सरसब्ज है आज भी भ्रष्टाचार की दीमक !

अगर किसी भी सामान्य व्यक्ति से पूछा जाए कि देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है, तो संभवतः अधिकाँश का जबाब होगा – भ्रष्टाचार ! किन्तु दुर्भाग्य ...



अगर किसी भी सामान्य व्यक्ति से पूछा जाए कि देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है, तो संभवतः अधिकाँश का जबाब होगा – भ्रष्टाचार ! किन्तु दुर्भाग्य से भ्रष्टाचार ऐसा विषाणु है, जो दिखता भी है, सब उसे समाप्त करने की बात भी करते हैं, किन्तु यह समाप्त नहीं होता ! क्योंकि उसे समाप्त करने की ईमानदार कोशिश ही नहीं होती |

देश में जब यूपीए सरकार का पतन हुआ, तब माना गया कि उसका प्रमुख कारण यूपीए सरकार की भ्रष्ट छवि पर नरेंद्र मोदी की ईमानदार शख्शियत का भारी साबित होना था | यह देश का सौभाग्य है कि नई सरकार के शीर्ष नेतृत्व पर भ्रष्टाचार की कालिख का कोई दाग अभी तक नहीं लगा है, किन्तु ऐसा भी नहीं है कि ऊपर से नीचे तक सब कुछ ठीकठीक हो | भ्रष्टाचार की दीमक अन्दर ही अन्दर देश की जड़ों को आज भी पूर्ववत खोखला कर ही रही हैं |

देश का एक महत्वपूर्ण संस्थान है “भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबंध संस्थान” | इस संस्थान के देश भर में महज चार केंद्र हैं, जिनमें से एक ग्वालियर में है ! इस संस्थान में निदेशक होने की प्राथमिक शर्त है – एमबीए और एमपीए की स्नातकोत्तर कक्षाओं में दस वर्ष तक अध्यापन का अनुभव | 

ग्वालियर में आजकल जो महाशय इस पद को गौरवान्वित कर रहे हैं, उनका नाम है श्री संदीप कुलश्रेष्ठ | अगर उनकी नियुक्ति नियम बिरुद्ध कर दी जाती तो शायद कोई उतनी गंभीर बात नहीं होती | गंभीर और आपराधिक तथ्य यह है कि उन महाशय ने फर्जी डाक्यूमेंट के आधार पर यह पद हथियाया | मजे की बात यह है कि प्रकरण जगजाहिर हो जाने के बाद भी उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नही हो रही है | प्रस्तुत है इस सम्बन्ध में पुलिस की जांच रिपोर्ट -

संदीप कुलश्रेष्ठ ने दस्तावेज प्रस्तुत किये कि उसने ग्वालियर के माधव महाविद्यालय में एमबीए व एमपीए कक्षाओं में अध्यापन कार्य किया और उन दस्तावेजों के आधार पर जनाब की नियुक्ति हो गई | जबकि मजे की बात यह है कि माधव कालेज में आज दिनांक तक एमबीए व एमपीए की कक्षाएं प्रारम्भ ही नहीं हुईं | स्वयं माधव कालेज के पूर्व निदेशक श्री विवेक जोशी ने इस बाबत दूरभाष पर पुष्टि भी की |

मान लिया जाए कि नियुक्ति कर्ताओं का इसमें कोई दोष नहीं रहा होगा, क्योंकि उन्होंने दस्तावेज देखे और नियुक्ति कर दी | किन्तु लगभग दो वर्ष पूर्व जब श्री मनोज यादव नामक शख्स ने इसकी शिकायत कर मामला उजागर कर दिया, उसके बाद कोई कार्यवाही न होना, यह सिद्ध करता है कि मामला भ्रष्टाचार का है | अधिकारियों ने जानबूझकर नियमों की अवहेलना की है और इसीलिए आपराधिक चुप्पी साधे हुए हैं |

प्रकरण का सम्पूर्ण विवरण इस प्रकार है –

24 फरवरी 2003 को चयन समिति की बैठक हुई और पाया कि जिन आवेदकों के आवेदन प्राप्त हुए थे, उनमें से कोई भी दस वर्ष स्नातकोत्तर कक्षाओं को पढ़ाने की शर्त को पूरा नहीं करता था | 

21 जुलाई 2003 को IITTM के बोर्ड ऑफ़ गवर्नर्स ने प्राध्यापकों की नियुक्ति के लिए दस वर्ष अध्यापन की इस शर्त को शिथिल कर दिया | लेकिन इस शिथिलता की अपनी ही कहानी है | प्रोफेसरों के चयन का मामला सप्लीमेंट्री एजेंडे में रखा गया, ताकि सबकी नजर में न आये और चहेतों को उपकृत किया जा सके | बाद में ग्वालियर उच्च न्यायालय में याचिका क्रमांक ३८५४/२०१३ के परा ९ में मंत्रालय ने शपथ पत्र देकर स्वीकार भी किया कि १० वर्ष के स्नातकोत्तर अनुभव को शिथिल नहीं किया गया है |

इसके बाद हुई नियुक्ति कार्यवाही के मिनिट पर तत्कालीन एडीजी टूरिज्म और सेक्रेटरी टूरिज्म ने हस्ताक्षर नहीं किये | और डॉ. कुलश्रेष्ठ प्रोफ़ेसर बन गए | उनके फर्जी दस्तावेज चल गए |  चालफरेब की हद पार करते हुए कहा गया कि डॉ. कुलश्रेष्ठ ने 1991 से 1997 तक माधव कालेज में प्रोफ़ेसर रहते हुए जीवाजी विश्वविद्यालय में अतिथि शिक्षक के रूप में इन कक्षाओं का मानसेवी अध्यापन कार्य किया और उसका प्रमाण दिया गया महज चंद घंटों का | 

क्या यह सरासर नियमों का मखौल उडाना नहीं है ? क्या इस सम्पूर्ण प्रकरण से गंभीर वित्तीय भ्रष्टाचार की गंध नहीं आती ? श्री मनोज यादव की तत्संबंधी शिकायत पर सीबीआई जांच भी प्रारम्भ हुई, किन्तु विभागीय अधिकारियों के असहयोग के चलते वह जांच दो वर्ष बीत जाने के बाद भी पूर्ण नहीं हुई | 

और देखते ही देखते प्रोफेसर डॉ कुलश्रेष्ठ 21 मार्च 2014 को इस महत्वपूर्ण संस्थान के निदेशक भी बन बैठे | जबकि उनके खिलाफ गाईड ट्रेनिंग प्रोग्राम में अनियमितता संबंधी विभागीय जांच भी लंबित थी | इसका प्रमाण है स्वयं पर्यटन विभाग का यह पत्र -

अब श्रीमान मनोज यादव को क्या करना चाहिए ? सूचना के अधिकार के तहत उन्होंने इस आपाधापी के सारे पुष्ट प्रमाण संकलित कर रखे हैं और अब न्यायालय की शरण में जाने की तैयारी में हैं |

लेकिन अहम सवाल यह कि हमारे केन्द्रीय पर्यटन मंत्री महोदय इस भ्रष्टाचार को अनदेखा क्यों कर रहे हैं ? हो सकता है वे स्वयं भ्रष्ट न हों, किन्तु उनकी नाक के नीचे अगर भ्रष्टाचार हो रहा है, तो यह भी तो उनकी कार्य कुशलता पर प्रश्न चिन्ह है | आशा की जानी चाहिए कि न केवल श्री कुलश्रेष्ठ बल्कि उन्हें बचाने वाले अधिकारी भी अब अपने किये की सजा पायेंगे |

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