भारतवर्ष की आत्मा धर्ममय, सेकुलर कह इसे अपमानित करना छोड़ें - डा. राधेश्याम द्विवेदी

स्वयं के लिए जीवन जीना पशुता है और दूसरों को भी जीने देना ही मानव धर्म है। धर्म-परायण, सभ्य मानवों ने दूसरों को भी ‘जीने दो’ का लक्ष्य...

स्वयं के लिए जीवन जीना पशुता है और दूसरों को भी जीने देना ही मानव धर्म है। धर्म-परायण, सभ्य मानवों ने दूसरों को भी ‘जीने दो’ का लक्ष्य रख कर स्वेच्छा से कुछ नियम और प्रतिबन्ध अपने ऊपर लागू कर लिये हैं। मानव भोजन के लिये किसी जीव की हत्या करने के बजाय या तो भूख बर्दाश्त करने लगे या भोजन के कोई अन्य विकल्प ढूंडने में लग गये। यदि किसी जीव से मानवों को खतरा लगता है तो मानव अपने आप को किसी दूसरे तरीके से बचाने की कोशिश भी करते थे। सभ्य मानव दूसरों को भी जीने का पूरा अवसर देते हैं। दूसरों के लिये विचार तथा कर्म करना ही सभ्य मानव स्वभाव का मूलमंत्र रहा है। दूसरों को भी जीने दो का लक्ष्य साकार करने के लिये मानव नें निजि धर्म का निर्माण किया तथा अपने आप को नियम-बद्ध करने की परिक्रिया आरम्भ की। इन्हीं नियमों को ही धर्म कहा गया है।

धर्म सम्बन्धी नियम का निर्माण :- जीने दो के मूल मंत्र को क्रियात्मिक रूप देने के लिये मानव समुदायों ने अपनी स्थानीय भूगौलिक राजनैतिक सामाजिक आर्थिक तथा सभ्यता के विकास की परिस्थितियों को ध्यान में रख कर अपने अपने समुदायों के लिये धर्म सम्बन्धी नियम बनाये। यह नियम आपसी सम्बन्धों में शान्ति तथा भाईचारा बनाये रखने के लिये हैं जिन का पालन करना सभी का कर्तव्य रहा है। मानव ने परिवार को सब से छोटी समुदायिक इकाई माना है। एक ही प्रकार के धर्म नियमों में बन्धे सभी परिवार एक ही धर्म के अनुयायी कहलाते हैं। भारत के महान धार्मिक ग्रंथ श्रीमद् भगवद्गीता में ‘ धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे’ कहा गया है। श्री राम चरित मानस में गोस्वामी तुलसी दासजी ने ‘ जब जब होंईं धर्म की हानी, बाढ़े असुर महा अभिमानी।‘ कह कर धर्म के महत्व को दर्शाया है। 

धर्म पालन मानवमात्र का कर्तव्य :- संसार के सभी प्राणी पर्यावरण का अंग होने के कारण एक-दूसरे पर आश्रित हैं। जीव जन्तुओं की तुलना में शरीरिक तथा मानसिक श्रेष्ठता के कारण केवल मानव ही अपने द्वारा रचे धर्म के नियमों को पालन करने के लिये बाध्य है। पशु-पक्षी तो केवल प्राकृतिक और स्वाभाविक नियमों का ही पालन करते हैं जो जन्म से ही उन के अन्दर सृष्टि कर्ता ने माईक्रो चिप की तरह उन में भर दिये थे। सूर्य तथा चन्द्र अपना प्रकाश बिना भेद-भाव के सभी को प्रदान करते हैं। सभी पशु-पक्षी, पैड़-पौधे तथा नभ-मण्डल के ग्रह अपने अपने कर्तव्यों का स्वेच्छा से निर्वाह करते रहते हैं और उस का फल समान रूप से सभी को दे देते हैं। केवल मानव ही अपना कर्तव्यों का चयन अपनी इच्छा से करते हैं और उस का फल भी स्वार्थ हित विचार कर बाँटते हैं। इस लिये मानव को धर्मबद्ध होना बहुत ही जरूरी होता है।

