व्यथा की अनकही कथा - किन्नर से हिजड़ा फिर गे – दिवाकर शर्मा

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महिला एवं पुरुष हमारे समाज के महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते है, परन्तु एक तीसरा जेंडर भी हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा है जिसे समाज में हे...

महिला एवं पुरुष हमारे समाज के महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते है, परन्तु एक तीसरा जेंडर भी हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा है जिसे समाज में हेय दृष्टी से देखा जाता है ! इन्हें कोई ट्रांसजेंडर के नाम से जानता है तो कोई ट्रांससेक्सुअल. ! लेकिन ज़्यादातर लोग इन्हें किन्नर या हिजड़े के नाम से ही जानते और पुकारते हैं ! तीसरे जेंडर का होने पर जिन्हें उनके अपने ख़ुद से दूर कर देते हैं, उन्हें किन्नर समाज पनाह देता है ! किन्नरों के समूह में शामिल होने का मतलब है, एक नई पहचान को अपनाना ! ये नई पहचान बाहरी समाज के लिए किसी अछूत से कम नहीं होती ! वर्तमान में जब कभी किसी के परिवार में कोई खुशी का अवसर होता है, तो हम देखते हैं कि एक लैंगिक दृष्टि से विवादित समाज के लोग जो प्रायः हिजड़े (अथवा वर्तमान में प्रचलित नाम किन्नर; हालाँकि किन्नर शब्द हिमाचल प्रदेश के किन्नौर निवासियों हेतु प्रयुक्त होता था, जिसे अब हिजड़ों के सन्दर्भ में व्यवहृत किया जाने लगा है) होते हैं, आ जाते हैं और बधाइयाँ गाकर, आशीर्वाद देकर कुछ रुपए लेकर विदा हो जाते हैं ! इसके बाद हम भी अपनी सामान्य गतिविधियों में व्यस्त हो जाते हैं और दोबारा कभी इनके बारे में नहीं सोचते ! हम कभी यह जानने का प्रयास नहीं करते कि ये किन्नर कौन हैं, कहाँ से आये हैं, इनकी समस्याएँ क्या हैं और वे कौन से कारण हैं, जिनकी वजह से इन्हें किन्नर बनकर एक प्रकार की भिक्षावृत्ति से जीवन-यापन करने को विवश होना पड़ता है ! 

यहाँ सवाल एक उठता है कि इन नपुंसकों को किन्नर कहा जाना क्या उचित है ? 

कौन थे या हैं किन्नर ?

''किन्नर'' हमारे यहां की एक पर्वतीय जन-जाति है और यह जन-जाति हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जनपद में रहती है ! वहीं उनकी भाषा कन्नौरी है ! हमारे यहां के मूर्ति-शास्त्र में भी यक्षों, गन्धर्वों और किन्नरों का सौंदर्य वर्णित है ! ये जातियां नृत्य गान और अन्य ललित कलाओं में प्रवीण होती थीं ! क्या किन्नौर जनपद में रहने वाली हमारी किन्नर जन-जाति और हमारे यहां के मूर्ति-शास्त्र में वर्णित यक्षों-गन्धर्वों-किन्नरों को किन्हीं संबंधों में देखा जा सकता है ? इसके लिए हमारे पास पर्याप्त आधार होने चाहिए, लेकिन किन्नौर की किन्नर जन-जाति के पास उनके अपने शिल्प और कला की समृद्ध परम्परा है ! तीसरे लिंग के पर्याय की तरह ''किन्नर'' शब्द का प्रयोग पूरी की पूरी उस जन-जाति की पहिचान को घातक रूप से भ्रामक बनाता है ! 

हिन्दू धर्म में किन्नर 

सखियों गावहु मंगलचार
या फिर
देव असुर गन्धर्व किन्नर

ये पक्तियां 'रामचरित्र मानस ' की हैं जिसमे त्रेता युग में साफ -साफ किन्नर जाति की स्थिति बताई गई है! 'सखी ' और किन्नर, जो मंगल- कामना करते हुए सीता को राम के गले में वरमाला डालने के लिए उत्साहित करते हैं और जिनके आशीर्वाद के साथ राम -जानकी विवाह संपन्न होता है ! द्वापर-युग में इन्द्रलोक की एक अप्सरा द्वारा अर्जुन को नंपुसक बनने का शाप दिए जाने तथा अज्ञातवास के दौरान उनके किन्नर वेश धारण करके मत्स्य नरेश के राजभवन में आश्रय लिए जाने का वृतांत मिलता है ! हम सभी जानते हैं की यदि कृष्ण के सुझाव पर किन्नर शिखंडी को सामने करके भीष्म वध ना किया गया होता तो धर्म पर अधर्म की विजय ना होती और विष्णु का कृष्ण अवतार लेने का मकसद कुछ हद तक निरर्थक ही रहता ! किन्नर वे जाति है जिसने देवताओ यक्षो गन्धर्वों के साथ स्थान पाया है ! भारतीय हिंदु संस्कृति में प्राचीन काल से ही किन्नरों का गौरवपूर्ण स्थान रहा है ! दूसरे शब्दों में कहा जाये तो किन्नरों के बिना भारतीय संस्कृति अधूरी है !

