ईस्ट इंडिया कम्पनी – भारत को लूटने हेतु निर्माण और विसर्जन – सतीश एलिया

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बात है सन 1615 की जब चौथे मुग़ल शहंशाह नुरूद्दीन मोहम्मद जहांगीर की सालगिरह पर हुए समारोह में रिवाज के अनुसार उन्हें तौला जाना था. प...



बात है सन 1615 की जब चौथे मुग़ल शहंशाह नुरूद्दीन मोहम्मद जहांगीर की सालगिरह पर हुए समारोह में रिवाज के अनुसार उन्हें तौला जाना था. पानी में घिरे एक चौकोर चबूतरे पर बीचों-बीच एक विशालकाय स्वर्ण पन्नी चढ़ी तराज़ू स्थापित थी. पहले मुग़ल बादशाह को चांदी के सिक्कों से तौला गया, जिन्हें तुरंत ही गरीबों में बांट दिया गया. इसके बाद सोने की बारी आई, फिर आभूषण, बाद में रेशम और आख़िर में दूसरी बेश-क़िमती चीज़ों से बादशाह सलामत के वज़न की तुलना की गई. 

ये दृश्य जहांगीर के दरबार में ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो ने देखा और डायरी में नोट कर लिया. लेकिन दौलत के इस हैरत कर देने वाले प्रदर्शन ने सर थॉमस को शक में डाल दिया कि क्या बंद थैले वाक़ई हीरे-जवाहारात या सोने से भरे हुए हैं, कहीं इनमें पत्थर तो नहीं? 

सर थॉमस एक ख़ास मिशन पर भारत आए थे. इनकी कोशिश थी कि किसी न किसी तरह से एक समझौते पर हस्ताक्षर करवा लें जिसके तहत एक छोटी सी ब्रिटिश कम्पनी को भारत में व्यापार का अधिकार हासिल हो जाए. 

लेकिन ये काम इतना आसान साबित नहीं हुआ क्योंकि मुग़ल शहंशाह की नज़र में इंग्लिस्तान एक छोटा सा द्वीप था, जिसके किसी मामूली बादशाह के साथ बराबरी के स्तर पर समझौता करना इनकी शान के ख़िलाफ़ था. लेकिन सर थॉमस ने हिम्मत नहीं हारी, और तीन साल की कड़ी मेहनत, राजनयिक दांव-पेंच और तोहफ़े देकर जहांगीर से तो नहीं, लेकिन वली अहद शाहजहां से आज से ठीक चार सौ साल पहले अगस्त 1618 में एक समझौते पर हस्ताक्षर करवाने में कामयाब रहा, जिसके तहत इस कम्पनी को सूरत में खुलकर कारोबार करने की इजाज़त मिल गई. और इस प्रकार 31 दिसंबर 1600 में स्थापित इस छोटी सी ईस्ट इंडिया कम्पनी के विराट बनने का सफ़र शुरू हो गया. ये घटना इसके इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई. ये पहला मौक़ा था कि मुग़ल हुकूमत ने सीधे तौर पर एक यूरोपीय देश के साथ बाक़ायदा व्यापारिक समझौता करके इसकी एक कम्पनी को प्रोत्साहन दिया था. 

सर थॉमस को जहांगीर के साथ दूसरे पलड़े में तुलने वाली दौलत पर यक़ीन करने में कठिनाई हुई थी, लेकिन ब्रिटेन अगले साढ़े तीन सौ सालों में भारत से जो दौलत समेट कर ले गया, उसके बारे में अर्थशास्त्रियों ने कुछ अनुमान लगाने की कोशिश ज़रूर की है. 

आईये देखते हैं कि ईस्ट इंडिया कम्पनी और ब्रिटिश राज के भारत पर सत्ता के दूसरे असर क्या पड़े जो महज़ लूट से भी कहीं अधिक भयानक थे. 

