तिब्बत की आजादी - अटल बिहारी बाजपेयी

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जब से चीन म कम्युनिष्ट शासन आया, च्यांग-काई-शेक के साथ बड़े मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध होते हुए भी भारत ने ने चीन का स्वागत किया और संसार के र...

जब से चीन म कम्युनिष्ट शासन आया, च्यांग-काई-शेक के साथ बड़े मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध होते हुए भी भारत ने ने चीन का स्वागत किया और संसार के राष्ट्र में उसे सम्मान का स्थान मिले इसके लिए हमने उनसे बढ़ कर प्रयत्न किया | हमारे प्रयत्नों को देखकर कभी-कभी ऐसा लगा कि मुद्दई सुस्त है | और गवाह चुस्त है | ( हमनें चीन की वकालत की क्योँकि हम समझते थे कि कम्युनिज़्म से हमारा मतभेद होते हुए भी यदि चीन की जनता उस मार्ग का अवलम्बन करती है तो यह उसकी चिंता का विषय है, और भिन्न-भिन्न जीवन पद्धतियों के होते हुए भी भारत और चीन मित्रता के साथ रह सकते है | ) 

लेकिन इस मित्रता को पहला आघात उस दिन लगा जब तिब्बत को चीन की सेनाओं ने 'मुक्त्त किया | हमारे प्रधानमंत्री ने उस समय पुछा था कि तिब्बत को किससे मुक्त किया जा रहा है, तिब्बत किसी देश का गुलाम नहीं था | भारत तिब्बत का निकटतम पडोसी है | अतीत के इतिहास में अगर हम चाहते तो तिब्बत को अपने साथ मिलाने का प्रयत्न कर सकते थे, लेकिन आज जो चीन के नेता भारत पर विस्तारवादी होने का आरोप लगाते है, वे यह भूल जातर है कि हमने कभी भी तिब्बत को अपने साथ मिलाने का प्रयत्न नहीं किया | तिब्बत छोटा है | परन्तु हमने उसके पृथक अस्तित्व का समादर किया | हमने तिब्बत की स्वतंत्रता का सम्मान किया, और हम आशा करते थे कि चीन भी ऐसा ही करेगा लेकिन कम्युनिष्टों के तरीके अलग होते है | उनके शब्दों की परिभाषाएं अलग होती है | जब वह गुलाम बनाना चाहते है तो कहते है कि सुधार करने जा रहे है, आज जब वह दमन कर रहे है तो कहते है कि सुधार करने जा रहे है | अगर कहीं सुधार करना है तो जिन्हे सुधारना है उनमें सुधार की प्रवृति पैदा होनी चाहिए | सुधार ऊपर से नहीं लादा जा सकता | लेकिन तिब्बत में जो कुछ हो रहा है वह सुधार नहीं है | 1950 के सौदे के अंतर्गत तिब्बत की स्वायत्ता का चीन द्वारा समादर किया जाना चाहिए था, लेकिन चीन ने तिब्बत के अंदरूनी मामलों में दखल दिया, चीन से लाखों की संख्या में चीनी तिब्बत लाकर बसाये गए जिससे तिब्बतवासी अपने ही देश में अल्पसंख्यक हो जाएँ और आगे जाकर तिब्बत चीन का अभिन्न अंग बन जाये | तिब्बत से हजारों नौजवानों को चीन में भेजा गया, नए मजहब की शिक्षा प्राप्त करने के लिए, लेकिन जब वह लौट कर आये और चीनी नेताओं ने देखा कि उन पर कोई असर नहीं हो रहा है और उनका तिब्बती रंग नहीं मिटाया जा सकता, उनकी पृथकता कायम रहती है और अपनी जीवन-पद्धति की रक्षा करने का उनका उत्साह अमित रहता है, तो उनके कान खड़े हुए और उन्होंने तिब्बत की जीवन-पद्धति को मिटाने का प्रयत्न किया | वर्तमान संघर्ष एक बड़े राष्ट्र द्वारा एक छोटे राष्ट्र को निगलने की इच्छा के कारण उत्पन्न हुआ है | 

