साम्यवाद, अम्बेडकर और बुद्ध |

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20 नवम्बर 1956 को काठमांडू में संपन्न चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन में, नेपाल नरेश की उपस्थिति में “ बुद्ध और कार्ल मार्क्स ” विषय पर बोलते...

20 नवम्बर 1956 को काठमांडू में संपन्न चौथे विश्व बौद्ध सम्मेलन में, नेपाल नरेश की उपस्थिति में बुद्ध और कार्ल मार्क्स विषय पर बोलते हुए डॉ. अम्बेडकर 

बाबा साहब जब तक जीवित रहे, कांग्रेस और कम्यूनिस्ट सदैव उन्हें नकारते रहे और आज देखिये वे अपना राजनैतिक उल्लू सीधा करने के लिए, उनके नाम का उपयोग सामजिक विद्वेष फैलाने और वर्ग संघर्ष के लिए कर रहे हैं | अम्बेडकर की विरासत के लिए सबसे बड़ा खतरा है, कम्युनिस्टों द्वारा बाबासाहेब की गलत प्रस्तुति । माओवादी और नक्सली, हिंसक वर्ग संघर्ष फ़ैलाने के लिए उनके नाम का उपयोग कर रहे हैं । जिहादी मुस्लिम और अनुसूचित जाति का गठबंधन बनाने का प्रयत्न हो रहा है, जिसे खुद बाबासाहेब ने पूरी तरह से खारिज कर दिया था । डॉ. अम्बेडकर की असली विरासत को बचाने का एकमात्र तरीका है उनके विचारों का अधिकाधिक प्रचार | यही एकमात्र तरीका है, जिसके माध्यम से समाज में भाईचारे की भावना और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित की जा सकती है ।

डॉ अंबेडकर ने बौद्ध धर्म के आधार पर साम्यवाद का बहुत सम्यक विवेचन किया। उन्होंने 'स्वतंत्रता, समता, बंधुता' के महत्वपूर्ण त्रय पर विचार किया और इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि कम्युनिज्म के लिए, इन तीनों में से किसी एक को भी नहीं छोड़ना चाहिये | 

'साम्यवाद' शब्द का मूल है लैटिन शब्द 'कम्यूनिस', जिसका अर्थ है 'समानता लाना या समान रूप से करना' | इस अर्थ में, साम्यवाद 'आदर्शवादी, आत्म-प्रबंधित समुदायों में रहने की स्थिति का नाम है, जहां उत्पादन और उपभोग, सामूहिक रूप से साझा किए जाते हैं' । डॉ अंबेडकर ने रेखांकित किया कि भारत में बुद्ध ने संघ के रूप में ऐसे ही जीवन की आधारशिला रखी थी । 

"तानाशाही पर बुद्ध की कोई आस्था नहीं थी | वे एक डेमोक्रेट के रूप में पैदा हुए और एक डेमोक्रेट के रूप में ही उन्होंने संसार से विदा ली । उनके कालखंड में 14 राजशाही राज्य और 4 गणराज्य थे। वह शाक्य थे और शाक्य राज्य एक गणतंत्र था "- BAWS, Vol. 3, Buddha or Karl Marx, p. 451” 

डॉ अंबेडकर के अनुसार, "बुद्ध ने संघ के रूप में ऐसे साम्यवाद की स्थापना की, जिसमें तानाशाही को कोई स्थान नहीं था। संभव है कि यह बहुत छोटे स्तर का साम्यवाद हो, लेकिन यह तानाशाही विहीन साम्यवाद था, एक ऐसा चमत्कार जो लेनिन भी नहीं कर पाए । " 

बुद्ध का साम्यवाद रूस के साम्यवाद से बेहतर था क्योंकि उसमें भिक्खू की निजी संपत्ति, मात्र आठ छोटी छोटी बस्तुओं तक सीमित थी, उसे स्वर्ण या चांदी का भी कोई मोह नहीं था, और यह सब हुआ, बिना किसी तानाशाही के । 

आधुनिक साम्यवाद 

आधुनिक समय में, 'कम्युनिज्म' शब्द का अर्थ है अधिकतम हिंसा और खूनी क्रांति की राजनीति । 

यह वह विचारधारा है, जो यह मानती है कि पूर्ण सामाजिक समानता और निजी संपत्ति रहित समाज संभव है, आवश्यक और अपरिहार्य भी, और उसे केवल क्रांति द्वारा "सर्वहारा वर्ग की तानाशाही" के माध्यम से निर्मित किया जा सकता है। यही साम्यवाद का वैचारिक आधार है, अब उसे नाम कोई भी दे सकते हैं जैसे कि मार्क्सवाद, मार्क्सवाद-लेनिनवाद या मार्क्सवाद-लेनिनवाद-माओवाद आदि आदि । ये सभी राजनैतिक आन्दोलन हैं, जिनकी प्रकृति ही षड्यंत्र और विद्रोह हैं, यही उनका स्वभाव हैं। 

