भ्रष्ट विरोधियों से निबटने में कमजोर सिद्ध हो रही है सरकार

आज बड़ी बड़ी बातें की जाती है केरल में हो रही संघ स्वयंसेवकों की हत्याओं की | सारे देश में कम्यूनिस्ट हिंसा को लेकर अलख जगाया जाता है | कम...


आज बड़ी बड़ी बातें की जाती है केरल में हो रही संघ स्वयंसेवकों की हत्याओं की | सारे देश में कम्यूनिस्ट हिंसा को लेकर अलख जगाया जाता है | कम्यूनिस्ट हिंसा के सबसे बड़े संरक्षक के रूप में केरल के वर्तमान मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन को दोषी बताया जाता है | 

किन्तु मुझे समझ नहीं आती कुछ महत्वपूर्ण बातें | जब मैं पढ़ता हूँ कि 13 फरवरी २००५ को केरल विधानसभा के पटल पर नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट रखी गई, जिसमें पूर्ववर्ती मार्क्सवादी सरकार के समय हुए पनबिजली घोटाले की रपट थी | इस रपट में केरल की पूरी माकपा इकाई व इसके तत्कालीन राज्य सचिव और वर्तमान मुख्यमंत्री पिनरई विजयन संदेह के घेरे में आ गए थे। रपट में कहा गया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री ई.के. नयनार एवं तत्कालीन बिजली मंत्री पिनरई विजयन द्वारा किए गए इस सौदे से राज्य को करीब 375 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ । 

रोचक तथ्य यह है कि रपट के बाद भाजपा नेताओं ने इस मामले की केन्द्रीय जांच ब्यूरो से जांच कराए जाने की मांग करते हुए इस घोटाले में शामिल सभी राजनेताओं व अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने की मांग की थी ।

अब क्या हो गया ? क्यों सांप सूंघ गया ? अब तो केंद्र में भाजपा सरकार ही है ना ? क्यों नहीं हो रही सीबीआई जांच ?

आईये जरा विस्तार से इस सम्पूर्ण प्रकरण को समझते हैं |

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रपट में बताया गया था कि तत्कालीन मुख्यमंत्री ई.के. नयनार एवं बिजली मंत्री पिनरई विजयन के नेतृत्व वाले मंत्रीस्तरीय प्रतिनिधिमंडल द्वारा एस.एन.सी. लावलीन के साथ आवश्यक यंत्रों, यांत्रिक सामानों एवं सेवाओं वाले सौदे को अंतिम रूप दिया गया, लेकिन इस सौदे में कई तरह की अनियमितताएं बरती गईं। कंपनी ने सलाहकार कंपनी और मध्यस्थ की दोहरी भूमिका निभाई। साथ ही, सौदे के सामानों एवं सेवाओं की आपूर्ति भी इस कंपनी की ओर से न होकर किसी अन्य कंपनी द्वारा ऊंची कीमत पर की गई। इससे राजकोष पर अनावश्यक भार पड़ा।

इस बहुचर्चित एवं विवादित सौदे की शुरुआत 1995 में तब हुई जब यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यू.डी.एफ.) को हराकर लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एल.डी.एफ.) की सरकार बनी थी। सन् 1997 में वाम मोर्चा सरकार के समय हुए समझौते में विवाद तभी शुरू हो गया था जब राज्य सरकार ने इस शर्त पर अपनी स्वीकृति दी थी कि अनुबंध मिलने पर कंपनी श्री विजयन के गृह जिले तल्लाशेरी स्थित मलाबार कैंसर सेंटर को 98 करोड़ 30 लाख का अनुदान देगी। जो स्पष्टतः मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के इस सौदे में रूचि व संलिप्तता को प्रदर्शित करता है |

उल्लेखनीय है कि एस.एन.सी. लावलीन को प्राप्त इस अनुबंध के लिए अन्य किसी कंपनी की कोई निविदा आमंत्रित नहीं की गई थी। सन् 2001 में सत्ता में लौटे संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (यू.डी.एफ.) सरकार ने इस सौदे पर जांच के आदेश दे दिए।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की जांच रपट में बताया गया कि यद्यपि राज्य पनबिजली परियोजना के पुनरोद्धार पर 374.5 करोड़ रुपए खर्च कर दिए गए किन्तु खराब यंत्रों की आपूर्ति के कारण अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया। साथ ही, बिजली उत्पादन की क्षमता में भी कोई सुधार नहीं हुआ। रपट में उन 14 कमियों को गिनाया गया जिसके कारण राजकोष को करोड़ों की चपत लगी। 

अब आते हैं इस पूरे प्रकरण के सबसे हैरत अंगेज विषय पर | सदन में इस रपट के पेश होने के बाद भाजपा नेता एवं पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्री ओ. राजगोपाल ने इस मामले की सी.बी.आई. जांच तथा इसमें शामिल राजनेताओं व अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने की मांग की । वहीं, केरल भाजपा अध्यक्ष श्री पी.एस. श्रीधरन पिल्लई ने माकपा- कांग्रेस पर घोटाले के प्रमुख आरोपी विजयन को बचाने का आरोप लगाया । उन्होंने कहा कि केरल के इतिहास में यह अब तक का अकेला सबसे बड़ा घोटाला है। सीबीआई जांच से ही इस घोटाले की सचाई सामने आ सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास ऐसे दस्तावेजी सबूत हैं जिससे साबित होता है कि कोझीकोड के एक दलाल को दुबई के रास्ते 90 करोड़ रुपए की दलाली दी गई। वे इस दस्तावेज को जांच एजेंसी को देने को तैयार हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री ऊमैन चेंडी पर आरोप लगाया कि चूंकि माकपा केन्द्र में संप्रग गठबंधन को समर्थन दे रहा है इसलिए वे विजयन को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।

स्मरणीय है कि अब ओ राजगोपाल जी केरल विधानसभा के सम्मानित सदस्य हैं | उन्होंने ही दीर्घकालिक संघर्ष के बाद केरल में पहली बार भाजपा का कमल खिलाकर विधानसभा में विजय हासिल की है | पी.एस. श्रीधरन पिल्लई भी भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय कार्यसमिति के सदस्य हैं, साथ ही लक्षदीप के प्रभारी भी | अर्थात दोनों महानुभाव प्रभावी भूमिका में हैं | अब क्यों आतताई मुख्यमंत्री को उस कथित भष्टाचार के आरोप में नहीं घेरा जा रहा, जिसके विषय में कहा गया था कि आपके पास पुख्ता प्रमाण हैं ?

कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह कि सामान्य राजनैतिक / सामाजिक कार्यकर्ता मरने खपने के लिए ही होता है | शीर्षस्थ महानुभावों में आतताईयों के विरुद्ध प्रभावी संघर्ष की दृढ इच्छाशक्ति का अभाव दृष्टिगोचर हो तो कुढ़ते रहो |

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क्रांतिदूत: भ्रष्ट विरोधियों से निबटने में कमजोर सिद्ध हो रही है सरकार
भ्रष्ट विरोधियों से निबटने में कमजोर सिद्ध हो रही है सरकार
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