तिब्बत पर चीन की प्रभुसत्ता स्वीकार कर भूल की | मेरा निवेदन है कि जब हमने तिब्बत पर चीन की प्रभुसत्ता स्वीकार की तो हमने बड़ी गलती की | वह दिन बड़े दुर्भाग्य का दिन था | लेकिन गलती हो गयी और हम समझते थे कि यह मामला हल हो जाएगा, संघर्ष पैदा नहीं होगा, और हम दूसरों को मौका नहीं देना चाहते थे कि वे हमारे और चीन के मतभेदों का लाभ उठायें | लेकिन परिणाम क्या हुआ ? चीन ने केवल तिब्बत के साथ हुए समझौते को ही नहीं तोडा, बल्कि उस समझौते की पृष्ठभूमि में भारत के साथ जो, समझौता हुआ था, उसका भी उल्लंघन किया | पंचशील की घोषणा कहाँ गयी ? जो पंचशील के दावे करते है उनका कहना है कि पंचशील के अंतर्गत लोकतंत्र एवं अधिनायकवाद साथ-साथ जीवित रह सकते है | अगर कम्युनिष्ट साम्राजयवाद के अंतर्गत तिब्बत के धर्मप्रिय और शांतिप्रिय लोग अपनी विशिष्ट जीवन पद्धति की रक्षा नहीं कर सकते, तो यह कहना कि इतने बड़े संसार में कम्युनिज़्म और डिमॉक्रेसी के साथ-साथ रह सकते है इसका कोई अर्थ नहीं होता | हम चीन के अंदरूनी मामलों में दखल नहीं देना चाहते परन्तु तिब्बत चीन का अंदरूनी मामला नहीं है | चीन बंधा हुआ है तिब्बत की स्वायत्ता का समादर करने के लिए, तिब्बत के अंदरूनी मामलों में दखल न देने के लिए | लेकिन वह समझौता टूट गया और में समझता हूँ कि अब भारत को भी, भारत सरकार को भी अपनी स्थिति पर पुनर्विचार करना चाहिए | समझौते दोनों तरफ से चलते है, दोनों तरफ से पालन होते है | अगर चीन ने समझौता तोड़ दिया, तो हमें अधिकार है कि हम अपनी परिस्थिति पर फिर से विचार करें | क्या कारन है कि तिब्बत की जनता को उसकी स्वतंत्रता से वंचित किया जा रहा है ? 

तिब्बत क्योँ स्वतंत्र नहीं रह सकता ? कहते है कि पहले स्वतंत्र नहीं था, तो क्या जो देश पहले स्वतंत्र नहीं था, उसे स्वतंत्र रहने का अधिकार नहीं हो सकता है ? क्या जहाँ पहले गुलामी थी, वहां अब भी गुलामी रहनी चाहिए ? अगर हम अल्जीरिया की स्वतंत्रता की आवाज का समर्थन कर सकते है, और वह समर्थन क़स्बर फ़्रांस के अंदरूनी मामलों में दखल देना नहीं है, तो तिब्बत की स्वतंत्रता का समर्थन चीन के अंदरूनी मामलों में दखल केस हो सकता है ? अभी मेरे मित्र श्री खडिलकर ने कहा कि देश में कोई भी ऐसी पार्टी नहीं है, जो तिब्बत की स्वतंत्रता का समर्थन करती है | में उनसे अपना मतभेद प्रकट करना चाहता हूँ | में एक छोटी सी पार्टी का प्रतिनिधि हूँ, लेकिन हमारी पार्टी तिब्बत की स्वतंत्रता की हिमायत करती है | तिब्बत की आजादी की आवाज कितने लोग उठाते है, इससे यह आवाज सही है या गलत, इसका निर्णय नहीं हो सकता | चीनी साम्राज्यवादी अपने पशुबल के द्वारा तिब्बत की स्वतंत्रता की आवाज को आज दबा सकते है, मगर स्वतंत्रता की पिपासा को मिटाया नहीं जा सकता | दमन उस आंदोलन में आग में घी का काम करेगा और आज नहीं तो कल तिब्बत की जनता अपनी स्वतंत्रता को प्राप्त करके रहेगी | 