धर्म का महत्व :- धर्म मानवी सम्बन्धों को पर्यावरण के समस्त अंगों से जोड़ने का एक सशक्त साधन है। किसी मानव के ईश्वरीय सत्ता में विश्वास करने या ना करने से ईश्वर को कोई फर्क नहीं पड़ता। जब सभी तर्क समाप्त हो जाते हैं तो विश्वास अपने आप जागृत होने लगता है। जब कर्म और संघर्ष मनवाँच्छित परिणाम नहीं दे पाते तो हम हताश होने के बजाये अपने आप ही ईश्वरीय-प्राधानता को स्वीकार कर के संतुष्ट हो जाते हैं। जब हम अनाश्रित होते हैं और कोई अन्य सहारा दिखाई नहीं पड़ता तो हम ईश्वर पर ही आश्रित हो कर पुनः अपने आत्म विश्वास को जगाते हैं। हम मानते हैं कि जो कुछ मानव को ज्ञात नहीं वह सृष्टि कर्ता को ही ज्ञात होता है, जब कोई पास नहीं होता तो सर्व-व्यापक सृष्टि कर्ता हमारे साथ होने का आभास अपने आप ही दे देता है। ईश्वरीय शक्ति के बिना सब कुछ शून्य हो जायगा, चारों ओर केवल एकान्त असुरक्षा निराशा और हताशा ही दिखायी पडेंगी। धर्महीन नास्तिक व्यक्ति ही अकेलेपन से त्रस्त होता है और वह स्वार्थ और कृतध्नता का साक्षात उदाहरण है जो किसी विश्वास के लायक नहीं रहता। 

सनातन धर्म मानवता एवं प्रकृति का मिश्रण :- भारत में विकसित मानव धर्म प्राकृतिक नियमों पर ही आधारित था। यह समस्त मानव जाति का प्रथम धर्म था और कालान्तर आर्य धर्म सनातन धर्म तथा हिन्दू धर्म के नाम से अधिक प्रसिद्ध हुआ। हिन्दू जियो और जीने दो के सिद्धान्त पर आदि काल से ही विशवास करते रहे हैं और अपने क्षेत्र के परियावरण के प्रति समवेदनशील रहे हैं। इसी कारण से हिन्दुओं ने पर्यावरण संरक्षण को भी अपने धर्म में सम्मिलत किये हैं ताकि पर्यावरण के सभी अंग आने वाली पीढ़ियों के लिये सुरक्षित रहें और उन की समयनुसार भरपाई भी होती रहे । बेल पीपल तुलसी नीम वट वृक्ष तथा अन्य कई पेड़ पौधे आदि को भी हिन्दू संरक्षित करते हैं और प्रतीक स्वरूप पूजा भी करते हैं। हिन्दुओं ने समस्त सागरों, नदियों, जल स्त्रोत्रों तथा पर्वतों आदि को भी देवी देवता का संज्ञा दे कर पूज्य माना है ताकि प्रकृति के सभी संसाधनो का संरक्ष्ण करना हर प्राणी का निजी दिनचर्या में प्रथम कर्तव्य बन सके। 