अमरीकी इतिहासकार मैथ्यू वाईट ने 'द ग्रेट बुक ऑफ़ हॉरिबल थिंग्स' के नाम से एक पुस्तक लिखी है, जिसमें उन्होंने इतिहास के सौ भयानक रक्तपातों की समीक्षा पेश की है. इस पुस्तक में इतिहास का चौथा भयानक रक्तपात ब्रिटिश दौर में भारत में आया अकाल है, जिनमें वाईट के मुताबिक़ दो करोड़ 66 लाख भारतीयों की जानें ख़त्म हुई. 

इस संख्या में वाईट ने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान बंगाल के उस अकाल की गिनती नहीं की, जिसमें 30 से 50 लाख के क़रीब लोग मारे गए थे. अगर इस अकाल को भी शामिल कर लिया जाए तो ईस्ट इंडिया कम्पनी और ब्रिटिश सरकार के दौरान तीन करोड़ के क़रीब भारतीय अकाल के कारण जान से हाथ धो बैठे. भारत की गिनती दुनिया की सबसे उपजाऊ इलाक़ों में होती थी और अब भी होती है, फिर इतने लोग क्यों भूखों मर गए? वाईट ने इन अकालों की वजह 'व्यापारिक शोषण' बताया. 

नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने 1769 में बंगाल में ही आये अकाल में होने वाली मौतों की संख्या एक करोड़ बताई है. इस दौर का एक दृश्य एक अंग्रेज़ ही की ज़बानी देखिए : 

'दसियों लाख लोग चंद बाक़ी हफ़्तों तक ज़िन्दा रहने की आस लिए मर गए जो उन्हें फ़सल तैयार होने तक गुज़ारने थे. उनकी आंखें इन फ़सलों को तकती रह गईं, जिन्हें इस समय पकना था जब उन्हें बहुत देर हो जाती.' 

फ़सलें तो अपने वक़्त पर तैयार हुईं, लेकिन उस समय वाक़ई बहुत देर हो चुकी थी. 1769 की यही कहानी पौने दो सौ साल बाद एक बार फिर पूर्वी बंगाल में दोहराई गई. 

टाईम्स ऑफ़ इंडिया 16 नवम्बर 1943 की कतरन : 'पूर्वी बंगाल में एक भीषण मगर आम दृश्य ये था कि आधी सदी की सबसे शानदार फ़सल के दौरान पड़ा हुआ गला-सड़ा कोई इंसानी ढ़ांचा नज़र आ जाता था.' 

कहा जा सकता है कि अकाल तो प्राकृतिक आपदा के श्रेणी में आते हैं. इसमें ईस्ट इंडिया कम्पनी का क्या क़सूर? प्रसिद्ध दार्शनिक विल ड्यूरान्ट इस बारे में लिखते हैं : 

'भारत में आने वाले ख़ौफ़नाक अकालों की बुनियादी वजह बेरहमी से किए गए शोषण, संसाधन के असंतुलित आयात और ठीक अकाल के दौरान क्रूर तरीक़ों से मंहगे टैक्सों की वसूली थी कि भूख से हलाक होते किसान उन्हें अदा नहीं कर सकते थे… सरकार मरते हुए लोगों से भी टैक्स वसूल करने पर तुली रहती थी.' 

एक छोटी सी कम्पनी इतनी शक्तिशाली कैसे हो गई कि हज़ारों मील दूर किसी देश में करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी और मौत पर हावी हो जाए? 

इसके लिए हमें इतिहास के कुछ और पन्ने पलटने होंगे. 

1498 में वास्कोडिगामा ने अफ़्रीका के दक्षिणी कोने से रास्ते ढूंढ कर भारत को समुद्री रास्ते के ज़रिए यूरोप से जोड़ दिया और आने वाले दशकों के दौरान धौंस, धमकी और दंगा-फ़साद का इस्तेमाल करके पुर्तगाली तटवर्ती भारत के तमाम व्यापारों पर क़ाबिज़ हो गए. इनके देखा-देखी डच भी अपने तोप वाहक नौसेना जहाज़ लेकर बहर-ए-हिन्द में आ धमके और दोनों देशों के बीच लड़ाई-झगड़ा होने लगा. 

