हिन्दू मुस्लिम सम्बन्ध - समस्या और समाधान - डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा रामस्वरूप अग्रवाल, जयपुर

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बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा संविधान निर्माण में दिए गए अतुलनीय योगदान से पूरा देश परिचित है। हिन्दू समाज के वंचित वर्ग को ...



बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर द्वारा संविधान निर्माण में दिए गए अतुलनीय योगदान से पूरा देश परिचित है। हिन्दू समाज के वंचित वर्ग को संगठित एवं शिक्षित करने के लिए किये गये उनके संघर्ष से भी बहुत से लोग परिचित होंगे। परन्तु आजादी पूर्व की और वर्तमान की भी, एक ज्वलंत समस्या ‘हिन्दू और मुसलमानों के बीच होने वाले साम्प्रदायिक वैमनस्य’ के बारे में बाबा साहेब के विचारों को बहुत कम लोग ही जानते होंगे। कुछ लेखकों ने योजनापूर्वक उन विचारों को सामने नहीं आने दिया। बाबा साहेब ने हिन्दू समाज के साथ ही मुस्लिम समाज और मुस्लिम मजहब का गहराई से अध्ययन किया था। इस विषय पर उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ सन् 1941 में प्रकाशित हुई। इस पुस्तक का दूसरा संस्करण सन् 1945 में ‘पाकिस्तान ऑर पार्टिशन ऑफ इण्डिया’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। 

बाबा साहेब के अनुसार मुसलमानों को सिखाया जाता है कि इस्लाम के बाहर वे सुरक्षित नहीं हैं। इस्लाम के सिद्धान्तों के बाहर कोई सत्य नहीं है। इस्लाम के आध्यात्मिक उपदेशों के बाहर कोई सुख नहीं है। ऐसा सिखाये जाने के कारण वे यह सोचने में असमर्थ हो जाते हैं कि इस्लामी विचार पद्धति से भिन्न भी कोई विचार हो सकता है। परिणामतः मुसलमान विश्वास करने लगते हैं कि उनका मजहब ही एक मात्र सत्य है। बाबा साहेब का निष्कर्ष था कि इस्लाम एक बंद निकाय है। जो इस निकाय के बाहर हैं, अर्थात् गैर-मुस्लिम हैं, उनके लिए मुसलमानों के मन में घृणा और निन्दनीय भाव के अलावा कुछ नहीं होता। बाबा साहेब ने उदाहरण देते हुए बताया कि महात्मा गांधी के निकट सहयोगी मुहम्मद अली ने अलीगढ़ और अजमेर में बोलते हुए कहा, ‘गांधीजी का चरित्र कितना ही निर्मल क्यों न हो, मजहबी दृष्टि से वे मुझे किसी भी मुसलमान से, चाहे वह चरित्रहीन ही क्यों न हो, निकृष्ट ही दिखाई देंगे।’ 

दारूल इस्लाम व दारूल हरब 

बाबा साहेब लिखते हैं कि मुस्लिम कानून दुनिया को दो भागों में विभाजित करता है- दारूल इस्लाम और दारूल हरब। दारूल इस्लाम यानी जहां इस्लाम का शासन है और दारूल हरब यानी जहां इस्लाम का शासन नहीं है। अतः वह युद्ध भूमि है, जहां लड़कर उसे दारूल इस्लाम बनाना है। मुसलमानों और मुस्लिम शासकों का कर्तव्य है कि वे ‘जिहाद’ के द्वारा ‘दारूल इस्लाम’ के क्षेत्र को आगे बढ़ाएं। 

मुस्लिम सिद्धान्तों के अनुसार जो देश मुस्लिम शासन के अंतर्गत नहीं हैं, अर्थात् जहां मुस्लिम विधि और देश की विधि में विरोधाभास है, वहां मुस्लिम कानून को प्रभावी करने का प्रयास होना चाहिए। बाबा साहेब के इस विश्लेषण से स्पष्ट हो जाता है कि क्यों भारत के मुसलमानों ने ‘अखिल भारतीय मुस्लिम व्यक्तिगत-विधि बोर्ड’ (।सस प्दकपं डनेसपउ च्मतेवदंस स्ंू ठवंतक) का गठन किया है तथा क्यों वे हर जिले में ‘शरिया-अदालतें’ स्थापित करना चाह रहे हैं। 

