एक साल : साख बेहाल - संजय तिवारी

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उत्तरप्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाना था। बड़े नेकनीयती से प्रयास करने थे। बड़े स्वप्नजीवी होकर चलना था और इस जातिवाद , सम्प्रदायवाद , गरीब...


उत्तरप्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाना था। बड़े नेकनीयती से प्रयास करने थे। बड़े स्वप्नजीवी होकर चलना था और इस जातिवाद , सम्प्रदायवाद , गरीबी , अपराध आदि से मुक्त करना था।ऐसे अनगिनत वादों का लक्ष्य लेकर भाजपा ने 28 जनवरी, 2017 को उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव-2017 के लिए घोषणा पत्र जारी किया था। यहाँ के लोगो ने खूब भरोसा किया और प्रचंड बहुमत दे दिया। भाजपा के 325 विधायकों को लोगो ने चुना। 19 मार्च, 2017 को योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। शपथ लेते ही सरकार दौड़ने लगी। सरकार बनाने के साथ ही योगी आदित्यनाथ ने जिस तेजी से फैसले लेने शुरू किये थे , उनकी गति में आज कमी नहीं है लेकिन उनके फैसलों का हकीकत बन पाने में बहुत विलम्ब हो रहा है। आज जब इस सरकार के 365 दिनों के कार्यो का रिपोर्टकार्ड देखा जा रहा है तो सब वैसे ही बियाबान दिख रहा है जैसे गोमती को वाले रिवर फ्रंट परियोजना का काम बंद होने के बाद से गोमती के किनारे दिख रहे हैं। शायद योगी जी को कोई बताने वाला ही नहीं है कि व्यवस्था और तंत्र में कितनी घास उग चुकी है। जमीन पर यह फैसले फलीभूत होते नहीं दिख रहे हैं, जिसका गलत सन्देश जनता के बीच जा रहा है, तो विपक्ष को सरकार पर हमलावर होने का मौका मिल रहा है। यह मौक़ा अब सपा और बसपा जैसे दो ध्रुवों को भी एक कर चुका है और कही न कही भाजपा की जमीन खिसकने लगी है।प्रस्तुत है योगी सरकार का एक साल पूरा होने पर एक विश्लेषण -

साख पर खड़े बड़े - बड़े सवाल 

सरकार और इसके पैरोकारों का दवा है कि बीते एक साल में उत्तरप्रदेश में काफी कुछ परिवर्तन हुआ है। खास तौर पर पुलिम महकमे की हनक लौटी है , तुष्टीकरण का दौर थमा है और बड़े पदों पर साफ छवि के लोग नियुक्त हुए, हालांकि इस दावे पर कई सवाल हुए हैं । बुंदेलखंड में सरकार संकल्प के साथ आगे बढ़ती नजर आई। हालांकि चुनौतियां अभी मुंह बाए खड़ी हैं। है कि योजनाएं धरातल पर दिखनी शुरू नहीं हुईं हैं, लिहाजा बेसब्री भी बढ़ी। साल पूरा होने से ऐन पहले मुखिया को अपने घर से ही सबक मिल गया। किसान उम्मीदों से देख रहे हैं। सरकारी महकमे और अफसरों का रवैया बदला नहीं है। साख बचाने और काम दिखाने के लिए काफी कुछ किया जाना बाकी है। 

याद आता है। एक वर्ष पहले... 18 मार्च को दोपहर उतरते-उतरते जब यह खबर मिली कि 14 वर्षों के वनवास के बाद सत्ता में लौटी भाजपा ने भगवा वेषधारी संन्यासी गोरखपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ को यूपी का राजकाज सौंपने का फैसला किया है तो साफ हो गया कि वक्त काफी बदल गया है। इतिहास अवसर कोई दीक्षित सन्यासी पीठाधीश्वर स्वयं सिंहासन पर आरूढ़ हो रहा था। भाजपा पर लोग भले ही राजनीति के भगवाकरण का आरोप लगाते हों, लेकिन एक संन्यासी को सत्ता सौंपकर उसने यह संदेश तो दे ही दिया कि भाजपा ने धर्मतंत्र के नियंत्रण में राजतंत्र को चलाने का फैसला किया है। यह सरकार पूर्व की सपा व बसपा सरकारों से अलग होगी। सरोकारों पर संवेदनशीलता, समाज के प्रति समर्पण, सेवा, सम्मान और समस्याओं के तुरंत समाधान के संकल्प के साथ काम करेगी। यानी प्रदेश में योगी युग शुरू हो चुका था। 