पशु - पक्षियों का दैवीकरण :- पशु पक्षियों को देवी देवताओं की श्रेणी में शामिल कर के हिन्दुओं ने प्रमाणित किया है कि हर प्राणी को मानव की तरह जीने का पूर्ण अधिकार है। सर्प और वराह को जहाँ कई दूसरे धर्मों ने अपवित्र और घृणित माना, सनातन धर्म ने उन्हें भी देव-तुल्य और पूज्य मान कर उन में भी ईश्वरीय छवि का अवलोकन करके ईश्वरीय शक्ति को सर्व-व्यापक प्रमाणित किया है। सृष्टिकर्ता को सृष्टि के सभी प्राणी प्रिय हैं इस तथ्य तो दर्शाने के लिये हिन्दुओं ने छोटे बड़े कई प्रकार के पशु-पक्षियों को देवी देवताओं का वाहन बना कर उन्हें चित्रों और वास्तु कला के माध्यम से राज-चिन्हों और राज मुद्राओं पर भी अंकित किया है। एसा करना विचारों को प्रत्यक्ष रूप देने की क्रिया मात्र है। हिन्दू हर जीव को ईश्वर की सृष्टि मानते हैं और समस्त सृष्टि को वसुदैव कुटुम्बकम कहकर एक बड़ा परिवार। अतः प्राकृतिक तथ्यों पर केन्द्रित सनातन धर्म आधुनिक वैज्ञानिक विचारों की कसौटी पर भी खरा उतरता है।

विपुल धार्मिक साहित्य :- धर्म के माध्यम से आदि काल से आज तक का इतिहास, अनुभव, विचार तथा विशवास हमें साहित्य के रूप में हस्तांतरित किये गये हैं। हमारा भी यह कर्तव्य है कि हम उस धरोहर को सम्भाल कर रखें, उस में वृद्धि करें और आगे आने वाली पीढ़ीयों को सुरक्षित सौंप दें। हम जैसा भी फैसला करना चाहें कर सकते हैं, परन्तु हमारा धार्मिक साहित्य मानवता के इतिहास, सभ्यता और विकास का पूर्ण लेखा जोखा होता है। इस तथ्य पर तो हर भारतवासी को गर्व करने का पूरा अधिकार है कि हिन्दू ही मानवता की इस स्वर्ण धरोहर के रचनाकार और संरक्षक थे , आज भी हैं और आगे भी बने रहेंगे। विज्ञान के इस युग में धर्म की यही महत्वशाली देन हमारे पास है। स्थानीय पर्यावरण का आदर करने वाले समस्त मानव, जो जियो और जीने दो के सिद्धान्त में विशवास रखते हैं तथा उस का इमानदारी से पालन करते हैं वह निस्संदेह हिन्दू हैं उनकी नागरिकता तथा वर्तमान पहचान चाहे कुछ भी हो। हिन्दू धर्म ही एकमात्र पूर्णतया मानव धर्म है। हाल ही में हुई वैज्ञानिक खोजों में भी धर्म का महत्व बढ़ा है। कई वैज्ञानिक अपनी खोज में सामाजिक मूल्यों पर ध्यान दे रहे हैं। किसी खोज का आम व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ेगा , इसका ध्यान रखा जाने लगा है। वैज्ञानिक भी इसी समाज की पैदाइश है। वह केवल विज्ञान के लिए काम नहीं कर सकता। उसे समाज निर्माण से भी जुड़ना होगा। धर्म समाज को संगठित करता है। ऐसे में विज्ञान समाज की उपेक्षा नहीं कर सकता। 

कानून तथा समाज द्वारा मान्यता :-भारत एक ऐसा देश है जहां धार्मिक विविधता और धार्मिक सहिष्णुता को कानून तथा समाज, दोनों द्वारा मान्यता प्रदान की गयी है। भारत के पूर्ण इतिहास के दौरान धर्म का यहां की संस्कृति में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। भारत विश्व की चार प्रमुख धार्मिक परम्पराओं का जन्मस्थान है - हिंदू धर्म, जैन धर्म, बौद्ध धर्म तथा सिक्ख धर्म। भारतीयों का एक विशाल बहुमत स्वयं को किसी न किसी धर्म से संबंधित अवश्य बताता है। हमारे संविधान की शुरुआत ,” हम भारत के लोग” से होती है और उसमें इस देश के हर नागरिक के लिए समान कानून बना हुआ हैं कोई भी मानव धर्म या संगठन कानून से ऊपर नहीं है। सन 1873 में बंगाल के लेखक किरण चन्द्र बनर्जी ने अपने नाटक के लिए भारत-माता शब्द का उपयोग किया गया था। उस समय बंगाल में दुर्गा पूजा, लोगों को एकजुट करने और स्वराज पर चर्चा करने का एक माध्यम बनी थी। इस बीच बंगाल के लेखकों, साहित्यकारों और कवियों के लेखों और रचनाओ में मां दुर्गा का गहरा प्रभाव रहा था और इन लेखकों द्वारा लिखे गए लेखों, नाटकों में भी भारत को दुर्गा की तर्ज पर मां और मातृभूमि कहकर सम्बोधित किया जाने लगा था।

