कृषि,किसान और मजदूर का बजट - प्रमोद भार्गव

अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखने की द्रष्टि से यह जरूरी था कि बजट, विकास की समावेशी अवधारणा को पुष्ट करे। इस नाते यह बजट श्रेष्ठ व उपयुक...



अर्थव्यवस्था को गतिशील बनाए रखने की द्रष्टि से यह जरूरी था कि बजट, विकास की समावेशी अवधारणा को पुष्ट करे। इस नाते यह बजट श्रेष्ठ व उपयुक्त है। कृषि,किसान,मजदूर और ग्रामीण महिलाओं की जरूरतों की आपूर्ति के उपाय जिस तरह से बजट में दिखाई दे रहे हैं,उससे साफ है,ग्रामीण भारत की आर्थिक हैसियत बढ़ेगी। इस वजह से घरेलू मांग में इजाफा होगा,जिसका अप्रत्यक्ष लाभ देश के उद्योग-धंधों को मिलना तय है। इस बजट में अमीरों से कृषि उपकर के रूप में धन लेकर गरीबों के हित साधने के उपाय किए गए हैं जो समय की जरूरत हैं। ये उपाय कालांतर में गरीब को समर्थ उपभोक्ता बनाने का काम करेंगे। 

गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले परिवारों की महिलाओं के नाम ईंधन गैस सब्सिडी के रूप में दी जाएगी। इससे ग्रामीण महिलाएं चूल्हा फूंकने के कष्टदायी काम से मुक्त होंगी,साथ ही जंगल कुल्हाड़ी की मार से बचेंगे। प्रधानमंत्री के निवेदन पर 75 लाख लोग गैस सब्सिडी स्वेच्छा से छोड़ चुके हैं,जिसका लाभ ग्रामीण महिलाओं को मिलने जा रहा है। गैस सब्सिडी के समायोजन का इससे श्रेष्ठ कोई दूसरा उपाय नहीं हो सकता था। भ्रष्टाचार को प्रौद्योगिकी से नियंत्रित करने व लोक सेवाओं को पारदर्शी बनाने के उपाय इस बजट में हैं,जिनका सीधे-सीधे लाभ उन युवा उद्यमियों को मिलेगा,जो सूचना प्रौद्योगिकी शिक्षा से शिक्षित है। स्टार्टअप व स्टेंडअप योजनाओं को भी प्रोत्साहित किया गया है।

ऐसा शायद बजट में पहली बार हुआ है कि किसान और कृषि आधारित मजदूरों के व्यापक हित साधने के उपाय किसी आम बजट में पेश आए हैं। साथ ही खेती को परंपरागत और जैविक खेती में बदलने के उपायों को प्रोत्साहित करने के लिए भी बजट में प्रावधान हैं। सिंचाई के संसाधन विकसित करने के लिए 17000 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा नाबार्ड के तहत 20,000 करोड़ रुपए ‘सिंचाई निधि‘ के लिए 6000 करोड़ रुपए भूजल ग्रहण क्षेत्र तैयार व पुननिर्माण के लिए, मृदा स्वास्थ्य राष्ट्रीय परियोजना में 368 करोड़ रुपए, दालों के उत्पादन के लिए 500 करोड़ रुपए दिए गए हैं। मनरेगा के तहत भी 5 लाख तालाबों का निर्माण किया जाएगा। इस मकसद पूर्ति के लिए मनरेगा में अब तक की सबसे बड़ी धनराशि 38,500 करोड़ रुपए दी गई है। मोदी सरकार के वजूद में आने के बाद ऐसा भ्रम हो गया था कि यह सरकार देश की इस सबसे बड़ी रोजगार देने वाली योजना को पलीता लगाने जा रही है। किंतु अब जिस तरह से इस मद में धन दिया गया है और तालाब निर्माण का लक्ष्य रखा गया है,उससे तय है कि अकुशल मजदूरों के हित साधने वाली यह योजना दीर्घकालिक चलेगी। सिंचाई के नए संसाधन विकसित होने के बाद देश की 28.5 लाख हेक्टेयर भूमि सिंचित हो जाएगी।

