तलवार दम्पति बरी , पर मीडिया ? - संजय तिवारी

आरुषि के माता पिता बेटी की ह्त्या से मुक्त हो गए। हाईकोर्ट ने उन्हें कही दोषी नहीं माना। लेकिन देश की मीडिया के हो हल्ले के बाद पिछले न...

आरुषि के माता पिता बेटी की ह्त्या से मुक्त हो गए। हाईकोर्ट ने उन्हें कही दोषी नहीं माना। लेकिन देश की मीडिया के हो हल्ले के बाद पिछले नौ साल से अपनी ही बेटी की ह्त्या के आरोप में यंत्रणा जेहल रहे इस दंपत्ति को बीते नौ वर्षो की उस यंत्रणा का हिसाब कौन देगा। सैकड़ी किताबें लिखी गयीं। फिल्म बनी। बेटी की मौत तो हुई ही , माँ बाप को भी तमाशा बना दिया। यह मीडिया कब सुधरेगा ? अभी रेयान स्कूल के प्रद्युम्न की ह्त्या पर भी देश ने यही तमाशा देखा। लोग आजिज आ गए। मौतों को मसाला बनाने वाले इस मीडिया पर आज हाईकोर्ट के फैसले के बाद इस मीडिया को कौन सजा देगा जो चिल्ला चिल्ला कर आरुषि के माता पिता को केवल हत्यारा ही नहीं , बहुत कुछ बताते रहे। इस फैसले ने फिर यह साबित किया है की भारत का मीडिया कही न कही अपना रास्ता भटक गया है। 

भारत की मीडिया को अब अपने देश की राजनीती की नब्ज भी नहीं समझ में आती। पिछले कई वर्षो से ऐसा होता आ रहा है कि भारतीय मीडिया को केवल भटकाव का ही सामना करना पड़ा है। इसके हर सर्वे फ़ैल मिलते हैं। इसे यह नहीं पता चल पाता कि उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री कौन बनेगा। इसे यह नहीं पता चल पाता कि अगला राष्ट्रपति कौन बनेगा। इसे न तो राजनीति की समझ का पता है और न है देश की नब्ज टटोल पता है। आरुषि या प्रद्युम्न जैसी घटनाओ को मसालेदार बनाकर बेचना ही इसका काम रह गया है। कभी रामपाल , कभी आसाराम और अब राम रहीम और हनीप्रीत इसके प्रिय विषय हो जाते हैं। ऐसी मीडिया से भला देश को क्या उम्मीद करनी चाहिए। 

इलाहाबाद हाईकोर्ट नौ साल पुराने नोएडा के आरुषि-हेमराज मर्डर केस में तलवार दंपती को बरी कर दिया है। इस मामले में सीबीआई कोर्ट ने आरुषि के पैरेंट्स राजेश और नूपुर तलवार को 2013 में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। तब से वो गाजियाबाद के डासना जेल में बंद थे। उन्होंने इसके खिलाफ हाईकोर्ट में पिटीशन दायर की थी। तलवार दंपती के वकील तनवीर अहमद ने कहा- मेरे मुवक्किल कल यानी शुक्रवार को किसी भी वक्त रिहा हो सकते हैं। हमें कोर्ट की डिटेल कॉपी का इंतजार है। 

