अल्लाउद्दीन खिलजी की मौत के बाद दिल्ली की गद्दी पर बैठा एक धर्मान्तरित गुलाम

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1312 में अल्लाउद्दीन खिलजी के नेतृत्व में इस्लामी ताकत अपनी बुलंदी पर थी । उसका सेनापति था मलिक काफुर, जो स्वयं धर्मान्तरित होकर मुसलमान...



1312 में अल्लाउद्दीन खिलजी के नेतृत्व में इस्लामी ताकत अपनी बुलंदी पर थी । उसका सेनापति था मलिक काफुर, जो स्वयं धर्मान्तरित होकर मुसलमान बना था, किन्तु उसने दक्षिण भारत में लूट, हिंसा और धर्मांतरण की पराकाष्ठा की । कहा जाता है कि अकेले मदुरई से ही उसने लगभग 100 मिलियन टन स्वर्ण भण्डार लूटा, जिसकी अनुमानित कीमत 2, 750 पौंड थी। इसके अतिरिक्त बेशुमार गहने और 20,000 घोडे लुटे गए । इस प्रकार पूरा भारत इस्लाम और सुलतान क झंडे क नीचे आ गया । लेकिन 1316 में अलाउद्दीन की मौत के बाद चार वर्ष में ही उसका वंश समाप्त हो गया ।

20 अप्रैल 1320 को, अलाउद्दीन खिलजी के बेटे, कुतुबुद्दीन मुबारक की हत्या उसके ही एक गुलाम खुसरो खान ने कर दी और नसीरुद्दीन (आस्था का रक्षक) के नाम से सिंहासन पर आसीन हुआ ।

खुसरो की कहानी

नसीरुद्दीन खुसरो की पूरी कहानी पर से तो पर्दा शायद ही कभी उठे, किन्तु फिर भी समसामयिक इतिहास से कुछ जानकारी अवश्य मिलती है ।

फरिस्ता का कहना है कि नसीरुद्दीन खुसरो एक कबाड़ बीनने वाले का बेटा था | बरानी की भी मान्यता है कि उसका जन्म निचले कुल में हुआ, किन्तु उसने स्वयं को झूठा ही बडवारी कुल का प्रदर्शित किया । लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि उसके मूल पिता भले ही एक रद्दी बीनने वाले हों, किन्तु उसके सौतेले पिता बड़वारी थे और इसी कारण उसकी परवरिश अपने सौतेले भाई हिशुमुद्दीन के साथ साथ एक समान ही हुई | अतः उसे झूठा भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि वह अपनी मां के माध्यम से बड़वारी था ।

कौन थे बडवारी ? 

घटनाओं की श्रृंखला में बरवारी (परवरिस,बरोस) की प्रमुख भूमिका निर्विवाद है | बारानी कहते हैं कि "उन भयावह दिनों में ... बरवारीयों का महत्व बहुत बढ़ गया था"। सैकड़ों वर्ष बाद निजामुद्दीन अहमद ने भी वर्णन किया कि "बरवारी गुजराती हिंदू थे, जिन्होंने इस्लाम की जड़ें कमजोर कीं । बरवारी गुजरात की अनेक जनजातियों में से एक थे, जो मुख्य रूप से पहरेदार, द्वारपाल जैसे कार्य करते थे ।

1305 में मालवा पर आक्रमण के दौरान अपनी अभागी मां के साथ ये दोनों लड़के खिलजी के हत्थे चढ़े और इन्हें नए नाम हसन और हिशमुद्दीन मिले, जिसके द्वारा वे आगे इतिहास में जाने गए । नशीरुद्दीन की मां को सुल्तान के हाथों बहुत जिल्लत का सामना करना पड़ा, बाद में जिसका भरपूर प्रतिशोध उसने लिया ।

अल्लाउद्दीन खिलजी ने गुलाम के रूप में “हसन” को शादी मलिक को दे दिया, जिसके सूफी स्वभाव के चलते हसन को दयालुता का स्पर्श मिला | वह इतना प्रभावित हुआ कि उसने मृत्यु उपरांत शादी मलिक के बगीचे में ही अपने अंतिम संस्कार की इच्छा व्यक्त की ।

फरिश्ता ने लिखा है कि जब कूतुबुद्दीन मुबारक खिलजी शासक बना, तब उसे दोनों भाई हसन और हुसमुद्दीन भा गए और वह इनके प्यार में पड़ गया । "शायद हसन ने शाही इच्छा के सामने अपना सिर झुका दिया और इसीलिए उसे खुसरू खान का खिताब मिल गया। हिशमूद्दीन शायद यह नहीं कर पाया, इसलिए बरानी के अनुसार वह एक गुलाम ही रहा, जिसे सुल्तान अक्सर पीटा करता था ।

इस स्थिति से दोनों भाईयों के मन में बदले की आग धधकती रही और शीघ्र ही उन्हें जियाउद्दीन बरानी के रूप में एक टर्की सहयोगी भी मिल गया । हिशमुद्दीन को जब सेना के साथ गुजरात भेजा गया, तो उसने बहां अपने बरवरी सम्बन्धियों को इकठ्ठा कर विद्रोह की साजिश रची। किन्तु साजिश बेनकाब हो गई और उसे वापस दिल्ली बुलाकर दण्डित किया गया । यह अलग बात है कि खुसरो के कारण उसकी जान बख्श दी गई |

