तीन अलग अलग स्वाद के चटपटे समाचार जिन पर संभवतः आपका ध्यान नहीं गया होगा !

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अटल जी और उनके पिताजी – सहपाठी  1 9 45 में, जब 21 वर्षीय अटल बिहारी वाजपेयी ने कानपुर कॉलेज में कानून का अध्ययन करने के लिए दाखिला ल...


अटल जी और उनके पिताजी – सहपाठी 

1 9 45 में, जब 21 वर्षीय अटल बिहारी वाजपेयी ने कानपुर कॉलेज में कानून का अध्ययन करने के लिए दाखिला लिया, तो उनके साथ एक और सहपाठी भी थे, जो एक शिक्षक के रूप में 30 साल शासकीय सेवा करने के बाद अब सेवानिवृत्त हो लॉ पढने कोलेज में आये थे । वह और कोई नहीं अटल जी के पिता जी, पंडित कृष्ण बिहारलाल वाजपेयी ही थे, जो डीएवी कॉलेज कानपुर में अटल जी के सहपाठी बने। वाजपेयी जी के प्रधान मंत्री बनने के बाद, उनके स्वयं के द्वारा लिखित तथा वर्ष 2002-03 में कॉलेज की पत्रिका में प्रकाशित यह आलेख ख़ासा चर्चित हुआ । 

वाजपेयी जी ने उस लेख में लिखा, "क्या आपने कभी ऐसे कॉलेज के बारे में देखा या सुना है, जहां पिता और पुत्र दोनों एक साथ अध्ययन करते हों, और वह भी एक ही क्लास में ? यदि नहीं, तो कानपुर के डीएवी कॉलेज से संबंधित आपकी जानकारी को अपूर्ण माना जाएगा। यह ऐसा ही कॉलेज था, जहाँ न केवल एक पिता और पुत्र साथ साथ पढ़े, बल्कि इसके लिए नाटकीय मंच भी स्थापित किया। " 

अटल जी लिखते हैं कि - "जब भी मेरे पिता कक्षा में देर से आते, तो हंसी के ठहाकों के बीच प्रोफेसर पूछते - आपके पिता कहाँ गायब हो गए हैं'। और जब कभी मुझे देर हो जाती, तो उनसे पूछताछ की जाती कि 'आपका बेटा कहाँ गुम है?” 

"यह स्थिति हम दोनों के लिए एक समस्या पैदा कर रही थी, और अंततः यह निर्णय लिया गया कि मेरे पिता जी उसी सेक्शन में रहेंगे, जबकि मैं दूसरे स्थान पर जाऊंगा।" 

"वर्ष 1 945-46 में, मैंने विक्टोरिया कॉलेज, ग्वालियर से बीए पूरा किया था, और भविष्य के बारे में चिंतित था ... मेरे पिता सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। मेरी दो बहनें विवाह योग्य उम्र की थीं । दहेज ने अभिशाप का रूप ग्रहण कर लिया था। प्रश्न सामने था कि स्नातकोत्तर के लिए संसाधन कहां से आयें? लेकिन जब सभी दरवाजे बंद हो गए, तब ग्वालियर महाराजा श्रीमंत जिवाजी राव सिंधिया ने, जो एक मेधावी छात्र के रूप में मुझे अच्छी तरह से जानते थे, उन्होंने 75 रुपये की मासिक छात्रवृत्ति प्रदान की । 

"पिता के चेहरे पर तनाव की झुर्रियां धीरे-धीरे गायब हो गईं। परिवार ने राहत की सांस ली, और मैंने भी भविष्य के सुनहरे सपने देखना शुरू किया । ग्वालियर रियासत से छात्रवृत्ति प्राप्त करने वाले अधिकांश छात्र कानपुर में डीएवी कॉलेज जाते थे । मुझे भी कानपुर जाने के लिए कहा गया । मेरे बड़े भाई प्रेम बिहारी वाजपेयी पहले से ही वहां कानून का अध्ययन कर रहे थे।" 

"उस समय एक असामान्य घटना हुई । अचानक, पिता जी ने फैसला किया कि वह भी उच्च शिक्षा प्राप्त करेंगे । उनके फैसले ने हम सभी को आश्चर्यचकित कर दिया था। 30 साल तक शिक्षा के क्षेत्र में अपना योगदान देने के बाद वह सेवानिवृत्त हुए थे। जब उन्होंने देखा कि मैं एमए करने के लिए कानपुर जा रहा हूं और कानून का अध्ययन करूंगा, तो उन्होंने भी फैसला किया कि वह मेरे साथ कानपुर जाएंगे और कानून का अध्ययन करेंगे। " 

