दावोस में संपन्न World Economic Forum की अड़तालीसवीं वार्षिक बैठक में दिया गया प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का अविकल भाषण !

His Excellency the President of the Swiss Federation, Honourable Heads of State and Government, World Economic Forum  के संस्थापक ...


His Excellency the President of the Swiss Federation,
Honourable Heads of State and Government,
World Economic Forum के संस्थापक और कार्यकारी अध्यक्ष श्री क्लॉज़श्वाब,
विश्व के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित उद्यमीउद्योगपति और CEOs
मीडिया के मित्रों,
देवियों और सज्जनों,
नमस्कार।
दावोस में World Economic Forum की इस अड़तालीसवीं वार्षिक बैठक में शामिल होते हुए मुझे बेहद हर्ष हो रहा है।
सबसे पहले मैं श्री क्लॉज़श्वाब को उनकी इस पहल पर और World Economic Forum को एक सशक्त और व्यापक मंच बनाने पर बहुत-बहुत साधुवाद देता हूँ। उनके vision में एक महत्वाकांक्षी एजेंडा है जिसका उद्देश्य है दुनिया के हालात सुधारना। उन्होंने इस एजेंडा को आर्थिक और राजनीतिक चिंतन से बहुत मज़बूती के साथ जोड़ दिया है।
साथ ही साथ हमारेगर्मजोशी भरे स्वागत-सत्कार के लिए मैं Switzerland की सरकार और उसके नागरिकों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करना चाहता हूँ।
Friends,
दावोस में आख़िरी बार भारत के प्रधानमंत्री की यात्रा सन् 1997 में हुई थी, जब श्री देवेगौड़ा जी यहाँ आए थे।
1997 में भारत का GDP सिर्फ़ 400 billion dollar से कुछ अधिक था। अब दो दशकों बाद यह लगभग 6 गुना हो चुका है।
उस वर्ष इस फोरम का विषय "Building the Network Society" था।
आज, 21 साल बाद technology और digital age की उपलब्धियों और प्राथमिकताओं को देखें तो यह विषय सदियों पुराना जान पड़ता है।
आज हम सिर्फ़ network society ही नहीं, बल्कि big data ,artificial intelligence तथा Cobots की दुनिया में हैं।
1997 में EURO मुद्रा प्रचलित नहीं हुई थी। और Asian financial crisis का कोई अता-पता नहीं था, ना ही BREXIT के आसार थे।
1997 में बहुत कम लोगों ने ओसामा बिन लादेन के बारे में सुना था और Harry Potter का नाम भी अनजाना था।
तब शतरंज के खिलाड़ियों को computer से हारने का गंभीर खतरा नहीं था।
तब Cyber Space में Google का अवतार नहीं हुआ था।
और यदि 1997 में आप internet पर ''Amazon'' शब्द ढूंढते तो आपको नदियों और घने जंगलों के बारे में सूचना मिलती।
उस जमाने में tweet करना चिड़ियों का काम था, मनुष्यों का नहीं।
वह पिछली शताब्दी थी।
आज, दो दशकों के बाद हमारा विश्व और हमारे समाज बहुत सी जटिल networks के network हैं।
उस जमाने में भी दावोस अपने समय से आगे था, और यह World Economic Forum भविष्य का परिचायक था।