आरुषि तलवार की हत्या 16 मई 2008 को नोएडा में उसके घर पर हुई थी। पांच साल चले केस के बाद सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने आरुषि के पैरेंट्स राजेश और नुपुर तलवार को उसकी हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद सुनाई थी। हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब तलवार दंपती को बरी कर दिया है।आरुषि हेमराज हत्याकाण्ड भारत का सबसे जघन्य व रहस्यमय हत्याकाण्ड था जो 15–16 मई 2008 की रात नोएडा के सेक्टर 25 (जलवायु विहार) में हुआ। आरोप था कि पेशे से चिकित्सक दम्पति ने अपनी एकमात्र सन्तान आरुषि (आयु: 14 वर्ष) के साथ अपने घरेलू नौकर हेमराज (आयु: 45 साल) की नृशंस हत्या कर दी और सबूत मिटा दिये। एक नाबालिग लड़की और अधेड़ व्यक्ति के दोहरे हत्याकाण्ड से सम्बन्धित इस घटना ने मीडिया के माध्यम से जनता का ध्यान आकर्षित किया। इसे लेकर कई किताबे भी लिखी गयी। फिल्म भी बनी। यह हत्याकाण्ड उस समय हुआ जब आरुषि के माता-पिता दोनों ही अपने फ्लैट में मौजूद थे। आरुषि के पिता ने बेटी को उसके बेडरूम में जान से मारने का शक अपने नौकर पर व्यक्त करते हुए पुलिस में हेमराज के नाम एफआईआर दर्ज़ करायी। पुलिस हेमराज को खोजने बाहर चली गयी। अगले दिन नोएडा के एक अवकाश प्राप्त पुलिस उपाधीक्षक के के गौतम ने उसी फ्लैट की छत पर हेमराज का शव बरामद किया था। 

इस घटना ने समय-समय पर कई मोड़ लिये। कई बार ऐसी खबरें आयीं कि काण्ड नौकर हेमराज के साथियों ने किया। कई बार इसमें बलात्कार के बाद हत्या की खबर आयी। और कई बार यह सन्देह भी जताया गया कि कहीं डॉक्टर दम्पति ने मिलकर ही तो इस दोहरे हत्याकाण्ड को अंजाम नहीं दिया। परन्तु मीडिया के लगातार हस्तक्षेप के चलते इस केस को दबाया नहीं जा सका। और पुलिस तथा सीबीआई की तमाम दलीलों व दोनों पक्ष के वकीलों सहित जनता की भावनाओं को देखते हुए इस पूरे मामले की तहकीकात रिपोर्ट को स्पेशल जुडीशियल मजिस्ट्रेट प्रीति सिंह की अदालत में समीक्षा के लिये भेजा गया। प्रीति सिंह ने पहली सीबीआई टीम द्वारा दाखिल क्लोज़र रिपोर्ट को सिरे से ही खारिज़ कर दिया और दुबारा जाँच के आदेश दिये।

इसके बाद हत्याकाण्ड की जाँच सीबीआई ने तेज तर्रार जाँच अधिकारी ए जी एल कौल को सौंपी। कौल और उनकी पूरी टीम ने मामले की कई कोणों से जाँच की और गाजियाबाद में विशेष रूप से गठित सीबीआई अदालत में दुबारा चार्जशीट दाखिल की। जस्टिस श्यामलाल ने आरुषि-हेमराज के बहुचर्चित रहस्यमय हत्याकाण्ड का फैसला सुनाते हुए आरुषि के माता-पिता नूपुर एवं राजेश तलवार को दोषी करार दिया। 26 नवम्बर 2013 को विशेष सीबीआई अदालत ने आरुषि-हेमराज के दोहरे हत्याकाण्ड में राजेश एवं नूपुर तलवार को आईपीसी की धारा 302/34 के तहत उम्रक़ैद की सजा सुनाई। दोनों को धारा 201 के अन्तर्गत 5-5 साल और धारा 203 के अन्तर्गत केवल राजेश तलवार को एक साल की सजा सुनायी। इसके अतिरिक्त कोर्ट ने दोनों अभियुक्तों पर जुर्माना भी लगाया। 

15–16 मई 2008 की रात राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अन्तर्गत आने वाले महानगर नोएडा के सेक्टर 25 (जलवायु विहार) में हुआ मर्डर मिस्ट्री के नाम से मशहूर इस बहुत बड़ी घटना का सार संक्षेप इस प्रकार है:

