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उत्तर प्रदेश का राजनीतिक इतिहास (1947–2026) - दिवाकर शर्मा की विस्तृत रिपोर्ट

 



भारत की स्वतंत्रता के समय वर्तमान गुजरात एक पृथक राज्य नहीं था। यह क्षेत्र मुख्यतः बॉम्बे प्रेसीडेंसी के अंतर्गत आने वाले ब्रिटिश प्रशासित जिलों तथा सैकड़ों छोटी-बड़ी रियासतों में विभाजित था। जूनागढ़, नवानगर (जामनगर), भावनगर, पोरबंदर, कच्छ, बड़ौदा और सौराष्ट्र क्षेत्र की अनेक रियासतें राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण थीं। स्वतंत्रता के बाद सरदार वल्लभभाई पटेल और वी. पी. मेनन के नेतृत्व में इन रियासतों का भारतीय संघ में विलय कराया गया। गुजरात के राजनीतिक इतिहास में जूनागढ़ का विलय विशेष महत्व रखता है क्योंकि मुस्लिम नवाब द्वारा पाकिस्तान में शामिल होने की घोषणा के विरुद्ध जनता ने व्यापक आंदोलन किया और अंततः जनमत संग्रह में भारी बहुमत ने भारत के पक्ष में मतदान किया।


1948 में सौराष्ट्र राज्य का गठन हुआ और उच्छंगराय नवलशंकर ढेबर उसके प्रथम मुख्यमंत्री बने। कच्छ अलग प्रशासनिक इकाई रहा जबकि बड़ौदा और अन्य क्षेत्रों को बॉम्बे राज्य में सम्मिलित किया गया। 1956 के राज्य पुनर्गठन अधिनियम के बाद सौराष्ट्र और कच्छ का विशाल द्विभाषी बॉम्बे राज्य में विलय कर दिया गया। इससे गुजराती भाषी जनता में असंतोष बढ़ा और महागुजरात आंदोलन ने जन्म लिया। इस आंदोलन का नेतृत्व इंदुलाल याज्ञिक ने किया। यह केवल भाषाई आंदोलन नहीं था बल्कि सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक आत्मसम्मान का भी प्रश्न बन गया।


लगातार जनदबाव और व्यापक आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने बॉम्बे राज्य के विभाजन का निर्णय लिया। 1 मई 1960 को गुजरात और महाराष्ट्र दो अलग राज्यों के रूप में अस्तित्व में आए। गुजरात के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ. जीवराज नारायण मेहता बने। इस प्रकार गुजरात का जन्म भारतीय संघीय व्यवस्था, भाषाई पहचान और जनआंदोलन की संयुक्त सफलता का परिणाम था।


राज्य गठन के बाद प्रारंभिक तीन दशकों तक गुजरात कांग्रेस का गढ़ बना रहा। 1962 के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 154 में से लगभग 113 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया। जीवराज मेहता के नेतृत्व में प्रशासनिक संरचना, सिंचाई, शिक्षा, औद्योगिक विकास और सहकारी आंदोलन को मजबूत आधार मिला। अमूल मॉडल और सहकारिता आंदोलन ने ग्रामीण गुजरात की राजनीति और अर्थव्यवस्था दोनों को प्रभावित किया।


1967 के चुनाव में कांग्रेस पुनः सत्ता में लौटी, किंतु पहली बार उसके सामने गंभीर चुनौती दिखाई दी। स्वतंत्र पार्टी और कांग्रेस (ओ) का प्रभाव बढ़ने लगा। यह वही समय था जब राष्ट्रीय राजनीति में भी कांग्रेस के भीतर मतभेद उभर रहे थे। गुजरात उन राज्यों में शामिल था जहाँ कांग्रेस के एकाधिकार को सबसे पहले चुनौती मिली। मोरारजी देसाई का प्रभाव भी राज्य की राजनीति में लगातार बढ़ रहा था।


