आखिर क्या है स्मोग, कैसे संभव है इसका निदान ? - विक्रम शर्मा

आखिर स्मोग (Smog) है क्या ओर क्यों ये मात्र आजकल के दिनों में ही बहुत बड़ी समस्या के रूप में उभर कर आती है हालांकि प्रदूषण तो 12 माह बराब...

आखिर स्मोग (Smog) है क्या ओर क्यों ये मात्र आजकल के दिनों में ही बहुत बड़ी समस्या के रूप में उभर कर आती है हालांकि प्रदूषण तो 12 माह बराबर ही रहता है...

एक ऐसा समाजिक सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा सवाल जिसने भारत जैसे बढ़ते देश को झकझोर कर रख दिया राजनैतिक पार्टियां अपनी राजनैतिक साख बचाने व दूसरों की उधेड़ने पर उतर आईं परन्तु हल किसी के पास नहीं है इस सवाल का। कोई ओड इवन तो कोई भारी ट्रांसपोर्टेशन साधनों को रोक कर,कोई इंडस्ट्रियल प्लांट्स को बाहर करने की बातें करने लगे जो मात्र इन राजनीतिज्ञों को आजकल के दिनों में ही खास कर याद आता है। खैर मेरा सवाल था कि आखिर स्मोग का मुख्य कारण है क्या ओर यह आखिर बनता कैसे है और आजकल ही पर्यावरण प्रदूषण क्यों दिखाई देता है, यह एक ऐसा सवाल है जिसका उत्तर हमारे बड़े बड़े पर्यावर्णविद्धि नहीं दे रहे मात्र इधर उधर की हांक के अपने शोध प्रसार में लगे हुए हैं। भारत जैसे विकासील देश के लिए पर्यावरण संरक्षण जैसी समस्या बहुत ही गम्भीर है,एक तरफ निरन्तर विकास की चुनोती दूसरी तरफ पर्यावरण जैसा गंभीर मुद्दा जिसके कारण 125 करोड़ जनता का भविष्य व स्वस्थ्य खतरे में पड़ा दिखता है। विकास के लिए हमे औधोगिकरण जैसी राह को अपनाना ही पड़ेगा, उधोग लगेंगे तो प्रदूषण भी साथ आएगा, परन्तु इसे किस तरीके से सम्बर्धित किया जाए, पर्यावरण को औधोगिकरण के साथ साथ पूर्णतः सरंक्षित किया जाए ये भारत के प्रबुद्ध वैज्ञानिकों व समाज शास्त्रियों के लिए एक बहुत बड़ा चैलेंज है जिसे पूरे समाज को जागृत करके समग्र विकास को आधार मान कर ज्ञान व विज्ञान के शोध से पूर्णतः आगे बढ़ाना है। स्मोग या कणिक वायु प्रदूषण एक ऐसी समस्या है जो अक्टूबर से दिसंबर महीनों में खास कर अपने प्रकोप से भारत व अन्य एशियाई देशों के सामान्य जनजीवन को अस्त व्यस्त करके कई प्रकार की बीमारियों को न्योता देकर मानव जाति पर सीधा आघात करती है। आखिर स्मोग या कणिक वायु प्रदूषण है क्या ओर खास तौर पर आजकल ही क्यों होता है....