आज भी दावोस अपने समय से आगे है।
इस वर्ष फोरम का विषय – ''Creating a shared Future in a Fractured World'' है। यानि दरारों से भरे विश्व में साझा भविष्य का निर्माण।
नये-नये बदलावों से, नई-नई शक्तियों सेआर्थिक क्षमता और राजनैतिक शक्ति का संतुलन बदल रहा है। इससे विश्व के स्वरुप में दूरगामी परिवर्तनों की छवि दिखाई दे रही है। विश्व के सामने शांति, स्थिरता और सुरक्षा को लेकर नई और गंभीर चुनौतियां है।
Technology driven transformation हमारे रहने, काम करने, व्यवहार, बातचीत और यहाँ तक कि अंतर्राष्ट्रीय समूहों और राजनीति तथा अर्थव्यवस्था तक को गहराई से प्रभावित कर रहे हैं।
Technology के जोड़ने, मोड़ने और तोड़नेतीनोंआयामों का एक बड़ा उदाहरण Social media के प्रयोग में देखने को मिलता है।
आज Data सबसे बड़ी संपदा है। Data के globalflow से सबसे बड़े अवसर बन रहे हैं, और सबसे बड़ी चुनौतियां भी।
विज्ञान, तकनीक और आर्थिक प्रगति के नये आयामो में एक ओर तो मानव को समृद्धि केनये रास्ते दिखाने की क्षमता है। वहीं दूसरी ओर, इन परिवर्तनों से ऐसी दरारें भी पैदा हुई हैं जो दर्द भरी चोट पहुंचा सकती हैं।
बहुत से बदलाव ऐसी दीवारें खड़ी कर रहे हैं जिन्होंने पूरी मानवता के लिए शान्ति और समृद्धि के रास्ते को दुर्गम ही नहीं दु:साध्य बना दिया है।
ये fractures, ये divides और ये barriers विकास के अभाव की हैं, गरीबी की हैं, बेरोजगारी की हैं, अवसरों के अभाव, और प्राकृतिक तथा तकनीकी संसाधनों पर आधिपत्य की हैं। इस परिवेश में हमारे सामने कई महत्वपूर्ण सवाल हैं जो मानवता के भविष्य और भावी पीढ़ियों की विरासत के लिए समुचित जवाब मांगते हैं।
क्या हमारी विश्व-व्यवस्था इन दरारों और दूरियों को बढ़ावा दे रही है?
वे कौन सी शक्तियाँ हैं जो सामंजस्य के ऊपर अलगाव को तरजीह देती हैं, जो सहयोग के ऊपर संघर्ष को हावी करती हैं?
और हमारे पास वे कौन से साधन हैं, वे कौन से रास्ते हैं जिनके ज़रिये हम इन दरारों और दूरियों को मिटाकर एक सुहाने और साझा भविष्य के सपने को साकार कर सकते हैं?
Friends,
भारत, भारतीयता ओर भारतीय विरासत का प्रतिनिधि होने के नाते मेरे लिए इस फोरम का विषय जितना समकालीन है उतना ही समयातीत भी है।
समयातीत इसलिए क्योंकि भारत में अनादिकाल से हम मानव मात्र को जोड़ने में विश्वास करते आये हैं, उसे तोड़ने में नहीं, उसे बांट ने में नहीं। हज़ारों साल पहले संस्कृत भाषा में लिखे गये ग्रंथों में भारतीय चिंतकों ने कहा: वसुधैवकुटुम्बकम्''। यानि पूरी दुनिया एक परि
वार है। तत्वतः हम सब एक परिवार की तरह बंधे हुए हैं, हमारी नियतियां एक साझा सूत्र से हमें जोड़ती हैं।
वसुधैवकुटुम्बकम् की यह धारणा निश्चित तौर पर आज दरारों और दूरियों को मिटाने के लिए और भी ज्यादा सार्थक है।
लेकिन आज एक गंभीर बात यह है कि इस काल की विकट चुनौतियों से निपटने के लिए हमारे बीच सहमति का अभाव है।