1972 का चुनाव इंदिरा गांधी की लोकप्रियता और बांग्लादेश युद्ध की विजय के बाद हुआ। कांग्रेस ने लगभग 140 सीटें जीतकर भारी बहुमत प्राप्त किया। लेकिन इस विजय के कुछ ही वर्षों बाद गुजरात की राजनीति में ऐसा भूचाल आया जिसने पूरे देश की राजनीति को प्रभावित कर दिया।


1974 का नवनिर्माण आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में गिना जाता है। महंगाई, भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और छात्र असंतोष के कारण शुरू हुआ आंदोलन शीघ्र ही राज्यव्यापी जनांदोलन बन गया। छात्रों से शुरू हुआ यह संघर्ष व्यापारियों, मध्यम वर्ग और आम नागरिकों तक पहुँच गया। मुख्यमंत्री चिमनभाई पटेल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और अंततः सरकार गिर गई। यह स्वतंत्र भारत का पहला ऐसा बड़ा आंदोलन था जिसने जनता की शक्ति से एक निर्वाचित सरकार को हटाया। बाद में यही आंदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय आंदोलन की प्रेरणा बना और अंततः आपातकाल तथा जनता पार्टी के उदय का मार्ग प्रशस्त हुआ।


1975 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को गंभीर नुकसान हुआ। जनता मोर्चा और गैर-कांग्रेसी दलों ने मिलकर सत्ता प्राप्त की। बाबूभाई पटेल के नेतृत्व में पहली स्थायी गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। गुजरात इस प्रकार देश में कांग्रेस विरोधी राजनीति की प्रयोगशाला बन गया। यही वह समय था जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ और अन्य वैकल्पिक राजनीतिक शक्तियों का संगठनात्मक विस्तार तेजी से हुआ।


1980 में इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी के साथ कांग्रेस ने गुजरात में भी पुनरुत्थान किया। माधवसिंह सोलंकी मुख्यमंत्री बने और उन्होंने गुजरात की राजनीति का सबसे चर्चित सामाजिक समीकरण प्रस्तुत किया, जिसे KHAM कहा गया। KHAM अर्थात क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम। इन वर्गों की संयुक्त आबादी राज्य में बहुमत के आसपास मानी जाती थी। इस सामाजिक गठबंधन ने कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता दिलाई।


1980 के चुनाव में कांग्रेस को भारी बहुमत मिला और 1985 में उसने 149 सीटें जीतकर गुजरात विधानसभा के इतिहास का सबसे बड़ा जनादेश प्राप्त किया। यह केवल चुनावी विजय नहीं थी बल्कि सामाजिक इंजीनियरिंग का एक सफल राजनीतिक प्रयोग भी था। माधवसिंह सोलंकी राष्ट्रीय राजनीति में भी चर्चित हो गए। लेकिन KHAM की सफलता के साथ ही उसके विरोध की राजनीति भी जन्म लेने लगी। पाटीदार, ब्राह्मण, जैन, बनिया और शहरी मध्यम वर्ग के एक बड़े हिस्से ने स्वयं को राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस किया। आरक्षण विरोधी आंदोलन शुरू हुए। कई शहरों में हिंसक प्रदर्शन हुए। सामाजिक ध्रुवीकरण बढ़ा और कांग्रेस का व्यापक सामाजिक गठबंधन धीरे-धीरे टूटने लगा। यही वह समय था जब भारतीय जनता पार्टी ने अपने लिए राजनीतिक अवसर तलाशना शुरू किया। संघ की मजबूत संगठनात्मक संरचना, शहरी मध्यम वर्ग का समर्थन, पाटीदार समुदाय का झुकाव और कांग्रेस विरोधी भावना ने भाजपा के विस्तार की नींव रखी। 1980 के दशक के अंत तक गुजरात की राजनीति कांग्रेस बनाम भाजपा की दिशा में बढ़ने लगी थी।