नयी सरकार इस दिशा में चली भी। काम शुरू हुए। एक साल के दौरान सरकार के सामने कई सवाल आए। समस्याएं भी आईं। सरकार ने समाधान किए, शासन को सरोकारी बनाने के प्रयास भी हुए। संकल्प पत्र के प्रति समर्पण का संदेश दिया गया। एजेंडे का ख्याल रखा गया। हिंदुत्ववादी सरकार के संदेश के साथ मुसलमानों का भी भरोसा हासिल करने की कोशिश हुई। कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी सुधार की कोशिश हुई। इस सरकार की सबसे बड़ी किरकिरी हुई खुद मुख्यमंत्री के घर में। गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में जब बच्चो की मौतों पर हंगामा हुआ तो डैमेज कंट्रोल के चक्कर में पूरी सरकार ही झूठ पर उतारू हो गयी। स्वास्थ्यमंत्री के अगस्त महीने में मौतों के बयान को गोरखपुर आज भी याद करता है। 

यह कहना उचित होगा कि प्रयास और मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत मेहनत से सरकार की साख तो बनी पर, साल पूरा होते-होते गोरखपुर व फूलपुर के नतीजों ने साख और काम पर सवालों को व्यापक बना दिया। इस आशंका को सही साबित कर दिया कि सरकार के फैसलों और जनता में उनकी डिलीवरी के बीच बड़ी खाई है। अफसरों की मनमानी और पुलिस के गैर जिम्मेदाराना रवैये को लेकर सरकार के प्रति लोगों में कहीं न कहीं कुछ नाराजगी है। कुछ ऐसे सवाल है, जिन्हें सरकार समझ नहीं पाई है। लोगों को इन पर आने वाले दिनों में समाधान का इंतजार रहेगा। सरकार को समाधान करने के लिए प्रयत्न करना होगा अन्यथा चुनौती बढ़ेगी। इस सरकार के कुछ ख़ास लक्ष्यों पर एक नजर डालने पर बहुत कुछ स्पष्ट हो जाता है -

किसान

भाजपा ने वादा किया था कि किसानों का पूरा कर्ज माफ होगा। बिना ब्याज कर्ज दिया जाएगा।सरकार बनने पर योगी ने पहली कैबिनेट मीटिंग में 36 हजार 359 करोड़ रुपए की कर्ज माफी का एलान किया। 78 लाख किसानों को कर्जमाफी का लाभ मिलना था। इस वादे की हकीकत यह है कि अभी तक 17.30 लाख किसानों का कर्ज माफ हुआ। यह कुल टारगेट का सिर्फ 22% है। देवरिया, वाराणसी, गोरखपुर और कुशीनगर को छोड़कर किसी भी जिले में दूसरे चरण की कर्जमाफी के प्रमाण पत्र बांटने का काम शुरू नहीं हुआ है। प्रदेश के कृषि मंत्री सूर्यप्रताप शाही कहते हैं कि किसानों को कर्जमाफी का लाभ मिला है। दूसरे चरण के प्रमाणपत्र भी जल्द बांटे जाएंगे। जब कि नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद चौधरी कहते हैं कि कर्जमाफी की आड़ में सरकार ने खेती का बजट 70.13% कम कर दिया। किसानों को छला गया है।

शिक्षा 

इसी तरह से चुनाव में वादा किया गया था कि पहली से 8वीं तक के बच्चों को स्वेटर, मौजे और जूते मुफ्त दिए जाएंगे। ग्रेजुएट तक लड़कियों और 12वीं तक लड़कों को लैपटॉप मुफ्त दिया जाएगा।इसके लिए सरकार ने दो बार टेंडर निकाला , लेकिन दिसंबर 2017 तक प्रॉसेस पूरी नहीं हो पाई। बाद में कलेक्टर को अपने स्तर पर टेंडर कराने को कहा गया। फ्री लैपटॉप वितरण योजना- 2017 शुरू की गयी । हकीकत यह है कि 1.5 करोड़ बच्चों में से सर्दी खत्म होने तक सिर्फ 45% बच्चों को स्वेटर बांटे गए। 22 से 23 लाख छात्रों में से अभी किसी को भी फ्री लैपटॉप नहीं मिला। इस मामले में विभाग की मंत्री अनुपमा जायसवाल की दलील है कि कलेक्टर को निर्देश दिए थे और सभी बच्चों को स्वेटर बांट दिए गए हैं।हलाकि यह दलील भी काफी हद तक झूठ ही लगता है क्योकि 200 रुपये के स्वेटर को पहली कक्षा से लेकर आठवीं तक का बालक या बालिका कैसे पहन पायेगी।