विज्ञान और धर्म मिलकर काम करें :- मानव समाज के विकास में पारंपरिक रूप से माना यह जाता रहा है कि धर्म विज्ञान का विरोधी है। धर्म की भूमिका मानव मन की शांति के लिए है , प्रभु की प्राप्ति के लिए है , आत्मा और परमात्मा से संबंधित तात्विक चिंतन में है , पर विकास में उसकी कोई भूमिका नहीं हो सकती। धर्म और विज्ञान ने अलग-अलग तौर-तरीकों से समाज के विकास को रास्ता दिखाया है। जब-जब विज्ञान और धर्म ने मिलकर काम किया , तब-तब समाज विनाश के कार्यों से दूर हटा। ऐसे समय में समाज ने हर क्षेत्र में तरक्की की। किसी वैज्ञानिक खोज में केवल विचार या अध्ययन की ही भूमिका महत्वपूर्ण नहीं होती , बल्कि उस खोज में आस्था , कल्पना और सहज ज्ञान का भी उतना ही महत्व होता है। आस्था और कल्पना के तत्व हमें धर्म से ही मिलते हैं। एसे में विचार और आस्था , दोनों ही एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों ही समाज के सच को समझने में सहायक दो औजार हैं। दूसरे विश्वयुद्ध में विज्ञान का भयानक चेहरा देखने को मिला। विज्ञान की देन परमाणु बम से अमेरिका ने भयानक तबाही मचाई। दूसरा विश्वयुद्ध समाप्त हुआ। विश्व में शांति बनाए रखने की चर्चा छिड़ी। इसके लिए स्थापना हुई संयुक्त राष्ट्र संघ की। तब से संयुक्त राष्ट्र भी लगातार विश्व शांति बनाए रखने और समाज विकास की कोशिश में लगा हुआ है। इसमें धर्म की बड़ी भूमिका हो सकती है। हाल ही में हुई वैज्ञानिक खोजों में भी धर्म का महत्व बढ़ा है। कई वैज्ञानिक अपनी खोज में सामाजिक मूल्यों पर ध्यान दे रहे हैं। किसी खोज का आम व्यक्ति पर क्या प्रभाव पड़ेगा , इसका ध्यान रखा जाने लगा है। वैज्ञानिक भी इसी समाज की पैदाइश है। वह केवल विज्ञान के लिए काम नहीं कर सकता। उसे समाज निर्माण से भी जुड़ना होगा। धर्म समाज को संगठित करता है। ऐसे में विज्ञान समाज की उपेक्षा नहीं कर सकता। 

बहुसंख्यक हिन्दू ही भारत की पहचान :- भारत की जनसंख्या के 79.8% लोग हिंदू धर्म का अनुसरण करते हैं। इस्लाम 14.23% बौद्ध धर्म 0.70%, ईसाई धर्म 2.3% और सिक्ख धर्म 1.72% भारतीयों द्वारा अनुसरण किये जाने वाले अन्य प्रमुख धर्म हैं। आज भारत में मौजूद धार्मिक आस्थाओं की विविधता, यहां के स्थानीय धर्मों की मौजूदगी तथा उनकी उत्पत्ति के अतिरिक्त, व्यापारियों, यात्रियों, आप्रवासियों, यहां तक कि आक्रमणकारियों तथा विजेताओं द्वारा भी यहां लाए गए धर्मों कोआत्मसात करने एवं उनके सामाजिक एकीकरण का परिणाम है। सभी धर्मों के प्रति हिंदू धर्म के आतिथ्य भाव के विषय में जॉन हार्डन लिखते हैं, हालांकि, वर्तमान हिंदू धर्म की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता उसके द्वारा एक ऐसे गैर-हिंदू राज्य की स्थापना करना है जहां सभी धर्म समान हैं।

