परितः आवरणं – पर्यावरणं- हमारा रक्षा कवच - श्री सीताराम जी गेडलिया (वरिष्ठ संघ प्रचारक)

जो हमारा आवरण अर्थात रक्षाकवच है, वही पर्यावरण है | भारतीय चिंतन की गहराई देखिये कि जिसे भारतीय संस्कृति में पंच महाभूत कहा गया है...




जो हमारा आवरण अर्थात रक्षाकवच है, वही पर्यावरण है | भारतीय चिंतन की गहराई देखिये कि जिसे भारतीय संस्कृति में पंच महाभूत कहा गया है, जिनसे हमारे शरीर की रचना हुई है, वस्तुतः वे पंचभूत ही न केवल हमारे शरीर के, बल्कि पूरी प्रथ्वी के रक्षा कवच भी हैं |

पंच महाभूत अर्थात वे तत्व जिनसे हमारा शरीर निर्मित है – क्षिति जल पावक गगन समीरा | प्रथ्वी, जल, अग्नि. आकाश और वायु | ये पंच तत्व हमारे शरीर में भी हैं और बाहर भी | इन्हीं तत्वों ने पंचकोष व्यवस्था के रूप में हमें ढंका हुआ है |

अन्नमय कोष - सबसे पहले प्रथ्वी तत्व की बात, क्योंकि जाने के बाद मिट्टी में ही मिलना है, अतः उसे माता कहा गया | मिट्टी से उत्पन्न अन्न ही हम खाते हैं, अगर बाहर की मिट्टी अशुद्ध तो अन्दर स्वस्थ कैसे रहेंगे ?

प्राणमय कोष - वायु प्राण तत्व है, उसके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती | बाहर की वायु और अन्दर की वायु प्रथक नहीं है, एक ही है | बाहर की वायु शुद्ध तो, अन्दर भी शुद्ध |

मनोमय कोष - जल का प्रतिनिधित्व करते हैं हमारे मनोभाव | सुसंस्कारित मन में ही प्रेम पनपता है | जहाँ जल अशुद्ध वहां प्रेम नहीं | आत्मीयता नहीं | 

विज्ञानमय कोष - अग्नि तत्व बुद्धि का, विवेचना करने की शक्ति का प्रतीक है | यह शरीर के अन्दर जठराग्नि के रूप में रहता है, अन्न को पचाने की शक्ति रखता है, इसे ही गीता में वैश्वानर कहा गया है |

आनंदमय कोष – आकाश – जो दिखता नहीं, विज्ञान में जिसे स्पेस कहा गया | हमारे यहाँ कहा गया साकाश भोजन अर्थात पेट को खाली रखकर भोजन | ठूंसकर नहीं खाना | अन्यथा अजीर्ण |

मनुष्य, उसका परिवार, समाज, राष्ट्र जीवन, विश्व जीवन स्वस्थ रखना है, तो पर्यावरण के साथ जीना होगा | पर्यावरण संरक्षण, संवर्धन, प्रदूषण न करते हुए जीना होगा | अन्यथा जीवन भी प्रदूषित होगा | दुनिया की सबसे बड़ी समस्या भी यही है |

पर्यावरण बचाओ अर्थात प्रदूषण से मुक्त करो | प्रदूषण का मुख्य कारण है कि हमारा मस्तिष्क प्रदूषित हो गया है | विज्ञानमय कोष प्रदूषित हुआ तो प्रदूषित बुद्धि ही पर्यावरण को प्रदूषित कर रही है | बुद्धि शुद्ध तो पर्यावरण स्वतः शुद्ध | भारतीय वांग्मय यजुर्वेद का शान्ति मन्त्र इसी कामना से है –

ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:,

पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:।

वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:,

सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥

इसका शाब्दिक अर्थ है –

हे परमात्मा स्वरुप शांति कीजिये, वायु में शांति हो, अंतरिक्ष में शांति हो, पृथ्वी पर शांति हों, जल में शांति हो, औषध में शांति हो, वनस्पतियों में शांति हो, विश्व में शांति हो, सभी देवतागणों में शांति हो, ब्रह्म में शांति हो, सब में शांति हो, चारों और शांति हो, हे परमपिता परमेश्वर शांति हो, शांति हो, शांति हो।

आज के अशांत वातावरण में शान्ति ही प्राथमिक आवश्यकता है |

गड्ढे में गिरने में बुद्धि का क्या काम ? गिरकर बचाओ, बचाओ चिल्लाने को क्या कहेंगे ? 

