मीडिया के मित्रो, कलम में सरस्वती का वास होता है, यह हाय तौबा की परंपरा रोको | - सुश्री मधु किश्वर

आजादी के इतने वर्ष बाद भी आज अंग्रेजी मीडिया हाबी है जो स्त्री अधिकार के साथ साथ मानव अधिकारों को भी नजर अंदाज करता है | महिला उत्पीडन क...



आजादी के इतने वर्ष बाद भी आज अंग्रेजी मीडिया हाबी है जो स्त्री अधिकार के साथ साथ मानव अधिकारों को भी नजर अंदाज करता है | महिला उत्पीडन के समाचार सनसनी के तौर पर तो प्रकाशित होते हैं, किन्तु उनकी वास्तविक तकलीफ को भी मीडिया समझे | आज विश्व संवाद केंद्र भोपाल द्वारा आयोजित “नारद जयन्ती समारोह” में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रख्यात लेखिका व “मानुषी” की सम्पादक सुश्री मधु किश्वर ने उक्त विचार व्यक्त किये |

स्थानीय शहीद भवन में प्रातः 11 बजे आयोजित इस कार्यक्रम का प्रारम्भ भारत माता व नारद जी के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ | कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार श्री रमेश शर्मा ने की | अतिथि स्वागत व व्यक्तिगत गीत के बाद श्री दिनेश जैन ने विश्व संवाद केंद्र की स्थापना व उसकी गतिविधियों का वर्णन किया | उसके पश्चात् केंद्र के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. अजय नारंग जी ने कार्यक्रम की प्रस्तावना व उद्देश्य पर प्रकाश डाला | | तदुपरांत सुश्री मधु किश्वर का उद्बोधन हुआ | 

मधु जी ने आगे कहा कि मीडिया पर फोरहन फंडेड NGO का अत्यधिक प्रभाव है | कांग्रेस सरकार में इन्हें खुली छूट मिल गई थी | इस फंडिंग का प्रभाव विश्वविद्यालयों व अन्य संस्थाओं पर भी स्पष्ट दिखाई देता है | ये लोग समस्याओं को सनसनीखेज बनाकर परोसते हैं, किन्तु समस्या के समाधान के चिंतन में इनकी कोई रूचि नहीं होती | मलेरिया के मरीज को बीमार है बीमार है चिल्ला चिल्ला कर अगर निमोनिया की दवा दी जायेगी, तो उसका जो हाल होगा, वही मीडिया प्रभावित समाज का हो रहा है | 

कहा जाता है कि परंपरागत रूप से भारत पुरुष प्रधान है, पुरातन पंथी और पिछड़ा हुआ है | इसीलिए महिला उत्पीडन की समस्या है | जबकि सचाई यह है कि पुराने जमाने में दहेज़ जैसी कोई समस्या थी ही नहीं | पिता के घर से महिला को जो मिलाता था उसे दहेज़ नहीं स्त्रीधन कहा जाता था | उस पर सर्वाधिकार महिला का ही होता था, पति भी उसे हाथ नहीं लगा सकता था | भेंट स्वरुप जो कुछ मिलाता था, वह सोना, चांदी, जमीन की शक्ल में मिलता था जो स्थाई संपत्ति होता था | जबकि आज सोफा सेट, क्राकरी, फ्रिज जैसी बस्तुएं दी जाती है, जो एक प्रकार से पारिवारिक विभाजन की शुरूआत होती हैं | मेरी गृहस्थी अलग की भावना को बढ़ावा देती हैं | अतः यह पुरानी नहीं आधुनिक समस्या है |

