स्वनिर्मित चक्रव्यूह में फंसी कांग्रेस - श्री अरुण जेटली

आज एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने कांग्रेस को लाजबाब कर दिया | नेशनल हेराल्ड मामले में गले गले तक फंसे कां...


आज एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने कांग्रेस को लाजबाब कर दिया | नेशनल हेराल्ड मामले में गले गले तक फंसे कांग्रेसी नेतृत्व को उन्होंने न केवल आईना दिखाया, बरन संसद को बाधित करने के कांग्रेसी कुकृत्य की वास्तविक मंशा जगजाहिर की | 

उनकी पोस्ट का हिन्दी अनुवाद -

कांग्रेस पार्टी पिछले कुछ दिनों से संसद के दोनों सदनों को बाधित किये हुए है। गोयबल के ये चेले प्रचारित कर रहे हैं कि उनका पार्टी नेतृत्व राजनीतिक प्रतिशोध का शिकार है। लेकिन वास्तविकता क्या है ?

एक अखबार 'नेशनल हेराल्ड' शुरू करने के उद्देश्य से एक कंपनी बनाई गई । कंपनी को देश के कई हिस्सों में बेशकीमती जमीन आबंटित हुई । इस भूमि का उपयोग अखबार के कारोबार के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए था। लेकिन आज कोई अखबार नहीं है। केवल भूमि और उस पर बनी संरचनाओं का व्यावसायिक रूप से शोषण किया जा रहा है ।

एक राजनीतिक दल को हक़ है कि वह अपनी राजनीतिक गतिविधियों के लिए धन एकत्रित करे । उस प्रयोजन के लिए, उसे आय कर भुगतान से भी छूट मिलती है। कांग्रेस पार्टी अपने द्वारा एकत्रित किये हुए इस धन नब्बे करोड़ रुपए को अखबार की कंपनी को देती है । कहा जा सकता है कि प्रथम दृष्टया यह आयकर अधिनियम के प्रावधानों का खुला उल्लंघन है, जिसमें एक छूट प्राप्त आय को एक गैर मुक्त उद्देश्य के लिए प्रयोग किया गया ।

50 लाख रुपए की मामूली रकम से धारा 25 में निर्मित की गई एक कंपनी को नब्बे करोड़ रुपये कर्ज के रूप में सौंप दिए गए । और इस प्रकार टैक्स मुक्त धन प्रभावी ढंग से एक रियल एस्टेट कंपनी को हस्तांतरित हो गया । उसके बाद रियल एस्टेट कंपनी ने अखबार के पूर्व कंपनी से 99% शेयर होल्डिंग प्राप्त कर लिए । इस प्रकार काफी हद तक कांग्रेस पार्टी के नेतागण धारा 25 के अधीन अखबार के प्रकाशन के लिए बनी कंपनी द्वारा अधिग्रहीत सभी संपत्तियों के मालिक हो गए । और यह लाभ विशाल कर योग्य आय है ।

2012 के बाद भारत के एक जागरूक नागरिक डॉ सुब्रमण्यम स्वामी ने विश्वास के उल्लंघन का आरोप लगाया । इस प्रकार का कृत्य संज्ञान में आने के बाद प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपराध की रिपोर्ट करे । देश का कोई भी नागरिक आपराधिक कानूनी प्रक्रिया निर्धारित कर सकता हैं। एक निचली अदालत ने डॉ स्वामी की शिकायत पर सम्मन जारी किया । आरोपी कांग्रेस पार्टी के नेतागण सम्मन निरस्त कराने के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में गए, वहां से उन्हें अंतरिम राहत भी मिली |आखिरकार, दिल्ली उच्च न्यायालय ने आरोपियों की याचिका खारिज कर दी । अब आरोपियों के पास दो विकल्प हैं। या तो वे सुप्रीम कोर्ट में आदेश को चुनौती दें अथवा निचली अदालत के समक्ष उपस्थित होकर केस लड़ें ।

तथ्य स्वतः स्पष्ट हैं। वित्तीय लेनदेन की इस श्रृंखला में कांग्रेस पार्टी के नेताओं ने खुद ही अपने लिए 'चक्रव्यूह' बनाया है । और अब वे उस 'चक्रव्यूह' से बाहर निकलने का मार्ग ढूंढ रहे हैं । उन्होंने बिना कुछ खर्च किये एक विशाल राशि प्राप्त की । कर मुक्त आय का एक गैर छूट वाले उद्देश्य के लिए इस्तेमाल किया । एक राजनीतिक दल की आय को एक रियल एस्टेट कंपनी के लिए ट्रांसफर किया । उस रियल एस्टेट कंपनी द्वारा भारी कर योग्य आय अर्जित की गई । किन्तु सरकार ने अब तक उस पर कोई भी दंडात्मक कार्रवाई नहीं की । प्रवर्तन निदेशालय ने भी उन्हें कोई नोटिस जारी नहीं किया है। अब जब कि यह आपराधिक मामला न्यायालय,के संज्ञान में आ गया है, आयकर अधिकारी भी नियमानुसार प्रक्रिया का पालन करेंगे। । निचली अदालत के साथ उच्च न्यायालय भी सहमत हो गया है। लड़ाई कानूनी तौर पर लड़ी जाना है। लेकिन कानूनी लड़ाई के परिणाम हमेशा अनिश्चित हैं। कांग्रेस इसलिए आंसू बहा रही है कि उसके साथ राजनीतिक बदले की भावना से काम हो रहा है । 

क्या यह न्यायालयों के खिलाफ आरोप नहीं है? सरकार ने विवादित लेनदेन के संबंध में कोई आदेश पारित नहीं किया है । कानून सबके लिए बराबर है । कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। भारत की यह रानी स्वयं को कानून के प्रति जवाबदेह नहीं मानतीं, और नही उसके निर्णयों को स्वीकार करतीं । क्या कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं को न्यायालयीन नोटिस का सम्मान नहीं करना चाहिए? सरकार अथवा संसद इस मामले में उनकी कोई मदद नहीं कर सकती । फिर विधायी गतिविधि को रोकने के लिए संसद को परेशान क्यों किया जा रहा है ? इस स्वनिर्मित चक्रव्यूह' में फंसा कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व कानूनी तौर पर अपनी लड़ाई लड़ने के स्थान पर संसद को बाधित कर रहा है । लोकतंत्र को परेशान करने से कांग्रेस नेताओं द्वारा की गई वित्तीय अनियमितताओं की लहरें शांत नहीं हो सकतीं ।

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