इस आंदोलन ने अमूमन तानाशाहों और सत्तावादियों को स्थापित किया, जो एक विद्रोह की सफलता के बाद एक राष्ट्र पर काबिज हो गए । इस प्रकार का साम्यवाद सत्ता हस्तांतरण का साधन भर है | लोकतांत्रिक सरकारों के विपरीत, कम्युनिस्ट सरकारें अत्यधिक केंद्रीकृत, जिद्दी, और असहिष्णु होती हैं, जो किसी भी विपक्ष और विरोध को बर्दास्त नहीं करतीं । 

"हम रूसी क्रांति का स्वागत करते हैं क्योंकि इसका उद्देश्य समानता लाना है, परन्तु समानता लाने के लिए बंधुत्व या स्वतंत्रता का बलिदान नहीं किया जा सकता । इन दोनों के बिना समानता का कोई मूल्य नहीं "— BAWS, Vol. 3, Buddha or Karl Marx, p. 462” 

क्या साम्यवाद अपरिहार्य है? 

कार्ल मार्क्स का दावा था कि उनका साम्यवाद और सोसलिज्म अन्यों की तुलना में अधिक "वैज्ञानिक" था। डॉ अंबेडकर ने कहा कि विशिष्टता का मार्क्स का दावा अनिवार्यता से जुड़ा था। कार्ल मार्क्स जिस वैज्ञानिक समाजवाद का उल्लेख करते हैं, वह तात्कालिक परिस्थितियों में अनिवार्य था, क्योंकि समाज स्वतः उस दिशा में आगे बढ़ रहा था ..." 

लेकिन इससे 'कम्युनिज्म की अनिवार्यता' का दावा नहीं किया जा सकता | डॉ. अम्बेडकर ने बताया कि कम्युनिस्ट शासन स्थापित करने के लिए जो क्रांति हुई, उसमें जानबूझकर, योजनाबद्ध ढंग से अत्याधिक हिंसा हुई, रक्तपात हुआ । इससे यह तो स्पष्ट होता ही है कि साम्यवाद 'स्वेच्छा से' नहीं आया था, अपितु उसके लिए आंतरिक और बाहरी ताकतों के माध्यम से बहुत अधिक मानवीय प्रयासों की आवश्यकता हुई थी । 

साम्यवाद का मूल आधार यह विश्वास है कि "इतिहास बनाने वाली शक्तियां मुख्यतः आर्थिक होती हैं" | इस आधार पर, यह कहा गया कि उत्पादन के स्वामित्व का निजीकरण होने से श्रम का शोषण बढ़ता है और स्पष्टतः पूंजीवादी प्रभाव का संकट भी आता है । इससे साम्यवादी क्रांति की ओर बढ़ने वाले एक सर्वहारा वर्ग को व्यवस्थित और विस्तारित करने में मदद मिली, जिसकी परिणति 'मार्च इतिहास’ में देखी गई ।' 

डॉ. अम्बेडकर ने साम्यवाद की इस आर्थिक या भौतिक शक्तियों की धारणा को चुनौती दी । उन्होंने कहा कि मनुष्य केवल आर्थिक मकसद से ही संचालित नहीं होता है। ... किसी व्यक्ति की सामाजिक स्थिति भी अक्सर शक्ति का स्रोत बन जाती है | यह इस बात से स्पष्ट होता है कि अधिकारी भी सामान्य जन पर प्रभाव रखने वाले महात्माओं के सामने झुकते हैं। " 

उन्होंने सवाल उठाया कि "भारत में करोड़पति भी क्यों सदा साधु और फकीर की आज्ञा का पालन करते हैं? भारत में लाखों गरीब भी अपनी अर्जित की हुई तमाम जायदाद बेचकर बनारस और मक्का क्यों जाते हैं? इसका कारण साफ़ है और वह यह कि धर्म शक्ति का स्रोत है, भारत के इतिहास में अनेकों ऎसी घटनाएँ हैं, जहां किसी न्यायाधीश से कहीं अधिक एक संत का आम आदमी पर प्रभाव देखा जाता है | और जहां हर चीज को, यहाँ तक कि हड़तालों और चुनावों को भी बहुत आसानी से धार्मिक मोड़ दिया जा सकता है । " 