डॉ राजेश तलवार व डॉ नूपुर तलवार के नोएडा सेक्टर-25 स्थित जलवायु विहार के फ्लैट नम्बर एल-32 के अन्दर 15 मई 2008 की रात जो कुछ हुआ उसकी खबर सभी अखबारों की सुर्खियों में अगले दिन थी। छपी हुई खबरों के अनुसार घर में माँ-बाप के साथ उनकी बेटी (आरुषि) और उनका घरेलू नौकर हेमराज सहित केवल चार ही लोग थे और रात के 12 से 1 बजे के बीच आरुषि व हेमराज की हत्या हो गयी। आरुषि का शव अगले दिन दोपहर उसके अपने बेडरूम में मिला जबकि हेमराज का शव दूसरे दिन उसी फ्लैट की छत पर बरामद हुआ। आरुषि के शव की हालत देखकर लगता था कि हत्यारे ने उस पर काफी तेज वार किये होंगे परन्तु इसके बावजूद आरुषि की न तो कोई चीख निकली और न किसी को कोई शोरगुल सुनायी दिया।

बाद में खोजबीन करने पर जो तथ्य निकलकर सामने आये वे काफी चौंकाने वाले थे। मसलन हत्या के बाद आरुषि के कमरे में रखे मोबाइल व कम्प्यूटर रात एक से चार बजे के बीच कई बार इस्तेमाल हुए पाये गये। नौकर हेमराज और आरुषि दोनों अपने-अपने कमरों मे थे। जब सुबह झाड़ू पोंछा करने वाली नौकरानी आयी तो डाक्टर दम्पति ने अपनी बेटी की मौत के बारे में उसे बताया। रिपोर्ट करने पर पुलिस घर आयी परन्तु वह भी जल्दबाजी में घटनास्थल की तफ्तीश छोड़ हेमराज को खोजने के बहाने घर के बाहर चली गयी। एक दिन बाद जब रिटायर्ड डीएसपी के के गौतम फ्लैट की छत पर तहकीकात करने गये तो उन्हें नौकर हेमराज का शव वहाँ पड़ा मिला। हेमराज का शव मिलते ही समूचे हत्याकाण्ड की दिशा ही बदल दी और आरुषि हेमराज हत्याकाण्ड एक रहस्य बन गया। 12 नवम्बर 2013 को केस की अन्तिम सुनवाई पूर्ण करने के पश्चात् गाजियाबाद में विशेष रूप से गठित सीबीआई अदालत ने 25 नवम्बर 2013 को निर्णय सुनाना निश्चित किया।

पांच साल चले केस के बाद सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने आरुषि के पैरेंट्स राजेश और नुपुर तलवार को उसकी हत्या का दोषी करार देते हुए उम्रकैद सुनाई थी। हालांकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब तलवार दंपती को बरी कर दिया है। इस घटना में घर के नौकर हेमराज की भी हत्या हुई थी। सीबीआई कोर्ट ने कहा था कि घटना के वक्त हालात और सबूत बताते हैं कि बाहर से कोई शख्स घर में नहीं आया। चार लोग घर में थे। दो (आरुषि और हेमराज) की लाशें मिलीं। बाकी दो (राजेश और नुपुर) सही सलामत थे। कोर्ट ने कहा था- परिस्थिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) तलवार दंपती के खिलाफ हैं।

सीबीआई कोर्ट ने इन 7 आधारों पर सुनाई थी उम्रकैद

1) घर में सिर्फ चार लोग थे। घर का दरवाजा भी अंदर से बंद मिला था। 

तलवार दंपती की दलील: दरवाजे पर ऑटोमैटिक लॉक था। जो बाहर और अंदर से बंद किया जा सकता है। हत्या के बाद मेन गेट को बाहर से खींचकर लॉक किया गया।

2) आरुषि के कमरे की चाबी राजेश के पास रहती थी। फिर कोई अंदर कैसे जा सकता है?