परिवार में जहां एक ओर सौहार्द्र और सहयोग होता है वहीं कुछ न कुछ मतभेद और झगड़े भी हो सकते हैं। लेकिन परिवार का प्राण, उसकी प्रेरणा यही भावना होती है कि जब साझा चुनौतियां सामने आयें तोसब लोग एकजुट होकर उनका सामना करते हैं, और एकजुट होकर उपलब्धियों और आनंद के हिस्सेदार बनते हैं।
परन्तु चिंता का विषय है कि हमारे विभाजनों ने, दरारों ने इन चुनौतियों के खिलाफ़ मानव जाति के संघर्ष को और भी कठिन, और भी कठोर बना दिया है।
Friends,
जिन चुनौतियों की ओर मैं इशारा कर रहा हूँ उनकी संख्या भी बहुत है और विस्तार भी व्यापक है। यहां पर मैं सिर्फ तीन प्रमुख चुनौतियों का जिक्र करुंगा जो मानव सभ्यता के लिए सबसे बड़े ख़तरे पैदा कर रही हैं।
पहला खतरा है Climate Change का।
Glaciers पीछे हटते जा रहे हैं। आर्कटिक की बर्फ पिघलती जा रही है। बहुत से द्वीप डूब रहे हैं, याडूबने वाले हैं। बहुत गर्मी और बहुत ठंड, बेहद बारिश और बाढ़ या बहुत सूखा - extreme weather का प्रभाव दिन-ब-दिन बढ़ रहा है।
इन हालात में होना तो यह चाहिए था कि हम अपने सीमित संकुचित दायरों से निकलकर एकजुट हो जाते। लेकिन क्या ऐसा हुआ? और अगर नहीं, तो क्यों? और हम क्या कर सकते हैं जो इन हालात में सुधार हो।
हर कोई कहता है की carbon emission को कम करना चाहिए। लेकिन ऐसे कितने देश या लोग हैं जो विकासशील देशों और समाजों को उपयुक्त technology उपलब्ध कराने के लिए आवश्यक संसाधन मुहैया कराने में मदद करना चाहते हैं।
आपने अनेक बार सुना होगा भारतीय परम्परा में प्रकृति के साथ गहरे तालमेल के बारे में। हजारो साल पहले हमारे शास्त्रों में मनुष्यमात्र को बताया गया- "भूमि माता, पुत्रोअहम्पृथ्व्याः'' यानि, we the human are children of Mother Earth.
यदि हम पृथ्वी की संतान हैं तो आज मानव और प्रकृति के बीच जंग-सीक्योंछिड़ी है?
हज़ारों साल पहले भारत में लिखे गए सबसे प्रमुख उपनिषद इशोपनिषदकी शुरुआत में  हीतत्त्वद्रष्टागुरु ने अपने शिष्यों से परिवर्तनशील जगत के बारे में कहा: तेनत्यक्तेनभुन्जीथा।यानि संसार मेंरहते हुए उसकात्यागपूर्वक भोग करो.
ढाई हज़ार साल पहले भगवान् बुद्ध ने अपरिग्रहयानि आवश्यकता के अनुसार इस्तेमाल को अपने सिद्धांतों में प्रमुख स्थान दिया।भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का trusteeship का सिद्धांत भी आवश्यकता यानि need के अनुसारउपयोग और उपभोग करने के पक्ष में था;greed परआधारित शोषण का उन्होंने सीधा विरोध किया था.
सोचने का विषय है कि त्यागपूर्वक भोग से आवश्यकतानुसार उपयोग करते हुए अब हम लालच के वश प्रकृति के शोषणतक कैसे पहुँच गए?यह हमारा विकास हुआ है या पतन?
हमारे दिमाग कीयेदुरावस्था, हमारे स्वार्थ की खौफनाक झलक, हमें क्यों आत्म-चिंतन पर मजबूर नहीं करती?
