भविष्य का भारत और संघ : डॉ. मयंक चतुर्वेदी

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देश की राजधानी दिल्‍ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तीन दिवसीय वैचारिक मंथन हो रहा है, विषय रखा गया भविष्य का भारत । इस वैचारिक मं...



देश की राजधानी दिल्‍ली में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का तीन दिवसीय वैचारिक मंथन हो रहा है, विषय रखा गया भविष्य का भारत । इस वैचारिक मंथन में देश-विदेश के उन तमाम श्रेष्ठ जनों को बुलाया गया है जो कि भारत को शक्ति संपन्न बनाने के लिए अपने-अपने स्तर पर कार्य और प्रयास कर रहे हैं। यहाँ एक बड़ा प्रश्न अवश्‍य उभरता है कि आखिर क्यों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को इस तरह के आयोजन की आवश्यकता पड़ी ? संघ के घोर आलोचक तथा उसके हर कार्य में केवल और केवल कमियां ढूंढनेवाले कह रहे हैं कि आगामी वर्ष में लोकसभा चुनाव हैं यह उसी की पूर्व तैयारी है एवं भारतीय जनता पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए स्‍वयं इस आयोजन के माध्‍यम से संघ आगे आया है। कुछ का कहना है, देश में इस वक्‍त मोदी सरकार को लेकर विरोध की लहर चल रही है, इसीलिए ही संघ ने देश के सभी प्रमुख लोगों को इस कार्यक्रम के माध्‍यम से साधने की कोशिश की है। किंतु क्‍या उनका यह आकलन सही है ? 


वस्‍तुत: यह सोचना बिल्‍कुल निराधार है। वस्तुतः वर्तमान भारत को लेकर संघ की चिंताएं व्‍यापक हैं, यही कारण है कि सशक्‍त भारत के लिए संघ उन सभी के साथ अपने विचार साझा करने के लिए आगे आया है जोकि सीधे तौर पर संघ से नहीं जुड़े, जोकि संघ के आलोचक हैं, जोकि संघ के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, किन्तु आगे जानना चाहते हैं। ऐसा प्रबुद्ध वर्ग जो कहीं न कहीं भारत के विकास में अपना योगदान देने के लिए ही कार्यरत है, उसके समक्ष इस विषय को लेकर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत करने का और उनका नजरिया समझने का मन संघ ने बनाया है। इस पारस्परिक विचार विनिमय से जो तत्व निकलकर सामने आएगा उसे जनजन से साझा कर श्रेष्ठ व उन्नत भारत निर्माण में सहभाग हेतु प्रेरित करना ही संघ को अभीष्ट है !


वास्‍तव में विविध समसामयिक मुद्दों पर स्पष्ट अपने विचार रखने के लिए जो उद्देश्य संघ ने निर्धारित किया है, उससे इतना तो समझ आ ही रहा है कि भारत को लेकर संघ की चिंताएं बेवजह नहीं हैं। एक तरह से देखें तो वर्तमान भारत के दो स्‍वरूप हमारे सामने दिखाई देते हैं, पहला वह भारत है जो तेजी से विश्व अर्थव्यवस्था में अपना प्रमुख योगदान दे रहा है। दुनिया के तमाम देशों के बीच आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए उद्यत है तथा जो सामर्थ्यशाली भारत किसी भी समस्या से निपटने के लिए पूर्णतः तैयार है। वह अंतरिक्ष में अपने रिकॉर्ड बना रहा है। वह खेल के मैदान में उच्च प्रदर्शन करता है। वह दुनिया की कई सेनाओं के बीच युद्धाभ्यास में अपना परचम लहराता है और अपने श्रम के बूते दुनियाभर में अपना लोहा मनवा रहा है। नासा को भी अपने वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए 37 प्रतिशत भारतीय दिमाग की आवश्‍यकता पड़ती है। किंतु क्या इतना पर्याप्त है ? 


वस्‍तुत: इसका दूसरा पक्ष उतना ही कमजोर और द्रवित कर देनेवाला है, जिसमें भारत की जनसंख्या 133 करोड़ होने पर उसके 16.3 करोड़ नागरिकों के पास आज भी स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल का अभाव है। भारत की कोई भी नदी या प्राकृतिक जल स्‍त्रोत ऐसा नहीं बचा है जिसको हम स्वच्छ कह सकते हों । वनों की कटाई, शहरों का विस्तार, जनसंख्या घनत्व का तेजी के साथ बढ़ना जैसे कई मुद्दे ऐसे हैं जिनमें कि भारत की तस्वीर हमें धुंधली नजर आती है। फिर प्रश्न यही है कि कि क्या भारत जैसा कि वर्तमान में दिखाई देता है भविष्य में भी ऐसा ही दिखाई देना चाहिए ? 