तलवार दंपती की दलील: नूपुर ने बयान में बताया था कि वह इंटरनेट का राउटर खोलने के लिए आरुषि के कमरे में गई थी। इसी दौरान आरुषि के कमरे की चाभी लॉक में फंसी रह गई।

3) सभी सो रहे थे तो घर का राउटर बार बार ऑन-ऑफ कैसे हो रहा था?

तलवार दंपती की दलील:जांच टीम ने हत्या वाले दिन सुबह छह बजे से दोपहर एक बजे तक राउटर में ऑटोमैटिक ऑन-ऑफ की प्रक्रिया जारी रहने की बात पाई थी। जब यूपी पुलिस घर में थी, तब भी राउटर अपने आप ऑन-ऑफ हो रहा था।

4) आरुषि की मौत के बाद उसके माता-पिता ने उसे गले नहीं लगाया। राजेश-नूपुर के कपड़ों में खून भी नहीं लगा हुआ था।

तलवार दंपती की दलील:आरुषि का गला कटा हुआ था। ऐसे में राजेश और नूपुर अपनी बेटी को गले कैसे लगा सकते थे? यह कहना गलत है कि राजेश और नूपुर के कपड़ों में खून नहीं लगा था।

5) सीढिय़ों की चाबी तलवार दंपती ने पहले दिन पुलिस को क्यों नहीं दी?

तलवार दंपती की दलील:छत के दरवाजे की चाबी हेमराज के पास ही रहती थी। पुलिस ने चाबी का इंतजार क्यों किया? उसने छत में लगा छोटा सा ताला तोड़ क्यों नहीं दिया?

6) हत्या के बाद शराब पी गई। शराब की बोतलों पर खून के निशान थे।

तलवार दंपती की दलील: जांच में बोतल पर राजेश के फिंगर प्रिंट नहीं मिले। नौकर के कमरे से भी शराब की बोतल मिलीं।

7) हेमराज की लाश को खींचकर छत पर ले जाया गया।

तलवार दंपती की दलील: यह भी हो सकता है कि हेमराज को छत पर ले जाकर मारा गया हो। यदि हेमराज को उसी कमरे में मारा गया होता तो तकिया, बेड शीट और कालीन पर हेमराज के खून के निशान क्यों नहीं मिले? क्या राजेश और नुपुर के लिए मुमकिन था कि वह बेडशीट, तकिया और कालीन से हेमराज-आरुषि के खून को अलग-अलग कर सकते थे।

क्या है आरुषि-हेमराज मर्डर केस

- 16 मई 2008 को दिल्ली से सटे नोएडा के जलवायु विहार स्थित घर में 14 साल की आरुषि का मर्डर कर दिया गया था। आरुषि की हत्या गला रेत कर की गई थी। करीब साढ़े पांच साल चली जांच और सुनवाई के बाद सीबीआई स्पेशल कोर्ट ने उसके माता-पिता नूपुर और राजेश तलवार को दोषी करार दिया।

- यह मामला लंबे वक्त तक सुर्खियों में छाया रहा था। लोग आरुषि के कातिलों को सजा दिलाने के लिए सड़कों पर उतर आए थे। उस वक्त उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने मामले की जांच सीबीआई को सौंपी थी।

- 2 लोगों का मर्डर हुआ था। आरुषि और हेमराज का। हेमराज (45) की बॉडी आरुषि के मर्डर के एक दिन बाद तलवार दंपती की छत पर एक कूलर में मिली थी। बता दें कि हेमराज तलवार दंपती के घर पर काम करता था।

-इस केस में शुरुआती जांच में 3 नौकर और तलवार दंपति समेत कुल पांच लोगों को सस्पेक्ट माना गया। तीनों नौकर सबूत न मिलने की वजह रिहा कर दिए।

1) कृष्णा थंडाराज:राजेश तलवार के नोएडा के क्लिनिक में काम करता था। वह हेमराज का दोस्त था। जलवायु विहार के आसपास ही रहता था।

