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आज एक मित्र ने त्रिपुरा कम्यूनिस्ट पार्टी के ऑफिस का चित्र भेजा, जिसके प्रवेश द्वार पर दुनिया भर के कम्यूनिस्ट नेताओं के चित्र लगे ह...



आज एक मित्र ने त्रिपुरा कम्यूनिस्ट पार्टी के ऑफिस का चित्र भेजा, जिसके प्रवेश द्वार पर दुनिया भर के कम्यूनिस्ट नेताओं के चित्र लगे हैं, किन्तु एक भी भारतीय का चित्र उनमें सम्मिलित नहीं हैं | शायद यही कारण है कि कम्यूनिस्ट पार्टियों का आधार समाप्त होता जा रहा है और अब वह केवल केरल में ही शेष रही है, वह भी महज साम्प्रदायिक आधार पर, क्योंकि केरल अल्पसंख्यक बहुल राज्य घोषित भले न हो, किन्तु बन तो चुका ही है | ईसाई और मुस्लिम मिलकर वहां हिन्दुओं से अधिक हो चुके हैं या होने वाले हैं | 

स्थिति को भांपने में कम्यूनिस्ट कुशल होते हैं, अतः उन्होंने बदली हुई रणनीति के तहत अपने कार्ड होल्डर केडर को भारत के अन्य राजनैतिक दलों में पहुंचाना प्रारम्भ कर दिया है | कोई भी प्रबुद्ध भारतीय अन्य राजनैतिक दलों में पहुंचे इन कम्यूनिस्टों को पहचान सकता है | 

खैर फिलहाल तो कम्यूनिस्टों की ही चर्चा करते हैं | कुछ तथ्यों पर गौर कीजिए – 

1920 में पूर्व सोवियत संघ के ताशकंद शहर में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का गठन किया गया ! 

आजादी के समय कम्युनिस्ट पार्टी ने प्रथक पाकिस्तान की मांग का समर्थन किया ! 

ज्योति बासू ने गुप्त रूप से ए के फजुल हक के साथ बैठकें कीं, जो बंगाल प्रांत मुस्लिम लीग के सदस्य और प्रमुख थे ! 

जिस समय भारत का संविधान बनाया जा रहा था, ज्योति बसु ने बाबासाहेब अंबेडकर से कहा कि एक संविधान बनाने स्थान पर 22 संविधान बनाये जाना चाहिए, क्योंकि भारत कभी ऐतिहासिक रूप से एक रहा ही नहीं है, यह बाईस देशों से मिलकर बना हुआ एक संयुक्त देश है। 

आजादी के बाद भारत की कम्युनिस्ट पार्टीयों का मानना था कि यह एक झूठी स्वतंत्रता है, जो कि अंग्रेजों का दिखावा मात्र है ! पढ़िए कम्युनिस्ट पार्टी की दूसरी कांग्रेस के बाद जारी घोषणापत्र – 

"हम एक सुधारवादी रास्ता अख्तियार कर रहे हैं और बुर्जुआ हितों के खिलाफ काम करने को प्रतिबद्ध हैं | चूंकि आजादी के मुद्दे पर हम स्वतंत्र रुख नहीं ले सके, परिणामस्वरूप, कांग्रेस और मुस्लिम लीग की प्रतिक्रियावादी ताकतों ने अपने अपवित्र गठबंधन के माध्यम से यह तथाकथित स्वतंत्रता प्राप्त की है । यह वास्तविक आजादी नहीं है, यह झूठी आजादी है, युद्ध के बाद की स्थिति की उपज है, अतः क्रांति के लिए अभी भी आधार है | यही कारण है कि बुर्जुआ के खिलाफ हमारा संघर्ष जारी रखना चाहिए। स्वतंत्रता की इस झूठी भावना को चुनौती देने के लिए हमें हड़तालों, सामूहिक रैलियों, प्रदर्शनों और सशस्त्र संघर्ष को जारी रखना चाहिए। " 

यही कारण रहा कि लम्बे समय तक कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपने मुख्यालयों पर तिरंगा नहीं फहराया ! और इन लोगों का दोहरा मापदंड देखिये कि स्वयं 26 जनवरी और 15 अगस्त को तिरंगा नहीं फहराने वाले, राष्ट्रीय ध्वज का सम्मान न करने वाले ये लोग, राष्ट्र के प्रति समर्पण भाव रखने वाले संगठन आरएसएस को फासिस्ट कहते हैं । 

यह तो सर्व विदित तथ्य है ही कि आजादी के बाद बाम पार्टियों ने किस प्रकार मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र के आदिवासी क्षेत्र में माओवादी और नक्सलवादियों का समर्थन किया है । 