बिजली 

भाजपा ने वादा किया था कि 2019 तक हर घर में बिजली लग जाएगी ।अगले 5 साल में 24 घंटे बिजली मिलने लगेगी। लेकिन ऐसा कही जमीन पर दिख नहीं रहा। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश वर्मा के मुताबिक, सपा सरकार में 14 घंटे बिजली मिल रही थी, अब 16 से 18 घंटे मिल रही है। हालांकि, लोड बढ़ने से किसानों को ज्यादा राहत नहीं मिली। सचाई यह है कि बिजली का निजीकरण किया गया। रेट 50 से 150 फीसदी तक बढ़े। गर्मी शुरू होते ही शहरों में भी बिजली कटौती शुरू हो गई है।हालांकि ऊर्जामंत्री श्रीकांत शर्मा ने दावा किया कि प्रदेश सरकार ने एक वर्ष में रिकॉर्ड 32.77 लाख बिजली कनेक्शन दिए हैं। इसके साथ ही सरकार दिसंबर 2018 तक 1.71 करोड़ घरों को रोशन करने के लिए संकल्पबद्ध है। उनका दावा है कि 57,036 से ज्यादा मजरों में बिजली पहुंचाई गई और 11.60 लाख बीपीएल परिवारों को निशुल्क कनेक्शन दिए गए हैं। ऊर्जामंत्री ने कहा कि प्रधानमंत्री सौभाग्य योजना में 10.13 लाख से ज्यादा कनेक्शन दिए गए। गांव में 18, तहसील में 20 और जिला मुख्यालयों पर 24 घंटे आपूर्ति दी जा रही है। ग्रामीण क्षेत्र की आपूर्ति में 21 प्रतिशत, तहसील में 17.7 प्रतिशत और शहरी क्षेत्र में 9.1 प्रतिशत की वृद्धि की गई है। सर्वदा योजना के तहत 20 लाख अवैध कनेक्शनों को वैध किया गया। डार्क जोन में निजी नलकूप पर कनेक्शन का प्रतिबंध हटाने से एक लाख से अधिक किसानों को फायदा मिला है। एक वर्ष में 2,38,990 खराब ट्रांसफार्मर बदले गए और 14.316 नए लगाए गए हैं। ऊर्जामंत्री ने बताया कि नहटोर, मांट, बांदा, आगरा दक्षिण, अटौर, इंदिरापुरम और डासना में 2210 करोड़ रुपये की लागत से 400 केवी के नए उपकेंद्र शुरू किए गए।

सेहत 

चुनावी वादा था कि राज्य में 25 सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल और 6 एम्स बनाएंगे। योगी सरकार ने बजट में सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल और एम्स के लिए पहले चरण में 4323.89 करोड़ रुपए रखे गए हैं।लेकिन यह भी सच है कि अभी तक किसी भी सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल या एम्स के लिए जमीन तक तय नहीं हुई है। गोरखपुर एम्स का शिलान्यास अखिलेश सरकार में किया गया था। डेढ़ साल बीत गया, लेकिन इसका भी निर्माण शुरू नहीं हो पाया है। स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह का कहना है कि यूपी में स्वास्थ्य की समस्या बहुत ही जटिल थी। पिछली सरकारों ने स्वास्थ्य के बजट में घोटाले किए। एक साल में हमने बेहतर इंतजाम किए। इस मुद्दे परप्रदेश के पूर्व स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन ने कहा कि सरकार काम करने की बजाए अस्पतालों का भगवाकरण करवा रही है। बीआरडी कॉलेज गोरखपुर की घटना सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है।

