महारानी पद्मिनी : इतिहास और कथा - संजय तिवारी

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में पत्रो के साथ नयी नयी कहानिया गढ़ना किसी भी दशा में अभिव्यक्ति की आज़ादी के बहाने उचित नहीं कहा जा सकता। कहानिय...

मध्यकालीन भारतीय इतिहास में पत्रो के साथ नयी नयी कहानिया गढ़ना किसी भी दशा में अभिव्यक्ति की आज़ादी के बहाने उचित नहीं कहा जा सकता। कहानियो को रोचक और विवादपूर्ण बना कर अपने ही पुरखो को अपमानित करने की कोशिश भी उचित नहीं हो सकती लेकिन आजकल यह एक फैशन सा बन गया है। कहानी बेचने के लिए पहले विवादित स्क्रिप्ट लिखो और फिर उसे जनता में परोस कर धन और नाम बना लेने की प्रक्रिया न तो कोई कला है और न ही अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर इस धोखे को आगे बढ़ाने देनी चाहिए। महारानी पद्मावती की नयी और गढ़ी गयी कहानी को लेकर जो कुछ हो रहा है वह शर्मनाक और दुखद ही कहा जाएगा। यह बात केवल एक फिल्म की नहीं है बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता और अपने गौरवशाली इतिहास की है। कला के नाम पर अनाप शनाप ताने बाने बनाने की इजाजत इतिहास भला कैसे दे सकता है ? बताया जा रहा है कि राजस्थान के जयगढ़ में पद्मावती फिल्म की शूटिंग के दौरान मारपीट और सेट पर तोड़फोड़ के बाद डायरेक्टर संजय लीला भंसाली ने रातोरात सामान समेट लिया । अब वे मुंबई में ही सेट लगाकर फिल्म का निर्माण पूरा करेंगे या कोई दूसरी जगह देखेंगे। उधर, राजपूत करणी सेना के पदाधिकारियों ने शनिवार को फिर चेतावनी दी कि अगर रानी पद्मावती के इतिहास के साथ छेड़छाड़ की गई तो न तो फिल्म की शूटिंग होने देंगे और न ही पर्दे पर आने देंगे। दूसरी ओर, भंसाली के साथ हुई मारपीट से बॉलीवुड में हड़कंप मच गया है। फिल्म डायरेक्टर, अभिनेता व अभिनेत्रियां करणी सेना के पदाधिकारियों द्वारा की गई बदसलूकी पर ट्वीट करके भड़ास निकाल रहे हैं। लेकिन उन्हें यह भी समझना होगा कि महारानी पद्मावती केवल एक ऐतिहासिक पात्र ही नहीं हैं बल्कि भारत की वीरता और नारियो के शौर्य की भी प्रतीक हैं। 

राजपूत इतिहास 

रानी पद्मावती को पद्मिनी के नाम से भी जाना जाता था। वे चित्तौड़गढ़ की रानी थी। कहा जाता है कि खिलजी वंश का शासक अलाउद्दीन खिलजी पद्मावती को पाना चाहता था। रानी को जब ये पता चला तो उन्होंने कई अन्य राजपूत महिलाओं के साथ जौहर कर लिया। यह बात सुप्रसिद्ध इतिहासकार आर वी सिंह द्वारा लिखित राजपूताना का इतिहास नमक पुस्तक में भी दर्ज है। 

संजय की लीला

संजय लीला भंसाली की फिल्म की कहानी खिलजी और पद्मावती को केंद्र में रखकर बुनी गई है। रानी पद्मावती को अलाउद्‌दीन खिलजी की प्रेमिका बताया जा रहा है। उसके सपने में पद्मावती के साथ प्रेम-प्रसंग के दृश्यों को फिल्माने की बात सामने आ रही है।

करणी सेना व राजपूत सभा के पदाधिकारियों की पीड़ा 

राजपूत करणी सेना के अध्यक्ष महिपाल मकराना और राजपूत सभा के अध्यक्ष गिर्राज सिंह लोटवाड़ा ने शनिवार को मीडिया से कहा कि अगर इतिहास और परंपराओं के साथ छेड़छाड़ होगी तो इसका अंजाम अच्छा नहीं होगा। पदाधिकारियों ने कहा कि रानी पद्मिनी हमारा गौरव हैं। उन्होंने अलाउद्दीन के पास जाने के बजाय जौहर (आग में कूदना) करने को बेहतर समझा। फिल्म में उन्हें अलाउद्‌दीन की प्रेमिका बताया जा रहा है, जो सरासर गलत है। हम राजपूतों की धरती पर अपने पूर्वजों को लेकर दिखाई जा रही अश्लीलता को बर्दाश्त नहीं करेंगे। करणी सेना के प्रमुख लोकेंद्र सिंह कालवी ने कहा कि दीपिका-रणवीर के रिलेशन कुछ भी हों लेकिन इस फिल्म में उन्हें प्रेमी-प्रेमिका के रूप में नहीं दिखाया जाना चाहिए। अलाउद्दीन-पद्मिनी के लव सीन को नहीं फिल्माया जाना चाहिए। फिल्म बनाने का विरोध करने के लिए करणी सेना के पदाधिकारियों ने राजपूत समाज के अन्य संगठनों व बाहरी राज्यों में संपर्क किया है।