इंग्लिस्तान ये सारा खेल बड़े ग़ौर से देख रहा था, भला वो इस दौड़ में क्यों पीछे रह जाता? इसलिए महारानी एलिज़ाबेथ ने इन दो देशों के नक़्शे-क़दम पर चलते हुए दिसम्बर 1600 में ईस्ट इंडिया कम्पनी स्थापित करवा कर इसे एशिया के देशों के साथ पूर्ण स्वामित्व के साथ व्यापार का इजाज़त-नामा कर दिया. 

लेकिन चतुर अंग्रेज़ों ने शुरूआत में युद्ध पर उर्जा खर्च करने के स्थान पर थॉमस रो जैसे मंझे हुए राजदूत को भारत भेजा ताकि वो ईस्ट इंडिया कम्पनी के लिए बंद दरवाज़ा खोल दे. 

मुग़लों की तरफ़ से आज्ञा मिलने के बाद अंग्रेज़ों ने भारत के विभिन्न तटीय शहरों में एक के बाद एक अपने व्यापारिक अड्डे स्थापित करने शुरू कर दिए, जिन्हें फैक्ट्रियां कहा जाता था. इन फैक्ट्रियों से उन्होंने मसालों, रेशम और दूसरी चीज़ों का व्यापार शुरू कर दिया जिसमें उन्हें ज़बरदस्त फ़ायदा तो होता रहा, लेकिन जल्द ही मामला बस व्यापार से आगे बढ़ गया. 

व्यापार से सेना – 

चूंकि ईस्ट इंडिया कम्पनी की दूसरे यूरोपीय देशों से अक्सर लड़ाईयां चलती रहती थीं और ये एक दूसरे का माल लूटने में कोई शर्म महसूस नहीं करते थे, इसलिए अंग्रेज़ों ने अपनी फैक्ट्रियों में बड़ी संख्या में स्थानीय सिपाही भर्ती करना शुरू कर दिया. अधिक समय नहीं गुज़रा कि ये फैक्ट्रियां फैलकर क़िलों और छावनियों की शक्ल अख़्तियार करने लगीं. 

जब कम्पनी की सैन्य और आर्थिक हालत मज़बूत हुई तो इसके अधिकारी स्थानीय रियासतों के आपसी लड़ाई झगड़ों में शामिल होने लगे. किसी राजा को सिपाहियों के दस्ते भिजवा दिए, किसी नवाब को अपने दुश्मन नीचे करने के लिए तोपें दे दीं, तो किसी को सख्त ज़रूरत के समय पैसा उधार दे दिया. इस जोड़-तोड़ के ज़रिए उन्होंने धीरे-धीरे अपने पंजे तटीय इलाक़ों से दूर तक फैला दिए. 

लगातार फैलाव के इस सफ़र में सबसे अहम मोड़ 1757 में लड़ी जाने वाली जंग-ए-पलासी है, जिसमें ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक क्लर्क राबर्ट क्लाईव के तीन हज़ार सिपाहियों ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की 50 हज़ार फौज को शिकस्त दी. 

कैसे शिकस्त दी, ये कहानी 'मोतालाए पाकिस्तान' की पुस्तक में दर्ज है. इस कहानी का नतीजा यह हुआ कि जंग के बाद क्लाईव ने सिराजुद्दौला का सदियों से जमा किया हुआ ख़ज़ाना समुद्री जहाज़ों से लदवा कर बिल्कुल इसी तरह लंदन पहुंचा दिया जिस तरह 18 साल पूर्व नादिर शाह दिल्ली की दौलत दोनों हाथों से निचोड़ कर ईरान ले गया था. 

लेकिन क्लाईव ने तमाम दौलत शाही ख़ज़ाने में जमा नहीं करवाई बल्कि अपने लिए भी कुछ हिस्सा रख लिया, जिसकी क़ीमत आज कल के हिसाब से तीन करोड़ डॉलर बनती है. इस पैसे से ब्रिटेन में एक शानदार महल बनवाया और व्यापक ज़मीनें खरीदी जिसका नाम 'पलासी' रखा. यही नहीं, उसने पैसा देकर न सिर्फ़ अपने लिए बल्कि अपने बाप के लिए भी संसद की सीट खरीद ली. बाद में इसे 'सर' का ख़िताब भी अता कर दिया गया. 