स्मोग या कणिक वायु प्रदूषण:--

जैसा कि स्मोग शब्द से ही पता चल जाता है कि ये स्मोक, फोग व अन्य धूल कणों के एक मिश्रण है जिसमे कार्बन के कण बहुतायत मात्रा में पाए जाते हैं, परन्तु ऐसा क्यों है कि शर्दियाँ शुरू होते ही ये दिखता है व बारिश पड़ते ही गायब हो जाता है..ऐसा क्यों ? यही विषय शोध का है जिस पर शोध करके उसका निदान किया जा सकता है।
मैं एक रसायन विज्ञान शास्त्र का विद्यार्थी होने के साथ वर्षों से हिमालयी क्षेत्र में कृषि बागवानी सरंक्षण व पर्यावरण को समझते हुए इस क्षेत्र में वाणिज्यिक कृषि बागवानी से युवा उत्थान में प्रयासरत हूँ  जिसके नाते प्रदूषण के प्रति हमेशा सचेतक होकर शोध करता रहता हूँ परन्तु पिछले दिनों से जनजीवन को अस्त व्यस्त किये हुए स्मोग ने मुझे इस पर ज्यादा सोचने को मजबूर कर दिया। ज्यादातर मेरा सबसे ज्यादा ध्यान पर्यावरण को बचाते हुए ऐसी फसलों पर रहता है जो आज के समय मे हो रहे पर्यावरण बदलाव के साथ पर्यावरण को सबसे ज्यादा हो रहे औधोगिक प्रदूषण पर शोध से सरंक्षण पर रहता है,जिसके चलते मैनें पिछले कुछ वर्षों से हिमालयी क्षेत्र के साथ उत्तरी भारत के मैदानी इलाकों में ऎसे पौधे व वाणिज्यिक फसलें तैयार करवाई जो युवायों को रोजगार के साथ स्वच्छ वातावरण भी मुहैया करवाये। जिसमे मैनें कॉफ़ी को सन 1999 में प्रयोगात्मक तौर पर शुरू किया था, कॉफ़ी पीपल के बाद एक ऐसा पौधा है जो 24 घण्टे निरन्तर ऑक्सिजन छोड़ता है तथा लगातार कार्बन डाइऑक्साइड इन्टेक करता है। मैं पिछले तीन दिन दिल्ली के अत्यंत प्रदूषित इलाकों में घूमा, स्मोग के बेसिक कारणों को समझा, यमुना के जल में तापमान बदलाव व किनारे लगे कम प्लांटेशन्स की बजह को समझते हुए इस पर शोध प्रारम्भ किया । स्मोग के मुख्य कारणों का वैज्ञानिक अध्ययन करने के बाद मैनें समझा कि ये एक समायिक समस्या है जिसका निदान बहुत ही सरल तथा थोड़े बहुत बदलाव से संभव है। पर्यावरण संरक्षण व प्रदूषण को समझने के लिए आपको रसायन विज्ञान, पर्यावरण विज्ञान व भूगोलिक विज्ञान को समझना अत्यंत आवश्यक है अन्यथा ऐसी समस्या का निदान सम्भब नहीं हो सकता।

सिंतबर माह के बाद मौसम का तापमान अचानक बदलना शुरू हो जाता है अक्टूबर माह में स्मोग का दिखना आंशिक रूप से शुरु ही जाता है जो दिल्ली जैसे बड़े शहर के लिए आफत की दावत है तथा नवंबर में ये पूरे चरम पर पहुंच कर पूरे पर्यावरण सिस्टम को ध्वस्त कर देता है।