1985 के बाद गुजरात की राजनीति में कांग्रेस का प्रभुत्व बना रहा, लेकिन उसकी सामाजिक नींव कमजोर होने लगी। दूसरी ओर भाजपा अभी सत्ता से दूर थी, किंतु उसके संगठनात्मक विस्तार ने भविष्य के सत्ता परिवर्तन की भूमिका तैयार कर दी थी। आने वाला दशक गुजरात की राजनीति को पूरी तरह बदल देने वाला था, जिसमें मंडल-कमंडल राजनीति, राम मंदिर आंदोलन, भाजपा का उदय और अंततः कांग्रेस युग का अवसान देखने को मिला।


1985 के बाद गुजरात की राजनीति एक ऐसे संक्रमणकाल में प्रवेश कर चुकी थी जिसने अगले तीन दशकों की दिशा निर्धारित की। माधवसिंह सोलंकी की KHAM राजनीति ने कांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता तो दिलाई, लेकिन उसी सफलता ने उसके विरोध में एक नए सामाजिक और राजनीतिक गठबंधन को जन्म दिया। पाटीदार, ब्राह्मण, जैन, बनिया, राजपूत और शहरी मध्यम वर्ग का बड़ा हिस्सा कांग्रेस से दूर होने लगा। आरक्षण विरोधी आंदोलनों, जातीय तनाव और बढ़ती राजनीतिक अस्थिरता ने कांग्रेस की सामाजिक नींव को कमजोर कर दिया। इसी दौर में भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात में अपने संगठन को तेजी से विस्तार देना शुरू किया।


1980 के दशक के उत्तरार्ध में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और भाजपा का नेटवर्क गाँव-गाँव तक फैलने लगा। राम जन्मभूमि आंदोलन ने भाजपा को वैचारिक और राजनीतिक ऊर्जा प्रदान की। गुजरात उन राज्यों में शामिल था जहाँ हिंदुत्व आधारित राजनीति को सबसे अधिक सामाजिक स्वीकार्यता मिलने लगी। 1989 के लोकसभा चुनावों और उसके बाद की राजनीतिक परिस्थितियों ने कांग्रेस विरोधी मतों को एक मंच पर लाने का काम किया।


1990 का विधानसभा चुनाव गुजरात की राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। कांग्रेस लगभग तीन दशकों के प्रभुत्व के बाद सत्ता से बाहर हो गई। जनता दल और भाजपा ने मिलकर चुनाव लड़ा। जनता दल को लगभग 70 सीटें और भाजपा को लगभग 67 सीटें मिलीं। कांग्रेस लगभग 33 सीटों तक सिमट गई। चिमनभाई पटेल मुख्यमंत्री बने। यह चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन नहीं था बल्कि गुजरात की राजनीति में कांग्रेस युग के अवसान और भाजपा युग की शुरुआत का संकेत था।


हालाँकि जनता दल और भाजपा का गठबंधन अधिक समय तक नहीं चल सका। राष्ट्रीय स्तर पर बदलती राजनीतिक परिस्थितियों और वैचारिक मतभेदों के कारण दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। चिमनभाई पटेल ने राजनीतिक व्यावहारिकता का परिचय देते हुए कांग्रेस का समर्थन प्राप्त कर अपनी सरकार बचा ली। यह गुजरात की राजनीति के सबसे रोचक घटनाक्रमों में गिना जाता है, जहाँ कांग्रेस विरोध की लहर पर सत्ता में आए नेता ने बाद में कांग्रेस का सहयोग स्वीकार किया।


1994 में चिमनभाई पटेल का निधन हो गया। इसके बाद छबीलदास मेहता मुख्यमंत्री बने, लेकिन तब तक राजनीतिक परिस्थितियाँ पूरी तरह बदल चुकी थीं। कांग्रेस संगठन कमजोर पड़ चुका था और भाजपा लगातार मजबूत हो रही थी। पाटीदार समुदाय, शहरी मध्यम वर्ग और युवा मतदाताओं का झुकाव भाजपा की ओर बढ़ता जा रहा था।