“धर्म हिंसा तदैव च“ को महत्व दिया जाय –“अहिंसा परमो धर्मः, धर्म हिंसा तदैव च” यह सूत्रवाक्य महाभारत से ग्रहण किया गया है। इसका अर्थ है कि अहिंसा मनुष्य का परम धर्म है किन्तु धर्म की रक्षा के लिए हिंसा करना उससे भी श्रेष्ठ है। महात्मा गांधीजी ने सिर्फ इस श्लोक को अधूरा ग्रहणकर इसके अर्थ को ही बदल दिया है। इस बदलाव को किये लगभग एक शतक होने को जा रहा है और हमारी संसद व सरकारें इस गल्ती को निरन्तर दोहराते हुए अर्ध सत्य को सत्य मानकर सत्य से बराबर दूरी बनाये हुए हैं। 

‘‘यतो धर्मः ततो जयः” भारत का मूल वाक्य बने :- ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ अर्थात् जहाँ धर्म है, वहीं विजय है विश्व के सबसे बड़े ग्रन्थ महाभारत में पचासों स्थानों पर एक वाक्य आया है। भारत के उच्चतम न्यायालय ने इस वाक्य को बड़े ही आदर से ग्रहण करके अपना ध्येय-वाक्य बनाया है और अपने प्रतीक-चिह्न की नीचे यह वाक्य अंकित भी किया है. सन 2000 में उच्चतम न्यायालय के 50 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 2 रूपये मूल्य का सिक्का भी जारी किया गया था, उसमें भी यह वाक्य उत्कीर्ण था। बृहन्मुंबई महानगरपालिका का भी ध्येय-वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ है और उसके भवन पर यह वाक्य उत्कीर्ण देखा जा सकता है। कूचबिहार रियासत (पश्चिम बंगाल) का भी ध्येय-वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ है और उसके प्रतीक चिह्न में भी यह अंकित है। स्वामी विवेकानंद (1863-1902) की शिष्या भगिनी निवेदिता (1867-1911) द्वारा राष्ट्रीय ध्वज जो का प्रारूप तैयार किया गया था, उसमें वज्र और ‘वन्देमातरम’ के साथ ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ यह वाक्य भी अंकित था। जयपुर के अलबर्ट हॉल म्यूजियम की दीवार पर भी बड़े गर्व से ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ उत्कीर्ण किया गया है । जीवन के सभी क्षेत्रों में धर्म व्याप्त है और धर्म के बिना जीवन जिया ही नहीं जा सकता। इसी “धर्म” ने हम सबको धारण किया हुआ है और हमने जन्म से मृत्युपर्यन्त धर्म को धारण किया हुआ है। इस धर्म से उसी प्रकार अलग नहीं हुआ जा सकता, जिस प्रकार जल आर्द्रता से और अग्नि ऊष्मा से अलग नहीं हो सकती। संक्षेप में “धर्म” से अलग हो जाना असंभव है। 

