ग्लोबल हुई खिचड़ी - डॉ. अर्चना तिवारी

अपने कॉलेज के दिनों की एक फिल्म के पोस्टर की बहुत याद आ रही है। नाम था - गोरखनाथ बाबा तोहे खिचड़ी चढ़इबो। तब हमने सोचा भी नहीं था कि कभी ख...

अपने कॉलेज के दिनों की एक फिल्म के पोस्टर की बहुत याद आ रही है। नाम था - गोरखनाथ बाबा तोहे खिचड़ी चढ़इबो। तब हमने सोचा भी नहीं था कि कभी खिचड़ी को लेकर वैश्विक चर्चा भी संभव है। यह तो कल्पना से परे था कि गोरखपुर जैसे स्थान में मकर संक्रांति के दिन गोरखनाथ मंदिर में चढ़ाये जाने के अलावा भी कभी खिचडी ख्याति पा सकती है। आज जब भारत के इस लोकव्यंजन को ग्लोबल होते देख रही हूँ तो आश्चर्य से ज्यादा ख़ुशी की अनुभूति हो रही है। 

इस अनुभूति की वजह यह भी है कि मैं जिस पेशे से जुडी हूँ उसमे शिक्षण के साथ पूरा खाद्य विज्ञान या कहे कि व्यंजन विज्ञान भी शामिल है। गृहविज्ञान में फ़ूड साइंस की विशेषज्ञ होने के नाते आज मुझे इस बात का गर्व है कि दुनिया को भारत की खिचड़ी का ज्ञान हो चुका है। यह हमारे प्रधानमंत्री की दूरदृष्टि का प्रतिफल भी है। 

खिचड़ी एक लोकप्रिय भारतीय व्यंजन है जो दाल तथा चावल को एक साथ उबाल कर तैयार किया जाता है। यह रोगियों के लिये विशेष रूप से उपयोगी है। खिचड़ी जैसा पौष्टिक आहार शायद ही कोई दूसरा हो, सोशल मीडिया पर इन दिनों ये सुर्खियों में आने वाला पहला व्यंजन बना हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस वर्ष के वर्ल्ड फूड इंडिया फेस्ट‍िवल के अपने भाषण में खिचड़ी के गुणों का वर्णन किया। अब ब्रांड इंडिया खिचड़ी को विदेशों में भारतीय दूतावास प्रचारित करेंगे। पाक विधि के साथ तैयार करने में इस्तेमाल होने वाले सामान की जानकारी भी उपलब्ध कराई जाएगी। सरकार को उम्मीद है कि दुनिया भर में हर रेस्टोरेंट और रसोई में खिचड़ी तैयार होने लगेगी।

लोक मान्यता के अनुसार मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने की परंपरा का आरंभ भगवान शिव ने किया था और उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से मकर संक्रांति के मौके पर खिचड़ी बनाने की परंपरा का आरंभ हुआ था। उत्तर प्रदेश में मकर संक्रांति को खिचड़ी पर्व भी कहा जाता है। मान्यता है की बाबा गोरखनाथ जी भगवान शिव का ही रूप थे। उन्होंने ही खिचड़ी को भोजन के रूप में बनाना आरंभ किया।

पौराणिक कहानी के अनुसार खिलजी ने जब आक्रमण किया तो उस समय नाथ योगी उन का डट कर मुकाबला कर रहे थे। उनसे जुझते-जुझते वह इतना थक जाते की उन्हें भोजन पकाने का समय ही नहीं मिल पाता था। जिससे उन्हें भूखे रहना पड़ता और वह दिन ब दिन कमजोर होते जा रहे थे।

अपने योगियों की कमजोरी को दूर करने लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एकत्र कर पकाने को कहा। बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा। सभी योगीयों को यह नया भोजन बहुत स्वादिष्ट लगा। इससे उनके शरीर में उर्जा का संचार हुआ। 

आज भी गोरखपुर में बाबा गोरखनाथ के मंदिर के समीप मकर संक्रांति के दिन से खिचड़ी मेला शुरू होता है। यह मेला बहुत दिनों तक चलता है और इस मेले में बाबा गोरखनाथ को खिचड़ी का भोग अर्पित किया जाता है और भक्तों को प्रसाद रूप में दिया जाता है।

क्या कहता है शब्दसागर

खिचड़ी - संज्ञा स्त्री॰ [सं॰ कृसर]