1995 का विधानसभा चुनाव गुजरात के राजनीतिक इतिहास का सबसे बड़ा सत्ता परिवर्तन माना जाता है। भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत प्राप्त करते हुए 121 सीटें जीत लीं। कांग्रेस लगभग 45 सीटों पर सिमट गई। केशुभाई पटेल मुख्यमंत्री बने। यह विजय केवल चुनावी सफलता नहीं थी बल्कि सामाजिक समीकरणों के व्यापक परिवर्तन का परिणाम थी। जिस पाटीदार समुदाय ने कभी कांग्रेस को समर्थन दिया था, वह अब भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति बन चुका था।


केशुभाई पटेल के नेतृत्व में भाजपा ने सत्ता तो प्राप्त कर ली, लेकिन जल्द ही पार्टी के भीतर नेतृत्व संघर्ष शुरू हो गया। शंकरसिंह वाघेला, जो भाजपा के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते थे, स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहे थे। उन्होंने पार्टी नेतृत्व के विरुद्ध विद्रोह कर दिया। यह भाजपा के इतिहास का पहला बड़ा आंतरिक संकट था।


1996 में वाघेला ने भाजपा छोड़कर राष्ट्रीय जनता पार्टी का गठन किया और कांग्रेस के समर्थन से मुख्यमंत्री बन गए। भाजपा सत्ता से बाहर हो गई। हालांकि यह सरकार स्थिर नहीं रह सकी। कुछ समय बाद दिलीप पारिख मुख्यमंत्री बने, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता जारी रही। इस पूरे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया कि गुजरात में भाजपा का सामाजिक आधार मजबूत हो चुका है, किंतु संगठन के भीतर नेतृत्व संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ था।


1998 में पुनः विधानसभा चुनाव हुए। भाजपा ने एक बार फिर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया और 117 सीटें जीतकर सत्ता में लौट आई। कांग्रेस को लगभग 53 सीटें मिलीं। केशुभाई पटेल दोबारा मुख्यमंत्री बने। यह चुनाव इस बात का प्रमाण था कि वाघेला विद्रोह से भाजपा को अस्थायी नुकसान हुआ था, लेकिन उसका जनाधार सुरक्षित था।


1998 से 2001 के बीच गुजरात ने कई चुनौतियों का सामना किया। सूखा, प्रशासनिक समस्याएँ, ग्रामीण असंतोष और संगठनात्मक चुनौतियाँ सामने आईं। जनवरी 2001 में कच्छ क्षेत्र में विनाशकारी भूकंप आया जिसमें हजारों लोगों की मृत्यु हुई और व्यापक तबाही हुई। सरकार की कार्यशैली को लेकर आलोचनाएँ बढ़ीं। भाजपा नेतृत्व को लगा कि राज्य में नई ऊर्जा और नए नेतृत्व की आवश्यकता है।


इसी पृष्ठभूमि में अक्टूबर 2001 में भारतीय जनता पार्टी ने एक ऐतिहासिक निर्णय लिया। राष्ट्रीय संगठन में कार्यरत नरेंद्र मोदी को गुजरात का मुख्यमंत्री बनाया गया। यह निर्णय उस समय कई लोगों के लिए अप्रत्याशित था क्योंकि मोदी ने इससे पहले कोई विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था और वे मुख्यतः संगठनात्मक कार्यों के लिए जाने जाते थे।


नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के साथ ही गुजरात की राजनीति एक नए चरण में प्रवेश कर गई। उन्होंने प्रशासनिक दक्षता, तेज निर्णय क्षमता और संगठनात्मक अनुशासन पर जोर दिया। लेकिन उनके कार्यकाल के शुरुआती महीनों में ही गुजरात को ऐसी घटना का सामना करना पड़ा जिसने न केवल राज्य बल्कि पूरे देश की राजनीति को प्रभावित किया।