मगर यह प्रश्न है कि हम उसके लिए क्या कर सकते है ? मैंने निवेदन किया कि हमने 1950 में गलती की | अब हमें उसका दंड भुगतना पड़ रहा है | लेकिन समय है प्रायश्चित करने का, गलती को पहचानने का | में प्रधान मंत्री जी से इस बात की आशा करता हूँ कि वह इस अवसर पर देश की करोङों जनता का सही प्रतिनिधित्व करेंगे | मुट्ठी भर हमारे मित्रों को छोड़कर सारा भारत इस प्रश्न पर एकमत है कि तिब्बत में जो कुछ हो रहा है, वह नहीं होना चाहिए | लेकिन क्या यह संभव है कि तिब्बत चीनी राज्य के अंतर्गत अपनी स्वायत्ता का उपयोग कर सके ? मुझे तो लगता है कि कम्युनिष्ट पद्धति और स्वायत्ता दोनों परस्पर विरोधी बातें है | कम्युनिष्ट राज्य में स्वायत्ता नहीं हो सकती | माओ-त्से-तुंग ने 1930 में कहा था कि हमने ऐसा संविधान बनाया है कि अगर कोई हमसे बहार जाना चाहेगा, तो बहार जा सकेगा | तिब्बती तो बहार जाने की बात नहीं करते थे | वे तो अपना पृथक अस्तित्व बनाये रखना चाहते थे, मगर उन्हें इसकी भी इजाजत नहीं दी गयी | 

उन्होंने यह भी कहा कि हम एक ऐसे फूल को खिलता देखना चाहते है, जिसमें हजारों पंखुड़ियां होंगी | हजारों की तो बात अलग रही, तिब्बत की कोमल काली को भी कुचलता जाता रहा है | जो तिब्बत में साम्राज्यवादी बन बैठे है, वे हम पर आरोप लगा रहे है | हमने कभी तिब्बत को भारत में मिलाने का प्रयत्न नहीं किया | हमने जहाँ चीन को संयुक्त राष्ट्र संघ में स्थान देने की वकालत की थी, वहां हम तिब्बत को भी स्थान देने की वकालत कर सकते थे | उक्रेन सोवियत संघ का अंग है, मगर वह संयुक्त राष्ट्र संघ में अलग स्थान पर बैठा है | तो क्या तिब्बत चीन के साथ होते हुए भी संयुक्तराष्ट्र संघ में अलग स्थान नहीं भर सकता था ? मगर हमने चीन की मित्रता के लिए ऐसा नहीं किया | हमें उस मित्रता का क्या प्रतिदान मिला ? 