अगर हम सोचें तो पाएंगे कि आजपर्यावरण में व्याप्तभयंकरकुपरिणामोंके इलाज का एक अचूक नुस्खा है प्राचीन भारतीय दर्शन का मानव और प्रकृति के बीच सामंजस्य।
यही नहीं, इस दर्शन से जन्मी योग और आयुर्वेद जैसी भारतीय परम्पराओं की समग्र पद्यति न सिर्फ परिवेश और हमारे बीच के fracture को heal कर सकती है, बल्कि हमें शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य और संतुलन भी प्रदान करती है।
वातावरण को बचाने और climate change का प्रतिकार करने के लिए एक बहुत बड़ा अभियान, एक बहुत बड़ा लक्ष्य मेरी सरकार ने देश के सामने रखा है। सन् 2022 तक हमें भारत में 175 GW renewable energy का उत्पादन करना है। पिछले करीब तीन वर्षों में 60 GW, यानी इस लक्ष्य का एक तिहाई से भी अधिक हम प्राप्त कर चुके हैं।
2016 में भारत और फ्रांस ने मिलकर एक नये अंतर्राष्ट्रीय treaty based organization की कल्पना की। यह क्रांतिकारी क़दम अब एक सफल प्रयोग में बदल गया है।
International Solar Alliance के रुप में यहपहल आवश्यक Treatyratification के बाद अब एक वास्तविकता है। मुझे बेहद ख़ुशीहै कि इस वर्ष मार्च में फ्रांस के राष्ट्रपति मैंक्रॉ और मेरे संयुक्त निमंत्रण पर इस Alliance के सदस्य देशों के leaders नई दिल्ली में होने वाले Alliance के पहले summit में भाग लेंगे।
Friends,
दूसरी बड़ी चुनौती है आतंकवाद। 2016 में 25 हजार से ज्यादा लोग आतंकी हमलों में मारे गये। 77 देशों में यानी संयुक्त राष्ट्र संघकी सदस्यता के करीब 40% हिस्से में आतंकवादी गतिविधियों से कई लोगों की जानें गई।
एक ओर आतंकवाद के आर्थिक दुष्परिणाम कोअरबों डॉलर के नुकसान के रूप में आंका गया है। दूसरी ओर किसी ने यह भी आकलन किया है कि यूरोप में एक आतंकी हमला आयोजित करने के लिए केवल 10 हजार डॉलर से कम में भी काम चल सकता है।
यह मानवता विरोधी चुनौती जीवन को ही नहीं, सुरक्षा को ही नहीं, सारे संसार केविकास, शान्ति और स्थिरता को बुरी तरह प्रभावित कर रही है।
स्पष्ट है कि हमें आतंकवाद से लड़ने के लिए आपसी सहयोग को एक व्यावहारिक बुनियाद पर मजबूती के साथ खड़ा करना होगा।
हमें जरुरत है कि मानवता में विश्वास रखने वाले सभी देश विभिन्न रास्तों से विभिन्न mechanism के द्वारा आपसी सहयोग बढ़ाये जिससे आतंकवाद को प्रश्रय देने वाली ताकतों को पराजित किया जा सके।
Friends,
तीसरी चुनौती मैं यह देखता हूँ कि बहुत से समाज और देश ज्यादा से ज्यादा आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि Globalization अपने नाम के विपरीत सिकुड़ रहा है। इस प्रकार की मनोवृत्तियों और गलत प्राथमिकताओं के दुष्परिणाम को climate change या आतंकवाद के ख़तरे से कम नहीं आंका जा सकता।
हालांकि हर कोई interconnected विश्व की बात करता है लेकिन globalization की चमक कम हो रही है।
संयुक्त राष्ट्र संघ के आदर्श अभी भी सर्वमान्य हैं। World Trade Organization भी व्यापक है। लेकिन दूसरे विश्व युद्ध के बाद बने हुए विश्व संगठनोंकी संरचना, व्यवस्था और उनकी कार्य पद्धति क्या आज के मानव की आकांक्षाओं और उसके सपनों को, आज की वास्तविकता कोपरिलक्षित करते हैं?
इन संस्थानों की पुरानी व्यवस्था और आज के विश्व में खासतौर पर बहुतायत विकासमान देशों की आवश्यकताओं के बीच एक बड़ी खाई है।
Globalization के विपरीत protectionism की ताकतें सर उठा रहीं हैं। उनकी मंशा है कि न सिर्फ वे खुद globalization से बचें बल्कि globalization के प्राकृतिक प्रवाह का रुख भी पलट दें।
इसका एक परिणाम यह है कि नये-नये प्रकार के tariff और non-tariff barrier देखने को मिलते हैं।
द्विपक्षीय और बहुपक्षीय व्यापार समझौते और negotiations रुक-से गये हैं.
