विजयादशमी : विजयोत्सव मर्यादा का - पूनम नेगी

हमारी संस्कृति आदिकाल से ही शौर्य और पराक्रम की आराधक रही है और विजयदशमी का पर्व उसी परम्परा को जीवन्तता प्रदान करने वाला हमारा राष्ट्री...



हमारी संस्कृति आदिकाल से ही शौर्य और पराक्रम की आराधक रही है और विजयदशमी का पर्व उसी परम्परा को जीवन्तता प्रदान करने वाला हमारा राष्ट्रीय महापर्व है। आज जिस तरह विश्वभर में आतंकी शक्तियां सिर उठा रही हैं, बढ़ती अराजकता और आतंकी शक्तियों का नाश करने की सच्चे सामर्थ्य का नाम है-श्रीराम। वैदिक चिंतन कहता है, "आग, शत्रु और रोग का आभास होते ही निदान करना जरूरी है। इससे पहले कि समय पाकर ये तीनों अपना विकराल रूप धारण करें और हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाएं, उन पर काबू पा लिया जाना चाहिए।" 

विजयदशमी का पर्व असल में संकल्पबद्ध और दृढ़निश्चयी होकर बाहरी और भीतरी शत्रुओं को जड़ सहित उखाड़ फेंकने का महापर्व है। विजयदशमी का महापर्व साबित करता है कि अन्यायी चाहे कितना ही शक्तिशाली क्यों न हो, उसका एक न एक दिन नाश अवश्य होता है। मगरकेवल असत्य पर सत्य की विजय कहने भर से विजयदशमी पर्व का संदर्भ स्पष्ट नहीं हो सकता। कारण कि असत्य व अन्याय पर सत्य व न्याय की विजय के यूं तो अनेक उदाहरण भारतीय साहित्य में उपलब्ध हैं लेकिन राम व रावण का यह युद्ध कई मायनों में अलग है। 

एक ओर मायावी व साधन सम्पन्न रथी रावण दूसरी ओर साधनहीन बिरथी रघुवीर हैं। यह महायुद्ध धन और बल की असीमित शक्ति से सम्पन्न मायावी जाल रचने वाले रावण और सिर्फ एक धनुष-बाण लिए नंगे पांव खड़े उस वनवासी राम के मध्य है जिसे आज की भाषा में हम समाज का अंतिम व्यक्ति कह सकते हैं। मगर खास बात यह है कि इस युद्ध के वनवासी नायक राम केवल बुद्धिकौशल के बल पर जीने वालों में से नहीं हैं। विवेक उनकी सबसे बड़ी खूबी है। साथ ही वे अत्यधिक व्यवहारिक, अत्यंत विनम्र व शीलवान हैं। 

वनवास काल में श्रीराम अपने संपूर्ण आचरण द्वारा हमें तीन महत्वपूर्ण अनमोल सूत्र देते हैं, पहला सूत्र है संयम का, दूसरा संघर्ष का तथा तीसरा त्याग का। "राम का वनवास" इन तीनों का सुन्दर समन्वय प्रस्तुत करता है, जिसमें उनका जीवन, उनकी भावनाएं और कार्य संयमित हैं जिसके बल पर वे आम जन की साधनहीन संगठन शक्ति की महत्ता प्रदर्शित करते हैं। 

श्रीराम के जीवन में सामाजिक मर्यादाएं अपने सर्वोत्कृष्ट रूप में परिलक्षित होती हैं। वे पिता के वचन का मान रखने के लिए 14 साल जंगलों में वनवासी की तरह रहे। उस वन क्षेत्र में अपने क्षत्रियोचित धर्म का पालन करते हुए उन्होंने साधु संतों व वन समाज को राक्षसी शक्तियों के आतंक से मुक्ति दिलायी। अपने वनवास काल में उन्होंने वनक्षेत्र के समस्त समुदायों व जातियों को संगठन के सूत्र में जोड़ा। श्रीराम ने मानव समुदाय को विजय और सफलता के लिए एक अभिनव मन्त्र दिया,"संगठन मंत्र"। इसी के बल पर उन्होंने रावण के अतुलित शक्ति-सम्पन्न साम्राज्य को ध्वस्त किया। समाज में समरसता का बीजारोपण किया। प्रत्येक वर्ग के व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के गले लगाया। अहिल्या, निषादराज गुह, वानरराज सुग्रीव, जामवंत, जटायु, शबरी, विभीषण, हनुमान और अंगद- ये सभी श्रीराम के चरित्र को उजला बनाने वाले नक्षत्र कहलाए।