भंसाली को पत्र लिख कहा था इतिहास से छेड़छाड़ ना करें

हंगामे के बाद गुजरात व हैदराबाद से राजपूत संगठनों के पदाधिकारी जयपुर भी पहुंच गए। करणी सेना के पदाधिकारियों ने बताया कि फिल्म में शूट किए जाने वाले दृश्यों को लेकर संजय लीला भंसाली से बात करने का प्रयास किया। लेकिन वे बात करने को ही तैयार नहीं हुए। करणी सेना के प्रमुख लोकेंद्र सिंह कालवी ने कहा कि सितंबर माह में जब मीडिया में पद्मावती फिल्म बनाए जाने की खबर आई और उसमें रणबीर सिंह व दीपिका पादुकोण लीड रोल में है। फिल्म में पद्मावती के साथ खिलजी के प्रेम-प्रसंग के दृश्यों पर शूटिंग की जाने की बात सामने आई थी। करनी सेना ने संजय लीला भंसाली को सितंबर माह में पत्र लिखकर कहा था कि रानी पद्मनी के इतिहास के साथ छेड़छाड़ नहीं किया जाए। लेकिन वहां से कोई जवाब नहीं मिला।

रानी की असली और फिल्मी कहानी को लेकर जंग…

करणी सेना का आरोप है कि फिल्म में रानी पद्मावती की छवि और इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया जा रहा है।करणी सेना का कहना है कि मूवी के एक ड्रीम सीन में रानी पद्मावती और अलाउद्दीन खिलजी के बीच लव सीन फिल्माया जाएगा। यह बर्दाश्त नहीं होगा। ऐसा सीन राजपूतों का अपमान होगा।हालांकि, भंसाली का कहना है कि मूवी में कोई इंटीमेट सीन नहीं होगा।इसी करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने एकता कपूर के सीरियल जोधा-अकबर का भी भारी विरोध किया था।करणी सेना का आरोप था कि सीरियल में भी इतिहास को तोड़-मरोड़ कर जोधा को गलत तरीके से पेश किया गया था।

कौन थीं रानी पद्मावती?

रानी पद्मावती को पद्मिनी के नाम से भी जाना जाता था। वे चित्तौड़गढ़ की रानी और राजा रतनसिंह की पत्नी थीं। इन्हें बेहद खूबसूरत माना जाता था।कहा जाता है कि खिलजी वंश का शासक अलाउद्दीन खिलजी पद्मावती को पाना चाहता था। रानी को जब ये पता चला तो उन्होंने कई दूसरी राजपूत महिलाओं के साथ जौहर कर लिया।ऐसा माना जा रहा है कि बाजीराव मस्तानी की तरह इस फिल्म में भी खिलजी और पद्मावती को सेंटर में रखकर कहानी को बुना जा रहा है।

पद्मावती का जन्म सिंहल देश में हुआ। उसके पिता राजा गंधर्वसेन व माता चंपावती थी। उसका विवाह मेवाड़ के रावल रतनसिंह के साथ हुआ। महारानी बन चित्तौड़गढ़ फोर्ट पहुंची पद्मावती के सौंदर्य के चर्चे उस समय पूरे देश में चर्चित होने लगे। इस दौरान रावल रतनसिंह ने किसी बात पर नाराज होकर राघव चेतन नामक राज चारण को देश निकाला दे दिया। राघव ने दिल्ली दरबार में जाकर महारानी पद्मावती के सौंदर्य का बखान अल्लाउद्दीन के सामने इस तरह किया कि वह रानी पद्मावती को हासिल करने की लालायित हो उठा और चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी। खिलजी की सेना के कूच करते ही रावल रतनसिंह ने चित्तौड़गढ़ फोर्ट में राजपूतों की सेना एकत्र करना शुरू कर दिया। खिलजी की सेना ने कई माह तक फोर्ट को घेरे रखा,लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। सफलता मिलती नहीं देख खिलजी ने एक दांव खेला। उसने रतनसिंह के समक्ष प्रस्ताव रखा कि एक बार वे महारानी पद्मावती के दीदार करवा दे। इसके बाद वह घेरा उठा देगा। इस प्रस्ताव से रतनसिंह आग बबूला हो गए। लेकिन पद्मावती ने खूनखराबा रोकने के लिए अपने पति को इसके लिए तैयार कर लिया। चित्तौड़गढ़ फोर्ट में स्थित महारानी के महल में लगे एक शीशे को इस तरह लगाया गया कि उसमें पद्मावती के स्थान पर खिलजी को सिर्फ प्रतिबिम्ब नजर आए। प्रतिबिम्ब में ही पद्मावती को देखते ही खिलजी की नीयत डोल गई और उसने बाहर निकलते समय उसे छोड़ने बाहर तक आए रतनसिंह को पकड़ लिया। रतनसिंह की जान की एवज में खिलजी ने प्रस्ताव रखा कि पद्मावती को सौंपने के बाद ही वह रतनसिंह को रिहा करेगा। इस प्रस्ताव के बाद पद्मावती ने अपने सात सौ लड़ाकों को तैयार किया और प्रस्ताव भेजा कि वह दासियों के साथ खिलजी से मिलने आ रही है। सात सौ पालकियों में दासियों के स्थान पर लड़ाकों के साथ पद्मावती खिलजी के डेरे में पहुंची और हमला बोल दिया। देखते ही देखते रतनसिंह को आजाद करवा कर वह फोर्ट में लौट गईं।

शाका और जौहर

इससे खफा हो खिलजी ने आक्रमण कर दिया। फोर्ट में रसद कम होने और संख्या में कम होने के कारण तीस हजार राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना धारण कर शाका करने फोर्ट के गेट खोल आक्रमण बोल दिया। दूसरी तरफ फोर्ट में मौजूद पद्मावती ने सोलह हजार राजपूत महिलाओं के साथ जौहर करने का निर्णय किया। सभी महिलाओं ने पहले गोमुख सरोवर में स्नान कर कुलदेवी की पूजा की। गोमुख के उत्तर में स्थित मैदान में जौहर तैयार करवाया गया। महारानी पद्मावती के नेतृत्व में सोलह हजार महिलाएं बारी-बारी से जौहर की चिता में कूद पड़ी।

क्या कहा करणी सेना ने?