कहते हैं किन्नरों का लगभग 4000 साल पुराना इतिहास है, इनका जिक्र महाभारत-रामायण में भी मिलता है। किन्नर भी इस सृष्टि का हिस्सा है। जैसे आदमी-औरत को परमात्मा ने बनाया है, तो किन्नरों को भी परमात्मा ने बनाया है। पहले उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी, लेकिन वर्तमान समय में उनकी आज की दुर्दशा देखी जाये तो वह आपको अपना जीवनयापन करने के लिए रेड लाइट पर दिखेंगे या तो किसी की खुशी में नजर आयेंगे नाचते हुए या टीवी सिनेमा पर समलैगिकता का भोंडा प्रदर्शन करते हुए ! अगर रामायण महाभारत के पवित्र पन्नों को पलटेंगे तो वहां पर भी आपको किन्नरों के बारे में पता चलेगा। वहां भी इनका जिक्र देखने को मिलता है। महाभारत में जब अज्ञातवास के दौरान अर्जुन ने भी वृहन्नला नाम के एक किन्नर का रूप धारण किया था। किन्तु बाद में महाभारत के युद्ध में उसी अर्जुन ने भीष्म जैसे महारथी को परास्त भी किया था, और वह भी सिर्फ शिखंडी के सहयोग से ही, जोकि किन्नर था।

भारत में मुगलों के आगमन के दौरान किन्नरों की स्थिति 

इतिहास में हिजड़ों का जिक्र काफी पुराने समय से मिलते आया है। महाभारत में जहां हिजड़े को शिखंडी के रूप में दर्शाया गया है, वहीं मुगलों और नवाबों के हरम में रानियों की देख-रेख व उनकी रक्षा के लिए हिजड़े रखे जाते थे। इस दौरान कुछ हिजड़े सेना में भी अच्छे पदों पर तैनात थे. हर संस्कृति और सभ्यता में किन्नरों का एक अहम रोल होता है। वे कुछ विशेष काम करते हैं। जैसे हरम या जनानखाने की रखवाली करना किन्नरों की खास जिम्मेदारी होती थी। हरम यानी वो जगह जहां शाही घराने की महिलाएं रहतीं थीं। यौन अक्षम होने के कारण मध्य काल में हरमों की सुरक्षा हेतु इन्हें सर्वश्रेष्ठ समझा जाता था ! मुग़ल शासन के दौरान भी किन्नरों का राज दरबार लगाया जाता था। इसी दौरान किन्नरों को एक कौतूहल का विषय बनाया गया ! कई इतिहासकारों का यहां तक दावा है कि मुग़ल शासन के दौरान कई लोग अपने बच्चों को किन्नर बना दिया करते थे ताकि उन्हें राजा के पास नौकरी मिल जाए ! मुग़ल काल में हजारों की संख्या में राजपूत पुरुषों के जननांगों को काटकर हिजड़ा बना दिया गया और अपने हरम में इन्हें अपनी स्त्रियों की सुरक्षा के लिए तैनात किया गया. इस प्रकार हिजड़ा बनाने की यह प्रक्रिया पुराने समय से चली आ रही है.

भारत में अंग्रेजों के आगमन के दौरान किन्नरों की स्थिति 

प्राचीन भारत में जहाँ किन्नरों को आम पुरुषों एवं महिलाओं की तरह अधिकार प्राप्त होते थे उन्हें समाज में सम्मान की दृष्टी से देखा जाता था एवं योग्यता अनुसार उनके कार्यों का निर्धारण किया जाता था वहीँ मुगलों के भारत में आगमन के साथ ही उन्हें केवल मुग़ल शासकों की बेगमों की देखभाल हेतु उनके हरम में कार्य करने हेतु नियुक्त किया गया इसके उपरांत भारत में अंग्रेजों के आगमन के साथ ही इनकी स्थिति दयनीय हो गयी ! जो किन्नर जाति भारतीय संस्कृति का मुख्य हिस्सा थी वे बिखरने लगी और उसकी हालत बद से बदतर होने लगी ! इनकी बदहाली का सबसे बड़ा कारण भारतीय संस्कृति के वे ठेकेदार हैं जो समय के साथ इनको न्याय न दिलवा सके ! वर्तमान में इनकी स्थिति यह है कि किन्नरों को समाज से अलग कर के देखा जाता है. वे ना ही शिक्षा पा सकते हैं और न कहीं नौकरी कर सकते हैं. 