गड्ढा मुक्त सड़कें

सरकार ने ऐलान किया था कि प्रदेश में सभी सड़कें 15 जून 2017 तक गड्ढा मुक्त होंगी। इसके लिए सरकार ने अलग-अलग विभागों को जिम्मेदारी सौंपी। कुल 1 लाख 21 हजार 816 किलोमीटर सड़क गड्ढा मुक्त की जानी थी। लेकिन वास्तविकता है कि सिर्फ 61 हजार 433 किलोमीटर यानी सिर्फ 50% सड़कें ही गड्ढा मुक्त हो पाई। इस महकमे के मंत्री और डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य का कहना है कि सड़कों को गड्डा मुक्त करने के लिए हम लगातार काम कर रहे हैं। विभाग के पास उचित बजट नहीं था फिर भी हमने अन्य विभागों के सहयोग से लक्ष्य को पूरा किया है।

कुछ बड़े कदम भी उठे 

सरकार के पक्षकारो का दावा है कि एक साल के कार्यकाल में योगी आदित्यनाथ सरकार ने गवर्नेंस में पारदर्शिता और जवाबदेही की ओर कदम बढ़ाया है। सरकार कह रही है कि ई-ऑफिस, ई-टेंडर, ई-लॉटरी की पहल की से काफी गति मिली है। यह अलग बात है कि इसके बाद भी आबकारी सहित कई बिभागो में सरकार फ़ैल ही रही है। सरकार का दावा है कि गवर्नमेंट ई-मार्केट (जीईएम) से सामानों की खरीद और राशन वितरण में ई-पॉस मशीनों जैसे संस्थागत सुधारों की ओर कदम बढ़ाएगए हैं । ऑनलाइन निवेश-मित्र पोर्टल शुरू किया है। कई विभागों ने भ्रष्टाचार रोकने में सफलता पाई है तो कई में करोड़ों रुपये बचाए हैं। लेकिन यह भी हकीकत है कि सरकारी विभागों में बायोमीट्रिक हाजिरी जैसे कई प्रयोग विभागीय अफसरों की सुस्ती की वजह से आगे नहीं बढ़ पाए हैं। तय समय सीमा में फाइलों के निस्तारण की पहल ‘ई-ऑफिस’ को लेकर भी सुस्ती नजर आने लगी है। हालांकि ‘गवर्नमेंट ई-मार्केट’ प्लेटफॉर्म भी सरकार की अच्छी बचत कराने वाला माध्यम बना है। सरकार को आने वाले दिनों में इन पहल के और विस्तार व प्रभावशाली बनाने की जरूरत है।

22 विभागों में ‘ई-ऑफिस’ 

सचिवालय में समय से फाइलों के निस्तारण के लिए मुख्यमंत्री योगी ने ई-ऑफिस सिस्टम लागू करने का एलान किया था। 22 विभागों में यह व्यवस्था लागू हो चुकी है। सभी जिलों व मंडलों में ई-ऑफिस लागू करने के लिए 30 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है।

माई-गवर्नमेंट

योगी सरकार की कोशिश है कि लोग केंद्र सरकार के माई-गवर्नमेंट प्लेटफॉर्म का उपयोग अधिकाधिक करें। इस पर लोग सरकार से सीधे जुड़ सकेंगे। सरकार तक अपने विचार साझा कर सकेंगे। इस पहल पर काम शुरू होना बाकी है।

निवेश मित्र पोर्टल

निवेशकों की सहूलियत के लिए ऑनलाइन आवेदन, रजिस्ट्रेशन, अनुमति, अनापत्ति और क्लीयरेंस की सुविधा के लिए निवेश मित्र पोर्टल शुरू किया गया है। इस पोर्टल पर निवेशक के हर काम तय समयसीमा में निस्तारित होंगे। निवेशकों को विभागों के चक्कर नहीं लगाने पड़ेंगे।

कानून व्यवस्था 

योगी आदित्यनाथ ने जिस दिन प्रदेश की सत्ता संभाली, उन्हें भरोसा था कि सपा सरकार की कानून-व्यवस्था को मुद्दा बनाकर आई यह सरकार पलक झपकते ही सब ठीक कर देगी। कानून-व्यवस्था में सुधार के लिए सरकार ने एनकाउंटर समेत कई कदम उठाए , लेकिन चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है। एक साल में कानून व्यवस्था को लेकर लोगों का नजरिया बदला है लेकिन कई घटनाओं ने पुलिस महकमे की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं।