खुसरो का विद्रोही रूप -

खुसरो जब भी सुलतान के साथ अकेला होता था, तब उसकी इच्छा सुलतान की तलवार से ही सुल्तान को काटने की होती थी ।" जब उसे दक्षिणी अभियान का प्रभारी बनाया गया, तब कुछ हिंदुओं और कई असंतुष्ट अनुयायियों के साथ उसने विद्रोह की योजना बनाई। सुलतान के वफादारों द्वारा इसकी जानकारी दिल्ली भेजी गई और असामान्य परिस्थितियों में उसे वापस बुला लिया गया | किन्तु अपनी चतुरता से उसने सुल्तान को इतना अधिक अपने पक्ष में कर लिया कि वफादारों को ही दण्डित किया गया | इसमें निजामुद्दीन औलिया के मुरीद शादी खान और खिजर खान की भी उस मदद मिली ।

इस्लामी लेखक बरानी, अगर ​​खुसरू खान को 'विश्वासघाती’ लिखते हैं तो इसमें हैरत की कोई बात नहीं है | यह उनका रूढ़िवादी इस्लामी नजरिया ही है, जो गुलामी, समलैंगिकता और जबरन धर्मांतरण को जायज व इसके खिलाफ आक्रोश को विश्वासघात मानते हैं ।

खुसरू खान ने बहुत योजनाबद्ध रूप से कार्य किया । इस्लामी सेना के बीच अपनी जड़ें मजबूत करने के लिए उसने मंदिरों का विनाश और हिंदू राजाओं का अपमान भी किया। किन्तु एक बार प्रभावी हो जाने के बाद उसने अति समृद्ध सुन्नीयों से उनकी धन सम्पत्ति छीन ली, जो उन्होंने हिन्दुओं को लूटकर एकत्रित की थी । इसके बाद खुसरू खान दिल्ली वापस लौटा।

वापस दिल्ली आकर उसने वासना में अंधे सुल्तान से अनुमति लेकर, सेना के भीतर अपने समर्थक 40,000 बरवरियों का एक दल गठित किया और अपने विश्वस्त कमांडर-इन-चीफ (बरानी) और वजीर (फ़रिश्ता) नियुक्त किये । उसने सुलतान की हत्या महल में ही करने की योजना बनाई, किन्तु उसके पूर्व महल को एक किले में तब्दील कर दिया, ताकि सुल्तान का कोई भी बफादार उसकी मदद न कर सके और जो भी बीच में आये सुल्तान के साथ उसे भी ख़त्म कर दिया जाए ।

और आखिर 20 अप्रैल, 1320 को महल में वह क्रांति हो ही गई और एक झटके में दिल्ली सल्तनत पर उसका कब्जा हो गया ।

दिल्ली में हुई इन घटनाओं से मानो उपमहाद्वीप में यह घोषणा हुई कि भारत में इस्लाम की शक्ति अजेय नहीं थी। जिहादी सेना को पराजय का स्वाद चखाने के बाद उसने सबसे पहले इस्लामी साम्राज्यवाद के सबसे महत्वपूर्ण आधार-राजसी खज़ाने को गायब किया । बरानी का कहना है कि नसीरुद्दीन ने शाही खजाने को बाहर ले जाकर पूरी तरह साफ कर दिया ...। सारे अभिलेख और खाते जला दिए । उसने पीछे एक दाग या दिरम नहीं छोड़ा। "

हिंदू संस्कारों का पुनरुद्धार

जियाउद्दीन बारानी के अनुसार " चार पांच दिन की तैयारी के बाद महल में मूर्तिपूजा प्रारम्भ की गई" और "मस्जिदों के चबूतरों पर मूर्तियों की स्थापना की गई" | संभवतः यह केवल उन मस्जिदों में किया गया, जो मंदिरों का विध्वंश कर बनाई गई थीं ।

बदानी और निजामुद्दीन अहमद का कहना है कि खुसरू खान के शासन काल में "मस्जिदों में बड़े पैमाने पर मूर्तियों की स्थापना हुई ।" बरानी का कथन अधिक विश्वसनीय है क्योंकि वह तथ्यात्मक है"|

हिंदू संस्कार और अनुष्ठानों को पुन: बहाल किया गया । इब्न बट्टुता जो इस घटना के 13 साल बाद भारत आए, उसने लिखा कि गाय क़त्ल पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और मुसलमानों को उनके घरों की दीवारों को गोबर से लीपने का आदेश दिया गया था। 

बरानी का कहना है कि खुसरू ने सत्ता संभालते ही सुलतान के सभी बफादार कर्मचारियों और अधिकारियों को मार दिया गया । कुछ को उनके घरों में ही नजरबन्द कर दिया गया और अनेकों के सर कलम कर दिए गए । मुबारक खिलजी की प्रमुख पत्नी देबल देवी को खुसरू ने अपनी पत्नी बना लिया |

अभी दिल्ली दूर अस्त 

ऐसा कहा जाता है कि एक सशस्त्र अभियान पर उत्तर पश्चिमी में जाते समय गियासुद्दीन तुगलक ने निजामुद्दीन को आदेश दिया कि उसके दिल्ली वापस आने से पूर्व वह दिल्ली छोड़ दे | इस पर सूफी संत ने कहा – “अभी दिल्ली दूर अस्त... (दिल्ली अभी दूर है)। गियासुद्दीन तुगलक कभी दिल्ली वापस नहीं लौटा और एक छत गिरने से उसके नीचे दबाकर उसकी मृत्यु हो गई। और निजामुद्दीन औलिया ने कभी दिल्ली नहीं छोड़ा |
इसे ही कर्म कहा जाता है |

साभार आधार ओर्गेनाईजर

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