क्या भारतीय राजनीति में संभव है बराक ओबामा जैसा मुस्लिम नेता उत्पन्न होना ? - तुफैल अहमद

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भारतीय राजनीति में मुसलमानों की स्थिति को लेकर पिछले दिनों तीन लेख प्रकाशित हुए । पहला लेख श्री हर्ष मंदर का, फिर उसकी प्रतिक्रिया म...



भारतीय राजनीति में मुसलमानों की स्थिति को लेकर पिछले दिनों तीन लेख प्रकाशित हुए । पहला लेख श्री हर्ष मंदर का, फिर उसकी प्रतिक्रिया में दूसरा लेख श्री रामचंद्र गुहा का और अंत में इन दोनों की प्रतिक्रिया में श्री तुफैल अहमद का | 

तो शुरूआत मंदर से करते हैं, जिन्होंने कांग्रेस की आलोचना इस आधार पर की, क्योंकि उसने हाल ही के गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान अपने चुनाव अभियान में मुसलमानों से परहेज किया । 

मंदर ने कांग्रेस पार्टी के एक दलित नेता को उद्धृत किया है, जिसने मुसलमानों को निर्देशित किया कि "आप हमारी रैलियों में बड़ी संख्या में आते हो, यह तो अच्छी बात है, किन्तु कृपया अपनी जालीदार टोपी और बुर्का पहिनकर मत आया करो ।" 

गुहा ने हर्षमंदर की इस आलोचना को उदारवाद की आलोचना माना | उनका मानना था कि बुर्का और जालीदार टोपी के पीछे जो धार्मिक कट्टरता दिखाई देती है, उससे बचने की कोशिश एक उदारवादी प्रयास है । 

स्पष्ट ही दोनों लेखों में यह चिंता साफ़ झलक रही है कि क्या कांग्रेस जैसे धर्मनिरपेक्ष राजनीतिक दल भी अब भारतीय राजनीति में मुसलमानों को किनारे करने जा रहे हैं ? क्या वे भी भारतीय जनता पार्टी का अनुशरण करेंगे ? मुख्य बात यह है कि क्या मुसलमानों में से लन्दन के मुस्लिम मेयर सादिक खान जैसा नेता नहीं निकल सकता ? और साथ ही यह भी कि क्या भारतीय राजनीति सादिक और बराक ओबामा जैसे नेताओं को झेल पायेगी, मान्यता दे पायेगी ? 

अंग्रेजों के खिलाफ 1857 का संग्राम मुसलमानों और हिंदुओं ने एकजुट होकर लड़ा था | उसके बाद तार्किक कदम तो यह होना चाहिए था, कि दोनों समुदाय शान्ति और भाईचारे से साथ साथ रहते | लेकिन मुगलिया सल्तनत खोने के भय से मुस्लिम नेतृत्व ने खिलाफत आंदोलन का मार्ग चुना, और पाकिस्तान के पक्ष में, स्वतंत्रता संग्राम की भावना को त्याग दिया। आजादी के बाद, हिंदू नेतृत्व ने भी मुसलमानों को अल्पसंख्यक मानकर उनके साथ बैसा ही व्यवहार करने का निर्णय लिया – मानो उन्हें सहायता की आवश्यकता हो | राजनीतिक दलों ने अपने अपने अल्पसंख्यक विंग बनाए और उन्हें समान नागरिक के रूप में स्वीकार करने के बजाय, प्रथक और विशेष माना । इसके बाद समरस होने के बजाय किनारे होना स्वाभाविक था | 

मुक्केबाजी की इस राजनीति के परिणाम स्वरुप मुस्लिमों के मनोमस्तिष्क में अलगाव बढ़ता गया, जिसे दंगों और कोटा की राजनीति तथा इस्लामी धर्मगुरुओं द्वारा और अधिक परवान चढ़ाया गया । हिन्दू चाहे धर्मनिरपेक्ष हों, अथवा हिंदुत्वनिष्ठ, दोनों ने मुसलमानों को मुख्यधारा से अलग थलग कर दिया | मध्यवर्गीय मुस्लिम नेतृत्व पहले ही पाकिस्तान जा चुका था, उस शून्य को इस्लामिक मौलवियों ने भरा । जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से लेकर वर्तमान में सोनिया गांधी, अरविंद केजरीवाल और अखिलेश यादव तक, सभी धर्मनिरपेक्ष नेताओं ने इन इस्लामिक मौलवियों को महत्व दिया, और इस प्रकार अपने समाजवादी दृष्टिकोण के विपरीत, मुसलमानों पर इन धर्म गुरुओं के प्रभाव को मजबूत किया है। 