राजपूत करणी सेना के लीडर लोकेंद्र सिंह कालवी ने कहा- जिस रानी ने देश और कुल की मर्यादा के लिए 16 हजार रानियों के साथ जौहर कर लिया था, उसे इस फिल्म में खिलजी की प्रेमिका के रूप में दिखाना बेहद आपत्तिजनक है। इस पूरी कहानी को ही ग्लैमराइज करके दिखाना हमारी संस्कृति पर तमाचा है। हम चुप नहीं रहेंगे। ये फिल्मकार क्रिएटिविटी के नाम पर हमारे इतिहास के साथ कुछ भी कर दें और हम चुप बैठें, ये कैसे हो सकता है? ये फिल्म बननी नहीं चाहिए।राजपूत समाज ने कहा कि भंसाली को कई बार पत्र लिखे गए। उनसे कहा गया कि इतिहास को सही तरीके से पेश करें, लेकिन वे नहीं माने। राजपूत समाज के पास बहुत समृद्ध लाइब्रेरी है। इतिहास की किसी भी किताब में पद्मावती को अलाउद्दीन की प्रेमिका नहीं बताया गया है।समाज के लोगों ने कहा- एेतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ कर पद्मावती को बदनाम किया जा रहा है। तथ्यों से छेड़छाड़ किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।करणी सेना ने कहा- चेतावनी के बाद भी भंसाली ने विवादित पार्ट नहीं हटाए तो बुरे नतीजे भुगतने होंगे।

फिल्मकार संजय लीला भंसाली की अल्लाउद्दीन खिलजी एवं जौहर करने वाली रानी पदमिनी के प्रेम प्रसंग पर फिल्मी कहानी बनाने पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। भंसाली फिल्म की शूटिंग बंद कर जयपुर से रवाना हो चुके हैं। इस विवाद पर कॉलेज एवं स्कूली पाठ्यक्रम में दिए गए तथ्यों और प्रदेश के इतिहासकारों से बातचीत में स्पष्ट रूप से सामने आया है कि जिस तथ्य का कहीं जिक्र तक नहीं है उनको लेकर भंसाली ने कहां से फिल्म की स्क्रिप्ट लिख डाली। इतिहासकार कहते हैं कि चित्तौडगढ़ के 42वें शासक रावल रतन सिंह की 15 रानियों में से एक थी रानी मदन कंवर पदमिनी। जिन्हें इतिहासकार पदमावती के नाम से जानते हैं।

पाठ्यक्रम में पद्मावती 

रानी पदमिनी के जौहर एवं अल्लाउद्दीन खिलजी से जुड़ी कहानियां राजस्थान के स्कूल, कॉलेज (बीए पार्ट 1 और बीए पार्ट- 2) एवं यूनिवर्सिटी (एमए प्रथम वर्ष या द्वितीय सेमेस्टर ) में पढ़ाई जा रही है। इनमें कहीं भी प्रेम प्रसंग के बारे में नहीं बताया गया है। सवा दो शताब्दी बाद लिखी कथा इतिहासकार बताते हैं कि सूफी कवि मलिक मोहम्मद जायसी ने 1540 ईस्वी में अवधी भाषा में चित्तौड़ पर हुए 1303 ईस्वी के आक्रमण पर पदमावती काव्य लिखा। किवदंतियों के आधार पर घटना से सवा दो शताब्दी बाद ये काव्य लिखा गया। जायसी के अनुसार आध्यात्मिक संदेशों के लिए इस रचना को चुना है। चित्तौड़ मनुष्य के शरीर का प्रतीक है। रावल रतन सिंह उसकी आत्मा और पदमावती उसकी बुद्धि। अल्लाउद्दीन खिलजी माया या भ्रम है, जो बुद्धि को भटकाने का प्रयास है।

क्या कहता है जायसी का पद्मावत 

मलिक मोहम्मद जायसी ने पदमावत नामक काव्य में 1303 ईस्वी में चित्तौडगढ पर हुए आक्रमण और ऐतिहासिक विजय का वर्णन किया है। इसमें उन्होंने रानी पदमिनी का नाम पदमावती रखा। इसमें कथाकार बताया है कि रानी पदमावती बड़ी सुंदर थी। अल्लाउद्दीन खिलजी ने पदमावती की सुंदरता के बारे में सुना तो देखने के लिए लालायित हुआ। खिलजी की सेना ने चित्तौड़ को घेर लिया और रावल रतन सिंह के पास पदमावती से मिलने का संदेश भिजवाया। भरोसा दिया कि पदमावती से मिलकर वह चितौड़ छोड़कर चल देंगे और आक्रमण नहीं करेंगे। रावल रतन सिंह ने इस बारे में पदमावती से बातचीत की। रानी इससे सहमत नहीं थी, लेकिन युद्ध टालने के लिए एक उपाय निकाला। खिलजी उनकी परछाई को कमल के तालाब में देख सकता है। शर्त यह रहेगी की खिलजी को बगैर शस्त्र आना होगा। खिलजी ने तालाब में पदमिनी का प्रतिबिंब देखा। रानी की सुंदरता पर मोहित खिलजी ने आक्रमण कर दिया। इस युद्ध में रावल रतन सिंह और उनके सैनिक मारे गए। हालांकि, जब तक अल्लाउद्दीन दुर्ग तक पहुंचते, उससे पहले ही पदमिनी ने हजारों महिलाओं के साथ जौहर कर लिया था। पद्मिनी सिंहल द्वीप (श्रीलंका) की अद्वितीय सुंदरी राजकन्या तथा चित्तौड़ के राजा भीमसिंह अथवा रत्नसिंह की रानी थी। उसके रूप, यौवन और जौहर व्रत की कथा, मध्यकाल से लेकर वर्तमान काल तक चारणों, भाटों, कवियों, धर्मप्रचारकों और लोकगायकों द्वारा विविध रूपों एवं आशयों में व्यक्त हुई है। पद्मिनी संबंधी कथाओं में सर्वत्र यह स्वीकार किया गया है कि अलाउद्दीन ऐसा कर सकता था लेकिन किसी विश्वसनीय तथा लिखित प्रमाण के अभाव में ऐतिहासिक दृष्टि से इसे पूर्णतया सत्य मान लेना कठिन है।सुल्तान के साथ चित्तौड़ की चढ़ाई में उपस्थित अमीर खुसरो में एक इतिहासलेखक की स्थिति से न तो 'तारीखे अलाई' में और न सहृदय कवि के रूप में अलाउद्दीन के बेटे खिज्र खाँ और गुजरात की रानी देवलदेवी की प्रेमगाथा 'मसनवी खिज्र खाँ' में ही इसका कुछ संकेत किया है। इसके अतिरिक्त परवर्ती फारसी इतिहासलेखकों ने भी इस संबध में कुछ भी नहीं लिखा है। केवल फरिश्ता ने चित्तौड़ की चढ़ाई (सन् १३०३) के लगभग ३०० वर्ष बाद और जायसीकृत 'पद्मावत' (रचनाकाल १५४० ई.) की रचना के ७० वर्ष पश्चात् सन् १६१० में 'पद्मावत्' के आधार पर इस वृत्तांत का उल्लेख किया। 

