आजादी के बाद की सोमनाथ गाथा - जूनागढ़ और सरदार पटेल !

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आजादी के बाद जूनागढ़ रियासत का नबाब महाबत खां चाहता था कि उसकी रियासत का विलय पाकिस्तान के साथ हो | अपने प्रमुख सलाहकार व प्रधान मंत्...



आजादी के बाद जूनागढ़ रियासत का नबाब महाबत खां चाहता था कि उसकी रियासत का विलय पाकिस्तान के साथ हो | अपने प्रमुख सलाहकार व प्रधान मंत्री एस.एन. भुट्टो (बेनजीर भुट्टो के दादा) की सलाह पर उसने पाकिस्तान को यह सूचना भी लिख भेजी कि जूनागढ़ रियासत का विलय पाकिस्तान में किया जाए | प्रत्युत्तर में उसे जिन्ना का वधाई सन्देश भी प्राप्त हो गया | इतना ही नहीं तो 15 अगस्त 1947 को नबाब ने गजट नोटिफिकेशन द्वारा यह घोषणा भी कर दी कि जूनागढ़ अब पाकिस्तान का अंग है | 

किन्तु सरदार पटेल जानते थे कि न केवल राजनैतिक वल्कि धार्मिक द्रष्टि से भी यह कितना गंभीर विषय है | देश की आंतरिक सुरक्षा के मद्देनजर भी यह होने देना अपने हाथों अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने जैसा था | स्थानीय जनता भी जूनागढ़ के भारतीय गणराज्य में विलय की ही पक्षधर थी | 13 सितम्बर को प्रजा मंडल के आव्हान पर एक विशाल आम सभा का वहां आयोजन हुआ, जिसमें लगभग 30 हजार लोग सम्मिलित हुए | अंततः स्थिति यह बनी कि जनता के संभावित विद्रोह से भयभीत नबाब 24 अक्टूबर 1947 को जूनागढ़ छोडकर प्लेन द्वारा पाकिस्तान भाग गया | वह कितना भयभीत था, इस का अंदाज इस बात से लगता है कि वह जल्दबाजी में अपनी नौ बेगमों से दो को जूनागढ़ में ही भूल गया | नवम्बर आते आते भारतीय सेना ने समूचे जूनागढ़ को अपने कब्जे में ले लिया | ब्रेगिडियर गुरुदयाल सिंह ने इस समूचे अभियान का सञ्चालन किया | 

बाद में सरदार पटेल द्वारा जूनागढ़ के भारतीय गणराज्य में विलय के निर्णय को विश्व मान्यता दिलवाने के लिए 20 फरवरी 1948 को जूनागढ़ रियासत में वोट डालकर जनमत संग्रह भी करवाया गया | उस समय के जनता के उल्लास का तो अद्भुत मंजर था | आखिर यह स्वतंत्र भारत का पहला चुनाव जो था | वोट डालने के लिए दो पेटियां रखी गई थीं | भारत के लिए लाल पेटी और पाकिस्तान के लिए हरी पेटी | जैसे ही यह ज्ञात हुआ कि भारत की पेटी लाल है, तो महिलायें लाल साड़ी पहिनकर मतदान के लिए आईं, तो पुरुष भी लाल पगड़ी और लाल कपडे पहिनकर रास्ते भर लाल गुलाल उड़ाते हुए पहुंचे | दुनिया भर के पत्रकार इस चुनाव को कवर करने के लिए जूनागढ़ आये हुए थे | एक लाख नब्बे हजार छः सौ अठासी वोट भारत के साथ विलय के पक्ष में तथा केवल इन्क्यानवे वोट विरोध में पड़े | सोचिये कि अगर जूनागढ़ का विलय पाकिस्तान में हो गया होता, तो क्या सोमनाथ मंदिर का निर्माण संभव हुआ होता ? 