27 फरवरी 2002 को गोधरा में साबरमती एक्सप्रेस के एक डिब्बे में आग लगने से कारसेवकों की मृत्यु हुई। इसके बाद राज्य के विभिन्न हिस्सों में भीषण सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। ये दंगे स्वतंत्र भारत के सबसे चर्चित और विवादास्पद घटनाक्रमों में गिने जाते हैं। विपक्षी दलों और मानवाधिकार संगठनों ने राज्य सरकार की भूमिका पर गंभीर प्रश्न उठाए, जबकि भाजपा और उसके समर्थकों ने तर्क दिया कि सरकार ने परिस्थितियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया और बाद में कानून व्यवस्था बहाल की।


2002 के अंत में हुए विधानसभा चुनाव गुजरात की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण चुनावों में गिने जाते हैं। भाजपा ने 182 में से 127 सीटें जीतकर भारी बहुमत प्राप्त किया जबकि कांग्रेस लगभग 51 सीटों तक सीमित रह गई। नरेंद्र मोदी ने स्वयं को राज्यव्यापी नेता के रूप में स्थापित कर लिया। यह चुनाव केवल भाजपा की जीत नहीं था बल्कि गुजरात की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत था।


2002 के बाद गुजरात की राजनीति में विकास, निवेश, औद्योगिकीकरण, आधारभूत संरचना और मजबूत नेतृत्व की अवधारणा केंद्र में आने लगी। भाजपा ने हिंदुत्व और विकास के मिश्रित राजनीतिक मॉडल को अपनाया। दूसरी ओर कांग्रेस लगातार संगठनात्मक चुनौतियों और नेतृत्व संकट से जूझती रही।


यदि 1990 से 2002 तक के कालखंड का निष्कर्ष निकाला जाए तो यह गुजरात की राजनीति में सबसे बड़े परिवर्तन का दौर था। कांग्रेस का प्रभुत्व समाप्त हुआ, भाजपा राज्य की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी, पाटीदार समुदाय भाजपा की मुख्य ताकत बना, शंकरसिंह वाघेला विद्रोह ने नेतृत्व संघर्ष की सीमाएँ दिखाईं और नरेंद्र मोदी के उदय ने गुजरात को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया। आने वाले वर्षों में गुजरात केवल एक राज्य नहीं रहा बल्कि भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक मॉडल की प्रयोगशाला बन गया।


2002 के विधानसभा चुनावों में मिली प्रचंड विजय के बाद गुजरात की राजनीति पूरी तरह एक नए दौर में प्रवेश कर गई। नरेंद्र मोदी अब केवल मुख्यमंत्री नहीं रहे, बल्कि वे भाजपा के सबसे प्रभावशाली क्षेत्रीय नेताओं में गिने जाने लगे। 2002 से 2014 तक का कालखंड गुजरात की राजनीति में "मोदी युग" के रूप में जाना जाता है। इस दौरान राज्य की राजनीति विकास, निवेश, औद्योगिकीकरण, बुनियादी ढाँचे, प्रशासनिक दक्षता और मजबूत नेतृत्व की छवि के इर्द-गिर्द घूमती रही।


मोदी सरकार ने सड़क, बिजली, जल प्रबंधन, औद्योगिक निवेश और ई-गवर्नेंस को प्राथमिकता दी। "वाइब्रेंट गुजरात समिट" के माध्यम से गुजरात को निवेशकों के लिए आकर्षक गंतव्य के रूप में प्रस्तुत किया गया। समर्थकों ने इसे "गुजरात मॉडल" कहा जबकि आलोचकों ने इस मॉडल में सामाजिक असमानताओं, बेरोजगारी और ग्रामीण समस्याओं की ओर ध्यान आकर्षित किया। बावजूद इसके, गुजरात में भाजपा का जनाधार लगातार मजबूत होता गया।