देखा जाए तो इस आयोजन के पीछे जो बड़ा उद्देश्‍य समझ आ रहा है, वह पूरी तरह राजनीति से मुक्‍त, राष्‍ट्र प्रेरित और समाज आधारित है। वर्तमान परिवेश में जो लोग भारत को शक्ति संपन्न स्वरुप में देखना चाहते हैं, उसके लिए वे ओर क्या करें तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो कि भारत को उसकी मूल पहचान के साथ अपनी संकल्पनानुसार परम वैभव के शिखर पर देखना चाहता है तथा इसके लिए निरंतर उसके स्वयंसेवक विभिन्न क्षेत्रों में कार्य भी कर रहे हैं । वस्‍तुत: उनका आपसी मिलन और परस्‍पर के सार्थक संवाद के जरिए भविष्‍य का उज्‍जवल भारत गढ़ने का कार्य तेजी के साथ हो, इसके लिए यह संवाद है। 


राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ का नजरिया भविष्य के भारत को लेकर क्या है, यह जानना सभी के लिए आज अत्यधिक आवश्यक हो गया है, कोई कह सकता है कि हम क्‍यों जाने संघ को ? तब उनके लिए यही कहना होगा कि वर्तमान परिदृष्‍य में वे संघ को नजरअंदाज भी नहीं कर सकते। कारण बहुत स्‍पष्‍ट है, वह यह कि देशभर में संघ की 60 हजार से ज्यादा नित्‍यप्रति चलने वाली शाखाएं हैं, जिसमें कई लाख स्‍वयंसेवक प्रतिदिन भारत को विश्‍व के उच्‍चतम शिखर पर पहुँचाने के‍लिए प्रार्थना के माध्‍यम से अपना संकल्‍प दोहराते हैं। संघ के आज लगभग बड़े-छोटे 50 से ज्यादा संगठन सीधे संघ की प्रेरणा से चल रहे हैं और अन्‍य स्वयंसेवकों के द्वारा अखिल भारतीय स्वरूप में कहें तो यह संख्‍या हजार से भी अधिक है। अकेले एकल फाउंडेशन के माध्यम से ही 65 हजार से अधिक शिक्षक वनवासी एवं भारत के उस सुदूर क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगा रहे हैं, जहां पिछले 70 सालों के बाद भी शासकीय एवं निजि स्‍तर पर अन्य कोई संस्था नहीं पहुंची है। 


संघ को लेकर इतना ही बताना काफी नहीं होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ देशभर में सामाजिक कल्याण से जुड़ी 1 लाख 70 हजार से अधिक परियोजनाएं अपने विभिन्न संगठनों के माध्यम से चला रहा है जिनका उद्देश्य और लक्ष्‍य एक ही है भारत का परम वैभव । इस सब के बीच देशभर में आज 4 करोड़ से अधिक लोग संघ से प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष जुड़े हैं। वस्‍तुत: भारत से भूख की समस्या का समाधान हो । भारत में सामाजिक सद्भाव हो। देश में कहीं भी प्राकृतिक या अन्‍य प्रकार कि विपदा आए तो उसका अतिशीघ्र शमन हो । भारत में आर्थिक संपन्नता हो। भारत के प्रत्येक व्यक्ति का सामाजिक स्तर श्रेष्‍ठ हो। सच पूछिए तो संघ आज यही चाहता है और इसी उद्देश्‍य के लिए कार्यरत है। 


वस्‍तुत: यह वैचारिक संवाद कई मायनों में बहुत ही अहम दिखाई दे रहा है। आशा की जानी चाहिए कि इस संवाद के जरिए वे सभी लोग संघ को और अधिक सही ढंग से जान सकेंगे जिनके लिए अभी तक रा.स्‍व.संघ. दूर का विचार था। अंतत: संघ का अंतिम लक्ष्‍य जो प्रत्‍यक्ष-अप्रत्‍यक्ष दिखाई देता है, वह यही है कि -
देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें, 
त्यागी तरुओं के जीवन से, हम परहित कुछ करना सीखे, 
जो अनपढ़ हैं उन्हें पढ़ायें, जो चुप हैं उनको वाणी दें, 
पिछड़ गये जो उन्हें बढ़ायें, हम मेहनत के दीप जलाकर, 
नया उजाला करना सीखें। 
भारत को वैभव शिखर पर मिलकर हम पहुँचाएं आज । 

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