1970 के दशक में आई अरब देशों में तेल की तेजी ने मुसलमानों पर दो प्रभाव डाले: इस्लामी मौलवियों ने सउदी अरब से अकूत धन इकट्ठा किया और रूढ़िवादी वहाबी इस्लाम को बढ़ावा दिया; और साथ ही पश्चिम एशिया से लौटने वाले मुस्लिम श्रमिक भारतीय इस्लाम को अपर्याप्त समझने लगे । 

नजीया एरम ने अपनी पुस्तक 'मदरिंग अ मुस्लिम' में एक भारतीय मुस्लिम को उद्धृत करते हुए लिखा है: "सऊदी अरब से लौटने वाले मुसलमान जब हमसे इस्लाम के विषय में बात करते हैं, ति ऐसा लगता है, जैसे वे गैर-मुसलमानों को शिक्षित कर रहे हों!" 

इस प्रक्रिया ने बुर्का को बढ़ावा दिया, जो कुछ दशक पहले तक कुछ गिनी चुनी जगह दिखाई देती थी, आज अधिकाँश भारतीय शहरों में बहुतायत से प्रचलन में है | 

गुहा के अनुसार बुर्का कोई हथियार नहीं बन सकता, किन्तु प्रतीकात्मक रूप से यह त्रिशूल के समान है। यह आस्था के सबसे प्रतिक्रियावादी और अनन्त प्रभावों का प्रतिनिधित्व करता है। कभी-कभी कपड़े केवल कपडे नहीं होते, बल्कि विचार बन जाते हैं । 

उदाहरण के लिए, अगर शोभा डे बुर्का पहनें, तो वह उनकी पसंद होगी | लेकिन, अधिकाँश मुस्लिम महिलाओं के लिए बुर्का एक विवशता है, वे मन मारकर पहनती हैं । मुसलमान महिलाओं के लिए बुरखा से विचार जुडा है | गुहा का यह कथन सत्य है कि उदारवादी लेखकों को मुस्लिम रूढ़िवादियों से यह सवाल करना चाहिए। 

एक तरफ गुहा मुस्लिम रूढ़िवाद को चुनौती देने में उदार लेखकों की विफलता को उजागर कर रहे हैं, तो दूसरी ओर मंदर का विश्लेषण अपनी जगह बरकरार है। मंदर प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नए भारत में हिंदू-मुस्लिम मुद्दे के केवल एक पहलू को देख रहे हैं। वे उस समय सही प्रतीत होते हैं, जब वे लिखते हैं कि मुसलमान आज एक जाति बन चुके हैं और उन्हें लगता है कि वे "राजनीतिक रूप से अस्पृश्य" हैं; या बड़े दलों ने उन्हें "निषिद्ध" मान लिया है । मुस्लिमों को समाज की मुख्य धारा से बाहर किये जाने में बीजेपी और आरएसएस के सहयोगी विभिन्न सांप्रदायिक समूहों की हिंदुत्व राजनीति प्रमुख कारण है। 

इस लेखक ने सोशल मीडिया पर हाल ही में दो वीडियो देखे। एक में, हिंदू युवकों का एक समूह एक बुजुर्ग मुस्लिम को रोकता है और उसे जय श्री राम चिल्लाने को मजबूर करता है। दूसरे में, हिंदू युवाओं ने एक बस को रोककर उसमें से एक बुजुर्ग मुस्लिम व्यक्ति को निकाला और पूछा कि बस पर पाकिस्तानी झंडा क्यों लगा है। वह कहता है कि उसे इसके बारे में पता नहीं है। बुजुर्ग आदमी के साथ गाली गलौज कर दुर्व्यवहार किया जाता है तथा उसे पाकिस्तान विरोधी नारे लगाने का आदेश दिया जाता है | दोनों वीडियो में, इन मुसलमानों की पहचान उनके टोपी और दाढ़ी द्वारा की जाती है। 