2) राजकुमार:यह नेपाल से है। घर का काम देखता था। तलवार दंपती के दोस्त दुर्रानी के घर का काम भी संभालता था।

3) विजय मंडल: यह तलवार दंपती के पड़ोसी के घर में काम करता था।

4) खुद तलवार दंपती डॉ. राजेश और नूपुर तलवार। बाद में इन्हें दोषी माना गया।

- नूपुर और राजेश तलवार गाजियाबाद की डासना जेल में उम्रकैद काट रहे हैं।

- तलवार दंपती ने सीबीआई स्पेशल कोर्ट के फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। जस्टिस बीके नारायण और जस्टिस एके मिश्रा ने इस साल 7 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

- तलवार दंपती दिल्ली-एनसीआर के जाने माने डेंटिस्ट रहे हैं। डॉ. राजेश पंजाबी और नूपुर महाराष्ट्रियन परिवार से हैं। नुपुर एयरफोर्स के अफसर की बेटी हैं और डॉ. राजेश के पिता हार्ट स्पेशलिस्ट रहे हैं। आरुषि का जन्म 1994 में हुआ था।

- इस मामले की जांच सबसे पहले यूपी पुलिस ने शुरू की थी। शुरुआती जांच में पुलिस ने तलवार दंपती को शक के घेरे में लिया था। बाद में यह जांच सीबीआई को सौंपी गई। 31 मई 2008 को इस केस की जांच उस वक्त के सीबीआई ज्वाइंट डायरेक्टर अरुण कुमार के हाथ में आई। उन्होंने तलवार दंपती को क्लीन चिट दी और तीन नौकरों को सस्पेक्ट माना।

- नोएडा पुलिस दावा किया था कि आरुषि-हेमराज का कातिल कोई और नहीं बल्कि उसके पिता डॉक्टर राजेश तलवार हैं। इस थ्योरी के पीछे पुलिस ने ऑनर किलिंग की दलील रखी। 23 मई, 2008 को पुलिस ने बेटी की हत्या के आरोप में राजेश तलवार को अरेस्ट कर लिया था। 

- इसके बाद, सितंबर 2009 में फिर से सीबीआई की दूसरी टीम ने जांच शुरू की। इस बार सीबीआई के अफसर एजीएल कौर ने जांच शुरू की। उन्होंने तलवार दंपती को प्राइम सस्पेक्ट माना।