१. एक में मिलाया या मिलाकर पकाया हुआ दाल और चावल । क्रि॰ प्र॰—उतारना ।—चढ़ाना ।—डालना ।—भूतना ।— पकाना । मुहा॰—पकना पकना = गुप्त भाव से कोई सलाह होना । ढाई चावल की खिचड़ी अलग पकना = सब की समति के विरुद्ध कोई कार्य होना । बहुपत के विपरीत कोई काम होना । ढाई चावल की खिचड़ी अलग पकाना = सब की संमति के विरुद्ध कोई कार्य करना । बहुमत के विरुद्ध कोई काम करना । खइचड़ी खाते पहुँचा उतारना = अत्यंत कोमल होना । बहुत नाजुक होना । खिचड़ी छुवाना = नववधू से पहले पहल भोजन बनवाला ।

२. विवाह की एक रसम जिसे 'भात' भी कहते है । मुहा॰—खिचड़ी खइलाना = वह और बरातियों को (कन्या पक्ष वालों का) कच्ची रसोई खिलाना ।

३. एक ही में मिले हुए दो या अधिक प्रकार के पदार्थ । जैसे,— सफेद औऱ काले बाल, या रुपए और अशरिफिआँ; अथव ा जौहरियों की भाषा में एक ही में मिले हुए अनेक प्रकार के जवाहिरात ।

४. मकर संक्रांति । इस दिन खिचड़ी दान की जाती है । यौ॰—खिचड़ी खिचड़वार ।

५. बेरी का फूल । क्रि॰ प्र॰—आना । वह पेशगी धन जो वेश्या आदि को नाच ठीक करने के समय दिया जाता है । बयाना । साई ।

मकर संक्रांति भी खिचड़ी 

उत्तरी भारत में मकर संक्रान्ति के पर्व को भी "खिचड़ी" के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन खिचड़ी खाने का विशेष रूप से प्रचलन है। एक में मिलाया या मिलाकर पकाया हुआ दाल और चावल। क्रि० प्र०—उतारना।—चढ़ाना।—डालना।—भूतना।— पकाना। मुहा०—पकना पकना = गुप्त भाव से कोई सलाह होना। ढाई चावल की खिचड़ी अलग पकना = सब की समति के विरुद्ध कोई कार्य होना। बहुपत के विपरीत कोई काम होना। ढाई चावल की खिचड़ी अलग पकाना = सब की संमति के विरुद्ध कोई कार्य करना। बहुमत के विरुद्ध कोई काम करना। खइचड़ी खाते पहुँचा उतारना = अत्यंत कोमल होना। बहुत नाजुक होना। खिचड़ी छुवाना = नववधू से पहले पहल भोजन बनवाला। २. विवाह की एक रसम जिसे 'भात' भी कहते है। मुहा०—खिचड़ी खइलाना = वह और बरातियों को (कन्या पक्ष वालों का) कच्ची रसोई खिलाना। ३. एक ही में मिले हुए दो या अधिक प्रकार के पदार्थ। जैसे,— सफेद औऱ काले बाल, या रुपए और अशरिफिआँ; अथवा जौहरियों की भाषा में एक ही में मिले हुए अनेक प्रकार के जवाहिरात। ४. मकर संक्रांति। इस दिन खिचड़ी दान की जाती है। यौ०—खिचड़ी खिचड़वार। ५. बेरी का फूल। क्रि० प्र०—आना। वह पेशगी धन जो वेश्या आदि को नाच ठीक करने के समय दिया जाता है। बयाना। साई।

खिचडी के प्रकार :- सामान्य भाषा मे उपर्युक्त प्रकार के मिश्रण को खिचडी कहते है परंतु देखा जाये तो कम्पोजिशन के आधार पर इसके 4 प्रकार होते है - (1) खिचडी या सामान्य खिचडी :- चावल + उड़द की काली दली हुई छिलके सहित दाल + नमक | (2) भेदडी :- चावल + मूँग की दाल + नमक + हल्दी | यह मरीजो के लिये होती है | (3) ताहरी :- चावल + दाल + आलू + सोयाबीन + नमक + हल्दी | (4) पुलाव :- चावल + दाल + मौसमी सब्जियां + सोयाबीन + नमक + हल्दी + सलाद |