गे राइट्स एक्टिविस्ट अंजली गोपालन अंग्रेजों के शासन को जिम्मेदार मानती हैं, उनका कहना है कि “भारत में अब स्थिति अलग है क्योंकि अंग्रेजों के शासन के दौरान यहां इस तरह के कानून बनाए गए. हमारे कानून में स्वाभाविक और अस्वाभाविक की नई परिभाषा दी गई." सन 1871 में तत्कालीन अँगरेज़ सरकार क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट या जरायमपेशा अपराध अधिनियम लेकर आई जिसमें इन पर कई प्रतिबन्ध लगाए गए और सन 1897 में इसमें संशोधन करते हुए इन्हें अपराधियों की कोटि में रखते हुए इनकी गतिविधियों पर नजर रखने हेतु एक अलग रजिस्टर तैयार करने को कहा गया. धारा 377 के अंतर्गत इनके कृत्यों को गैर जमानती अपराध घोषित किया गया. 

आज़ादी मिलने पर इन्हें जरायमपेशा जातियों की सूची से तो हटा दिया गया किन्तु धारा 377 की तलवार तब भी इनके ऊपर लटकती रही, नवम्बर 2009 में भारत सरकार ने इनकी पुरुषों एवं महिलाओं से अलग पहचान को स्वीकृति प्रदान की तथा निर्वाचन सूची एवं मतदाता पहचान पत्रों पर इनका ‘अन्य’ के तौर पर उल्लेख किया. 15 अप्रैल सन 2015 को उच्चतम न्यायालय ने तीसरे लिंग के रूप में इनके अधिकारों को मान्यता दी है और सभी आवेदनों में तीसरे लिंग का उल्लेख अनिवार्य कर दिया. इतना ही नहीं उच्चतम न्यायालय ने इन्हें बच्चा गोद लेने का अधिकार भी दिया और इन्हें चिकित्सा के माध्यम से पुरुष या स्त्री बनने का भी अधिकार दिया.

जैसे आदमी-औरत को परमात्मा ने बनाया है, तो किन्नरों को भी परमात्मा ने बनाया है। पहले उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी, लेकिन वर्तमान समय में उनकी आज की दुर्दशा देखी जाये तो वह आपको अपना जीवनयापन करने के लिए रेड लाइट पर दिखेंगे या तो किसी की खुशी में नजर आयेंगे नाचते हुए। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है और सबसे बड़ा संविधान, आध्यत्मिक दृष्टिकोण से देखा जाये, सबसे ज्यादा धर्म के बारे में यहां ज्ञान है। उसके बाद भी एक जाति ऐसी है, एक हिस्सा ऐसा है। जो अपने अधिकारओं के लिए खुद लड़ता है, खुद आवाज उठाता है। उनके लिए इंडिया गेट पर मोमबत्ती लेकर कोई नहीं जाता। उनकी पीड़ा को सुनने वाला कोई नहीं होता। उनके रोते चीखते, नम आंखों में बस ये सवाल होता है कि मैं अगर किन्नर हूं, तो मेरा क्या कसूर? मुझे भी उसने भेजा है, धरती पर जिसने ये दुनिया बनाई। मुझे ही क्यों सब सहना पड़ता है।

भारत में वर्तमान में किन्नरों की स्थिति 

सिंहस्थ कुंभ में 13 अखाड़े शामिल होते हैं, लेकिन इस बार कुछ अलग देखने को मिला, इस बार एक नया अखाड़ा बना, और ये अखाड़ा कोई और नहीं बल्कि किन्नर अखाड़ा था। और इसकी अगवानी किन्नर अध्यक्ष लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी ने की। लक्ष्मी टीवी की कलाकार है, और वह बिग बॉस सीजन 5 में भी भाग ले चुकी है। टीवी शो “सच का सामना”, “दस का दम” और “राज़ पिछले जन्म का” में भी देखी जा चुकी हैं और लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी 2008 में संयुक्त राष्ट्र संघ में एशिया-पैसिफिक का प्रतिनिधित्व करने वाली पहली ट्रांसपर्सन थीं।

कहते हैं कि प्रभु राम हिजड़ों की इस निश्छल और निःस्वार्थ भावना से अत्यधिक प्रभावित हुए और उन्होंने प्रसन्न होकर इनको वरदान दिया कि कलयुग में तुम लोग राज करोगे. कहते हैं कि भगवान राम ने इन्हें यह भी वरदान दिया कि तुम जिन्हें अपना आशीर्वाद दोगे, उसका कभी अनिष्ट नहीं होगा. इसीलिए शुभ अवसरों पर गृहस्थ इनका स्वागत करते हैं और इन्हें मुंहमांगी रकम देकर विदा करते हैं.