तारीखे अलाई

सुल्तान के साथ चित्तौड़ की चढ़ाई में उपस्थित अमीर खुसरो ने एक इतिहास लेखक की स्थिति से न तो 'तारीखे अलाई' में और न सहृदय कवि के रूप में अलाउद्दीन के बेटे खिज्र ख़ाँ और गुजरात की रानी देवलदेवी की प्रेमगाथा 'मसनवी खिज्र ख़ाँ' में ही इसका कुछ संकेत किया है। इसके अतिरिक्त परवर्ती फ़ारसी इतिहास लेखकों ने भी इस संबध में कुछ भी नहीं लिखा है। केवल फ़रिश्ता ने 1303 ई. में चित्तौड़ की चढ़ाई के लगभग 300 वर्ष बाद और जायसीकृत 'पद्मावत' की रचना के 70 वर्ष पश्चात सन् 1610 में 'पद्मावत' के आधार पर इस वृत्तांत का उल्लेख किया जो तथ्य की दृष्टि से विश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। गौरीशंकर हीराचंद ओझा का कथन है कि पद्मावत, तारीखे फ़रिश्ता और टाड के संकलनों में तथ्य केवल यही है कि चढ़ाई और घेरे के बाद अलाउद्दीन ने चित्तौड़ को विजित किया, वहाँ का राजा रत्नसिंह मारा गया और उसकी रानी पद्मिनी ने राजपूत रमणियों के साथ जौहर की अग्नि में आत्माहुति दे दी।

रानी पद्मिनी का महल, चित्तौड़गढ़

ओझा जी (गौरीशंकर हीराचंद) के अनुसार पद्मिनी की स्थिति सिंहल द्वीप की राजकन्या के रूप में तो अनैतिहासिक है लेकिन ओझा जी ने रत्नसिंह की अवस्थिति सिद्ध करने के लिये कुंभलगढ़ का जो प्रशस्तिलेख प्रस्तुत किया है, उसमें उसे मेवाड़ का स्वामी और समरसिंह का पुत्र लिखा गया है, यद्यपि यह लेख भी रत्नसिंह की मृत्यु 1303 ई. के 157 वर्ष पश्चात सन् 1460 में उत्कीर्ण हुआ था। भट्टिकाव्यों, ख्यातों और अन्य प्रबंधों के अलावा परवर्ती काव्यों में प्रसिद्ध 'पद्मिनी के महल' और 'पद्मिनी के तालाब' जैसे स्मारकों के प्रामाणिक रूप आज भी मौजूद हैं।

महारानी पद्मिनी 

रावल समरसिंह के बाद उनका पुत्र रत्नसिंह चित्तौड़ की राजगद्दी पर बैठा। रत्नसिंह की रानी पद्मिनी अपूर्व सुन्दर थी। उसकी सुन्दरता की ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। उसकी सुन्दरता के बारे में सुनकर दिल्ली का तत्कालीन बादशाह अलाउद्दीन ख़िलज़ी पद्मिनी को पाने के लिए लालायित हो उठा और उसने रानी को पाने हेतु चित्तौड़ दुर्ग पर एक विशाल सेना के साथ चढ़ाई कर दी। उसने चित्तौड़ के क़िले को कई महीनों घेरे रखा पर चित्तौड़ की रक्षार्थ पर तैनात राजपूत सैनिकों के अदम्य साहस व वीरता के चलते कई महीनों की घेरा बंदी व युद्ध के बावज़ूद वह चित्तौड़ के क़िले में घुस नहीं पाया। तब अलाउद्दीन ख़िलज़ी ने कूटनीति से काम लेने की योजना बनाई और अपने दूत को चित्तौड़ रत्नसिंह के पास भेज सन्देश भेजा कि-

"हम तो आपसे मित्रता करना चाहते हैं, रानी की सुन्दरता के बारे में बहुत सुना है सो हमें तो सिर्फ एक बार रानी का मुँह दिखा दीजिये हम घेरा उठाकर दिल्ली वापस लौट जायेंगे।"

रत्नसिंह ख़िलज़ी का यह सन्देश सुनकर आगबबूला हो उठे पर रानी पद्मिनी ने इस अवसर पर दूरदर्शिता का परिचय देते हुए अपने पति रत्नसिंह को समझाया कि