घटनाक्रम की प्रमुख तिथियाँ

- 16 मई, 2008 :आरुषि तलवार की डेड बॉडी घर में मिली। 
- 17 मई, 2008 : नेपाल के रहने वाले नौकर हेमराज की लाश छत पर मिली, उसी पर आरुषि की हत्या का आरोप राजेश तलवार ने लगाया था।
- 18 मई 2008: जांच में यूपी एसटीएफ को भी लगाया गया। पुलिस ने कहा कि दोनों मर्डर बेहद सफाई से किए गए। साथ ही, पुलिस ने माना कि मर्डर में परिवार से जुड़े किसी शख्स का हाथ है।
- 19 मई, 2008:तलवार परिवार के पूर्व घरेलू नौकर विष्णु शर्मा पर भी पुलिस ने शक जाहिर किया।
- 21 मई, 2008: यूपी पुलिस के साथ ही दिल्ली पुलिस भी जांच में शामिल हुई।
- 22 मई, 2008: आरुषि की हत्या के ऑनर किलिंग होने का शक पुलिस ने जाहिर किया। इस पहलू से भी जांच शुरू की गई। पुलिस ने आरुषि के लगातार संपर्क में रहे एक नजदीकी दोस्त से भी पूछताछ की। इस दोस्त से आरुषि ने 45 दिनों में 688 बार फोन पर बात की थी।
- 23 मई, 2008 : पुलिस ने डॉ. राजेश तलवार को मर्डर के आरोप में अरेस्ट किया।
- 29 मई, 2008: जांच सीबीआई के हवाले।
- 01 जून, 2008 : सीबीआई ने जांच शुरू की।
- 03 जून, 2008: कम्पाउंडर कृष्णा को पूछताछ के लिए सीबीआई ने हिरासत में लिया।
- 27 जून, 2008 : नौकर राजकुमार को अरेस्ट किया गया।
- 12 जुलाई, 2008 : नौकर विजय मंडल अरेस्ट डॉ. तलवार को जमानत मिली।
-सितम्बर 2008- सबूतों के अभाव में राजेश तलवार के सहायक और दो नौकरों को भी रिहा कर दिया गया
- 29 दिसंबर, 2010:सीबीआई ने क्लोजर रिपोर्ट लगाई। गाजियाबाद कोर्ट ने नौकरों को क्लीन चिट दी, लेकिन पेरेंट्स के रोल पर सवाल उठाए।
- 09 फरवरी, 2011:मामले में तलवार दंपती बने आरोपी।
- 21 फरवरी, 2011: दंपती ने इलाहाबाद हाईकोर्ट से अपील की। हाईकोर्ट ने अपील खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट को इनके खिलाफ सुनवाई शुरू करने के आदेश दिए।
- 19 मार्च, 2011: सुप्रीम कोर्ट गए। वहां भी राहत नहीं मिली। 
- 11 जून, 2012:सीबीआई की स्पेशल कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। इस मामले की सुनवाई जस्टिस एस लाल ने की। 
- 26 नवंबर, 2013 : नूपुर और राजेश तलवार को उम्रकैद की सजा। जस्टिस एस लाल ने 208 पेज का जजमेंट सुनाया था।

क्या हुआ था आरुषि के साथ! सीबीआई ने किया सार्वजनिक 2015

मामला विशेष अदालत में

आरुषि-हेमराज के इस दोहरे हत्याकाण्ड में नोएडा पुलिस ने साक्ष्य जुटाने में हर कदम पर चूक की जिसकी वजह से सीबीआई भी साक्ष्यों के आधार पर हत्यारों का सुराग नहीं लगा पायी। केवल इतना ही नहीं फॉरेंसिक व इलेक्ट्रॉनिक सबूत भी मिटाने की कोशिश हुई। जब मामला दुबारा सीबीआई के संज्ञान में लाया गया तो सीबीआई ने एजीएल कौल के नेतृत्व में जाँच की पूरी टीम ही बदल दी।

मामले की सुनवाई गाज़ियाबाद में सीबीआई द्वारा इसी कार्य के लिये विशेष रूप से गठित अदालत में हुई। न्यायाधीश श्याम लाल के समक्ष पूरे मुकदमे के दौरान सीबीआई की टीम ने 39 लोगों की गवाही पेश की, जबकि बचाव पक्ष की ओर से केवल सात साक्ष्य ही सामने आये। अदालत में आरुषि के माता-पिता नूपुर व राजेश तलवार दोनों पर भारतीय दण्ड संहिता (आईपीसी) की धारा 302/34 (समान उद्देश्य से हत्या करने), 201 (साक्ष्यों को छिपाने) के तहत मुकदमा चलाया गया। इसके अलावा आरुषि के पिता (डॉ॰राजेश) पर एक अन्य धारा 203 (फर्जी रिपार्ट दर्ज़ करने) के अन्तर्गत एक और मुकदमा भी साथ-साथ चला।

आरुषि के माता-पिता ही दोषी करार

गाजियाबाद की विशेष सीबीआई अदालत ने आरुषि-हेमराज के बहुचर्चित रहस्यमय हत्याकाण्ड का फैसला सुनाते हुए आरुषि के माता-पिता नूपुर एवं राजेश तलवार को दोषी ठहराया। फैसला आते ही दोनों को पुलिस ने हिरासत में ले लिया और डासना जेल में भेज दिया।