जूनागढ़ राज्य के औपचारिक रूप से भारतीय संघ में शामिल होने के बाद 12 नवंबर 1 9 47 में सरदार पटेल ने जूनागढ़ का दौरा किया। जुनागढ़ के प्रमुख नागरिक जाम साहेब और काकासाहेब गाडगील इस यात्रा के दौरान सरदार के साथ थे। जाम साहेब ने उस समय के जो सरदार पटेल के भाव थे, उन्हें कुछ इस प्रकार वर्णित किया:

हम समुद्र किनारे गए और वहां सरदार ने समुद्र का कुछ पानी अपनी अंजुरी में लिया और मुझसे कहा, 'मेरी महत्वाकांक्षा पूरी हो गई'। उस समय सरदार पूरी तरह निश्चिन्त और प्रफुल्लित दिखाई दे रहे थे ।

फिर हम जूनागढ़ होते हुए वेरावल पहुंचे, जहाँ संवत 2004 के नव वर्ष दिवस कार्तिक शुदी पडवा के दिन सोमनाथ पहुंचकर हमने मंदिर के दर्शन किये । जब सरदार और मैं समुद्र तट पर टहल रहे थे, मैंने सरदार से कहा, 'मुझे लगता है कि भारत सरकार को इस मंदिर का पुनर्निर्माण करवाना चाहिए।' सरदार ने कहा, 'ठीक है, आगे बढ़ो।' तब मंदिर में पहुंचकर लगभग 500 लोगों की उपस्थिति में, मैंने घोषणा की कि: 'भारत सरकार ने इस मंदिर को फिर से बनाने और भगवान शिव को स्थापित करने का फैसला किया है। अब बनाने वाली सरकार आ गई है, नष्ट करने वाली नहीं । अब पुनर्निर्माण का समय आ गया है। '

जाम साहेब ने उसी समय सार्वजनिक रूप से एक लाख रुपए का दान देने की घोषणा करके सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण में पहला योगदान दिया | इसी प्रकार जुनागढ़ प्रशासन ने भी 51,000 रुपये देने की घोषणा की । सरदार पटेल ने अपने सार्वजनिक भाषण में कहा,

नए साल के इस शुभ दिन पर, हमने फैसला किया है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण किया जाना चाहिए। इस कार्य में आप सभी सौराष्ट्र के लोगों को अपना अधिकतम योगदान देना चाहिए। यह एक पवित्र कार्य है जिसमें सभी को सहभागी बनना चाहिए।

इसके बाद आचार्य के एम मुंशी ने जनवरी 1 9 48 में सोमनाथ का दौरा किया और मंदिर की स्थिति का अवलोकन किया |

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने एक संपूर्ण सर्वेक्षण / उत्खनन कार्य किया और मंदिर संरचनाओं की विभिन्न परतों की पहचान की। उत्खनन में विभिन्न मूर्तियां, नृत्य प्रदर्शन, शिलालेख और शिव लिंग की नक्काशीदार जलहरी आदि मिलीं।

तथाकथित सिक्यूलर उस जमाने में भी पैदा हो चुके थे, अतः कुछ स्वर उठे कि ध्वस्त मंदिर के अवशेषों को पुनर्निर्माण के स्थान पर एक प्राचीन स्मारक के रूप में संरक्षित कर दिया जाना चाहिए । ऐसे लोगों से सरदार पटेल ने दो टूक कहा कि -

इस मंदिर के संबंध में हिंदू भावना मजबूत भी है और व्यापक । वर्तमान परिस्थितियों में, यह असंभव है कि मंदिर का पुनर्निर्माण रोका जा सके । यह हिंदू जनता के सम्मान और भावना का प्रश्न है ।

स्वाभाविक ही इसके बाद तो यह फैसला होना ही था कि भव्य और नवीन मंदिर बनाया जाए। पटेल की इच्छा थी कि यह पुनर्निर्माण भारत सरकार द्वारा प्रायोजित हो, लेकिन महात्मा गांधी के सुझाव के अनुसार, यह तय हुआ कि सरकार, मंदिर के पुनर्निर्माण में कोई मौद्रिक योगदान नहीं करेगी । जनवरी 1 9 4 9 में निम्नलिखित उद्देश्यों के साथ एक ट्रस्ट का गठन किया गया:

सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण और रखरखाव

देहोत्सर्ग का नवीकरण - जहां कृष्ण ने अपने शरीर को विलोपित किया था 

पवित्रता बनाए रखने के लिए आसपास का सामान्य सुधार

आचार्य के एम मुंशी ने सुझाव दिया कि ट्रस्ट के उद्देश्यों में उपरोक्त के अलावा, यहाँ अखिल भारतीय संस्कृत विश्वविद्यालय और एक गोशाला गठित किया जाए और सोमनाथ को एक सांस्कृतिक केंद्र बनाया जाए, जहाँ महान मंदिरों की परंपरा सिखाई जाए | मुंशी के सुझाव स्वीकार कर लिए गए ।