"मेरे कारण व्यर्थ ही चित्तौड़ के सैनिकों का रक्त बहाना बुद्धिमानी नहीं है।

रानी को अपनी नहीं पूरे मेवाड़ की चिंता थी वह नहीं चाहती थीं कि उसके चलते पूरा मेवाड़ राज्य तबाह हो जाये और प्रजा को भारी दुःख उठाना पड़े क्योंकि मेवाड़ की सेना अलाउद्दीन की विशाल सेना के आगे बहुत छोटी थी। रानी ने बीच का रास्ता निकालते हुए कहा कि अलाउद्दीन रानी के मुखड़े को देखने के लिए इतना बेक़रार है तो दर्पण में उसके प्रतिबिंब को देख सकता है। अलाउद्दीन भी समझ रहा था कि राजपूत वीरों को हराना बहुत कठिन काम है और बिना जीत के घेरा उठाने से उसके सैनिको का मनोबल टूट सकता है और उसकी बदनामी होगी, उसने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। चित्तौड़ के क़िले में अलाउद्दीन का स्वागत रत्नसिंह ने अथिति की तरह किया। रानी पद्मिनी का महल सरोवर के बीचोंबीच था। दीवार पर एक बड़ा आइना लगाया गया रानी को आईने के सामने बिठाया गया। आईने से खिड़की के ज़रिये रानी के मुख की परछाई सरोवर के पानी में साफ़ पड़ती थी वहीं से अलाउद्दीन को रानी का मुखारविंद दिखाया गया। सरोवर के पानी में रानी के मुख की परछाई में उनका सौन्दर्य देखकर अलाउद्दीन चकित रह गया और थोड़ी ही देर तक दिखने वाले महारानी के प्रतिबिंब को देखते हुए उसने कहा,

"इस अलौकिक सुंदरी को अपना बना लूँ, तो इससे बढ़कर भाग्य और क्या हो सकता है। जो भी हो, इसका अपहरण करके ही सही, इसे ले जाऊँगा।"

अलाउद्दीन ने अपने इस लक्ष्य को साधने के लिए एक योजना भी बना ली। महाराज के आतिथ्य पर आनंदित होने का नाटक करते हुए प्यार से उसने उन्हें गले लगाया। चूँकि रानी का प्रतिबिंब देखने मात्र के लिए सुल्तान अकेले आया था, इसलिए महराजा रत्नसिंह निरायुध, अंगरक्षकों के बिना बातें करते हुए सुल्तान के साथ गये। अलाउद्दीन से द्वार के बाहर आकर राणा रत्नसिंह ने कहा-

"हमें मित्रों की तरह रहना था, पर शत्रुओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं। यह भाग्य का खेल नहीं तो और क्या है?"
तब तक अंधेरा छा चुका था। आख़िरी बार वे दोनों गले मिले। दुष्ट ख़िलज़ी ने जैसे ही इशारा किया झाड़ियों के पीछे से आये उसके सिपाहियों ने निरायुध राणा को घेर लिया। मैदान में गाड़े गये खेमों में उसे ले गये। अब राजा का उनसे बचना असंभव था। रत्नसिंह को क़ैद करने के बाद अलाउद्दीन ने प्रस्ताव रखा कि रानी को उसे सौंपने के बाद ही वह रत्नसिंह को कैद मुक्त करेगा। रानी ने भी कूटनीति का जबाब कूटनीति से देने का निश्चय किया और उन्होंने अलाउद्दीन को सन्देश भेजा कि-

"मैं मेवाड़ की महारानी अपनी सात सौ दासियों के साथ आपके सम्मुख उपस्थित होने से पूर्व अपने पति के दर्शन करना चाहूंगी यदि आपको मेरी यह शर्त स्वीकार है तो मुझे सूचित करे।"

रानी का ऐसा सन्देश पाकर कामुक अलाउद्दीन की ख़ुशी का ठिकाना न रहा, और उस अदभुत सुन्दर रानी को पाने के लिए बेताब उसने तुरंत रानी की शर्त स्वीकार कर सन्देश भिजवा दिया। उधर रानी ने अपने काका गोरा व भाई बादल के साथ रणनीति तैयार कर सात सौ डोलियाँ तैयार करवाई और इन डोलियों में हथियार बंद राजपूत वीर सैनिक बिठा दिए डोलियों को उठाने के लिए भी कहारों के स्थान पर छांटे हुए वीर सैनिको को कहारों के वेश में लगाया गया। इस तरह पूरी तैयारी कर रानी अलाउद्दीन के शिविर में अपने पति को छुड़ाने हेतु चली उनकी डोली के साथ गोरा व बादल जैसे युद्ध कला में निपुण वीर चल रहे थे। अलाउद्दीन व उसके सैनिक रानी के क़ाफ़िले को दूर से देख रहे थे। सुल्तान ख़िलज़ी खेमों के बीच में बड़ी ही बेचैनी से रानी पद्मिनी के आने का इंतज़ार करने लगा। तब उसके पास गोरा नामक हट्टा-कट्टा एक राजपूत योद्धा आया और कहा-

"सरकार, महारानी को अंतिम बार महाराज को देखने की आकांक्षा है। उनकी विनती कृपया स्वीकार कीजिये।"

सुल्तान सोच में पड़ गया तो गोरा ने फिर से कहा-

"क्या महारानी की बातों पर अब भी आपको विश्वास नहीं होता?"