उम्रक़ैद की सजा

26 नवम्बर 2013 को विशेष सीबीआई अदालत ने आरुषि-हेमराज के दोहरे हत्याकाण्ड में राजेश एवं नूपुर तलवार को आईपीसी की धारा 302 के तहत उम्रक़ैद की सजा सुनाई। इसके अतिरिक्त कोर्ट ने दोनों ही अभियुक्तों पर जुर्माना भी लगाया। दोनों को फिलहाल गाज़ियाबाद के निकट डासना जेल में ही रखा गया है। अदालत ने सीबीआई के वकील द्वारा की गयी फाँसी की माँग को ठुकराते हुए इसे रेयरेस्ट ऑफ रेयर केस मानने से इनकार कर दिया।जस्टिस श्याम लाल द्वारा पारित जजमेण्ट ऑर्डर के मुताबिक भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के तहत डॉ राजेश तलवार और डॉ नूपुर तलवार को आजीवन कारावास की सजा सुनायी गयी। आजीवन कारावास का मतलब तक जिन्दा रहेंगे उन्हें जेल में ही रखा जायेगा। इसके अलावा धारा 201 के तहत दोनों मुल्जिमों को पाँच-पाँच साल क़ैद की सजा दी गयी। इसके साथ ही धारा 203 के तहत डॉ राजेश तलवार को एक साल की अतिरिक्त सजा भी हुई। तलवार दम्पति में पति राजेश तलवार पर 17 हजार जबकि पत्नी नूपुर तलवार पर पन्द्रह हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया था। 


आरुषि को फिर किसने मारा ?

अब सवाल ये है कि अगर तलवार दंपती ने आरुषि को नहीं मारा, पहले गिरफ्तार किए गए नौकरों ने नहीं मारा तो फिर किसने मारा? नौ साल बाद भी सस्पेंस कायम है।सीबीआई के पूर्व डायरेक्टर एपी सिंह ने कहा कि जांच में बड़ी खामियां थीं। मौका-ए-वारदात पर सबूतों से बुरी तरह छेड़छाड़ की गई थी। इसका नतीजा ये निकला कि हमें वारदात की जगह से ठोस सबूत हासिल नहीं हो पाए। पूरी जांच के दौरान ये सबसे बड़ी खामी थी। बता दें कि सिंह 2010 से 2012 के बीच सीबीआई के डायरेक्टर थे, जब एजेंसी इस केस की जांच कर रही थी।

सबूतों से छेड़छाड़

एपी सिंह ने कहा, "हाईकोर्ट का फैसला वास्तव में कोई क्लीन चिट नहीं है। कोर्ट ने उन्हें (तलवार दंपती को) बेनिफिट ऑफ डाउट दिया है। ये नहीं कहा है कि वे बेकसूर हैं।"

"जब हमारी एजेंसी इस मामले की जांच कर रही थी, तब एक नहीं कई बड़ी अड़चनें थीं। यूपी पुलिस की शुरुआती जांच के बाद हमारे सामने क्राइम सीन सबसे बड़ी मजबूरी थी। मौका-ए-वारदात पर सबूतों से बुरी तरह छेड़छाड़ की गई थी। इसका नतीजा ये निकला कि हमें वारदात की जगह से कुछ भी खास हासिल नहीं हो पाया।"

हालांकि, सिंह ने कहा कि जब मैंने चार्ज संभाला तो जांच करीब-करीब पूरी हो गई थी। सिंह ने कहा, "तलवार दंपती को दोषी ठहराए जाने के लिए सबूत काफी नहीं थे। गाजियाबाद में ट्रायल कोर्ट में अपनी क्लोजर रिपोर्ट में भी सीबीआई ने इस बात का जिक्र किया था। मुझे लगता है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तलवार दंपती को जो बेनिफिट ऑफ डाउट दिया है, वो वास्तव में वही बात है जो हमने अपनी क्लोजर रिपोर्ट में कही थी।"