इलाज के रूप में क़ानून बदलने व समाज सुधार की बात होती है | सर दर्द है तो क़ानून बना दो, छींक आई तो क़ानून बना दो, इ प्रकार की हिस्टीरियाई सोच मीडिया बना देता है | लेकिन इस प्रकार दबाब में बनाए गए कानूनों का हश्र क्या ? सुश्री किश्वर ने निशा शर्मा प्रकरण का उदाहरण दिया जो पूर्व में बड़ी मीडिया सुर्खी बना था | निशा ने दहेज़ माँगने का आरोप लगाकर अपने होने वाले पति मुनीश दलाल को ही नहीं, उसकी शिक्षिका मा व मौसी को भी जेल पहुँचवा दिया था | दस वर्ष जेल में रहने के बाद वे लोग न्यायालय द्वारा निरपराध प्रमाणित हुए | उस समय यह बात सामने आई कि वस्तुतः यह प्रकरण दहेज़ का था ही नहीं | निशा किसी और से शादी करना चाहती थी, इसलिए उसने यह नौटंकी रची थी, और मीडिया आँख मूंचकर उस नौटंकी में सहयोगी हो गई थी | लेकिन उस दौरान न केवल निर्दोष मुनीश का कैरियर तबाह हो गया, वरन उसकी शिक्षिका माँ को भी नौकरी से हाथ धोना पड़ा, वे अपनी पेंशन आदि सुविधाओं से भी वंचित हुईं | जबकि गलत आरोप लगाने वाली निशा शर्मा पर कोई कार्यवाही नहीं हुई |

मीडिया के मित्रो, कलम में सरस्वती का वास होता है, यह हाय तौबा की परंपरा रोको | हर बात के लिए सरकार या पुलिस पर आश्रित होना मृतक समाज का लक्षण है | पहले जर्नलिज्म का ठेका लो, उसके बाद समाज सुधार का | 

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि जम्मू से पधारी प्रख्यात साहित्यकार श्रीमती क्षमा कौल ने पाश्चात्य संस्कृति में नारी व भारतीय चिंतन में नारी के अंतर को स्पष्ट किया | श्रीमती क्षमा कौल ने कहा कि भारतीय पद्धति में क्षरण इस्लाम के आगमन के बाद तथा सांस्कृतिक संहार अंग्रेजों के आने के बाद शुरू हुआ | इसके कारण हम हीनभावना से ग्रसित हो गए | इस दुश्चक्र से बाहर निकलना होगा | भारत की मीडिया कहने को भारतीय है, किन्तु इसने पश्चिमी संस्कृति के कुप्रभाव में आकर पैसा कमाने की होड़ में अपनी आत्मा की बोली लगा दी है | मीडिया और विज्ञापनों में महिला की प्रस्तुति उद्दीपक और ग्लोबल सेल्स गर्ल के रूप में की जा रही है | जबकि भारतीय ज्ञान में महिला का स्थान सर्वोच्च रहा है | 

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री रमेश शर्मा ने क्षमा जी द्वारा प्रस्तुत विषय को और अधिक स्पष्टता देते हुए तथा प्राचीन भारतीय परंपरा और ग्रंथों का हवाला देते हुए कहा कि भारतीय चिंतन में नारी को शक्ति, भक्ति व स्फूर्ति स्वरूपा मान कर प्रधानता दी गई है | वैदिक रिचाओं की रचनाकार भी 26 रिशिकाएं रही हैं | भारत में सदैव नारी को पूज्य माना गया कि न्तु पश्चिम में स्त्री को दोयम दर्जे का तथा भोग्या माना गया | 

कार्यक्रम में सकारात्मक रिपोर्टिंग के लिए तीन प्रतिभागियों का चयन किया गया | इनमें भोपाल से पीपुल्स समाचार पत्र के श्री नरेंद्र शर्मा, इंदौर से दैनिक भास्कर के श्री सुमित ठक्कर तथा मुरैना से पत्रिका के श्री रवीन्द्र सिंह कुशवाह को वर्ष 2015 का पत्रकारिता नारद सम्मान प्रदान किया गया |

कार्यक्रम के अंत में अलीशा द्वारा वन्देमातरम का सस्वर गायन किया गया |

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