कभी विचार किया है कि भारतीय पुरा साहित्य में जिस रावण को उच्च ऋषिकुल में जन्म लेने वाले महान शिवभक्त, वेदों के प्रकाण्ड विद्वान राजनीति के महापंडित के रूप में चित्रित किया गया है; ऐसा महान व्यक्ति क्योंकर दुर्गति को प्राप्त हुआ! ज्ञानी होने के साथ-साथ रावण परम पराक्रमशाली भी है और अत्यधिक समृद्ध भी। सोने की लंका के अधिपति की समृद्धि का अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है। ऐसा धनी, बली, ज्ञान सम्पन्न व्यक्ति क्यूंकर ऐसी दुगर्ति को प्राप्त हुआ कि उसके पुतले बना बनाकर सदियों से उसका दहन कर रहे हैं ?

एक ओर पिता के वचन का मान रखने के लिए वनवास ग्रहण करने वाले शील, विवेकशीलता की डोर थामे मर्यादा पुरुषोत्तम राम का चरित्र है जो उनके त्याग व तपस्वी जीवन तथा बाह्य व आंतरिक संघर्ष को प्रस्तुत करता है और दूसरी ओर रावण का अमर्यादित, अहंकारी व लोभी-लोलुप चरित्र जो छल छद्म से आसुरी शक्तियों का अधिपति बन स्वयं को सर्वोपरि मानने का दंभ संजोये हुए है। दशहरा इन दोनो विपरीत ध्रुवों के आपसी संघर्ष का प्रतीक है। 

आज भी मनुष्य को अपने जीवन के अंधेरों से संघर्ष करने के लिये इस प्रेरक एवं प्रेरणादायी पर्व की संस्कृति को जीवंत बनाने की जरूरत है। आखिर कैसे संघर्ष करें घर-घर में छिपी बुराइयों से, जब घर आंगण में रावण-ही-रावण पैदा हो रहे हां, चाहे भ्रष्टाचार के रूप में हो, चाहे राजनीतिक अपराधीकरण के रूप में, चाहे साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने वालों के रूप में हो या फिर शिक्षा, चिकित्सा को व्यापार बनाने वालों के रूप में। हालांकि काफी कठिन है यह बुराइयों से संघर्ष करने का सफर। बहुत कठिन है तेजस्विता की यह साधना। मगर यही एकमात्र उपाय है जो देश की संस्कृति को बचा सकता है। भटकती मानव संस्कृति को सुरक्षा देने के लिए श्रीराम के आदर्श जीवन-मूल्यों की समाज में प्रतिष्ठिा आज के समय की महती जरूरत है। 

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के आदर्श आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने त्रेतायुग में थे। न्याय, समरसता, भाईचारा व रिश्तों को सहेजने की कला और मानव कल्याण किस प्रकार किया जाता है। इसीलिए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी देश की आजादी के बाद देश में "रामराज्य" की स्थापना करना चाहते थे। 

रामराज्य की विशिष्टता है सनातन जीवन मूल्यों और सच्चे समाजवाद पर आधारित उनकी प्रजातांत्रिक कार्यप्रणाली। यही कारण है कि युगों बाद भी आज भारतीय समाज में श्रीराम के आदर्श जिंदा हैं। सच तो यह है भारतीय जीवन मूल्यों के पोषक देशवासियों के लिए श्रीराम और उनका जीवन आदर्श कभी भी खत्म न होने वाली संपत्ति है। श्रीराम की आदर्श शासन पद्धति में दर्शन, राजनीति, नैतिकता और सामंजस्यपूर्ण व्यवहार के कारगर सूत्र निहित हैं। बढ़ती अराजकता और आतंकी शक्तियों का नाश करने की सच्चे सामर्थ्य का नाम है-श्रीराम। राम रावण का युद्ध आसुरी व आतंकी शक्तियों पर सत्य व न्याय की विजय का पर्व है। 