इतिहास 

ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो भारतीय खिचड़ी का सबसे पहला उल्लेख यूनान के शासक सिकंदर के सेनापति सेल्यूकस ने किया था। विश्व विजेता बनने का सपना रखने वाले सिकंदर ने 336 से 323 ईसा पूर्व तक शासन किया था, लेकिन असामयिक मौत के बाद जब उसका सेनापति सेल्यूकस बेबीलॉन का शासक बना तो उसने भी भारत पर विजय पाने का सपना देखा। तब भारत में चंद्रगुप्त मौर्य का शासन था, लेकिन चाणक्य की रणनीति के कारण सेल्यूकस की बेटी का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य से हो गया। इस विवाह के लिए चंद्रगुप्त ने कुछ शर्तें भी रखी थी। इस विवाह के बाद सेल्युकस को भारतीय खान-पान और रीति रिवाज को समझने का काफी मौका मिला। तब उसने अपनी किताबों में भारतीय खिचड़ी की बहुत तारीफ की और इसे पौष्टिक आहार बताया।

इब्नबतूता ने खाई थी मूंग की खिचड़ी 

13 वीं शताब्दी में मोरक्को के यात्री इब्नबतूता ने दक्षिण एशिया की यात्रा की थी। इब्नबतूता ने अपने यात्रा संस्मरणओं में भारत में बनाई जाने वाली मूंग की दाल की खिचड़ी को बहुत स्वादिष्ट बताया था।

बीरबल की खिचड़ी के चर्चे

इसके बाद मुगलों ने भी जब भारत पर शासन किया तो मुगलाई खाने के साथ-साथ खिचड़ी भी अपने स्वाद के कारण खूब पसंद की जाती थी। इसका एक प्रमाण आज भी 'बीरबल की खिचड़ी' वाली कहावत में देखने को मिलता है। एक बार बादशाह अकबर ने घोषणा की कि जो आदमी सर्दी के मौसम में नदी के ठंडे पानी में रात भर खड़ा रहेगा, उसे भारी भरकम तोहफ़े से पुरस्कृत किया जाएगा। एक गरीब धोबी ने अपनी गरीबी दूर करने की खातिर नदी में घुटने तक डूबे रहकर पानी में ठिठुरते हुए सारी रात बिता दी। बाद में वह बादशाह के दरबार में अपना इनाम लेने पहुँचा। बादशाह अकबर ने उससे पूछा - "तुमने कैसे सारी रात बिना सोए, खड़े-खड़े ही नदी में रात बिताई? तुम्हारे पास क्या सबूत है?"

धोबी ने उत्तर दिया - "जहाँपनाह, मैं सारी रात नदी किनारे के महल के कमरे में जल रहे चिराग को देखता रहा और इस तरह जागते हुए सारी रात नदी के ठंडे जल में गुजारी।"

"इसका मतलब यह हुआ कि तुम महल के चिराग की गरमी लेकर सारी रात पानी में खड़े रहे और इनाम चाहते हो?" "सिपाहियों इसे जेल में बन्द कर दो।" बादशाह ने क्रोधित होकर आदेश दिया।

बीरबल भी दरबार में था। उसे यह देख बुरा लगा कि बादशाह नाहक ही उस गरीब पर जुल्म कर रहे हैं। बीरबल दूसरे दिन दरबार में नहीं आए, जबकि उस दिन दरबार की एक आवश्यक बैठक थी। बादशाह ने एक खादिम को बीरबल को बुलाने भेजा। खादिम ने लौटकर जवाब दिया, "बीरबल खिचड़ी पका रहे हैं और वह खिचड़ी पकते ही उसे खाकर आएंगे।"

जब बीरबल बहुत देर बाद भी नहीं आए तो बादशाह को कुछ सन्देह हुआ। वे खुद तफतीश करने पहुँचे। बादशाह ने देखा कि एक बहुत लंबे से डंडे पर एक घड़ा बाँध कर उसे बहुत ऊँचा लटका दिया गया है और नीचे जरा सी आग जल रही है। पास में बीरबल आराम से खटिए पर लेटे हुए हैं।

बादशाह ने तमककर पूछा - "यह क्या तमाशा है? क्या ऐसी भी खिचड़ी पकती है?"