"वह 50 वर्ष से ऊपर थे। सफेद बाल और छड़ी के सहारे पैदल चलते हुए जब मेरे पिता - पंडित कृष्ण बिहारलाल वाजपेयी - प्रिंसिपल (कालका प्रसाद भटनागर) के कार्यालय में पहुंचे, तो श्री भटनागर ने सोचा कि बुजुर्ग सज्जन प्रोफेसर की पोस्ट पाने के लिए आए हैं, लेकिन कोई जगह तो है नहीं, लेकिन जब श्री भटनागर को पता चला कि बुजुर्ग सज्जन खुद को नामांकित करने आए हैं, तो वह वास्तव में आश्चर्यचकित होकर कुर्सी से उछल गए ।" 

"जल्द ही, यह समाचार पूरे कॉलेज में फैल गया। छात्रावास में, जहां हम पिता और पुत्र एक साथ रहते थे, छात्रों की भीड़ हमें देखने के लिए आती थी । उन्होंने कॉलेज में दो साल बिताए। 

"मुझे अभी भी रामायण मंडली याद है जिसे पुरोत्तम प्रसाद मिश्रा द्वारा संचालित किया जाता था। मंडली हर हफ्ते रामायण पढ़ती थी, और जैसे ही छात्रावास में पहुंचे, मेरे पिताजी को इसमें शामिल कर लिया गया। मुझे अभी भी स्वतंत्रता दिवस का जश्न याद है। यह पीड़ा और उत्साह का एक अजीब संयोग था। हम उत्साही थे क्योंकि 1,000 साल का विदेशी शासन खत्म हो गया है, और मातृभूमि के विभाजन के कारण दुखी भी । मुझे दुःख है कि मुझे कानून की पढाई बीच में ही छोड़नी पडी, मुझे कॉलेज ही छोड़ना पड़ा । स्वतंत्रता प्राप्त करने और देश के विभाजन ने नई परिस्थितियां पैदा की थीं। कई युवाओं ने अपने घर छोड़े, और राष्ट्र निर्माण के रास्ते पर उतरे । अध्ययन छोड़ दिया, दोस्त अलग हो गए और नए प्रश्न सामने आए। फिर भी, डीएवी कॉलेज में बिताए गए दो साल को भुलाया नहीं जा सकता । 

दिल्ली की “अपराधी गॉड मदर” बसीरन 


कितने हैरत की बात है कि एक 62 वर्षीय महिला को गिरफ्तार करने के लिए दिल्ली पुलिस को खुद एक झूठी अफवाह फैलानी पडी कि उक्त महिला के घर की नीलामी की जा रही है | तब कहीं जाकर वह महिला बसीरन पुलिस के चंगुल में आई, जिसके खिलाफ नौ आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से एक कांट्रेक्ट हत्या भी शामिल है। 

अभियुक्त, बसीरन उर्फ ​​मम्मी को अपराध जगत में "गॉडमादर" के रूप में जाना जाता है, और वह दक्षिणी दिल्ली के संगम विहार में अनुबंध हत्या के एक मामले में आठ महीने से फरार थी । 

बशीरन के इस आपराधिक संसार में उसके आठ बेटे भी शामिल हैं | इस परिवार पर कुल 113 मामले दर्ज हैं, जिनमें अवैध शराब, चोरी, अनुबंध हत्या, हत्या का प्रयास और हत्या जैसे जघन्य अपराध भी शामिल हैं । इतना ही नहीं तो बसीरन ने आठ महीने पहले तक अपने क्षेत्र में पानी की आपूर्ति माफिया का भी संचालन किया ।" 

बशीरन के तीन बेटे - शमीम उर्फ ​​गुंगा (31), फैजल (23) और राहुल खान (22) को भी गिरफ्तार किया जा चुका है, जबकि शेष अभी फरार हैं। शमीम को तो पहले ही महाराष्ट्र में सिंडिकेट चलाने के आरोप में “महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट” (मकोका) के तहत बुक किया गया है ... और अब बशीरन को भी उसी अधिनियम के तहत बुक किया जाएगा ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उन्हें जमानत न मिल सके।" 

पुलिस के मुताबिक, पिछले साल सितंबर में, बशीरन और उसके सहयोगियों आकाश, विकास और नीरज ने कथित रूप से अमेठी निवासी मिराज को मार डाला और संगम विहार के पास जंगलों में उसके शव को फेंक दिया । उनके खिलाफ अनुबंध हत्या का मामला दर्ज किया गया था, और आरोप लगाया गया था कि बशीरन ने मिराज को मारने के लिए उसकी सौतेली बहिन से 60,000 रुपये लिए थे। दिसंबर में पीड़ित की पहचान की पुष्टि हुई और बसीरन के सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया गया, जबकि वह फरार हो गई। 