1 9 4 9 के अंत तक, मंदिर पुनर्निर्माण के लिए लगभग 25 लाख रुपये एकत्र हो गए । भारत सरकार और सौराष्ट्र सरकार ने 15 मार्च 1 9 50 को पुनर्निर्माण को मंजूरी भी दे दी।

सौराष्ट्र के मुख्यमन्त्री उच्छंगराय नवल शंकर ढेबर ने 19 अप्रैल, 1940 को यहां उत्खनन कराया था, जिसमें एक ब्रह्मशिला प्राप्त हुई थी । इस शिला पर ही सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह उपाख्य जाम साहब ने 8 मई, 1950 को मंदिर की आधार शिला रखी | इस अवसर पर एक चांदी का पवित्र नंदी स्थापित किया गया, जिसे मंदिर के खंडहर में से ही 19 अक्टूबर 1950 को उत्खनित किया गया था।

जाम साहेब ने इसके बाद सभी भारतीय राजनयिकों को एक पत्र लिखकर आग्रह किया कि वे प्राण प्रतिष्ठा के समय अपने अपने कार्यक्षेत्र से कुछ मिट्टी और पवित्र जल भेजें, ताकि दुनिया में एकता और भाईचारे का सन्देश जाए ।

पटेल द्वारा महात्मा गांधी की सहमति लेकर मंदिर निर्माण प्रारम्भ तो करवा दिया गया, किन्तु प्रधानमंत्री नेहरू इस निर्णय से अप्रसन्न बने रहे | गांधी और पटेल के देहावसान के बाद तो उनकी बेरुखी अपमानजनक ढंग से बढ़ गई |

पटेल के स्वर्गवास उपरांत सेक्यूलर लॉबी और भी सक्रिय हो गई तथा धर्मनिरपेक्षता का राग अलापना शुरू हो गया | प्रधान मंत्री तो पहले से ही इस प्रकरण को लेकर रुष्ट चल रहे थे । केबिनेट बैठक में जवाहरलाल नेहरू ने के एम मुंशी को जताया:

मुझे सोमनाथ मंदिर पुनर्निर्माण की आपकी कोशिश पसंद नहीं है। यह हिंदू पुनरुत्थानवाद है।

मुंशी ने पुनर्निर्माण से जुड़े सभी प्रासंगिक दस्तावेजों के साथ नेहरू को जवाब में लिखा :

कल आपने हिंदू पुनरुत्थानवाद को संदर्भित किया था। आपने कैबिनेट में सोमनाथ से जुड़े मुद्दे पर मुझे संदर्भित किया। मुझे खुशी है कि आपने ऐसा किया; क्योंकि मैं अपने विचारों या गतिविधियों से रत्ती भर भी पीछे हटने वाला नहीं हूँ... हाँ मैं आपको आश्वस्त अवश्य कर सकता हूं कि आज भारत का 'सामूहिक अवचेतन' भारत सरकार द्वारा स्वीकृत सोमनाथ पुनर्निर्माण की योजना से, हमारे द्वारा लागू की गई, किसी भी अन्य योजना की तुलना में. अधिक प्रसन्न है ।

मंदिर को हरिजनों के लिए खोलने के इरादे से यद्यपि हिंदू समुदाय के रूढ़िवादी खंड ने कुछ आलोचना की है। इसके बाद भी ट्रस्ट डीड में यह स्पष्ट किया है कि मंदिर न केवल हिंदू समुदाय के सभी वर्गों के लिए खुला रहेगा, बल्कि सोमनाथ की प्राचीन परम्परा के अनुरूप गैर-हिंदू आगंतुकों के लिए भी दर्शन की अनुमति होगी । कई रीति-रिवाज ऐसे हैं जिनका मैंने व्यक्तिगत जीवन में बचपन से निषेध किया है। मैंने हिंदू धर्म के कुछ पहलुओं को सुधारने या पुनर्निर्मित करने के लिए साहित्यिक और सामाजिक कार्य के माध्यम से अपने नम्र तरीके से काम किया है, मेरा दृढ़ विश्वास में कि वह अकेले ही आधुनिक परिस्थितियों में भारत को एक उन्नत और सशक्त राष्ट्र बना देगा।

