैसेज आने लगे। नहीं किया तो परिवार और दोस्तों के प्रति भड़काया और ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’ को हमदर्द बताते हुए मैसेज भेजे गए। इन्कार करने पर परिवार को बर्बाद करने की धमकियां भी दी गईं। इससे शुभम डिप्रेशन में आ गया।
टास्क को पूरा न करने पर शुभम और उसके परिवार को जान से मारने की धमकी दी गई। कहा गया कि भारत में भी हमारे लोग हैं, जो पूरे परिवार को मार देंगे, इसलिए गेम आगे खेलो। लेकिन शुभम आगे नहीं खेला और मौत के कुएं से आजाद हो गया।

 पीछा छुड़ाना नहीं आसान

इस घातक खेल से पीछा छुड़ाना बहुत आसान नहीं है।  इस गेम को खेलने के बाद साइन आउट नहीं किया जा सकता। शुभम ने अनइंस्टाल कर दिया, तो मोजिला पर जो भी सर्च करता उसकी जगह ब्लू व्हेल चैलेंज ही आता। इसके बाद एक नंबर से मैसेज आया, जिसे ट्रू-कॉलर पर सर्च किया तो पता चला कि पहला अक्षर सात रूस का कोड है। इसके बाद 15 अगस्त की रात को मोबाइल री-सेट कर दिया। इसके बाद कोई मैसेज नहीं आया।
ब्लू व्हेल चैलेंज को हराने वाले शुभम का कहना कि जो भी लोग इसे खेल रहे हैं। वह डरें नहीं, बल्कि दोस्तों और माता-पिता को बताएं। एडमिनिस्ट्रेटर सिर्फ टॉर्चर कर सकता है। इसके अतिरिक्त कुछ नहीं कर सकता। जो लोग डर जाते हैं। वही अपनी जिंदगी के लिए खतरा बनते हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि ब्लू व्हेल गेम के भंवर में फंसकर दो बार जान देने की कोशिश करने वाला हर बच्चा  अभी भी तनाव में है। पठानकोट में इसी तरह के  एक बच्चे की  काउंसिलिंग करने वाली मनोरोग विशेषज्ञ का कहना है  कि उसके मम्मी-पापा अपनी जॉब में व्यस्त रहते थे। काउंसिलिंग में छात्र ने बताया कि जब घर पर मम्मी-पापा के साथ कुछ समय बिताने का मौका मिलता तो दोनों अपने-अपने मोबाइल में बिजी हो जाते थे। अक्सर दोनों झगड़ा भी करते। यहां तक कि स्कूल जाते समय वह उनकी बाय का जवाब भी नहीं देते थे। ऐसे में वह अपने आप को अकेला महसूस करने लगा था।
शुभम ने बताया कि उसने कई बार मम्मी-पापा को बताने की भी कोशिश की, लेकिन कहा कि उनके पास मेरे लिए समय ही नहीं था। उनको देख वह भी मोबाइल में बिजी हो जाता। कभी गेम खेलता तो कभी सोशल साइट सर्च करता। इसी बीच साइट खोजते-खोजते वह ब्लू व्हेल गेम तक पहुंचा। उस गेम को खेलते-खेलते वह खुद को दूसरों से अलग महसूस करने लगा। हॉरर मूवीज व टास्क उसे रात को सोने नहीं देते। वह बस जीतना चाहता था। अपने डर पर काबू पाना चाहता था। चाहता था कि कोई उसे समझे। बस, ऐसा करते-करते उसे पता ही नहीं चला कि कब उसने जिंदगी की सबसे बड़ी गलती कर दी।

 क्या कहते हैं एक्सपर्ट

इस बारे में मनोवैज्ञानिकों की राय बहुत महत्वपूर्ण है। प्रख्यात मनोवैज्ञानिक डॉ. आनंद प्रकाश का कहना है कि शुरुआत में बच्चे सोचते हैं कि एक बार करके देखते हैं क्या होता है? वे सोचते हैं कि एक-दो बार खेलेंगे, फिर हम छोड़ देंगे। फिर बच्चों के ग्रुप बन जाते हैं और आपस में गेम्स की लेवल को लेकर भी उनमें आपसी प्रतियोगिता होने लगती है।  टीनएजर्स में चैलेंज स्वीकार करके विनर बनने की जिद बढ़ रही है। इससे इस गेम का शिकार किशोर हो रहे हैं। अभिभावकों को बच्चों पर ध्यान देने और समय देने की जरूरत है। इस खेल के प्रस्तोता या कि नियंत्रक , जो भी लोग हैं वे मूलतः अपराधी प्रवृत्ति की मानसिकता वाले ही हैं। उन्हें इस खेल से क्या फायदा या नुक्सान है , यह तो वे ही बता सकते हैं , लेकिन अब यह दुनिया की सरकारों के लिए भी चिंता की बात है। 
 ये लोग , जो भी हैं , वे बच्चे में विड्रॉवल सिमटम्स दिखते हैं, उसके अंदर एंग्जाइटी रहती है। ऐसे गेम बच्चा जब भी खेलता है वह पैरेंट्स से छिपकर खेलता है। बच्चे का स्वभाव उग्र होने लगता है। वह खाना-पीना छोड़ देता है, पढ़ाई में भी उसका मन नहीं लगता। बच्चा डिप्रेशन में जाने लगता है। बच्चा अपने माता-पिता और दोस्तों से दूरी बना लेता है। जब भी बच्चों में ऐसा कोई दिखे तो माता-पिता को चाहिए कि उसे कभी अकेला न छोड़ें। रात को भी उसे अकेले न सुलाएं। बच्चे के आसपास रहें और उसे बिल्कुल भी यह एहसास
 न होने दें कि आप उस पर नजर रख रहे 
हैं। बच्चे को डांटना और मारना नहीं चाहिए, क्योंकि इससे स्थिति और बिगड़ेगी ही। ऐसे बच्चे को प्यार की जरूरत होती है। उसे लगना चाहिए कि उसके माता-पिता, दोस्त और सामाज उसके साथ हैं।

डॉ . अर्चना तिवारी
लेखिका परिचय -लेखिका प्रगति की सचिव एवं गृह विज्ञान की आचार्य है । 

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क्रांतिदूत: ब्लू व्हेल गेम बाल मन की संवेदना का अपहरण - डॉ. अर्चना तिवारी
ब्लू व्हेल गेम बाल मन की संवेदना का अपहरण - डॉ. अर्चना तिवारी
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