ताबड़तोड़ एनकाउंटर 

ताबड़तोड़ एनकाउंटर से अपराधियों में ऐसा खौफ पैदा हुआ कि कई बदमाशों ने अदालतों में सरेंडर कर दिया तो कुछ ट्रैक बदलकर मुख्यधारा में वापस लौट आए। हालांकि कुछ जिलों में फर्जी एनकाउंटर के आरोपों से पुलिस खुद को दूर नहीं रख सकी। नोएडा पुलिस पर सुमित गुर्जर के फर्जी एनकाउंटर को लेकर धरना-प्रदर्शन और पंचायतें तक हुईं। एक जिम संचालक को दरोगा के गोली मारने पर नोएडा पुलिस की फिर फजीहत हुई। मेरठ में पति की हत्या के गवाह मां-बेटे को गोलियों से छलने जैसी कई घटनाओं ने पुलिस के इकबाल पर सवाल खड़े किए।

बदमाशों से निपटने की खुली छूट

कानून-व्यवस्था में सुधार के लिए कई कदम उठाए गए। जोन और रेंज में वरिष्ठ अफसरों को तैनात करने की कवायद को भी इसी नजरिये से देखा गया। पुलिस को बदमाशों से निपटने की खुली छूट दी गई। एक साल में प्रदेश में पुलिस और अपराधियों के बीच 1339 मुठभेड़ हुईं, जिनमें 3140 बदमाशों को पकड़ा गया। 188 के खिलाफ रासुका के तहत कार्रवाई की गई और गैंगस्टर एक्ट के तहत 175 अपराधियों की 147 करोड़ रुपये मूल्य की संपत्ति जब्त की गई।

कहाँ चूक गए 

सवाल यह उठ रहा है कि चूक कहां हो रही है? क्या सरकारी मशीनरी योगी सरकार के मंसूबों पर पानी नहीं फेर रही है? योगी की बार−बार की डांट−डपट के बाद भी नौकरशाही के कानों पर जूं क्यों नहीं रेंग रही है ? चर्चा यह भी है कि ब्यूरोक्रेसी के दिलो−दिमाग में यह बात घर कर गई है कि यूपी की सरकार पीएमओ से चल रही है ? सरकार के गठन के समय प्रमुख और मुख्य सचिव से लेकर पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति तक में जिस तरह की फजीहत सरकार की हो चुकी है, उससे ब्यूरोक्रेसी के बीच यही सन्देश गया है कि यूपी में सभी प्रमुख पदों पर नौकरशाही की नियुक्ति में योगी नहीं, केन्द्र की मोदी सरकार की चल रही है।केंद्र ही उत्तरप्रदेश में महत्वपूर्ण पदों पर अपने हिसाब से अपनी पसंद के अधिकारियों का बैठा रहा है, ताकि केन्द्रीय योजनाओं को पीएम की इच्छा के अनुरूप लागू किया जा सके। 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए ऐसा आवश्यक भी बताया जा रहा है।

शुरू से ही ढीलापन 

सीएम योगी ने कुर्सी संभालते ही अपनी पसंद का प्रमुख सचिव बनाने के लिये आईएएस अधिकारी अवनीश अवस्थी को दिल्ली से बुलाया था, लेकिन उनकी चली नहीं और एसपी गोयल को दिल्ली ने प्रमुख सचिव के रूप में नामित कर दिया। अवनीश को प्रमुख सचिव सूचना के पद पर संतोष करना पड़ा। इसी तरह दिल्ली से भेजे गये आईएएस राजीव कुमार को मुख्य सचिव बनाना पड़ा था। बात यही नहीं रूकी। 1983 बैच के आईपीएस अधिकारी ओ0पी0सिंह की डीजीपी पद पर नियुक्ति औरकई दिनों तक उनके कार्यभार नहीं ग्रहण करने के कारण योगी सरकार पर सवाल उठे । विपक्ष ने भी इससे मुद्दा बना दिया। असल में ओ0पी0 सिंह का बैक ग्रांउड उनके लिये परेशानी का सबब बन गया । बात जून 1995 की है। तब प्रदेश में सपा−बसपा गठबंधन की संयुक्त सरकार थी। मुलायम सिंह सीएम थे। मुलायम सरकार को सत्ता संभाले डेढ़ वर्ष से अधिक का समय बीत चुका था। इस दौरान सपा−बसपा के बीच तमाम मुद्दों पर दूरियां काफी बढ़ गई थीं। बसपा बार−बार समर्थन वापसी की धमकी दे रही थी। इसी बीच जब बसपा सुप्रीमों मायावती ने मुलायम सरकार से समर्थन वापस लिया तो सपा के दबंगों ने बसपा सुप्रीमो मायावती को लखनऊ के स्टेट गेस्ट हाउस में बंधक बना लिया। कहा यह गया कि सपा नेताओं ने मायावती के साथ काफी अभद्रता की। वह उन्हें जान तक से मार देना चाहते थे। तब केन्द्र सरकार के हस्तक्षेप से मामला ठंडा पड़ा। बीजेपी ने मायावती को पूरा समर्थन दिया। वह सीएम बन गईं। उस समय ओ0पी0 सिंह लखनऊ के एसएसपी थे। माया के सीएम बनने के बाद ओपी सिंह को निलंबन का सामाना करना पड़ा। अब 22 वर्ष बाद ओपी सिंह को सूबे का हाकिम बन चुके है।आने वाले दिनों में यह भी बड़ा मुद्दा अवश्य बन सकता है। क्योकि मायावती इसे दलित स्वाभिमान से जोड़ कर सियासी रोटियां सेंकने का मौका छोड़ेंगी नहीं। वैसे भी सहारनपुर में दलितों के साथ घटी घटना के बाद बीजेपी दलितों के मामले में बैकफुट पर है।