स्मोग का मुख्य कारण है पर्यावरण में तापमान का बदलाव व बड़े शहरों के नज़दीक जलाशयों से उठने वाले जलकण जो यमुना जैसी बड़ी नदी के पानी के तापमान में बदलाव के कारण वाष्पीकरण से बनते हैं। आखिर होता ये है कि यमुना पहाड़ों से निकलती हुई अत्यंत ठंडा जल प्रवाहित करती हुई दिल्ली जैसे बड़े शहर के समीप से जब गुजरती है तो अचानक तापमान वृद्धि से वाष्पीकरण प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है, उधर मौसम में बदलाव के कारण ऊपर से ठंड धरती की तरफ गिरना शुरू हुई होती है वाष्पीकरण के कारण ऊपर उठने वाले जलकण अपने साथ औधोगिक कार्बन उत्सर्जित कण, धूल कण व अन्य प्रदूषण के कारण उत्सर्जित कण मिल कर ऊपर उठना शुरू करते है परन्तु नीचे से गर्म हवा का गुवार ऊपर उठना व ऊपर से ठंडी हवा का नीचे की तरफ बढ़ना इस ओर गुबार को रोकने का कार्य करता है तथा 250 मीटर से 500 मीटर के बीच एक ब्लॉकेज बना कर इस सारे गुबार को हवा में तैरने को मजबूर कर देता है जो स्मोग या कणिक वायु प्रदूषण का रूप लेकर पूरे पर्यावरण को अपनी चपेट में ले लेता है। कणिक वायु प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण इलाके से लगती हुई इंडस्ट्रियल इकाईयां व ईंट भट्ठे भी है जो यमुना के बहुतायत नज़दीक हैं तथा उठने वाले वाष्प कणों के साथ सीधा मिल जाते हैं। दूसरा कारण सड़कों के किनारे पड़ी धूल मिट्टी व निर्माण स्थानों पर उड़ रही धूल कण हैं जो एकत्रित होकर वाष्पित जलकणों से मिलकर स्मोग तैयार करते हैं। इसमे डीजल इंजन बाले वाहनों के कारण उत्सर्जित कार्बन कण बहुत ही कम होते हैं क्योंकि वह गाड़ियों में लगे कैटलीटिकल कॉन्वेर्टर की बजह से भारी होने के कारण ज्यादा तर नीचे ही गिर जाते हैं। परन्तु इस सारी प्रक्रिया में एयरकंडीशनर बहुत बड़ा रोल प्ले करते हैं क्योंकि जब मौसम बदलाव शुरू होता है तो ये पूरे शहर में गर्म वायु उत्सर्जन कर रहे होते हैं तथा अपने साथ मिट्टी कण व अन्य प्रदूषण से जुड़े कण बहुतायत मात्रा में गर्म हवा के साथ ऊपर की हवा में धकेलते हैं जो फिर वाष्पित जलकणों के साथ स्मोग बनाने में ज्यादा सहायक सिद्ध होते हैं।

निदान:--

स्मोग एक अस्थायी वायु प्रदूषण है परन्तु ऊपरी क्षेत्र में वैक्यूम बनने की बजह से सफोकेशन जैसी परिस्थिति उत्पन्न करता है जिसके कारण स्थानीय निवासी सांस व अन्य बीमारियों की बढ़त फील करते है।

स्मोग का स्थायी हल है बहती हुई नदी के दोनों किनारों पर बड़े वृक्षों का रोपण करवाएं, जिसमे पीपल, बट, व नीम आदि प्रमुख हैं, इसके साथ बड़ी बिल्डिंगों से जल बौछार या वाटर मिस्टिंग करवाएं जिसमे 5% फिटकरी का मिश्रण जरूर डालें जो कणों को अपने साथ बांड करके उन्हें निरस्त स्थिति में करने में सहायक रहेगा। प्लास्टिक जलाना दिल्ली की प्रमुख समस्या है तो एतिहातन उसे नियंत्रित चैम्बर में करवाया जाए, ईंट भट्ठों की चिमनियों पर प्रदूषण नियंत्रक लगाने अनिवार्य किये जायें। सभी सड़कों को धूल मिट्टी रहित किया जाए तथा कंस्ट्रक्शन साइट्स को भी धूल नियंत्रण की सख्त चेतावनी जारी की जाए। बड़े वाहनों की गति नियंत्रित रखी जाए ताकि कम से कम धूल कण उठ सकें। डीजल वाहनों के उतत्सर्जन चैम्बर में जल वाष्पन कैटलीटिक लगवाया जाए ताकि उत्तसर्जित कण जल के साथ मिलकर चेम्बर में जमा होते रहें जिन्हें सर्विस के समय नियंत्रित किया जाए। सभी बड़ी बिल्डिंगों पर AC जैसे उपकरण प्रतिवन्धित कर दिए जाएं जिन्हें भूमिगत ऐरकंडिशनिंग यूनिट्स से ही वतानकूलित किया जाए

विक्रम शर्मा 

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आखिर क्या है स्मोग, कैसे संभव है इसका निदान ? - विक्रम शर्मा
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