तीन लोकों में दुर्लभ स्वर्ण नगरी लंका को जीतने के बाद भी रंच मात्र भी लोभ उन्हें छू तक न गया। श्रीराम का जीवन हम मानवों को प्रेरणा देता है कि "लालच" और "पराई संपत्ति" हमें कभी भी सुख नहीं दे सकती। आम आदमी को झूठे मोह-माया के जाल में उलझने से रोकने में श्रीराम के "आदर्श" सच्चे पथप्रदर्शक हैं। राम का साहस हमारी वृत्तियों को उर्ध्वगामी बनाने की प्रेरणा देता है।

आज के सामाजिक जीवन में सभी आपाधापी में परेशान हैं। सबको स्वार्थ और अहंता की कारा घेरे हुए है। हमने अपने पूर्वजों द्वारा बतायी गयी पर्वों की पुण्य प्रेरणाओं को पूरी तरह भुला दिया हैं। पर्वों में समायी सांस्कृतिक संवेदना हमारी मानसिक जड़ता के कुटिल व्यूह में फंसकर मुरझा गयी है। सत्य को जानने, समझने और अपनाने का साहस और संकल्प शायद हम सभी में चुकता जा रहा है। ऐसे में सांस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय महत्त्व के बिन्दुओं पर सोचने का जोखिम कौन उठाए; यह हमारा राष्ट्रीय और सांस्कृतिक प्रमाद ही है। जबकि विजयादशमी इसी साहस और संकल्प का महापर्व है। यह पर्व अंतस में प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करने और उन्हें सही दिशा में नियोजित करने की महान प्रेरणा देता है। 

पुराने समय में विजयादशमी के दिन राजा, महाराजा अपने राज्य की सीमा लांघ कर युद्ध करने निकलते थे। इस परमपरा को "सीमोल्लंघन" कहते थे। "सीमोल्लंघन" का अर्थ अपनी मर्यादा तोडना नहीं वरन अपने व्यक्तित्त्व को सीमित न रखते हुए क्षमताओं का असीम विकास करना है। क्या हम विजयादशमी के पर्व पर अपनी इस क्षमता का विकास करने का संकल्प कर सकते हैं? क्या हम हमारे समाज को संगठित कर विजयी सीमोल्लंघन करने निकलेंगे! 

आज का संघर्ष नए रूप में हमारे सामने हैं। आतंकवाद असुर जैसा रूप धारण कर मासूम लोगों की जान ले रहा है। भूमंडलीकरण के बाद कई चीजें मायावी रूप धारण कर हमारे सामने आ रही हैं। क्या हम इन नए आक्रमणों पर विजय प्राप्त कर सकते हैं? विजयादशमी के पर्व पर इस दिशा में हमें सोचना होगा। विश्व में जीवन की प्रगति के जो मार्ग चुने गए थे वे पराजित, ध्वस्त हैं। ऐसे में विश्व को एक नये वैचारिक मार्गदर्शन की जरूरत है। दुनिया को चिरविजयी विचार देने की क्षमता केवल भारतीय जीवनदर्शन में है। विश्व की मानवता को पावन करने की क्षमता हम ही विश्व को दे सकते हैं। यही विजयादशमी का संदेश है। 

तो आइए इस शौर्य के इस विजय पर्व को हम सब मिल-जुलकर दुष्प्रवृत्तियों के रावण दहन के संकल्प के साथ मनाएं। संकल्प लें अपनी निज की और सामूहिक रूप से समाज की दुष्प्रवृत्तियों को मिटाने का, अनीति और कुरीति के विस्र्द्ध संघर्ष करने का तथा आतंक और अलगाव के विरुद्ध जूझने का। हमारे इस संकल्प में ही इस महापर्व की सार्थकता निहित है।

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विजयादशमी : विजयोत्सव मर्यादा का - पूनम नेगी
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