लेकिन इसी दौरान बंगाल में आने वाले ख़ौफ़नाक अकाल और उसके नतीजे में सूबे की एक तिहाई आबादी के ख़त्म हो जाने की ख़बरें इंग्लिस्तान पहुंचना शुरू हो गई थीं जिनका कारण लॉर्ड क्लाईव की पॉलिसियों को क़रार दिया गया. 

लाट साहब पर उंगलियां उठने लगीं, नौबत संसद में अनुबंध पेश होने तक जा पहुंची. ये अनुबंध तो खैर मंज़ूर नहीं हो सका, क्योंकि उस ज़माने में संसद के एक चौथाई के लगभग सदस्यों का खुद ईस्ट इंडिया कम्पनी में हिस्सा थे. लेकिन बहस के दौरान क्लाईव का बयान गौर किये जाने योग्य है - 'मैं तो खुद सख्त हैरान हूं कि मैंने हाथ इस क़दर 'हौला' क्यों रखा!' वर्ना मैं चाहता तो इससे कहीं अधिक माल व सोना समेट कर ला सकता था. 

यह अलग बात है कि भारत में बरपा होने वाली क़यामत के प्रभाव ने किसी न किसी हद तक क्लाईव के दिल व दिमाग़ पर भी असर डाला और उसने बड़ी मात्रा में अफ़ीम खाना शुरू कर दिया. नतीजा ये निकला कि वो 1774 में अपने कमरे में रहस्यमय हालत में मुर्दा पाया गया. ये पहेली आज तक हल नहीं हो सका कि क्लाईव ने आत्महत्या की थी या अफ़ीम की अधिक खुराक जानलेवा साबित हुई. 

इस दौरान मुग़ल अपनी अयोग्यता से इस क़दर कमज़ोर हो चुके थे कि वो दूर ही दूर से अंग्रेज़ों के रसूख को दिन दोगुना, रात चौगुना बढ़ते देखने के अलावा कुछ न कर सके. ऐसे में पलासी की जंग के सिर्फ़ आधी सदी बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी के सिपाहे की संख्या ढ़ाई लाख से पार हो गई और उन्होंने बंगाल से निकल कर भारत के बड़े हिस्से पर अपने वर्चस्व क़ायम कर लिया. 

1803 के आते आते दिल्ली के तख्त पर बैठा मुग़ल शहनशाह शाह आलम ईस्ट इंडिया कम्पनी के वज़ीफ़ा पर आश्रित होकर रह गया. जिस शाह आलम के पुरखे जहांगीर के आगे ब्रिटिश राजदूत सर थॉमस रो, घुटनों के बल झुकता था, उसी ईस्ट इंडिया कम्पनी के एक क्लर्क के सामने झुक कर पूरे बंगाल का अख़्तियार-नामा पेश करना पड़ा. 

ये सारा काम ब्रिटिश सरकार ने नहीं, बल्कि एक कम्पनी ने किया जिसका सिर्फ़ एक उसूल था, हर मुमकिन हथकंडे इस्तेमाल करके अपने हिस्सेदारों के लिए अधिक से अधिक मुनाफ़ा कमाना. ये कम्पनी लंदन के एक इलाक़े में एक छोटी सी बिल्डिंग से काम करती थी और स्थापना के एक सदी बाद तक भी इसके स्थायी कर्मचारियों की संख्या सिर्फ़ 35 थी. लेकिन इसके बावजूद दुनिया के इतिहास में कोई कम्पनी ऐसी नहीं हुई जिसके पास इस क़दर ताक़त हो. 