सर्वहारा-कंगाल-संपन्न 

मार्क्स ने संपत्ति विहीन सर्वहारा की कल्पना की, जिनका कोई निजी हित नहीं, कोई निजी संपत्ति नहीं, और वे ही पूंजीवादी व्यवस्था में साम्यवाद के प्रणेता या प्राकृतिक नेता हों । पूंजीवादी प्रगति ने संकट को विकराल बनाया, इस असंतोष को व्यवस्थित कर सर्वहारा वर्ग को सामाजिक परिवर्तन और राजनीतिक क्रांति का एक शक्तिशाली वाहक बनाया जा सकता है । 

इसके खिलाफ, डॉ. अम्बेडकर ने तर्क दिया कि "इसे कोई भी स्वीकार नहीं कर सकता कि सर्वहारा सदैव दयनीय ही रहेगा "। इसके अलावा, "सर्वहारा वर्ग एक समान वर्ग नहीं हैं, इसमें भी अलग अलग वर्ग हैं, इनमें भी उच्च और निम्न का भेद है, जोकि सामाजिक परिवर्तन की दिशा में उनके दृष्टिकोण में परिलक्षित होता है, उच्च सुधारवादी हैं और निम्न क्रांतिकारी हैं। "दूसरे शब्दों में, सर्वहारा वर्ग की संख्या में वृद्धि से भी स्वत: असंतोष बढ़ सकता है और एक नया क्रांतिकारी वर्ग पैदा हो सकता है। 

डॉ. अम्बेडकर ने इस कम्युनिस्ट धारणा पर भी सवाल उठाया कि "सर्वहारा अपने लिए कोई लाभ नहीं चाहता" और "सब कुछ दूसरों के साथ साझा करने के लिए तैयार" है। इसे कोरा शाब्दिक आडम्बर बताते हुए उन्होंने कहा कि सर्वहारा की भले ही कोई निजी संपत्ति न हो, किन्तु संपत्ति चेतना हो सकती है | क्योंकि वे साम्यवाद के कोई वंशानुगत या प्राकृतिक वाहन नहीं हैं | 

भारत के सम्बन्ध में डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि यह विचार कि सर्वहारा वर्ग अपने लिए कोई विशेष लाभ या दर्जा नहीं मांगेगा, नितांत झूठ है । 

कम्युनिस्ट एजेंडे के खिलाफ 

डॉ. अम्बेडकर ने साफ़ तौर पर कहा कि अगर संक्षेप में स्पष्ट कहा जाए तो "कम्युनिस्टों द्वारा अपनाये जाने वाले साधन ... और कुछ नहीं सर्वहारा की हिंसा और तानाशाही हैं। " 

इन तरीकों के विरुद्ध डॉ. अम्बेडकर ने एडमंड बर्क का हवाला देते हुए कहा कि बल का केवल अस्थायी प्रभाव होता है क्योंकि यह "एक क्षण के लिए तो प्रभावित कर सकता है,; लेकिन तुरंत ही पुनः इसकी आवश्यकता महसूस हो सकती है ... "। 

इससे भी बुरी बात यह है कि, कम्युनिस्ट तरीके से परिवर्तन मजबूरी में होता है, अतः अनिवार्य रूप से अस्थायी है और अपनी तानाशाही शक्ति के साथ जल्द ही गायब हो जाता है। इसका कारण यह है, साम्यवाद में निजी संपत्ति की जड़ें नष्ट करने का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि वह स्वयं ही लालच और भ्रम से पोषित हैं। इस बिंदु को और स्पष्ट करते हुए डॉ. अम्बेडकर ने बुद्ध के हवाले से कहा, "हे आनंद, जिस प्रकार लाभ की इच्छा के कारण तृष्णा आती है, फिर यह पाने की अदम्य लालसा बन जाती है, और यही कब्जे की भावना लोभ बन जाती है । " 

डॉ. अंबेडकर एक आधुनिकतावादी थे, जो 'स्वतंत्रता, समानता, बंधुता' के सिद्धांतों के लिए प्रतिबद्ध थे, वे विचार जिन्होंने फ्रांसीसी क्रांति को प्रेरित किया था। इस प्रकार, डॉ. अंबेडकर के लिए, साम्यवाद आधुनिकता का एक दोषपूर्ण उत्पाद था क्योंकि इसकी तथाकथित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व की कीमत पर थी । इसकी तानाशाही में उपयोगी केवल समानता का वादा था, परन्तु यह वादा भी तानाशाही के अपरिहार्य पतन के साथ लुप्त होने वाला था, क्योंकि तानाशाही निरंतर नहीं सहन की जा सकती । साम्यवाद अर्थात मिट्टी के पैरों वाला एक विशालकाय प्राणी |

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