2007 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला था। कांग्रेस ने किसान, ग्रामीण विकास और सामाजिक मुद्दों को प्रमुखता दी, लेकिन भाजपा ने विकास और नेतृत्व को चुनाव का मुख्य विषय बनाया। परिणामस्वरूप भाजपा ने 117 सीटें जीतकर लगातार दूसरी बार सत्ता प्राप्त की जबकि कांग्रेस लगभग 59 सीटों तक सीमित रही। यह चुनाव इस बात का संकेत था कि गुजरात में भाजपा का समर्थन केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रहा था।


2012 का चुनाव नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री के रूप में तीसरे कार्यकाल की परीक्षा माना जा रहा था। इस चुनाव तक मोदी राष्ट्रीय राजनीति में भी एक बड़े नेता के रूप में उभर चुके थे। भाजपा ने 115 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया जबकि कांग्रेस लगभग 61 सीटों तक पहुँची। यह विजय नरेंद्र मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता और भाजपा के संगठनात्मक ढाँचे दोनों की सफलता मानी गई।


2014 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति का ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने और गुजरात की राजनीति में नेतृत्व परिवर्तन का दौर शुरू हुआ। उनके बाद आनंदीबेन पटेल मुख्यमंत्री बनीं। वे गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं। हालांकि उनके कार्यकाल में पाटीदार आरक्षण आंदोलन ने राज्य की राजनीति को झकझोर दिया।


2015 में हार्दिक पटेल के नेतृत्व में पाटीदार आरक्षण आंदोलन शुरू हुआ। पाटीदार समुदाय लंबे समय से भाजपा का सबसे मजबूत सामाजिक आधार माना जाता था। आंदोलन ने भाजपा के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी। राज्य के विभिन्न हिस्सों में बड़े प्रदर्शन हुए और कई स्थानों पर हिंसा भी हुई। आंदोलन ने यह स्पष्ट कर दिया कि गुजरात की राजनीति में पाटीदार समुदाय का प्रभाव अभी भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।


पाटीदार आंदोलन के साथ-साथ दलित राजनीति और ओबीसी राजनीति भी नए रूप में उभरने लगी। ऊना कांड के बाद दलित राजनीति को नया स्वर मिला और जिग्नेश मेवाणी जैसे नेता सामने आए। इसी समय अल्पेश ठाकोर ने ओबीसी समुदायों को संगठित करने का प्रयास किया। हार्दिक पटेल, जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर की तिकड़ी ने भाजपा के लिए राजनीतिक चुनौती पैदा करने का प्रयास किया।


2016 में आनंदीबेन पटेल के स्थान पर विजय रूपाणी मुख्यमंत्री बनाए गए। भाजपा ने संगठनात्मक संतुलन बनाए रखने की रणनीति अपनाई। 2017 का विधानसभा चुनाव भाजपा के लिए 1995 के बाद सबसे कठिन चुनावों में से एक माना गया। पाटीदार आंदोलन, ग्रामीण असंतोष और कांग्रेस की अपेक्षाकृत सक्रिय रणनीति के कारण मुकाबला कड़ा हो गया।


2017 के चुनाव में भाजपा 99 सीटें जीतकर सत्ता में लौटी जबकि कांग्रेस 77 सीटों तक पहुँच गई। सीटों का अंतर अपेक्षाकृत कम था, लेकिन भाजपा सरकार बनाने में सफल रही। यह चुनाव इस बात का संकेत था कि विपक्ष यदि प्रभावी नेतृत्व और सामाजिक गठबंधन तैयार करे तो भाजपा को चुनौती दी जा सकती है। फिर भी भाजपा का संगठन और नेतृत्व कांग्रेस पर भारी पड़ा।