सीबीएसई ने इस बार परीक्षार्थी को अपनी उत्तर पुस्तिकाओं में अपना नाम भी लिखना जरूरी किया है, इससे मुस्लिम बच्चों के मन में डर पैदा हो गया है कि कहीं उनके नामों की वजह से, उनके अंक कम ना हो जाएँ । भाजपा हिंदुत्व का उपयोग कर रही है ताकि भारतीयों को मुसलमानों और हिंदुओं के बीच विभाजित कर सकें | इसी प्रकार बहुत से धर्मनिरपेक्ष दलों ने भी भारतीयों को विभाजित करने के लिए जाति और धर्मनिरपेक्षता के विकृत स्वरुप का इस्तेमाल किया है | भाजपा का कहना है कि उसका “सबका साथ सबका विकास” में भरोसा है | लेकिन यह हाथी के दांत की तरह है, खाने के लिए अलग और दूसरे को दिखाने के लिए अलग । आजादी के बाद भाजपा पहली सत्तारूढ़ पार्टी है, जिसके लोकसभा में एक भी मुस्लिम सांसद नहीं है । मंदर ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया है कि भाजपा के पास गुजरात, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड में एक भी मुस्लिम विधायक नहीं है। 

लेकिन सवाल उठता है कि हिंदुत्व की यह लहर उठी कैसे ? शाह बानो का मामला, इमाम बुखारी से लेकर तौकीर रजा खान जैसे मौलवियों को बढ़ावा, सैटैलिक वर्सेज पर प्रतिबंध – क्या ये वे कारण नहीं हैं, जिन्होंने हिंदुत्व के इस तूफ़ान को जन्म दिया। 

लिबरल लेखकों को यह समझना चाहिए कि संविधान ने उचित स्कूलों में छह से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए "अनिवार्य" शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था की है - मदरसे, गुरुकुल या हिंदू स्कूलों में नहीं। ऐसे धार्मिक विद्यालयों को गैर-विद्यालयों के रूप में वर्गीकृत किया जाना चाहिए। वर्तमान में, कुरान और मदरसे राज्य की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और स्कूल के घंटों में कमी कर रहे हैं । यह नहीं भूलना चाहिए कि मदरसे कोई स्वतंत्रता संग्राम नहीं कर रहे हैं। 

संविधान के अनुच्छेद 45 में कहा गया है: "राज्य छह साल की उम्र के सभी बच्चों के बचपन की देखभाल और शिक्षा प्रदान करने का प्रयास करेगा । यह आयु सीमा 18 वर्ष की जाना चाहिए | यह देखते हुए कि इतनी बड़ी संख्या में भारतीय गरीबी में और बेहतर भोजन के अभाव में जीते हैं, बच्चों को पढ़ाने की जिम्मेदारी भारतीय राज्य की ही होना चाहिए। इन संवैधानिक प्रावधानों को लागू करना और बच्चों को उनकी प्रारम्भिक आयु में धर्मोन्माद से बचाना जरूरी है । 

ऐसी स्थिति में जब तीन साल की अबोध लड़कियों को भी बुर्का पहनने के लिए मजबूर किया जाता हो, यह सोचना भी हास्यास्पद प्रतीत होता है कि मुस्लिम समुदाय या भारतीय राजनीति में सादिक और ओबामा जैसे नेता बन सकेंगे । ब्रिटिश और अमेरिकी राजनीति उच्च स्तरीय शिक्षा के कारण बेहतर विकसित हुई है। उदार वादियों को हिंदू और मुस्लिम दोनों सांप्रदायिक चरमपंथियों को आईना दिखाने का साहस अपने अंदर पैदा करना चाहिए। 

The author is senior fellow for Islamism and counter-radicalisation initiative at the Middle East Media Research Institute, Washington DC.
साभार आधार - http://www.firstpost.com/india/nature-of-indian-polity-and-lack-of-education-means-india-will-not-groom-muslim-leaders-like-the-uks-sadiq-khan-4399241.html

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क्रांतिदूत: क्या भारतीय राजनीति में संभव है बराक ओबामा जैसा मुस्लिम नेता उत्पन्न होना ? - तुफैल अहमद
क्या भारतीय राजनीति में संभव है बराक ओबामा जैसा मुस्लिम नेता उत्पन्न होना ? - तुफैल अहमद
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