भारत व विश्व जीवन को स्वस्थ रखना है, शान्ति से जीने लायक रखना है, तो सबसे पहले पर्यावरण स्वस्थ रखना होगा, और यह दायित्व हमारे ऋषियों ने हम भारतीयों को हिन्दुओं को ही दिया है |

इसके लिए करना क्या होगा ?

1) प्रथ्वी तत्व, अन्नमय कोष - किसान रासायनिक खाद के पीछे भाग रहे हैं | विदेशी व्यापारियों के इस षडयंत्र में किसान भी मरेगा, जमीन भी मरेगी और सोने का अंडा देने वाली मुर्गी की तरह भारत भी लालची लोगों द्वारा मार दिया जाएगा | हमें सजग होकर भारत के किसानों को सजग करना चाहिए, जैविक खेती को बढ़ावा देना चाहिए | इसी प्रकार खनिज का शोषण सीमातीत है, अंतहीन और असीम है | अगर माता का गर्भ ही खाली हो जाएगा, तो आगे क्या होगा ? उपभोग नहीं, उपयोग मात्र करो, यह समाज जागरण करना होगा |

2) वायु, प्राणमय कोष – उपभोगी मानसिकता के कारण सर्वाधिक खतरा हमारी वायु पर मंडरा रहा है | वाहन, धूम्रपान, कारखानों, एयर कंडीशनर, इन सबके कारण वायु सर्वाधिक प्रदूषित हो रही है | प्राण प्रदूषित हो तो प्राण बचेंगे क्या ? हमारे यहाँ हर परिवार में वंश बृक्ष बनाने की परिपाटी थी | पिता, दादा, पड़दादा, उनके भी पिता, प्रपिता, आदि आदि का इतिहास रखा जाता था | जरा सोचें कि वंश बृक्ष ही क्यों नाम दिया गया इसे ? बृक्ष वंश बढेगा तो वंश बृक्ष बचेगा | यह जागरण आवश्यक है | चिपको आन्दोलन के दौरान उत्तराखंड की महिलाओं ने बृक्ष काटने वालों को भगाया, हजारों बृक्ष लगाए भी | बृक्ष लगाने व उनके पालन की वृत्ति को बढ़ावा देना होगा |

3) जल, मनोमय कोष – जल को ही जीवन कहा गया है | एक बूँद जल भी व्यर्थ नहीं जाना चाहिए, अनावश्यक व्यय नहीं करना चाहिए | तालाब, कुआ, नदी, सबको प्रदूषण से बचाना होगा |

4) अग्नि, विज्ञान मय कोष –अनावश्यक रासायनिक चीजों के उपयोग से ग्लोबल बार्मिंग हो रहा है | ग्लेशियर पिघल रहे हैं | 

5) आकाश तत्व – ध्वनि प्रदूषण, फिर चाहे वह तेज आवाज में बजाते सिनेमा के फूहड़ गीतों से हो, डीजे संस्कृति से हो, या फिर वाणी द्वारा अपशब्दों के प्रयोग से हो, इससे बचाव के लिए भी जनजागरण करना होगा | अच्छा बोलो, हितकर बोलो, अच्छा सुनो |

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क्रांतिदूत: परितः आवरणं – पर्यावरणं- हमारा रक्षा कवच - श्री सीताराम जी गेडलिया (वरिष्ठ संघ प्रचारक)
परितः आवरणं – पर्यावरणं- हमारा रक्षा कवच - श्री सीताराम जी गेडलिया (वरिष्ठ संघ प्रचारक)
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