Cross-border वित्तीय निवेश में ज्यादातर देशों में कमी आई है। और Global supply chains की वृद्धि भी रुक गयी है।
Globalisation के विरुद्ध इस चिंताजनक स्थिति का हल अलगाव में नहीं है। इसका समाधान परिवर्तन को समझने और उसे स्वीकारने में है, बदलते हुए समय के साथ चुस्त और लचीली नीतियां बनाने में है।
भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था, ''मैं नहीं चाहता कि मेरे घर की दीवारें और खिड़कियां सभी तरफ से बंद हो। मैं चाहता हूँ की सभी देशों की संस्कृतियों की हवा मेरे घर में पूरी स्वछंदता से आ जा सके। लेकिन इस हवा से मेरे पैर उखड़ जायें, यह मुझे मंजूर नहीं होगा।''
आज का भारत महात्मा गांधी के इसी दर्शन और चिंतन को अपनाते हुए पूरे आत्मविश्वास और निर्भिकता के साथ विश्व भर से जीवनदायिनी तरंगों का स्वागत कर रहा है।
Friends,
भारत का लोकतंत्र देश की स्थिरता, निश्चितता और सतत विकास का मूल आधार है। धर्म, संस्कृति, भाषा, वेश-भूषा और खान-पान की अपार विविधता से भरे-पूरे भारत के लिए लोकतंत्र महज़ एक राजनैतिक व्यवस्था नहीं बल्कि एक जीवन दर्शन है, जीवन शैली है।
हम भारतीय यह भली-भांति जानते और समझते हैं की विविधता की अनेकता को सौहार्दृ, सहयोग और संकल्प की एकता में बदलने के लिए लोकतांत्रिक परिवेश और स्वतंत्रताओं का महत्व क्या है।
भारत में लोकतंत्र सिर्फ हमारी विविधता का ही पालन-पोषण नहीं करता, बल्कि सवा सौ करोड़ से भी अधिक भारतीयों की आशाओं, आकांक्षाओं, अपेक्षाओं और उनके सपनों को पूरा करने के लिए, उनके समुचित विकास के लिए आवश्यक परिवेश, roadmap और template भी प्रदान करता है।
लोकतांत्रिक मूल्य और समावेशी आर्थिक विकास और प्रगति में तमाम दरारों को पाटने की संजीवनी शक्ति है।
भारत के छह सौ करोड़ मतदाताओं ने 2014 में तीस साल बाद पहली बार किसी एक राजनीतिक Party को केंद्र में सरकार बनाने के लिए पूर्ण बहुमत दिया।
हमने किसी एक वर्ग या कुछ लोगो के सीमित विकास का नहीं बल्कि सबके विकास का संकल्प किया। मेरी सरकार का मोटो है:"सबका साथ -सबका विकास"। प्रगति के लिए हमारा vision समावेशी है, हमारा mission समावेशी है।
यह समावेशी दर्शन मेरी सरकार की हर नीति का हर योजना का आधार है।
चाहे वह करोड़ों लोगों के लिए पहली बार bank खाते खुला के financial inclusion करना हो, या गरीबों तक, हर जरूरतमंद तक digital technology द्वारा direct benefit transfer.
या फिर gender justice के लिए 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ'
हम मानते हैं कि प्रगति तभी प्रगति है, विकास तभी सच्चे अर्थों में विकास है जब सब साथ चल सकें।
हम अपनी आर्थिक और सामाजिक नीतियों में केवल छोटे-मोटे सुधारही नहीं कर रहे, बल्कि आमूलचूलरूपान्तरण कर रहे हैं। हमने जो रास्ता चुनाहै वो है reform, performand transform.