यह भी सब जानते हैं कि साम्यवाद एक विदेशी अवधारणा है और इसे मानने वालों के लिए इनकी साम्यवादी विचारधारा प्रमुख है, देश गौण | इतना ही नहीं तो राष्ट्रवाद तो इनके लिए दुश्मन नंबर एक है । इसीलिए साम्यवादी भारत को कई राष्ट्रों का समुच्चय मानते और प्रचारित करते हैं | भारत को एक राष्ट्र के रूप में इन्हें कभी स्वीकार नहीं है, इसीलिए ये लगातार विभाजनकारी मानसिकता का पोषण करते हैं | “भारत तेरे टुकडे होंगे – इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह” इसी विभाजनकारी मानसिकता की उपज है । 

कम्युनिस्ट नेताओं के प्रेरणा स्त्रोत एक भी भारतीय महापुरुष नहीं है - महात्मा गांधी, सुभाष चन्द्र बोस, जय प्रकाश नारायण कोई नहीं । 

भारत की स्वतंत्रता को प्रारम्भ से अस्वीकार करने वाले साम्यवादियों ने 1962 के चीन-भारत युद्ध के दौरान चीन का न केवल साथ दिया, वरन भारत के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह का स्वर उठाया, 1975 में आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप का समर्थन किया, पोखरन -2 की आलोचना की। भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान की साम्यवादी भूमिका तो सभी को अच्छी तरह से ज्ञात है। 

चीन युद्ध के दौरान सीपीआई की भूमिका सर्वाधिक घृणित रही । इनका नारा था - "चेयरमैन माओ, हमारा चेयरमैन" | जहाँ अन्य कम्यूनिस्ट पार्टियां परदे के पीछे से चीन का समर्थन कर रही थी, सीपीआई घोषित रूप से चीन के साथ थी | 

आज भी समय समय पर कम्यूनिस्ट नेता सीताराम यचेरी और डी. राजा जैसे लोग भारत के विभिन्न हिस्सों में अलगाववादी आंदोलन के साथ खड़े दिखाई देते हैं, फिर चाहे वह कश्मीर में जिहाद हो या नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश में विभाजन की हिंसक आग । 

कम्युनिस्ट पार्टीयों ने अपनी विरोधी विचारधारा वाले सामजिक कार्यकर्ताओं की उसी प्रकार निर्मम हत्याएं की हैं, जैसी उनके आराध्य कॉमरेड जोसेफ स्टालिन और निकिता ख्रुश्चेव ने सोवियत संघ में की थीं । अपने हत्यारे नेताओं के सच्चे अनुयाई हैं – भारत के कम्यूनिस्ट ! 

कम्यूनिस्ट पार्टियाँ स्वतः अस्तित्वशून्य तो होती ही जा रही हैं | भारतीय जनमानस ने उन्हें पूरी तरह ठुकरा दिया है | किन्तु अब वे अन्य दलों में घुसपैठ कर अपनी अस्तित्व रक्षा के प्रयत्न कर रहे हैं | 

जरा विचार कीजिए कि ऐसे में देशभक्त नागरिकों का कर्तव्य क्या हो जाता है ? 

अन्य दलों में पहुंचे इन हिन्साचारियों और विभाजनकारियों को पहचान कर उनका पर्दाफ़ाश करना और उन संगठनों को उनसे छुटकारा पाने के लिए विवश करना ! 

चलते चलते जरा देख लें कि त्रिपुरा के उक्त कार्यालय के प्रवेश द्वार पर लगे इन महान नेताओं में से किस किस ने अपने समय में कितने विरोधियो की हत्याएं कीं – 

माओत्से तुंग – 60 मिलियन 

जोसेफ स्टालिन – 40 मिलियन 

पोल पॉट – 1.7 मिलियन 

किम इल सुंग – 1.6 मिलियन 

अब जरा कम्यूनिस्ट देशों में हुई राजनैतिक हत्याओं के आंकड़ों पर गौर करें – 

सोवियत रूस – 20 मिलियन 

चीन – 65 मिलियन 

वियतनाम – 1 मिलियन 

उत्तर कोरिया, कम्बोडिया – 2 मिलियन 

पूर्वी यूरोप – 1 मिलियन 

लेटिन अमरीका, अफ्रीका, अफगानिस्तान – 3.4 मिलियन 

भारत में भी कार्यपद्धति वही है – अपने विरोधियों और असहमति रखने वालों का सफाया | केरल बंगाल त्रिपुरा – हर जगह यही तो हुआ है | पर हैरत की क्या बात है, जो उनके विदेशी आकाओं ने किया, वही तो कर रहे हैं |

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