बीरबल ने कहा - "माफ करें, जहाँपनाह, जरूर पकेगी। वैसी ही पकेगी जैसी कि धोबी को महल के दीये की गरमी मिली थी।"

बादशाह को बात समझ में आ गई। उन्होंने बीरबल को गले लगाया और धोबी को रिहा करने और उसे इनाम देने का हुक्म दिया।

1890 का भीषण अकाल और खिचड़ी के तालाब

सन् 1890 का भीषण अकाल पूरे गोंडवाने में आज भी याद किया जाता है। उस दौर में यहाँ असंख्य तालाब बनाए गए थे जिनमें मजदूरी की तरह खिचड़ी बाँटी जाती थी। छिंदवाड़ा की सौंसर तहसील में तब का बना एक तालाब आज भी काम कर रहा है। बालाघाट में भी ऐसे कई तालाब मौजूद हैं। उस दौर में एक अंग्रेज इंजीनियर सर सॅफ कॉटन थे जिन्हें पानी की बड़ी परियोजनाएँ बनाने में महारत हासिल थी। इस वजह से ही उन्हें ‘सर’ की उपाधि दी गई थी। उन्होंने दक्षिण भारत से लगाकर पंजाब तक देश की शुरूआती बड़ी सिंचाई परियोजनाएँ बनवाई थीं। इस इलाके में भी सर कॉटन ने दो बड़े काम किए थे-एक 1911 में वैनगंगा नदी पर 57 लाख रुपयों की लागत से एक लाख एकड़ सिंचाई करने के लिए बालाघाट के पास ‘ढूटी-डायवर्सन’ बनाया था जिसके दरवाजे इंग्लैंड के मेन्चेस्टर से मँगवाए गए थे। दूसरा था छत्तीसगढ़ में 1923 में बना ‘मॉडम सिल्ली’ बाँध। ‘ढूटी डायवर्सन’ जब पहली बार बना तो तेज बहाव के कारण टूट गया था। बाद में 1921 में इसे फिर से बनाया गया। आजादी के बाद भी ‘नर्मदा घाटी विकास परियोजना’ के अंतर्गत अंजनिया के पास बना मटियारि बाँध हवेली क्षेत्र में सिंचाई बढ़ाने के लिए बनाया गया था। लेकिन मटियारि, नैनपुर की थाबर और मंडला की भीमगढ़ परियोजनाओं के बीच की निचली जमीनें होने के कारण इस इलाके पर दलदलीकरण बढ़ने का खतरा खड़ा हो गया है। इस क्षेत्र में कहते हैं कि पानी की मात्रा जरूरत से ज्यादा बढ़ती जा रही है। और गोलाछापर, धतूरा आदि गाँवों में दलदलीकरण होने की खबरें भी आने लगी हैं। पानी ऐसे बढ़ाया जाता रहा तो धरती के लवण ऊपर आ जायेंगे तथा जमीनें बर्बाद होने लगेंगी।

2500 साल पुराना है खिचड़ी का इतिहास 

माना जाता है कि खिचड़ी शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के खिच्चा शब्द से हुई है. खिच्चा चावल और विभिन्न प्रकार की दाल से बनने वाला खाद्य पदार्थ होता है. खिचड़ी का इतिहास करीब ढाई हजार साल पुराना है. इंडिया करेंट्स नामक वेबसाइट के एक लेख के अनुसार ग्रीक राजदूत सेलुकस ने लिखा है कि इंडिया में चावल और दाल से बना खाद्य पदार्थ काफी लोकप्रिय है. पाकशास्त्री मानते हैं कि ये डिश खिचड़ी या उसका पूर्व रूप रही होगी. मोरक्को के सैलानी इब्न बतूता ने भी भारत में चावल और मूंग की दाल से बनने वाली खिचड़ी का उल्लेख किया है. इब्न बतूता सन् 1350 में भारत आया था. 15वीं सदी में भारत आने वाले रूसी यात्री अफानसी निकितीन ने भी भारतीय उपमहाद्वीप में लोकप्रिय खिचड़ी का जिक्र किया है.