कहते हुए जैसे ही उसने पालकी की ओर अपना हाथ उठाया, तो उस पालकी में से एक सहेली ने परदे को थोड़ा हटाया। मशालों की कांति में सुंदरी को देखकर सुलतान के मुँह से निकल पड़ा "वाह, सौंदर्य हो तो ऐसा हो।" वह खुशी से फूल उठा। रानी पद्मिनी को उनके पति से मिलने की इज़ाज़त दे दी।

प्रथम पालकी उस ओर गयी, जहाँ महाराज क़ैद थे। राणा रत्नसिंह को रिहा करने के लिए जैसे ही सीटी बजी, पालकियों में से दो हज़ार आठ सौ सैनिक हथियार सहित बाहर कूद पड़े। पालकियाँ को ढोनेवाले कहार भी सैनिक ही थे। उन्होंने म्यानों से तलवारें निकालीं और जो भी शत्रु हाथ में आया, उसे मार डाला। इस आकस्मिक परिवर्तन पर सुल्तान हक्का-बक्का रह गया। उसके सैनिक तितर-बितर हो गये और अपनी जानें बचाने के लिए यहाँ-वहाँ भागने लगे। कुछ और पालकियाँ पहाड़ पर क़िले की ओर से निकलीं। उनमें रानी के होने की उम्मीद लेकर शत्रु सैनिकों ने उनका पीछा किया, पर बादल नामक एक जवान योद्धा के नेतृत्व में राजपूत सैनिकों ने उन पर हमला किया। एक पालकी में बैठकर महाराज और गोरा सक्षेम क़िले में पहुँच गये।

इसके बाद गोरा लौट आया और दुश्मनों का सामना किया। गोरा और सुल्तान के बीच में भयंकर युद्ध हुआ। इसमें गोरा ने अद्भुत साहस दिखाया। लेकिन दुर्भाग्यवश दुश्मनों ने चारों ओर से गोरा को घेर लिया और उसका सिर काट डाला। उस स्थिति में भी गोरा ने तलवार फेंकी, उससे सुलतान के घोड़े के दो टुकड़े हो गये और सुलतान खिलजी नीचे गिर गया। भयभीत सुल्तान सेना सहित दिल्लीकी ओर मुड़ गया।

रानी पद्मिनी अपने चाचा गोरा व भाई बादल की सहायता से व्यूह रचकर शत्रुओं से बच सकती थी, पर वह क़िले से बाहर ही नहीं आयी। सुल्तान ने दर्पण में जो प्रतिबिंब देखा था, वह उनकी सहेली का था। पालकी में जो दिखायी पड़ी, वह वही सहेली थी।

राजदंपति फिर से मिलन पर खुश तो हुए, लेकिन गोरा की मृत्यु पर उन्हें बहुत दुख हुआ। यों कुछ समय बीत गया। उस दिन रत्नसिंह का जन्म दिनोत्सव बहुत बड़े पैमाने पर मनाया गया। थकी हुयी चित्तौड़ की प्रजा को युद्ध के नगाड़ों व हाहाकारों ने जगाया। इस हार से अलाउद्दीन बहुत लज्जित हुआ और उसने अब चित्तौड़ विजय करने के लिए ठान ली। आखिर उसके छ:माह से ज़्यादा चले घेरे व युद्ध के कारण क़िले में खाद्य सामग्री अभाव हो गया तब राजपूत सैनिकों ने केसरिया बाना पहन कर जौहर और शाका करने का निश्चय किया। जौहर के लिए गोमुख के उत्तर वाले मैदान में एक विशाल चिता का निर्माण किया गया। रानी पद्मिनी के नेतृत्व में 16000 राजपूत रमणियों ने गोमुख में स्नान कर अपने सम्बन्धियों को अन्तिम प्रणाम कर जौहर चिता में प्रवेश किया। थोड़ी ही देर में देवदुर्लभ सौंदर्य अग्नि की लपटों में स्वाहा होकर कीर्ति कुंदन बन गया। जौहर की ज्वाला की लपटों को देखकर अलाउद्दीन ख़िलज़ी भी हतप्रभ हो गया। महाराणा रतन सिंह के नेतृत्व में केसरिया बाना धारण कर 30000 राजपूत सैनिक क़िले के द्वार खोल भूखे सिंहों की भांति ख़िलज़ी की सेना पर टूट पड़े भयंकर युद्ध हुआ बादल ने अद्भुत पराक्रम दिखाया बादल की आयु उस वक़्त सिर्फ़ बारह वर्ष की ही थी उसकी वीरता का एक गीतकार ने इस तरह वर्णन किया-

बादल बारह बरस रो, लड़ियों लाखां साथ।
सारी दुनिया पेखियो, वो खांडा वै हाथ।।

रत्नसिंह युद्ध के मैदान में वीरगति को प्राप्त हुए और रानी पद्मिनी राजपूत नारियों की कुल परम्परा मर्यादा और अपने कुल गौरव की रक्षार्थ जौहर की ज्वालाओं में जलकर स्वाहा हो गयी जिसकी कीर्ति गाथा आज भी अमर है और सदियों तक आने वाली पीढ़ी को गौरवपूर्ण आत्म बलिदान की प्रेरणा प्रदान करती रहेगी। यह जौहर हमेशा भारतवासियों को इस बात की याद दिलाती रहेगी कि भारत की स्त्रियों के लिए उनका सम्मान सर्वोपरी है.

सोते मन में स्मृति सुन्दरी ,लहर लहर लहरे |
चित्र खीचती चपला क्षितिज पर, कोई न ठहरे ||
जौहर की जीत लिए दिल में ,तेज तेगा वेग बढे |
पद्मिनी की सुन्दरता में खलजी की खिल्ली उड़े ||

इतिहासकारों के तर्क

यह युद्ध केवल राजनीतिक फायदे के लिए हुआ था। प्रेस प्रसंग का एक भी सबूत अभी तक नहीं मिला है। जिस कवि ने ये रचना की थी, उसकी एक भी लाइन में प्रेम प्रसंग की बात नहीं है। 

-प्रो. के.जी.शर्मा, इतिहासकार

पदमिनी का खिलजी के साथ प्रेम-प्रसंग होता तो वह हजारों महिलाओं के साथ जौहर क्यों करती? खिलजी ने यह युद्ध पदमिनी से ज्यादा राजनीतिक फायदे के लिए किया था। इतिहास पर फिल्में जरूर बननी चाहिए, लेकिन पूरे अनुसंधान के साथ। रिसर्च के बाद ही गांधीजी पर फिल्म बनी थी। कोई विवाद नहीं हुआ।