मुझे हमारे अतीत पर आस्था है, उससे ही मुझे वर्तमान में काम करने और हमारे सुनहरे भविष्य के सपने संजोने की ताकत मिलती है। मैं भारत की आजादी को महत्व नहीं दे सकता अगर यह हमें भगवद् गीता से वंचित कर देता है या हमारे लाखों लोगों की उस आस्था को खंडित करता है जिसके साथ वे हमारे मंदिरों को देखते हैं। मुझे सोमनाथ पुनर्निर्माण के अपने चिर स्वप्न को साकार करने का पूरा अधिकार है । मुझे पूरा भरोसा है यह मंदिर हमारे जीवन में धर्म के महत्व को बहाल करेगा, हमारे लोगों में धर्म की शुद्ध अवधारणा आयेगी तो राष्ट्र की शक्ति और चेतना प्रदीप्त होगी, जिसकी स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात के इन दिनों में सर्वाधिक आवश्यकता है | 


मुंशी के जबाब को पढकर राज्य मंत्रालय के तत्कालीन सलाहकार वी पी मेनन ने मुंशी को लिखा :

मैंने आपका जबाब देखा । मैं सदैव आपके पत्र में व्यक्त किए गए विचारों के लिए जीने को तैयार रहूंगा और यदि आवश्यक हो, तो उनके लिए मरने को भी ।

और इस प्रकार धुन के पक्के के.एम मुंशी ने मंदिर निर्माण कार्य चालू रखा,
तथा 1951 में वह अवसर आ गया जब मंदिर में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा होना थी | 

मुंशी ने इस निमित्त तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से पधारने का अनुरोध किया, जिसे राष्ट्रपति महोदय द्वारा स्वीकार भी कर लिया गया | किन्तु जैसे ही नेहरू जी की जानकारी में यह तथ्य आया उन्होंने तुरंत राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को ख़त लिखकर मना किया कि मेरे विचार से आपको सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण कार्यक्रम में नहीं जाना चाहिए, किन्तु इसके बाद भी राजेन्द्र बाबू कार्यक्रम में सम्मिलित हुए | और अंततः 11 मई 1951 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की उपस्थिति में शिवलिंग की मंदिर में पुनः प्राण प्रतिष्ठा हुई | इस ऐतिहासिक अवसर पर दिए गए अपने भावपूर्ण उद्बोधन में डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा :


हमारी सभ्यता के भौतिक प्रतीकों को नष्ट किया जा सकता है, लेकिन कोई हथियार, सेना या राजा, हमारी संस्कृति और आस्था के साथ हमारे अटूट बंधन को नष्ट कर सकता । जब तक वह बंधन बना रहेगा, यह सभ्यता जीवित रहेगी। भगवान सोमनाथ की प्राण प्रतिष्ठा, सदियों से लोगों के दिलों में पोषित, सभ्यता के नवीनीकरण के प्रति रचनात्मक आग्रह का प्रतीक है । सोमनाथ प्राचीन भारत की आर्थिक और आध्यात्मिक समृद्धि का प्रतीक था। सोमनाथ का पुनर्निर्माण तब तक पूरा नहीं होगा, जब तक कि भारत अपने पुरातन गौरव और समृद्धि को पुनः नहीं पा लेता ।

मीडिया में भाषण छपा तो जरूर, पर मुख्य अंशों को काट छांट कर ।

इस प्रकार, लाखों लोगों की भक्ति, पटेल की प्रतिज्ञा, गांधी का आशीर्वाद और मुंशी के अनथक प्रयास से सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया और देश के असंख्य घावों में से एक पर कुछ मलहम लगा। 

ख़ास बात यह कि मंदिर निर्माण कार्य पूर्णतः जन सहयोग से ही हुआ था | इसमें सरकार की कोई भूमिका नहीं थी | यह अलग बात है कि सोमनाथ मंदिर के पुनरुद्धार के लिए शासन द्वारा धन देने से इनकार करने वाले नेहरू ने बाद में बौद्ध यात्रियों के लिए सांची में तीर्थयात्री केंद्र के निर्माण के लिए जमीन दान की और सारनाथ (एक और बौद्ध स्थल) के पुनर्निर्माण हेतु भी मुक्त हस्त से धनराशि प्रदान की । 

बाद में प्रधानमंत्री से बढ़ते मनमुटाव के चलते मुंशी ने कांग्रेस से त्यागपत्र भी दे ही दिया |

साभार आधार -
https://swarajyamag.com/politics/the-somnath-saga-a-precursor-to-debates-around-secularism-in-india
http://prekshaa.in/history-of-the-somnath-temple-3/
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