यह कम्पनी भारत में अफ़ीम उगाती थी जिसका बड़ा हिस्सा चीन ले जाकर महंगे दामों पर बेचा जाता था. जब चीनियों को अहसास हुआ कि ये तो हमारे साथ घपला हो रहा है, तो उन्होंने आगे अफ़ीम खरीदने से क्षमा मांग ली. कम्पनी अपने मुनाफ़े में कमी को कैसे बर्दाश्त करती? इसने 1839 में कुछ तोप वाहक जहाज़ चीन भेज कर चीन का नौसेना बेड़ा तहस नहस कर दिया. चीनी शहनशाह ने अपनी ग़लती स्वीकार करते हुए न सिर्फ़ अफ़ीम की आयात पर पाबंदी हटा ली बल्कि बतौर जुर्माना हांगकांग भी ब्रिटेन को दे दिया जो 1997 में कहीं जाकर वापस चीन को मिला. 

इस दौरान भारत की एक के बाद एक रियासत, एक के बाद एक रजवाड़ा ईस्ट इंडिया कम्पनी की झोली में गिरता रहा. 1818 में इन्होंने मरहटों की सल्तनत हथियाई, इसके बाद अगले कुछ दशकों में सिक्खों को शिकस्त देकर तमाम पश्चिमी भारत यानी आज के पाकिस्तान पर भी क़ाबिज़ हो गई. अब दर्रा-ए-ख़ैबर से लेकर बर्मा और हिमालय की बर्फ़ानी चोटियों से लेकर कन्या कुमारी तक इनका राज था.
लेकिन इनकी बदक़िस्मती से 1857 में बड़े पैमाने पर हुए खून खराबे और गड़बड़ियों की ख़बर इंग्लिस्तान तक पहुंची. कंपनी इतनी बदनाम हो गई कि आख़िरकार संसद को जनता के दबाव में इस कम्पनी के राष्ट्रीयकरण का फ़ैसला करना पड़ा और भारत सीधे ब्रिटिश सरकार के अधीन हो गया. 

इसके बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी कुछ साल तक तो घिसट घिसट कर ज़िन्दगी गुज़ारती रही, लेकिन आख़िर 01 जून 1874 को पौने तीन सौ साल की लंबी शान व शौकत के बाद ये कम्पनी भंग हो गई. 

आज लंदन में लीडन हॉल स्ट्रीट पर जिस जगह कम्पनी का हेडक्वार्टर था, वहां बैंक की चमचमाती इमारत खड़ी है, और कहीं कोई स्मृति, कोई मूर्ति, यहां तक कि कोई बोर्ड तक स्थापित नहीं है. न कोई जनाज़ा उठा, न कहीं मज़ार बना. 

कम्पनी की भले ही कोई स्मृति हो न हो, लेकिन उसने जो काम किया उसके प्रभाव को अब तक महसूस किया जा सकता है. इस कम्पनी के प्रभुत्व से पहले भारत दुनिया का अमीर देश था और दुनिया की कुल जीडीपी का एक चौथाई हिस्सा पैदा करता था. जबकि इसी दौरान इंग्लिस्तान का हिस्सा सिर्फ़ दो फ़ीसद था. 

भारत की ज़मीन उपजाऊ और हर तरह के संसाधन से मालामाल थी, और लोग मेहनती व हुनरमंद थे. यहां पैदा होने वाले सूती कपड़े और मलमल की मांग दुनिया भर में थी, जबकि शिपिंग और स्टील के उद्योग में भी भारत से कोई आगे नहीं था. 

अर्थशास्त्र के विशेषज्ञ और पत्रकार मेहनाज़ मर्चेन्ट की रिसर्च के मुताबिक़ 1757 से लेकर 1947 तक अंग्रेज़ों के हाथों भारत को पहुंचने वाले आर्थिक नुक़सान की कुल रक़म 2015 के फ़ॉरेन एक्सचेंज के हिसाब से 30 खरब डॉलर बनती है. इसके मुक़ाबले पर नादिर शाह द्वारा की गई लूट तो सिर्फ़ 143 अरब डॉलर ही थी.

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क्रांतिदूत: ईस्ट इंडिया कम्पनी – भारत को लूटने हेतु निर्माण और विसर्जन – सतीश एलिया
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