-प्रो. आरएस खंगारोत, इतिहासकार

मलिक काफूर का प्रेमी था अल्लाउद्दीन खिलजी 

वस्सफ अब्दल्लाह इब्न फदलल्लाह शरीफ अल-दिन शिराज़ी
14वीं शताब्दी के पर्सियन इतिहासकार

एक काल्पनिक चरित्र हैं" तथाकथित इतिहासकार इरफ़ान हबीब का यह कहना बिलकुल सही है, इसे मान लेने में मुझे अब कोई हर्ज नहीं दिखता। हबीब कैसे सही कह रहे हैं इसे ठीक संदर्भ में देखिये, आप भी सहमत होंगे की इस वामपंथी इतिहासकार ने दुरुस्त बात कही है। यही तथ्य लेकर अब जावेद अख्तर भी इस इतिहास में अपना कुछ सेकने को उत्तर आये है। 

वस्सफ अब्दल्लाह इब्न फदलल्लाह शरीफ अल-दिन शिराज़ी ,14वीं शताब्दी के पर्सियन इतिहासकार, के मुताबिक अलाउद्दीन खिलजी एक होमो सेक्सुअल (समलैंगिक) था और उसके हरम में हजारों लड़के सेक्स स्लेव्स के तौर पर थे। मलिक काफूर नामक उसके समलैंगिक प्रेमी का बाकायदा जिक्र भी आता है जबकि रानी पद्मावती से अनुराग का इतिहास में कोई जिक्र नहीं।

चूंकि भारतीय उपमहाद्वीप पर यह ऐतिहासिक तथ्य.... 14वीं शताब्दी के किसी आरएसएस अथवा कट्टर हिंदू इतिहासकार ने नहीं लिखा तो यह मान लेना बनता है कि पर्सिया के इन इतिहासकार ने गलत नहीं लिखा होगा।जब इरफ़ान हबीब यह कहते हैं कि रानी पद्मावती एक काल्पनिक चरित्र हैं, और रंगीन गिरोह उसका समर्थन करता है तो वह गलत कहाँ है ? ध्यान रखिए, पद्मावती जी काल्पनिक चरित्र हैं ऐसा उन्होंने इस खिलजी-पद्मावती प्रेमकथा वाली फिल्म के संदर्भ में कहा है। इस कहानी में वाकई पद्मावती एक काल्पनिक कैरेक्टर ही हैं।

दरअसल हम सबने संदर्भ सही से नहीं समझा। हबीब अलाउद्दीन खिलजी के होमो सेक्सुअल होने की पर्सियन इतिहासकार की बात के आधार पर ही ऐसा कह रहे हैं। अगर खिलजी एक होमोसेक्सुअल था, हजारों लड़के उसके हरम में थे, मलिक काफूर उसका प्रेमी / प्रेमिका था : तो भला एक स्त्री रानी पद्मावती से उसका कोई संबंध कैसे संभव था ? हमारे समकालीन छद्म भारतीय 'धर्मनिरपेक्ष-उदारवादी", संस्कृति, इतिहास और परंपराओं से कितने अनभिज्ञ हैं, कितने पूर्वाग्रह से ग्रस्त हैं ! उनके कपट, झूठ और संवेदनहीनता की तो कोई सीमा ही नहीं है ! यही देश की सबसे बड़ी समस्या है। पहली बात तो यह कि पद्मिनी की ऐतिहासिकता, उनका महान व्यक्तित्व और पवित्र स्मृति वंश परंपरा से लाखों हिंदुओं के मन में जिंदा है, जिसे ये जाहिल, उजड्ड, असभ्य और अशिष्ट 'धर्मनिरपेक्ष तबके' के लोग कभी नहीं समझ सकते, यह उनकी कल्पनाशीलता की तुलना में कहीं अधिक जटिल है। चित्तौड़ के कण कण में, वहां से सदियों पुराने मंदिरों और धार्मिक स्थलों में रानी पद्मिनी के जौहर की गाथा लोकगीतों और भजनों के रूप में सुनने व अनुभव करने की पात्रता भी इन दुराग्रही धनपशुओं में नहीं है ।

ये समझ लें कि महारानी पद्मिनी का चित्रण अगर होगा तो केवल पारंपरिक पवित्रता के साथ ही होगा ! कोई भी अन्य प्रयत्न राजपूताने को ही नहीं, समूचे भारत को धधका सकता है । इसी मनोदशा में विरोध प्रदर्शन की वैधता को देखा और समझा जाना चाहिए ! ऐतिहासिक साक्ष्य को लेकर एक तथ्य देखा जाना चाहिए कि भीष्म, द्रौपदी, विक्रमादित्य या राजा भोज, भारत की संस्कृति में पीढ़ियों से रचे बसे हैं ! इतिहास लिखने में तत्वचिन्तक भारतीयों की रूचि नहीं रही ! आज की भाषा में वे सदा लो प्रोफाईल रहे ! किन्तु आमजन ने अपने तीज त्योहारों में, उत्सवों में उन्हें जिन्दा रखा !

"धर्मनिरपेक्षतावादी" बढ़चढ़ कर जिस ऐतिहासिक साक्ष्य की बात करते हैं, क्या वे इस्लामी आक्रमणकारियों द्वारा मध्यकालीन युग में किये गए व्यापक भीषण नर संहार, जबरन धर्मांतरण और मंदिरों के विनाश को भी इस आधार पर नकारेंगे, क्योंकि किसी मुग़ल इतिहासकार ने तो ऐसा कुछ लिखा नहीं ? आखिर ये लोग उस समय के अत्याचारियों को, खल नायकों को कोमल भावों बाला, उदार और नायक के रूप में क्यों स्थापित करना चाहते हैं ?