जब उसका कोई सुराग नहीं लग पाया, तब इंस्पेक्टर उपेंद्र सिंह की अगुआई में एक टीम ने उसके घर की नीलामी के सम्बन्ध में अफवाह फैलाने की योजना तैयार की। इस अफवाह को सुनकर, बशीरन सचाई जानने को इलाके में आई और शुक्रवार को पुलिस के जाल में फंस गई । और अब अपने कर्मों का फल भोगेगी | 

बशीरन का जन्म आगरा में हुआ था और 45 साल पहले उसने मलखान नामक एक राजस्थानी से शादी कर ली थी । 1980 के दशक में, दोनों दिल्ली चले आए और गोविंदपुरी में नवजीन स्लम कैंप में रहना शुरू कर दिया। एक दशक बाद, वह अपने परिवार के साथ संगम विहार चली गयी। यह अपने आप में हैरत की बात है कि मलखान के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं हुआ है, जो क्षेत्र में भेड़ पालता है। 

जबकि बसीरन पहले अवैध शराब बेचना शुरू कर कुख्यात हुई, और जल्द ही उसने अपने बच्चों को भी इसी व्यापार में शामिल कर लिया । 2002 में पहली बार उसे एक्साइज एक्ट के तहत बुक किया गया । और उसके बाद तो ये लोग अपराध दर अपराध करते ही गए | 

मुम्बई में बकरईद से पहले कानूनी लड़ाई 

मुम्बई महानगर परिषद ने सोमवार को मुम्बई हाईकोर्ट के समक्ष एक शपथ पत्र देकर यह बताने जा रही है कि उसने 22 अगस्त को बकर-ईद के मद्दे नजर, देवनार बूचड़खाने के बाहर भेड़ या बकरियों की हत्या के लिए अनुमति देने हेतु एक ऑनलाइन तंत्र विकसित किया है। 

सोमवार को, अदालत “जीव मैत्री ट्रस्ट” द्वारा दायर उस याचिका की सुनवाई करने वाली है, जिसमें हाल ही में बीएमसी द्वारा संचालित देवनार बूचड़खाने के महाप्रबंधक डॉ योगेश जयप्रकाश शेटे द्वारा जारी उन दो नोटिसों को चुनौती दी गई है, जिसमें बकर-ईद पर भेड़ के बच्चे और बकरियों के क़त्ल के लिए बूचड़खाने के बाहर भी अनुमति प्रदान की गई है । 

याचिकाकर्ताओं के वकील सुजय कंटवाला के अनुसार उन्हें शनिवार शाम को हलफनामे की प्रति प्राप्त हो गई है । 

"... नगरपालिका निगम ने पिछले साल भी पशु वध के लिए ऑनलाइन अनुमति शुरू की थी और वह पूरी तरह सफल रही थी... उसी प्रकार नगर निगम द्वारा इस वर्ष भी ऑनलाइन अनुमति की पेशकश की गई है ताकि प्रक्रिया में आसानी रहे । 

हलफनामे में कहा गया है कि कई लोगों ने अनुमति के लिए आवेदन कर भी दिए हैं, और लगभग 29,907 बकरियां और भेड़ें पहले से ही क़त्ल करने हेतु बेचे खरीदे जा चुके हैं। 

"... नगर निगम ने अपने प्रत्येक प्रशासनिक वार्ड में अवैध ढंग से की जाने वाली पशु हत्याएं रोकने हेतु निगरानी और नियंत्रण करने के लिए कर्मचारियों को तैनात किया है..."। 

स्मरणीय है कि नगर पालिका ने पिछले दिनों देवनार बूचड़खाने का आधुनिकीकरण भी किया है, जिसके बाद जानवरों को मारने की इसकी क्षमता में कम से कम तीन गुना बढ़ोतरी हो जाएगी"। 

(टिप्पणी – ओन लाईन परमीशन लो और कहीं भी पशुओं को जिबह करो | स्मरणीय है कि कुर्बानी के नाम पर भेड़ बकरों को हलाल किया जाता है, अर्थात गला आधा काटकर छोड़ दिया जाता है, पशु धीरे धीरे मरता है, तब तक तड़पता है, चीखता है | बस्ती में रहने वाले हिन्दू इस बेदर्दी को देख सुनकर कलपने के सिवा और क्या कर सकते हैं | और अब तो मुम्बई की ही तरह अन्य महानगरों में इस क्रूरता को कानूनी शक्ल भी दी जाने लगी है | ओन लाईन परमीशन इसी का एक रूप है |)

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क्रांतिदूत: तीन अलग अलग स्वाद के चटपटे समाचार जिन पर संभवतः आपका ध्यान नहीं गया होगा !
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