2021 में भाजपा नेतृत्व ने एक बार फिर अप्रत्याशित निर्णय लेते हुए विजय रूपाणी को हटाकर भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बना दिया। भूपेंद्र पटेल पाटीदार समुदाय से आते हैं और उन्हें अपेक्षाकृत शांत तथा संगठननिष्ठ नेता माना जाता है। इस निर्णय को भाजपा की सामाजिक और राजनीतिक रणनीति का हिस्सा माना गया।


2022 का विधानसभा चुनाव गुजरात के राजनीतिक इतिहास में नया रिकॉर्ड लेकर आया। भाजपा ने 182 में से 156 सीटें जीतकर राज्य के इतिहास की सबसे बड़ी चुनावी विजय प्राप्त की। कांग्रेस केवल 17 सीटों तक सिमट गई जबकि आम आदमी पार्टी ने लगभग 13 प्रतिशत वोट प्राप्त कर 5 सीटें जीत लीं। यह पहली बार था जब आम आदमी पार्टी ने गुजरात विधानसभा में उल्लेखनीय उपस्थिति दर्ज कराई।


2022 के परिणामों ने कई महत्वपूर्ण संदेश दिए। पहला, नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता गुजरात में अभी भी निर्णायक बनी हुई है। दूसरा, भाजपा का संगठनात्मक ढाँचा अन्य दलों की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है। तीसरा, कांग्रेस का पारंपरिक वोट बैंक लगातार कमजोर हो रहा है। चौथा, आम आदमी पार्टी भविष्य में कांग्रेस के स्थान पर मुख्य विपक्ष बनने का प्रयास कर सकती है।


यदि जातीय राजनीति की बात करें तो गुजरात में पाटीदार समुदाय का प्रभाव सबसे अधिक माना जाता है। यद्यपि उनकी जनसंख्या लगभग 12 से 15 प्रतिशत के बीच आंकी जाती है, लेकिन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक प्रभाव उनकी संख्या से कहीं अधिक है। कोली समुदाय राज्य का सबसे बड़ा सामाजिक समूह माना जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य ओबीसी समुदाय, दलित, आदिवासी, मुस्लिम, जैन, बनिया, ब्राह्मण और राजपूत भी राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।


1960 से 1980 तक कांग्रेस लगभग सभी सामाजिक वर्गों की पार्टी थी। 1980 के दशक में KHAM राजनीति ने कांग्रेस को मजबूत किया। 1990 के बाद भाजपा ने पाटीदार, जैन, बनिया, ब्राह्मण और शहरी मध्यम वर्ग को संगठित किया। 2000 के बाद भाजपा ने आदिवासी, दलित और ओबीसी क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय विस्तार किया। यही कारण है कि कांग्रेस का पारंपरिक सामाजिक आधार लगातार कमजोर होता गया।


क्षेत्रीय दृष्टि से गुजरात की राजनीति चार बड़े हिस्सों में विभाजित दिखाई देती है। सौराष्ट्र-कच्छ, उत्तर गुजरात, दक्षिण गुजरात और मध्य गुजरात। सौराष्ट्र क्षेत्र कभी कांग्रेस का गढ़ माना जाता था, लेकिन अब भाजपा यहाँ भी मजबूत हो चुकी है। उत्तर गुजरात में ठाकोर और अन्य ओबीसी समुदायों का प्रभाव है। दक्षिण गुजरात आदिवासी राजनीति का केंद्र रहा है जबकि अहमदाबाद, गांधीनगर, सूरत और वडोदरा जैसे शहरी क्षेत्र भाजपा के सबसे मजबूत आधार माने जाते हैं।


गुजरात की राजनीति में अनेक महत्वपूर्ण घटनाएँ मील का पत्थर साबित हुईं। जूनागढ़ का भारत में विलय, महागुजरात आंदोलन, नवनिर्माण आंदोलन, KHAM राजनीति, भाजपा की पहली सरकार, शंकरसिंह वाघेला विद्रोह, नरेंद्र मोदी का मुख्यमंत्री बनना, 2002 के दंगे, गुजरात मॉडल, पाटीदार आरक्षण आंदोलन और 2022 की रिकॉर्ड जीत इनमें प्रमुख हैं।