दुर्भाग्य से आजादी के बाद भारत के शैक्षणिक जगत पर वामपंथी काबिज हो गए, जिनके कारण सत्ताधीशों ने प्रो. के. एस. लाल जैसे विचारक इतिहासकार को दरकिनार कर दिया और उनकी लिखी पुस्तकें ‘The Legacy of Muslim Rule in India’ और ‘Muslim slave system in Medieval India’ आदि को विचार बाह्य कर दिया ! अब इसे सुनियोजित षडयंत्र नहीं तो क्या कहा जाये ? भारत की संघर्ष पूर्ण गौरव गाथा को भुलाना और हिंसक आतताईयों, आक्रान्ताओं को महिमा मंडित करना, यही इन अंग्रेजीदां धर्मनिरपेक्षता वादियों का एकसूत्री कार्यक्रम है !

इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि केंद्र की सत्ता में बैठी आज की भाजपा, जिससे औसत राष्ट्रभक्तों को बड़ी आशा थी, कि अब शायद स्थिति कुछ बदलेगी, वह आशा भी तब टूट गई, जब कल एक केन्द्रीय मंत्री ने करणी सेना के प्रदर्शन पर आक्रोश व्यक्त किया !

साक्ष्य उपलब्ध न होने का अर्थ यह नहीं है कि घटना हुई ही नहीं ! थोड़ी देर के लिए पद्मिनी की चर्चा को छोड़कर चंद्रगुप्त की ओर आते हैं ! क्या किसी यूनानी रिकोर्ड में मौर्य पुरातनता के प्रतीक चंद्रगुप्त के अस्तित्व की पुष्टि होती है ? सोमनाथ पर महमूद गजनवी के आक्रमण के दस्तावेजी प्रमाण कहाँ हैं ? किन्तु ये दर्दनाक ऐतिहासिक घटनायें जन स्मृति में कायम है और समय के उलटफेर में भी हिंदुओं ने इन्हें भुलाया नहीं है । भले ही प्रस्तुति उतनी अच्छी नही हुई हो, किन्तु बीके करकरा ने एक शोधपूर्ण पुस्तक लिखी है “चित्तोड़ की नायिका - रानी पद्मिनी” ! उक्त पुस्तक में करकरा ने जोर देकर कहा है कि मलिक मोहम्मद जायसी की 'पद्मावत' में पद्मिनी का उल्लेख 1526 में सारंगपुर के नारायण दास द्वारा लिखी गई छिताई चरित से प्रभावित है ! करकरा का प्रभावी तर्क है कि जब नारायण दास और जायसी जैसे ऐतिहासिक साक्ष्य उपलब्ध हैं, तो पद्मिनी की ऐतिहासिकता को किवदंती बताना निरी मूर्खता है ! जन चेतना में गुजरात की देवल रानी भी विद्यमान हैं, जिनका विवाह अपहरण के बाद जबरन सुल्तान के बेटे से करा दिया गया था । इसके अलावा, खिलजी के प्रसिद्ध दरबारी कवि अमीर खुसरो द्वारा 1303 में खिलजी के चित्तौड़ मार्च के समय लिखी गई कहानी “सुलैमान और शबा की रानी” में छुपे सन्दर्भ को भी अनदेखा नहीं किया जाना चाहिये । खिलजी के सैन्य अभियानों के दौरान हुए जौहर के अन्य उदाहरण भी मिलते हैं, जैसे कि रणथंभौर की रानी रंगा देवी द्वारा किया गया जौहर । भले ही वामपंथी पोंगे इन साक्ष्यों को अप्रत्यक्ष कहकर नकारें, किन्तु पद्मिनी की ऐतिहासिकता स्वयंसिद्ध है ! और भला मुस्लिम दरबारी इतिहासकार अपने आका हुजूर खिलजी की असफलता की इस दर्दनाक घटना को क्यूं और कैसे लिख सकते थे ?

ऐतिहासिक प्रामाणिकता की मांग बेमतलब है, क्योंकि इतना तो तय है कि अलाउद्दीन खिलजी एक हत्यारा दरिंदा था, जो सुल्तान जलालुद्दीन खिलजी की हत्या कर गद्दी पर बैठा था । हिन्दू राजाओं के खिलाफ अपने सैन्य अभियानों में उसने क्रूरतम जघन्य कत्लेआम किये थे ! स्वयं अमीर खुसरो लिखता है कि चित्तोड़ में हिन्दू आबादी को सूखी घांस की तरह काटा गया ! इतिहासकार आर सी मजुमदार ने लिखा है कि खिलजी की अर्थनीति ने देश को खून से नहला दिया ! सुल्तान अलाउद्दीन ने अपने उलेमाओं से ऐसे नियम बनाने को कहा, जिससे हिन्दू जमींदोज रहें, यह सुनिश्चित किया जाए कि उनके पास कोई संपत्ति न हो ! उन्हें केवल जीवित भर रहने के लिए जजिया कर देना ही होगा, उन्हें इतना दयनीय बना दो, ताकि वे विद्रोह की सोच भी न सकें ! उसके कालखंड में अपने सम्मान की रक्षा के लिए हजारों हिंदू महिलाओं द्वारा जौहर किये जाने की एक नहीं तीन तीन घटनाएँ हुई थीं ! और हमारे फिल्मी धनपशु कहते हैं वह एक रसिक प्रेमी था ? घिन आती है इन लोगों पर !

संजय तिवारी 
संस्थापक - भारत संस्कृति न्यास
वरिष्ठ पत्रकार
 

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महारानी पद्मिनी : इतिहास और कथा - संजय तिवारी
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