किसान कल्याण निधियों के रूप में खाध सुरक्षा व खाद के प्रयोग के लिए 35,984 करोड़ रुपए रखे हैं। उर्वरक की सब्सिडी अब तक खाद कारखानों के मालिकों को मिलती थी,वह अब सीधे ई-भुगतान के जरिए किसान के खाते में जाएगी। सरकार को कालांतर में ऐसे ही उपाय कृषि उपकरणों को दी जाने वाली सब्सिडी में भी करने चाहिए। किसानों को अब प्राकृतिक आपदा से फसल की जो हानि होती है,उसका भी बीमा मिलेगा। इसके लिए किसान को मामूली प्रीमियम देना होगा। इस बीमा मद में 5500 करोड़ रुपए रखे गए हैं। 

ग्रामीण भारत को स्वच्छ भारत में बदलने का बहतरीन तरीका पेश किया गया है। गांव से जो कचरा निकलेगा, उसका प्रबंध जैविक खाद बनाने में होगा। इस हेतु 9000 करोड़ रुपए का प्रावधान है। इसके साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क बनाने के लिए 19,000 करोड़ रुपए प्रस्तावित हैं। इस राशि से जहां ग्रामों में पहुंच मार्ग विकसित होंगे,वहीं अकुशल आबादी को रोजगार मिलेगा। ग्राम पंचायतों के पोषण के लिए 2.87 लाख करोड़ का बजट प्रावधान है। इस राशि से पंचायतें गांव की जरूरत के हिसाब से विकास कार्य करा सकेंगी। ग्रामीण भारत के स्वास्थ्य अभियान में 655 करोड़ रुपए प्रस्तावित हैं। जैनरिक दवाओं को बढ़ावा दिया जाएगा। इस लक्ष्यपूर्ति के लिए सस्ती दवा के 3000 औषधीय भंडार खोले जाएंगे। यह प्रयोग आम आदमी के बेहतर हित साधने वाला है। 

साथ ही पशु धन के स्वास्थ्य के ख्याल पर भी मुकम्मल ध्यान दिया गया है। नकुल संजीवनी योजना के तहत ‘नकुल स्वास्थ्य पत्र‘ मिलेगा, जिसे दिखाने पर पशु चिकित्सालय में पशुओं का मुफ्त इलाज होगा। गांव में डीजिटल साक्षरता के लिए भी 6 करोड़ परिवारों को जोड़ने का काम होगा। भू-अभिलेखों का भी डीजिटल करण के जरिए नवीनीकरण होगा। मसलन सूचना प्रौद्योगिकी में बल्ले-बल्ले है। ग्रामीण महिलाएं धुएं के अभिशाप से मुक्त हों,इस हेतु गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रही महिलाओं को सब्सिडी आधरित गैस कनेक्सन मिलेगा इस मद में 2000 करोड़ का बजट प्रस्तावित है।

कृषि, किसान, मजदूर और ग्राम को महत्व इसलिए दिया जाना जरूरी था, क्योंकि आज भी देश में किसानों की संख्या 60,000 करोड़ है। आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक देश के किसान की औसत आय मात्र 20,000 रुपए सालाना है। बावजूद इसी किसान के बूते जो फसल उत्पादित होती है,उसी पर अर्थव्यवस्था की गति टिकी होती है। ग्रामीण भारत को तवज्जो इसलिए भी जरूरी थी,क्योंकि भाजपा को बिहार की हार से सबक मिल गया था कि गांव से पीठ फेरने का अर्थ क्या होता है। राजग के कार्यकाल में वित्तमंत्री अरुण जेटली द्वारा पिछले जो दो बजट पेश किए गए हैं,उनमें खेती-किसानी और गांव को महत्व नहीं दिया गया था। मनरेगा के मद में धनराशि घटाकर उसकी रीढ़ तोड़ दी गई थी। अब जरूर मनरेगा को जीवनदान मिल गया है। हालांकि पिछले दो साल से प्राकृतिक आपदाओं के चलते खेती की जो दुर्दषा हुई है,उस परिप्रेक्ष्य में जरूरत तो यह थी कि किसानों को बड़ा आर्थिक पैकेज दिया जाता। जैसा कि डॉ मनमोहन सरकार के दौरान बुंदेलखण्ड और विदर्भ के किसानों को दिया गया था।