राजनीतिक दलों की वर्तमान स्थिति पर दृष्टि डालें तो भाजपा 1995 से लगातार सत्ता में बनी हुई है। यह भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में किसी बड़े राज्य में सबसे लंबे राजनीतिक वर्चस्वों में से एक माना जाता है। कांग्रेस अभी भी कई क्षेत्रों में संगठनात्मक उपस्थिति रखती है, लेकिन उसे नेतृत्व, संगठन और सामाजिक गठबंधन की गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। आम आदमी पार्टी स्वयं को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने का प्रयास कर रही है, किंतु अभी उसका संगठन सीमित है।


2014 के बाद गुजरात की राजनीति में एक और बड़ा परिवर्तन दिखाई देता है। पहले राजनीति क्षेत्रीय नेताओं के इर्द-गिर्द घूमती थी जैसे जीवराज मेहता, बलवंतराय मेहता, माधवसिंह सोलंकी, चिमनभाई पटेल, केशुभाई पटेल और शंकरसिंह वाघेला। लेकिन मोदी-शाह युग में भाजपा ने संगठन आधारित मॉडल को प्राथमिकता दी। मुख्यमंत्री चयन में भी यह प्रवृत्ति स्पष्ट दिखाई देती है, जहाँ व्यक्तिगत जनाधार की तुलना में संगठनात्मक स्वीकार्यता को अधिक महत्व दिया जाता है।


वर्तमान समय में गुजरात भाजपा के प्रमुख शक्ति केंद्रों में नरेंद्र मोदी, अमित शाह, भूपेंद्र पटेल, सी. आर. पाटिल, पुरुषोत्तम रूपाला और अन्य संगठनात्मक नेता शामिल हैं। दूसरी ओर कांग्रेस में शक्तिसिंह गोहिल, अमित चावड़ा, जिग्नेश मेवाणी और कुछ क्षेत्रीय नेता प्रमुख चेहरों के रूप में उभरे हैं। आम आदमी पार्टी की ओर से गोपाल इटालिया और अन्य युवा नेता अपनी पहचान बनाने का प्रयास कर रहे हैं।


2026 की स्थिति में अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि गुजरात अभी भी भाजपा का सबसे मजबूत राजनीतिक गढ़ बना हुआ है। फिर भी पाटीदार राजनीति, युवा मतदाताओं की अपेक्षाएँ, शहरी रोजगार, औद्योगिक विकास के नए प्रश्न, किसान समस्याएँ, आदिवासी क्षेत्रों की राजनीति और विपक्ष के संभावित पुनर्गठन जैसे कारक भविष्य में चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं।


यदि 1947 से 2026 तक की पूरी यात्रा का निष्कर्ष निकाला जाए तो गुजरात की राजनीति रियासतों के एकीकरण से शुरू होकर महागुजरात आंदोलन, कांग्रेस के प्रभुत्व, नवनिर्माण आंदोलन, KHAM सामाजिक गठबंधन, भाजपा के उदय, मोदी युग और वर्तमान संगठनात्मक राजनीति तक पहुँची है। जिस प्रकार उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय सत्ता की राजनीति को प्रभावित करता है, मध्य प्रदेश संगठनात्मक राजनीति का महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है और राजस्थान सामाजिक समीकरणों की प्रयोगशाला है, उसी प्रकार गुजरात आधुनिक भारत की चुनावी रणनीतियों, राजनीतिक प्रबंधन, संगठनात्मक विस्तार और नेतृत्व आधारित राजनीति की सबसे प्रभावशाली प्रयोगशाला के रूप में स्थापित हो चुका है। आज गुजरात केवल एक राज्य नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति की दिशा और दशा दोनों को प्रभावित करने वाली एक महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति के रूप में देखा जाता है।

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