मुग़ल बादशाहों को प्रिय थी खिचड़ी

मुगल बादशाहों को भी खिचड़ी काफी पसंद थी. मुगल बादशाह के दरबारी और सलाहकार अबुल फजल ने आईन-ए-अकबरी में खिचड़ी का जिक्र किया है. आईन-ए-अकबरी में खिचड़ी बनाने का सात तरीके दिए हुए हैं. अकबर और बीरबल के किस्सों में खिचड़ी पकाने का किस्सा काफी मशहूर है. माना जाता है कि अकबर के बेटे जहांगीर को खिचड़ी बहुत पसंद थी. मुगलों से खिचड़ी से प्यार की वजह से ही मशहूर शेफ तरला दलाल ने खिचड़ी की अपने एक रेसिपी का नाम शाहजहानी खिचड़ी रखा.खिचड़ी भारत के कई राज्यों हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, बंगाल, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र इत्यादि में लोकप्रिय है. पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और फिजी जैसे देशों में भी खिचड़ी खायी जाती है. दक्षिण भारत में पोंगल और उत्तर भारत में मकरसंक्राति पर खिचड़ी खाने की परंपरा है. मकरसंक्रांति को उत्तर भारत के कई इलाकों में खिचड़ी कहा जाता है. भारत में किसी चीज का धर्म से वास्ता न हो तो हैरत ही होगी. खिचड़ी अपवाद नहीं है. उत्तर भारत में मान्यता है कि शनिवार को खिचड़ी खाने से शनि ग्रह का प्रकोप नहीं होता. कई जगहों पर शनि मंदिरों में खिचडी़ प्रसाद के तौर पर भी चढ़ाई जाती है। 

जहांगीर ने कहा - यह तो लाजवाब है 

बादशाह जहांगीर गुजरात की यात्रा पर गए हुए थे. वहां उन्होंने एक गांव में लोगों को कुछ खाते देखा. ये कुछ अलग था. बादशाह की भी उसे खाने की इच्छा हुई. जब उन्हें ये व्यंजन परोसा गया तो उन्हें इतना पसंद आया कि उन्होंने कहा-वाह, ये तो लाजवाब है. ये खिचड़ी थी. मूंग दाल की खिचड़ी, जिसमें चावल की जगह बाजरे का इस्तेमाल किया गया था। बादशाह को लगा कि ये व्यंजन मुगल पाकशाला में भी पकना चाहिए. तुरंत एक गुजराती रसोइया शाही पाकशाला के लिए नियुक्त किया गया. खिचड़ी शाही महल में जा पहुंची. वहां इस पर और प्रयोग हुए. वैसे कुछ लोग कहते हैं कि खिचड़ी को दरअसल शाहजहां ने मुगल किचन में शामिल किया. मुगल बादशाहों को कई तरह की खिचड़ी पेश की जाती थी। 

सूखे मेवा की खिचड़ी 

मुगल पाकशाला में एक खास किस्म की खिचड़ी विकसित की गई. जिसमें ड्राइ फ्रूट्स, केसर, तेज पत्ता, जावित्री, लौंग और अन्य मसालों का इस्तेमाल किया जाता था. जब ये पकने के बाद दस्तरखान पर आती थी, तो इसकी लाजवाब सुगंध गजब ढाती थी. भूख और बढ़ जाती थी. जीभ पर पानी आने लगता था. तब इसके आगे दूसरे व्यंजन फीके पड़ जाते थे.

खिचड़ी के जायके 

आमतौर पर खिचड़ी विशुद्ध शाकाहारी व्यंजन है लेकिन मुगलकाल में मांसाहारी खिचड़ी का भी सफल प्रयोग हुआ, जिसे हलीम कहा गया. बंगाल में त्योहारों के दौरान बनने वाली खिचड़ी तो बहुत ही खास जायका लिए होती है- इसमें बादाम, लौंग, जावित्री, जायफल, दालचीनी, काली मिर्च मिलकर इसे इतना स्वादिष्ट स्वाद देते हैं कि पूछना ही क्या।

शुद्ध आयुर्वेदिक भोजन 

असल में ये हानिरहित शुद्ध आयुर्वेदिक खाना है, जायके और पोषकता से भरपूर. वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो जब चावल और दालों को संतुलित मात्रा में मिलाकर पकाते हैं तो एमिनो एसिड तैयार होता है, जो शरीर के लिए बहुत जरूरी है. कहा जाता है कि इससे बेहतर प्रोटीन कुछ है ही नहीं. मूल रूप से खिचड़ी का मतलब है दाल और चावल का मिश्रण। 