संस्कृत की अद्भुत क्षमता :- संस्कृत में अर्थग्रथित शब्द बनाने की अद्भुत क्षमता रही है, किन्तु उसका भी जैसा उत्कृष्ट उदाहरण ‘धर्म’ शब्द में मिलता है, वैसा अन्यत्र नहीं मिलता। भारतवर्ष ने जो कुछ सशक्त निर्माण-कार्य युग-युग में संपन्न किया है और कर रहा है, वह सब ‘धर्म’ है। यह धर्म-भाव प्रत्येक हिंदू के हृदय में अनादिकाल से अंकित है। यदि यह प्रश्न किया जाये कि करोड़ों वर्ष प्राचीन भारतीय संस्कृति की उपलब्धि क्या है और यहाँ के जनसमूह ने किस जीवन-दर्शन का अनुभव किया था तो इसका एकमात्र उत्तर यही है कि भारतीय-साहित्य, कला, जीवन संस्कृति और दर्शन इन सबकी उपलब्धि ‘धर्म’ है। इन सभी के बाद भी इस देश में धर्म (सनातन जीवन-मूल्य) की उपेक्षा हो रही है और उसे मजहब” (सम्प्रदाय=रिलिजन) से जोड़ा जा रहा है। भारतीय लोक सभा ने :धर्मचक्र प्रवर्तनाय” को अपना प्रतीक वाक्य बनाया है। इसका अर्थ है कि धर्मचक्र के प्रवर्तन (आगे ले जाने) के लिए भारतीय संसद कार्य करती रहेगी। राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय :धर्मो रक्षति रक्षितः” अपना सूत्र वाक्य चयनित किया है। इसका तात्पर्य है कि जो धर्म की रक्षा करते हैं, वे धर्म द्वारा रक्षित होते हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय का प्रतीक वाक्य “धर्मो विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठा” को चुना है। इसका अर्थ है कि धर्म सारे जगत् की प्रतिष्ठा (आधार) है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि लोग अज्ञानता बस या विदेशी सभ्यता के प्रभाव में आकर भारतवर्ष में धर्म का निरादर करते हुए अपने को सेकुलर आदि विदेशी तथ्यहीन उपाधियों से जोड़कर भारत का महान अहित कर रहे हैं। इस पर तत्काल लगाम लगायी जानी चाहिए तथा हिन्दू धर्म को ना केवल भारत का अपितु विश्व का सर्वमान्य धर्म घोषित किया जाना चाहिए। इससे “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना बलवती होगी तथा विश्व स्थायी शान्ति की तरफ अग्रसर हो सकेगा।

डा. राधेश्याम द्विवेदी
लेखक परिचय - डा.राधेश्याम द्विवेदी - लेखक परिचय - डा.राधेश्याम द्विवेदी ने अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद से बी.ए.और बी.एड. की डिग्री,गोरखपुर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी),एल.एल.बी.,सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी का शास्त्री, साहित्याचार्य तथाग्रंथालय विज्ञान की डिग्री तथा विद्यावारिधि की (पी.एच.डी) की डिग्री उपार्जितकिया। आगरा विश्वविद्यालय से प्राचीन इतिहास से एम.ए.डिग्री तथा’’बस्ती कापुरातत्व’’ विषय पर दूसरी पी.एच.डी.उपार्जित किया। बस्ती ’जयमानव’ साप्ताहिकका संवाददाता, ’ग्रामदूत’ दैनिक व साप्ताहिक में नियमित लेखन, राष्ट्रीय पत्रपत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित, बस्ती से प्रकाशित होने वाले ‘अगौना संदेश’ के तथा‘नवसृजन’ त्रयमासिक का प्रकाशन व संपादन भी किया। सम्प्रति 2014 से भारतीयपुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मण्डल आगरा में सहायक पुस्तकालय एवं सूचनाधिकारीपद पर कार्यरत हैं। प्रकाशित कृतिः ”इन्डेक्स टू एनुवल रिपोर्ट टू द डायरेक्टर जनरलआफ आकाॅलाजिकल सर्वे आफ इण्डिया” 1930-36 (1997) पब्लिस्ड बाई डायरेक्टर जनरल, आकालाजिकल सर्वेआफ इण्डिया, न्यू डेलही। अनेक राष्ट्रीय पोर्टलों में नियमित रिर्पोटिंग कर रहे हैं

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क्रांतिदूत: भारतवर्ष की आत्मा धर्ममय, सेकुलर कह इसे अपमानित करना छोड़ें - डा. राधेश्याम द्विवेदी
भारतवर्ष की आत्मा धर्ममय, सेकुलर कह इसे अपमानित करना छोड़ें - डा. राधेश्याम द्विवेदी
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