मुस्लिम राजनीति 

बाबा साहेब अम्बेडकर ने मुस्लिम राजनीति को भली-भांति समझ लिया था। उनके अनुसार मुस्लिम राजनीति के दो आयाम हैं- आक्रामकता और अलगाववाद। मुसलमानों में हिन्दुओं की दुर्बलता का अनुचित लाभ उठाने की भावना रहती है। हिंसक उपद्रव राजनीति में उनकी रणनीति का स्थायी भाग है। कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को राजनीतिक और अन्य रियायतें देकर उन्हें सहन करने और खुश रखने की नीति से बाबा साहेब खुश नहीं थे। उनके अनुसार ‘छूट देने की नीति’ ने मुस्लिम आक्रामकता को बढ़ावा दिया है। ‘तुष्टीकरण’ की यह नीति हिन्दुओं को भयावह स्थिति में फंसा देगी। बाबा साहेब की यह बात सच निकली। देश का विभाजन इसी का परिणाम है। 

पाकिस्तान का निर्माण 

बाबा साहेब हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच वैमनस्य से बहुत चिंतित रहते थे। उनकी मान्यता थी कि पाकिस्तान के निर्माण से भी मुस्लिम मन संतुष्ट नहीं होगा। पाकिस्तान के निर्माण से भारत की ‘साम्प्रदायिक समस्या’ का हल नहीं निकलेगा। पाकिस्तान तो जनसंख्या की दृष्टि से ‘एकरूप’ बन जायेगा। परन्तु, हिन्दुस्थान तो ‘मिश्रित देश’ ही बना रहेगा। उनका मानना था कि इसका एक मात्र उपाय है- ‘जनसंख्या की अदला-बदली’। सभी मुसलमान पाकिस्तान भेज दिए जावें तथा सभी हिन्दू हिन्दुस्थान में लाए जावें। 

हिन्दू-मुस्लिम समस्या का हल 

बाबा साहेब मानते थे कि हिन्दू-मुस्लिम एकता एक भ्रम है तथा सेकुलरवाद की बातें व्यर्थ हैं। हिन्दू बहुसंख्या में हैं, इस नाते उनके दृष्टिकोण का महत्त्व होना चाहिए। हिन्दुओं को लगता है कि भारतीय जीवन की कुछ विशेषताएँ दोनों समुदायों के बीच एकता के तारों का काम करेंगी। यह निर्विवाद है कि अधिकांश मुसलमान उसी जाति के हैं जिसके हिन्दू हैं। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि सभी मुसलमान एक जैसी भाषा नहीं बोलते और बहुत से तो वही बोलते हैं जो हिन्दू बोलते हैं। दोनों समुदायों में कई सामाजिक रिवाज भी एक समान हैं। बाबा साहेब प्रश्न उठाते हैं कि क्या इन सभी तत्वों से ही हिन्दू व मुसलमान एक राष्ट्र बन जाते हैं? क्या इनमें एक दूसरे से जुड़ने की इच्छा पैदा हुई है? 

बाबा साहेब पूछते हैं कि क्या कोई ऐतिहासिक घटनाक्रम है जिसे हिन्दू और मुसलमान समान रूप से गौरव या व्यथा के विषय में याद रखे हुए हैं? वे कहते थे कि हिन्दू और मुसलमानों को जितनी ये समानताएं मिलाती हैं, राजनैतिक व साम्प्रदायिक शत्रुता उससे कहीं अधिक उन्हें बांटती हैं। 

आशा की किरण 

बाबा साहेब अम्बेडकर के ‘मुस्लिम मानसिकता’ और हिन्दू-मुस्लिम समस्या पर विचारों की आज भी प्रासंगिकता है। उन विचारों को ठीक से समझकर भविष्य का रास्ता तलाश करने की आवश्यकता है। -

हिन्दू और मुसलमानों के एक ही पुरखे हैं, उनका रक्त एक ही है। वे भारत में बाहर से नहीं आये, अतः विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं से अपना संबंध न मानते हुए अपने मजहब के कठोर सिद्धान्तों से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद को बल प्रदान करने की आवश्यकता है।

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