नौकरशाही पर दुविधा

सिक्के का दूसरा पहलू यह भी है कि सीएम योगी स्वयं नौकरशाही का कैसे बखूबी इस्तेमाल किया जाये इसको लेकर भी तमाम मौकों पर दुविधा में नजर आते हैं। यह दुविधा सरकार के गठन के समय से शुरू हुई थी और अब तक जारी है। बात पिछले वर्ष हुए विधान सभा चुनाव प्रचार के समय की है। तब तत्कालीन मुख्य सचिव राहुल भटनागर और डीजीपी रिजवान अहमद के खिलाफ बीजेपी नेताओं−कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग तक से शिकायत की थी कि दोनों अधिकारी सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के एजेंट के रूप में काम कर कर रहे हैं। बीजेपी के पक्ष में नतीजे आते ही इस संभावना को बल मिलना शुरू हो गया कि सीएम योगी सबसे पहले मुख्य सचिव राहुल भटनागर और डीजीपी रिजवान अहमद की छुट्टी करेंगे, लेकिन ऐसा करने की बजाये योगी ने घोषणा कर दी कि नौकरशाही गलत नहीं होती है, इसको चलाने वाले गलत होते हैं, हम इसी नौकरशाही से काम लेकर दिखायेंगे। इसके साथ ही योगी ने यह फरमान भी सुना दिया कि अधिकारी बीजेपी नेताओं और कार्यकर्ताओं के दबाव में न आयें। इसका नतीजा यह हुआ कि बीजेपी वालों की इन सहित तमाम अधिकारियों ने सुनना बंद कर दिया। योगी के इस एक फरमान से बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का मनोबल टूट गया। यह मामला बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के समाने भी पहुंचा था। इस पर शाह ने सभी मंत्रियों को आदेश दिया था कि वह पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से मिलने का समय निकालें, ताकि जनता की समस्याओं का निराकरण हो सके। योगी के ब्यूरोक्रेसी में बदलाव नहीं करने वाले फैसले से संगठन में यह संदेश गया कि सरकार को कार्यकार्ताओं की भावनाओं की कद्र नहीं है। भ्रष्टाचार से निपटने को लेकर योगी सरकार सख्त नहीं है। दरअसल, यह धारणा मुख्य सचिव राहुल भटनागर को नहीं हटाये जाने के कारण बनी थी। तत्कालीन मुख्य सचिव राहुल भटनागर कभी अपनों के बीच 'शूगर डैडी' के नाम से मशहूर हुआ करते थे, उनके चीनी मिल मालिकों से बहुत अच्छे संबंध थे, इसलिये उनकी छवि पर भी उंगली उठती थी। राहुल भटनागर को करीब तीन माह के बाद काफी फजीहत उठाने के बाद योगी ने चलता किया और भटनागर की जगह पीएमओ की पसंद के राजीव कुमार को मुख्य सचिव की कुर्सी सौंपी गई।