सीबीआई जांच प्रक्रिया पर उठे ये 4 बड़े सवाल

‘आरुषि’ पर किताब लिखने वाले अविरुक सेन ने सीबीआई जांच पर सवाल उठाए थे।
1) ऑनर किलिंग की दलील पर
सीबीआई के मुताबिक घर में कोई बाहरी नहीं आ सकता था, जबकि रिपोर्ट के मुताबिक हत्या के दिन घर में बाहरी व्यक्ति दाखिल हुआ था।
2) गोल्फ स्टिक पर भी सवाल
- सीबीआई के मुताबिक पिता ने गोल्फ स्टिक से हत्या की, जिसे बाद में साफ किया गया, लेकिन मुकदमे में सीबीआई ने दूसरी स्टिक पेश की।
3) अफसरों की सोच पर सवाल
- सीबीआई ने तलवार दंपती से हेमराज नाम की ईमेल आईडी के जरिए संपर्क साधा। इसको लेकर शुरू से ही अफसरों की सोच पर सवाल खड़े होने लगे।
4) 141 की जगह 39 गवाह ही पेश
- सीबीआई ने उन गवाहों को पेश नहीं किया, जिनकी गवाही तलवार दंपती के खिलाफ पक्ष को मजबूत कर सकती थी।

CBI की 2 टीमों ने की थी जांच

पहली जांच: 2008 में सीबीआई की पहली टीम ने जांच शुरू की। इस टीम ने तलवार दंपती को मुजरिम नहीं माना, बल्कि तलवार के असिस्टेंट कृष्णा और उसके दो साथियों राजकुमार का नार्को टेस्ट किया। सीबीआई ने कहा कि इन लोगों ने आरुषि का सेक्शुअल असॉल्ट किया और मर्डर कर दिया। हालांकि, सीबीआई पर गुनाह कबूल करवाने के लिए संदेह भरे तरीकों का इस्तेमाल करने का आरोप लगे। ठोस सबूत के अभाव में तीनों आरोपियों को रिहा कर दिया गया।

दूसरी जांच: 2009 में केस की जांच दूसरी सीबीआई टीम ने संभाली। टीम ने राजेश तलवार को मुजरिम माना, लेकिन उन पर चार्ज नहीं लगाए। सीबीआई ने कोर्ट सबूतों के अभाव में केस बंद करने की बात कही। सीबीआई कोर्ट ने मजबूत सबूतों के अभाव की बात नकार दी और तलवार दंपती के खिलाफ कानूनी कार्यवाही जारी रखी। सीबीआई कोर्ट ने नवंबर 2013 में तलवार दंपती को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।

इस मामले की सुनवाई गुरुवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस बीके नारायण और जस्टिस एके मिश्रा की बेंच ने की। बेंच ने कहा- मौजूद सबूतों के आधार पर तलवार दंपती को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। तलवार दंपती को दोषी ठहराने के लिए हालात और सबूत काफी नहीं हैं। हालात और कोर्ट के सामने पेश किए गए सबूतों की कड़ी से यह साबित नहीं होता कि वे आरुषि और हेमराज के कत्ल में शामिल थे। बेनिफिट ऑफ डाउट (संदेह का लाभ) देने के लिए यह बिल्कुल फिट केस है।

सीबीआई कोर्ट के जज श्यामलाल ने तलवार दंपती को सजा सुनाते वक्त परिस्थितिजन्य सबूतों का हवाला दिया था। उन्होंने कहा था कि जब परिस्थितिजन्य सबूत मौजूद हों तो मोटिव की बहुत ज्यादा अहमियत नहीं रह जाती।

सीबीआई ने अब तक साफ तौर पर ये नहीं कहा है कि वो हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज करेगी या नहीं। उसने सिर्फ इतना है कि वो अगला कदम उठाने से पहले हाईकोर्ट के फैसले की कॉपी को ठीक से पढ़ेगी।


संजय तिवारी
संस्थापक - भारत संस्कृति न्यास
वरिष्ठ पत्रकार 

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क्रांतिदूत
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