आज हम भारत की अर्थव्यवस्था को जिस प्रकार से निवेश के लिए सुगम बना रहे हैं उसका कोई सानी नहीं है ।
इसी का नतीजा है कि आज भारत में निवेश करना, भारत की यात्रा करना, भारत में काम करना, भारत में manufacture करना, और भारत से अपने products and services को दुनिया भर को export करना, सभी कुछ पहले की तुलना में बहुत आसान हो गया है।
हमने लाइसेंस-परमिट राज को जड़ से ख़त्म करने का प्रण लिया है। Red tape हटा कर हम red carpet बिछा रहे हैं।
अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्र foreign direct investment के लिए खुल गए हैं। 90प्रतिशत से अधिक में automatic route से निवेश सम्भव है।
केंद्र एवं राज्य सरकारों ने मिल कर 10,000 से अधिक reforms किये हैं। 1400 से अधिक ऐसे पुराने कानून, जो business में, प्रशासन में, और आम इंसान के रोजमर्रा के जीवन में अडचनेंडालरहे थे, ऐसे पुराने कानूनों को हमने ख़त्म कर दिया है
70 साल के स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार देश में एक एकीकृत कर व्यवस्था goods and service tax – GST - के रूप में लागू कर ली गई है।
पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने के लिए हम technology का इस्तेमाल कर रहे हैं।
भारत कोtransform करनेके लिए हमारे संकल्प और हमारे प्रयासों का विश्व भर की business community ने स्वागत किया है।
भारत में democracy,demographyऔर dynamism मिल कर development को साकार कर रहे हैं, destiny को आकारदे रहे हैं।
दशकों के नियंत्रण ने भारत के लोगों की, भारत के युवा की क्षमताओं को जकड रखा था। लेकिन अब, हमारी सरकार के निर्भीक नीतिगत फैसलों ने, असरदार कदमों ने परिस्थितियां बदल दी हैं।
अब भारत के लोग, भारत के युवा 2025 में 5 ट्रिलियनडॉलर कीअर्थव्यवस्था के निर्माण में योगदान के लिए समर्थ हैं।
यही नहीं, जब Innovation और Entrepreneurship(आंत्रप्रेनयूरशिप) के ज़रिये वे जॉब-सीकर नहीं,जॉबगिवर बनेंगे तो उनके लिए, उनके देश के लिए और आप के व्यवसाय के लिए कितने रास्ते खुलेंगे इसकी कल्पना ही की जा सकती है।
आप सभी विश्व के प्रमुख लीडर्स हैं, और विश्व में हो रहे परिवर्तनों से, भारत की ranking और rating में हुए सुधार से, और आगे के लिए जो रास्ता हमने चुना है - इन सबसे आप भलीभाँति परिचित हैं।
लेकिन इन सभी आकंड़ो से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि भारत के लोगों ने हमारी नीतियों का, अपनी भविष्य में बदलाव के लिए हुई नई पहलों और अच्छे भविष्य के सुनहरे संकेतों का स्वागत किया है।
स्वेच्छा से subsidy का त्याग, या फिर चुनाव दर चुनाव लोकतांत्रिक तरीकों से हमारी नीतियों और सुधारों में अपना विश्वास व्यक्त करना होऐसे अनेक प्रमाण भारत में इन अभूतपूर्व परिवर्तनोंके व्यापक समर्थन की पुष्टि करते हैं।
Friends,
विश्व में तमाम तरह के फ्रैक्चर और तमाम तरह की दरारों को देखते हुए, यह आवश्यक है कि हमारे साझा भविष्य के लिए हम कई दिशाओं पर ध्यान दें।
सबसे पहले तो ये आवश्यक है कि विश्व की बड़ी ताक़तों के बीच सहयोग के संबंध हों। यह आवश्यक है कि विश्व के प्रमुख देशों के बीच प्रतिस्पर्धा उनके बीच एक दीवार बनकर न खड़ी हो जाए। साझा चुनौतियों का मुक़ाबला करने के लिए हमें अपने मतभेदों को दरकिनार करके एक larger vision के तहत साथ मिल कर काम करना होगा।