नौकरशाहों ने खूब किरकिरी कराई 

योगी सरकार के इस एक वर्ष के शासनकाल में नौकशाहों की लापरवाही के कारण उनकी सरकार की किरकिरी की लम्बी चौड़ी लिस्ट तैयार की जा सकती है। विधान सभा में मिले सफेद पाउडर को खतरनाक पीटीईएन पाउडर बताना, किसानों का लोन माफ करने में की गई लापरवाही का प्रकरण अथवा सरकारी अस्पतालों में बच्चों की मौत के मामलों, गोरखपुर महोत्सव सहित अन्य कुछ घटनाओं के कारण योगी सरकार की फजीहत को भुलाया नहीं जा सकता है। बात विधान सभा में मिले सफेद पाउडर की कि जाये तो यह एक ऐसा मौका था, जब सीएम योगी ब्यूरोक्रेसी को कड़ा संदेश दे सकते थे। ब्यूरोक्रेसी की लापरवाही के कारण ही सीएम योगी ने सदन में बयान दे दिया था कि यह एक आतंकी घटना हो सकती है। जितना पीटीईएन पाउडर मिला है, उससे पूरी विधान सभा उड़ाई जा सकती थी। इसके बाद आनन−फानन में पूर्व विधान सभा सदस्यों सहित तमाम लोगों के प्रवेश पत्र निरस्त कर दिये गये। बाद में पता चला कि विधान सभा हाल में मिला पाउडर पीटीईएन नहीं, लकड़ी के फर्नीचर और खिड़की−दरवाजों पर पॉलिश करने के काम आने वाला साधारण पाउडर था। इतनी बड़ी चूक हो गई, मगर किसी बड़े अधिकारी के ऊपर आंच नहीं आई।

गुमराह होते रहे मुख्यमंत्री 

नौकरशाह मनमानी ही नहीं करती है। मुख्यमंत्री को गुमराह करने का भी कोई मौका नहीं छोड़ती हैं। इसका एक उदाहरण कुछ माह पूर्व वाणिज्य विभाग बना था। मुख्यमंत्री योगी के अधीन आने वाले वाणिज्य कर विभाग में एक हजार वैट अधिकारियों के स्थानान्तरण व तैनाती को लेकर खींचतान चल रही थी, लम्बे मंथन के बाद विभाग के 84 ज्वाइंट कमिश्नरों की सूची गोपनीय ढंग से जारी की गयी, कई अधिकारियों के लिए पद भी खाली छोड़े गए, लेकिन शासन में बैठे अधिकारियों ने सीएम को जो जानकारी दी वह हकीकत से कोसों दूर थी। सीएम को बताया गया कि अगर विभाग में अधिकारियों की तैनाती में फेरबदल किये गए तो इसका प्रभाव जीएसटी के अनुपालन पर पड़ेगा और ये फेल हो सकती है। 

पंचमतल की सुस्त रफ़्तार 

योगी सरकार में पंचम तल और जिलों में तैनात नौकरशाह/अधिकारियों की लापरवाही के चलते सरकारीं फाइलों की रफ्तार सुस्त है तो मोदी की महत्वाकांक्षी किसानों का ऋण माफी योजना में भी नौकरशाही के कारण सरकार को फजीहत उठानी पड़ी।पंचमतल की एक और कमी है कि वहाँ तंत्र पर नजर रखने वाला कोई राजनीतिक समझ वाला नौकरशाह भी नहीं है जो सरकार के कदमो की जमीनी हकीकत से रूबरू करा सके। योगी का गौ−माता प्रेम जगजाहिर है। योगी जी जानते हैं कि पॉलिथीन के बैग्स सबसे अधिक गौ−माता को नुकसान पहुंचाते हैं, इसको लेकर निचली से ऊपरी कोर्ट तक के तमाम आदेश आ चुके हैं, मगर पॉलिथीन आज तक बंद नहीं हो पाई है। इससे बाजार पटा पड़ा है तो नालियां और नाले चोक हो रहे हैं। योगी ने पदभार ग्रहण करते ही प्रदेश की सड़कों को गड्ढा मुक्त करने का बीड़ा उठाया था। वह आज तक नहीं हो सका।अतिक्रमण और जाम से भी जनता को छुटकारा नहीं मिल पाया है। अवैध निर्माण और नजूल की जमीन पर कब्जा दिन पर दिन पैर पसारता जा रहा है। 

संजय तिवारी
संस्थापक - भारत संस्कृति न्यास नयी दिल्ली
वरिष्ठ पत्रकार 

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क्रांतिदूत: एक साल : साख बेहाल - संजय तिवारी
एक साल : साख बेहाल - संजय तिवारी
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