इस बजट से उद्योगपति, नौकरी पेशा और पेंशनधारी थोड़े रुष्ट दिखाई दे सकते हैं। दरअसल इन लोगों को उम्मीद थी कि ढाई लाख से ऊपर तक की आय पर कर छूट के प्रावधान कर दिए जाएंगे। किंतु वित्तमंत्री अरुण जेटली ने ऐसा किया नहीं। बल्कि विलासिता की वस्तुओं, महंगी कारों पर आयकर और सरचार्ज बढ़ाकर 20,600 करोड़ रुपए जरूर अतिरिक्त जुटाने के उपाय कर लिए। ऐसा इसलिए भी जरूरी था, क्योंकि सरकार पर वन रैंक, वन पेंशन और सांतवे वेतन आयोग की सिफारिषों को लागू करने का अतिरिक्त बोझ आन पड़ा है। वैसे भी जो पेंशनधारी उच्च पदों से सेवा निवृत्त हुए हैं, वे बिना कुछ किए-धरे 50 से 70 हजार रुपए तक की पेंशन फिजूल में पा रहे हैं। ऐसे में क्या उनका दायित्व नहीं बनता कि मौसम की मार झेल रहा जो किसान रोटी के लिए फसल का उत्पादन करता है, उसके हितों के सरंक्षण में उनकी भी अहम् भूमिका सामने आए। उद्योगपतियों की आमदनी पर जो सरचार्ज लगाया गया है, वह भी जायज है। क्योंकि जब उद्योगपति अपने उद्योग की बुनियाद रखते हैं तब सरकार से सस्ती दर पर भूमि, बिजली, पानी और तमाम तरह के करों में रियायत लेते हैं। उद्योग में भी सरकारी बैंक की पूंजी लगाते हैं। ऐसे में किसान कल्याण के लिए सरचार्ज लेने में कोई बुराई नहीं है।

इस बजट में युवाओं को प्रत्यक्ष रोजगार के प्रावधान दिखाई नहीं दे रहे हैं। लेकिन कौशल दक्षता के उपायों के लिए कई क्षेत्रों में धन आबंटित किया गया है। अनुसूचित जाति, जनजाति एवं अल्पसंख्यकों की उद्यमिता को विकसित करने व इन्हीं वर्ग की महिलाओं को स्टार्टअप से जोड़ने के लिए जरूर 500 करोड़ दिए हैं। इससे ये युवा अपनी सुक्ष्म, लघु व मध्ययम औद्योगिक इकाइयां विकसित कर सकते हैं। 62 नवोदय विद्यालय खोलने का जो प्रस्ताव रखा है, उनके खुलने पर जरूर नए पदों का सृजन होगा। अब तक यह सरकार एक करोड़ युवाओं को दक्ष कर चुकी है और आगे 76 लाख युवाओं को और दक्ष बनाने का लक्ष्य है। हालांकि कौशल विकास, किसी कार्य में दक्ष हो जाने का एक माध्यम जरूर है,लेकिन दक्ष होने के बाद कोई युवा रोजगार की द्रष्टि से आत्मनिर्भर हो जाएगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। 

सीमांत क्षेत्रों में तनावग्रस्त हालात होने के बावजूद इस बजट में प्रतिरक्षा के क्षेत्र में कोई अतिरिक्त प्रावधान सामने नहीं आए हैं, यह चिंतनीय पहलू है। सैनिक रक्षात्मक वस्त्र व दुर्लभ क्षेत्रों में उपयोगी जीवनदायी उपकरणों की उपलब्धता में आज भी पिछड़े हैं। हथियारों की कमी तो है ही, बावजूद रक्षा क्षेत्र को क्यों नजरअंदाज किया गया यह समझ से परे है। सबकुल मिलाकर बजट इसलिए संतोषजनक है, क्योंकि यह इंडिया और स्मार्ट सिटी जैसे दिखावों से निकलकर उस ग्रामीण भारत का पोषण करता दिखाई दे रहा है,जिसके द्वारा की जाने वाली फसलों के उत्पादन से देश की आबादी का पेट भरता है और अर्थव्यवस्था गातिशील बनी रहती है।

प्रमोद भार्गव
लेखक/पत्रकार
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007
लेखक, वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।


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