दूसरी आवश्यकता है कि नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था का पालन करना पहले से भी ज़्यादा ज़रूरी हो गया है। ख़ास तौर पर जब हम ऐसे समय से गुज़र रहे हैं जहाँ हमारे चारों और होने वाले बदलाव अनिश्चितताओं को जन्म दे सकते हैं, तब अंतरराष्ट्रीय कानूनों और नियमों का सही spirit में पालन ज़रूरी है।
तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि विश्व के प्रमुख राजनैतिक, आर्थिक एवं सुरक्षा से संबंधित संस्थानों में सुधार की अत्यंत आवश्यकता है। उनमें सहभागिता और लोकतांत्रिकरण कोआज की परिस्थिति के अनुरूप बढ़ावा दिया जाए।
चौथी महत्वपूर्ण बात ये है कि हमें विश्व की आर्थिक प्रगति में और तेज़ी लानी होगी। इस बारे में विश्व में आर्थिक वृद्धि के लिए हाल के संकेत उत्साहजनक है। Technology और digital revolution ऐसे नए समाधानों की संभावना बढ़ाते हैं जिनसे हम ग़रीबी और बेरोज़गारी जैसी पुरानी समस्याओं और चुनौतियों का नए सिरे से मुक़ाबला कर सकते हैं।
Friends,
इस प्रकार के प्रयासों में भारत ने हमेशा सहायता का हाथ आगे बढ़ाया है।आज से ही नहीं, अपनी स्वतंत्रता के समय से नहीं, बल्कि पुरातन काल से भारत चुनौतियों का मुक़ाबला करनेमें सबके साथ सहयोग का हामी रहा है।
पिछली शताब्दी में जब विश्व दो विश्वयुद्धों के संकट से गुज़रा तब अपना कोई निजी स्वार्थ न होते हुए भी, कोई आर्थिक या territorial हितन होते हुए भी भारत शान्ति और मानवताके उच्च आदर्शों की सुरक्षा के लिए खड़ा हुआ। डेढ़ लाख से भी अधिक भारतीय सैनिकों ने अपनी जान दी।
ये वही आदर्श हैं जिनके लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना के बाद से भारत ने UN peace keeping ऑपरेशंस में सैनिकों का सबसे बड़ी संख्या में योगदान किया है।
ये वही आदर्श हैं जिनकी प्रेरणा और शक्ति हमें संकटों और प्राकृतिक आपदाओं के समय अपने पड़ोसियों मित्र देशों और मानव मात्र की सहायता करने के लिए उत्साहित करती है।
चाहे नेपाल में भूकंप हो,या हमारे दूसरे पड़ोसी या मित्र देशों में बाढ़, तूफ़ान, या दूसरी प्राकृतिक आपदाएँ। भारत ने FirstResponder के रूप में सहायता पहुँचाना अपना सबसे प्रमुखकर्तव्य समझता है। यमन में जब हिंसा की लपटों ने भारत ही नहीं दुनिया के बहुत से देशों के नागरिकों को चपेट लेना शुरू किया तो हमने अपने संसाधनों के ज़रिए भारतीयों को ही नहीं, अन्य देशों केलगभग 2 हज़ार नागरिकों को भीवहाँ से सुरक्षित निकाला।
स्वयं एक विकासशील देश होने के बावजूद भारत development cooperation में, capacity building में, आगे बढ़कर सहयोग करता आ रहा है। Africa के देश हों, या भारत के पड़ोसी, या South East Asia के देश हों, या फ़िर Pacific Islands हों, सभी के साथ हमारे सहयोग की रूपरेखा और हमारे projects उन देशों की प्राथमिकताओं और ज़रूरतों पर आधारित होते हैं।
Friends,
भारत ने कोई राजनैतिक या भौगोलिक महत्वाकांक्षा नहीं रखी है।हम किसी भी देश केप्राकृतिक संसाधनों का शोषणनहीं करतेबल्कि उसदेश के लिए उसके साथ मिलकर उनकाविकास करते हैं।
भारतीय भूभाग में हज़ारों साल से विविधता के सौहार्दपूर्ण सहअस्तित्व का सीधा नतीजा यह है कि हम multi-cultural संसार में और multi-polar विश्व-व्यवस्था में विश्वास रखते हैं।
भारत ने यह साबित कर दिया है कि लोकतंत्र, विविधता का सम्मान, सौहार्द्र और समन्वय, सहयोग और संवाद सेसभी विवादों और दरारों को मिटाया जा सकता है।
शांति, स्थिरता और विकास के लिए यह भारत का जांचा-परखा नुस्खा है।
यही नहीं, a predictable, stable, transparent and progressive India will continue to be the good news in an otherwise state of uncertainty and flux.