आज किन्नर (हिजडा) क्या है एक जाति सूचक शब्द या गाली ! हम समाज में नाई को नाई नही बोल सकते, धोबी को धोबी नही बोल सकते, जमादार को जमादार नही बोल सकते लेकिन किन्नर को हिजडा कह कर उसका अपमान कर सकते हैं ! 'एक मच्छर आदमी को हिजडा बना देता है ' अर्थात नपुसंक बना देता है ये डायलौग ये बताता है की मनुष्य को समाज में क्या उसकी सैक्सपावर से ही पहचाना जाना चाहिए, या फिर मात्र सैक्सपावर ही उसे पुरुषत्व प्रदान करती है, क्या दया -करुणा-क्षमा -प्रेम -धैर्य -शक्ति जैसे गुण पुरुष को पुरुष होने का अहसास नही कराते ? 

भारतीय संस्कृति में सदियों से महत्वपूर्ण रहे किन्नर समाज की वर्तमान दुर्दशा पर यदि हम गौर से नजर डालें तो हम अपनी संस्कृति पर हुए एक षड्यंत्रपूर्वक हमले का आभास कर पायेंगे ! हमारी संस्कृति पर आए दिन जाती-पाती, छुआछूत, महिलाओं का दमन इत्यादि के गभीर आरोप लगाए जाते है, हमारे समाज को पुरुष प्रधान समाज कहा जाता है जबकि यदि हम अपने प्राचीन समय में झांके तो सदा से हमने महिलाओं को तो वह अधिकार दिया है जो हमारे समाज में पुरुषों को प्राप्त रहा है बल्कि हमने महिला और पुरुषों के साथ साथ किन्नर समुदाय के लोगों को भी वही महत्त्व दिया है ! सदियों से विदेशी आक्रमण झेल रही इस पुण्य धरा पर विदेशी आक्रमणकारी आते गए और हमारी श्रेष्ठ संस्कृति को भी दूषित करते रह इसी का परिणाम है कि हमारे समाज का अभिन्न भाग रहे किन्नर समाज को आज हम अपनी संस्कृति से विमुख होकर हेय की दृष्टी से देखते है ! 

प्राचीन समय कि इस श्रेष्ठ प्रजाति को मुगलों के भारत आगमन के दौरान “हिजड़ा” शब्द प्रदान कर मुगलों की महिलाओं के हरम में कार्य करने हेतु नियुक्त कर दिया गया क्यूंकि मुगलों में महिलाओं का संपर्क मर्दों के साथ निषेध था या यूं कहें कि इन्हें स्वयं के अतिरिक्त अपनी महिलाओं कि जिम्मेदारी अपने परिवार के ही अन्य पुरुष को सौपने में ही भय लगता था ! मुगलों के बाद भारत में अंग्रेजों के आगमन पर किन्नरों पर बहुत अधिक अत्याचार हुआ, दरअसल अंग्रेज एक चालाक प्रजाति थी और इन्होने जितना बल से उससे कहीं अधिक छल से हमारे देश को छति पहुंचाई है ! अंग्रेजों ने न जाने कितने षड़यंत्र रचे और हमारी संस्कृति को तोड़ने का प्रयास किया, हमारे धर्मग्रंथों में मिलावट कर हमें हमारी संस्कृति से दूर करने का प्रयास किया, दूषित साहित्यों का निर्माण कर हम पर थोपा गया, हमारे गौरवशाली इतिहास को हमसे दूर करने का घिनौना षड़यंत्र रचा ! 

हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग रहे नृत्यकला प्रवीण किन्नर, मुगलों के इस देश में आगमन के बाद “हिजड़े” हुए, अंग्रेजों के आगमन के बाद इन्हें “अपराधी” घोषित किया गया, वहीँ आजादी के बाद अंग्रेजों के मानस पुत्रों ने समलैंगिकता की मांग उठाते हुए इन्हें “गे” में परिवर्तित कर हमारी संस्कृति को धूमिल करने का घिनौना षड़यंत्र रचा ! 

जबकि रामचरित मानस में किन्नरों को भी सबके समान मान्यता दी है -


माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥ 

देव दनुज किन्नर नर श्रेनीं। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥2॥ 

माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं, तब सब लोग तीर्थराज प्रयाग को आते हैं। देवता, दैत्य, किन्नर और मनुष्यों के समूह सब आदरपूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं।
दिवाकर शर्मा
संपादक
क्रांतिदूत डॉट इन
प्रदेश अध्यक्ष - भारत संस्कृति न्यास मध्यप्रदेश 

    

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क्रांतिदूत: व्यथा की अनकही कथा - किन्नर से हिजड़ा फिर गे – दिवाकर शर्मा
व्यथा की अनकही कथा - किन्नर से हिजड़ा फिर गे – दिवाकर शर्मा
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