खिचड़ी तेरे कितने रूप 

क्या आपको मालूम है कि इसका असली उदगम कहां था. कहा जाता है कि इसकी शुरुआत दक्षिण भारत में हुई थी. कुछ कहते हैं कि इसे मिस्र की मिलती जुलती डिश खुशारी से प्रेरणा लेकर बनाया गया था.अब भी आप गुजरात से लेकर बंगाल तक चले जाइए या पूरे देश या दक्षिण एशिया में घूम आइए, हर जगह खिचड़ी जरूर मिलेगी लेकिन अलग स्वाद वाली. महाराष्ट्र में झींगा मछली डालकर एक खास तरह की खिचड़ी बनाई जाती है. गुजरात के भरूच में खिचड़ी के साथ कढ़ी जरूर सर्व करते हैं. इस खिचड़ी में गेहूं से बने पतले सॉस, कढी पत्ता, जीरा, सरसों दाने का इस्तेमाल किया जाता है.अंग्रेजों ने भी खिचड़ी को अपने तरीके से ब्रितानी अंंदाज में रंगा. उन्होंने इसमें दालों की जगह उबले अंडे और मछलियां मिलाईं. साथ ही क्रीम भी। फिर इस बदली डिश को नाम दिया गया केडगेरे-खास ब्रिटिश नाश्ता। 

एलन डेविडसन अपनी किताब आक्सफोर्ड कम्पेनियन फार फूड में लिखते हैं सैकड़ों सालों से जो भी विदेशी भारत आता रहा, वो खिचड़ी के बारे में बताता रहा. अरब यात्री इब्ने बबूता वर्ष 1340 में भारत आए. उन्होंने लिखा, मूंग को चावल के साथ उबाला जाता है, फिर इसमें मक्खन मिलाकर खाया जाता है. हालांकि दुनियाभर में खिचड़ी लोकप्रिय करने का श्रेय हरे कृष्ण आंदोलन की किताब हरे कृष्ण बुक ऑफ वेजेटेरियन कुुकिंग को देना चाहिए.

आइन-ए-अकबरी में अबुल फजल ने यूं तो खिचड़ी बनाने की सात विधियों का जिक्र किया है, लेकिन मूल खिचड़ी यानि सादी खिचड़ी की विधि कुछ यूं बताई गई (अगर आप खिचड़ी बनाने जा रहे हों तो जरा एक बार इस तरीके का इस्तेमाल करके भी देखें-)

पांच कटोरी चावल
पांच कटोरी दाल
पांच कटोरी घी
नमक स्वादानुसार
आधी कप मूंग दाल
एक कप चावल
3 से 4 कप पानी, या आवश्यकतानुसार
चौथाई चम्मच जीरा
3 से 4 तेज पत्ता
3 से 4 लौंग
नमक स्वादानुसार
.
चावल और दाल को अलग अलग कुछ घंटे के लिए भिगोएं. फिर पानी में छान लें. तीन से चार चम्मच तेल या घी लें और इसे तेज पत्ता, लौंग लेकर कुछ सेकेंड तक फ्राइ करें. फिर इसमें धीरे धीरे दाल और चावल मिलाएं. इसे आठ से दस मिनट फ्राइ करें. अब इसमें और पानी मिलाएं. मध्यम आंच पर बंदकर पकाएं. फिर कुछ देर बाद आंच धीमी करें. पकने दें. जब तक चावल और दाल पक नहीं जाते. अगर जरूरत हो तो और पानी मिला सकते हैं. अगर आप चाहें पतली पतली सब्जियां मसलन-पालक, टमाटर, गोभी, मटर भी मिला सकते हैं लेकिन ये काम तभी करें जब खिचड़ी तीन चौथाई पक गई हो। 

अब इस पर भुना हुआ जीरा, हरी धनिया के पत्ते और पतली कटी प्याज ऊपर से छिड़क सकते हैं. हां, खिचड़ी का असली आनंद तभी है, जब इसे शुद्ध गरम घी, रायता, दही, पापड़, चटनी, अचार, आलू का भरता और सलाद के साथ सर्व करें. वाह तब तो इसके स्वाद के कहने ही क्या. अगर चाहें तो कई तरह की चटनी का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. इस खाने का जो स्वाद आपकी जीभ पर आएगा, उसे आप शायद सालों याद रखेंगे।

डॉ. अर्चना तिवारी(लेखिका गृहविज्ञान में फ़ूड साइंस की विशेषज्ञ हैं )

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ग्लोबल हुई खिचड़ी - डॉ. अर्चना तिवारी
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