An India where enormous diversity exists harmoniously will always be a unifying and harmonising force. 
अपने लिए नहीं, अपने देश के लिए ही नहीं भारतीय मानस ने, भारत के चिंतकों ने ऋषि मुनियों ने प्राचीन काल से ही सर्वेभवन्तुसुखिनःसर्वेसन्तुनिरामया, सर्वेभद्राणीपश्यंतु, माकश्चिद् दुख भाग भवेत् - यानी सब प्रसन्न हों, सब स्वस्थ हों, सबका कल्याण हों और किसी को दुःख ना मिले - यह सपना देखा है।
और इस आदर्श को प्राप्त करने के लिए, इस सपने को साकार करने के लिए रास्ता भी दिखाया है: सहनाऽवतु, सह नौ भुनक्तु सह वीर्यंकरवावहे। तेजस्विनाधीतमस्तुमाविद्विषावहे।
इस हजारोंसाल पुरानी भारतीय प्रार्थना का अभिप्राय है कि हम सब मिलकर काम करें, मिलकर चलें, हमारी प्रतिभाएं साथ-साथ खिलें और हमारे बीच कभी भी द्वेष न हो।
पिछली शताब्दी के महान भारतीय कवि और Nobel पुरस्कार विजेता गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक ऐसे heaven of freedom की कल्पना की“where the World has not been broken up into fragments by narrow domestic walls”.
आइए हम मिलकर एक ऐसा heaven of freedom बनाएँ जहाँ सहयोग और समन्वय हो, divide और fracture नहीं।
आइए हम सब साथ-साथ दुनिया को उसकी दरारों और अनावश्यक दीवारों से मुक्ति दिलाएँ।
Friends,
भारत और भारतीयों ने पूरे विश्व को एक परिवार माना है। विभिन्न देशों में भारतीय मूल के 30 million लोग रह रहे हैं।
जब हमने पूरी दुनिया को अपना परिवार माना है, तो दुनिया के लिए भी हमभारतीय उनका परिवार हैं।
मैं आप सबका आह्वान करता हूं कि अगर आप वेल्थ के साथ वैलनेस चाहते हैं, तो भारत में काम करें।
अगर आप health के साथ जीवन की wholeness यानि समग्रता चाहते हैं तो भारत में आयें।
अगर आप prosperity के साथ peace चाहते हैं तो भारत में रहें।
आप भारत आएं, भारत में हमेशाआपका स्वागत होगा।
मुझे आप सब से बातचीत करने का यह बहुमूल्य अवसर प्रदान करने के लिए, World Economic Forum का, श्री क्लास श्वाब का और आप सबका मैं ह्रदय से बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूँ।


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क्रांतिदूत: दावोस में संपन्न World Economic Forum की अड़तालीसवीं वार्षिक बैठक में दिया गया प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का अविकल भाषण !
दावोस में संपन्न World Economic Forum की अड़तालीसवीं वार्षिक बैठक में दिया गया प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का अविकल भाषण !
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क्रांतिदूत
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