हम मित्रता आज भी चाहते है, मगर उस मित्रता का महल तिब्बत की लाश पर खड़ा नहीं किया जा सकता | अन्याय को देखकर हम आंखें बंद नहीं कर सकते | यह भारत की परंपरा रहीं है और इसी परंपरा में हमारे प्रधान मंत्री ने देश की विदेश निति का संवहलन किया है कि जहाँ कहीं अन्याय होगा, मानवता का हनन होगा, अत्याचार होगा, हम अपनी आवाज उठाएंगे, हम सत्य की भाषा को बोलेंगे और निर्भीक होकर हम पददलित होने वाले के अधिकारों का संरक्षण करेंगे | आज तिब्बत कसौटी है नेहरू की नीतिमत्ता की, तिब्बत कसौटी है भारत सर्कार की दृणता की, तिब्बत कसौटी है चीन की पंचशील-प्रियता की | पंचशील की घोषणाएं करने से, पंचशील की जो भावनायें है, उनका आदर नहीं होगा | पंचशील की कसौटी आचरण है | हमारे प्रधानमंत्री कितना भी संयम से काम लें, लेकिन उससे तिब्बत की समस्या हल नहीं होती, तो हमें मानना पड़ेगा कि उस नीति में थोड़ी सी दृणता, थोड़ी सी सक्रियता लाने की आवश्यकता है | दलाई लामा तिब्बत में रहें, या जाएँ, यह कोई बड़ा सवाल नहीं है | यह तो तिब्बती आपस में तय करेंगे | लेकिन तिब्बत एक कसौटी है बड़े राष्ट्र द्वारा छोटे राष्ट्र को निगलने की | अगर छोटे देश इस तरह से निगले जायेंगे, तो संसार की शांति कायम नहीं रह सकती है | दक्षिण-पूर्वी एशिया में अनेक देश ऐसे है जिनमें चीनी बहुसंख्या में निवास करते है | तिब्बत के कारन उन सभी देशों में आशंका की एक लहार उत्पन्न हो गयी है | जहाँ तक भारत का सवाल है, हम पर तो चीन की शनि-दृष्टी दिखाई देती है | चीन के नक़्शे में हमारा प्रदेश उनका बताया गया है | चीन के कम्युनिष्टों ने च्यांग-काई-शेक को तो निकाल दिया, मगर उनके नक़्शे को रख लिया | अगर वे चाहते तो नक्शों को भी निकाल सकते थे | और हमारे कम्युनिष्ट दोस्तों ने तो वह नक़्शे देखें ही नहीं है | मुझे उनकी बात पर विश्वास नहीं होता | लेकिन यह चीन का अप्रत्यक्ष आक्रमण है भारत के लिए | उत्तर प्रदेश के दो स्थानों पर चीनी कब्ज़ा जमा कर बैठे है | ये घटनाएं आने वाले संकट की और संकेत करती है | हमें आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है, मगर हमें दृण नीति अपनानी चाहिए | एक बात का निवेदन और में करूँगा कि दलाई लामा भारत में आये है, वे स्वतंत्रता के लड़ाकू है, अपने देश की स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे है, जिसके कारण उनको अपना देश छोड़कर भारत में आना पड़ा है | में चाहता हूँ कि उन्हें अपने देश की स्वतंत्रता की लड़ाई भारत में चलाने का अधिकार होना चाहिए | उनके ऊपर जो बंधन लगाए है, वे यद्धपि सुरक्षा के लिए है, लेकिन उन बंधनों को ढीला करने की आवश्यकता है | अगर हमारे देशभक्त अंग्रेजी राज्य के दिनों में दूसरे देशों में जाकर भारत की स्वतंत्रता के लिए प्रयत्न कर सकते थे और हमारी आँखों में सम्मान का स्थान प्राप्त कर सकते थे, तो कोई कारन नहीं कि दलाई लामा को भी इस बात की छूट न दी जाये | 

दलाई लामा यदि चीन के साथ समझौता करने में सफल हों, और हमारे प्रधानमंत्री इस सम्बन्ध में कोई मध्यस्थता कर सकें तो इससे बढ़कर देश की जनता को कोई और आनंद नहीं होगा | लेकिन यदि चीन के नेताओं को सीधी राह पर नहीं लाया जा सकता, राजनैतिक या कूटनीतिक दवाब से उन्हें नहीं समझाया जा सकता और वर्मा, लंका और इंडोनेशिया के जनमत को जाग्रत करके, संगठित करके, प्रभावी रूप से उसका प्रकटीकरण करके, अगर चीन पर असर नहीं डाला जा सकता, तो भारत के सामने इसके सिवा कोई विकल्प नहीं रहेगा कि हम दलाई लामा को छूट दे दें कि वह अपने देश की आजादी के लिए प्रयत्न करें | 

भारत के नौजवान तिब्बत की स्वतंत्रता को अमूल्य समझते है - इसलिए नहीं कि तिब्बत के साथ उनके घनिष्ठ सम्बन्ध है, अपितु इसलिए कि हम गुलामी में रह चुके है, हम गुलामी का दुःख और दर्द जानते है, हम आजादी की कीमत को जानते है - उन्हें कार्य करने की स्वतंत्रता दी जाये | तिब्बत की जनता यदि आजादी के लिए संघर्ष करती है तो भारत की जनता उसके साथ होगी | हम अपनी सहानुभूति उसको देंगे और हम चीन से भी आशा करें कि वह साम्राज्यवाद की बातें न करे | साम्राज्यवाद के दिन लद गए | किन्तु यह नया साम्राज्यवाद है | इसका खतरा यह है कि यह एक क्रांति के आवरण में आता है, यह इंकलाब की पोशाक पहन कर आता है, यह नयी व्यवस्था का नारा लगाता हुआ आता है, मगर है यह उपनिवेशवाद, है यह साम्राज्यवाद | अतीत में हम गोरों के साम्राज्यवाद से लड़ते रहे लेकिन यह अब पीलों का साम्राज्यवाद भी प्रकट हो रहा है विश्व की छत पर | हमें दृणता के साथ उसका भी मुकाबला करना चाहिए |   

साभार - लोकसभा, ८ मई १९५९  

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