मौसम का सटीक पूर्वानुमान - कब और कैसे ? - प्रमोद भार्गव

इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने अच्छी बारिश की उम्मीद जगाई है। यदि यह अनुमान यथार्थ के धरातल पर सटीक बैठता है तो किसानों के चेहरे तो...



इस बार मौसम विभाग के पूर्वानुमान ने अच्छी बारिश की उम्मीद जगाई है। यदि यह अनुमान यथार्थ के धरातल पर सटीक बैठता है तो किसानों के चेहरे तो खिलेंगे ही,देश की सकल घरेलू उत्पाद दर भी बढ़ जाएगी। देश के जीडीपी में कृषि का योगदान 15 फीसदी है और खेती-किसानी भी देश का एकमात्र ऐसा व्यवसाय है,जिससे 60 प्रतिशत आबादी की रोजी-रोटी चलती है। फसल आधारित अनेक ऐसे उद्योग हैं, जिनकी बुनियाद अच्छी फसल पर ही टिकी है। इन उद्योगों में चीनी, कपड़ा, चावल, तिलहन, दाल और आटा उद्योग मुख्य हैं। इन्हीं उद्योगों के बूते करोड़ों लोगों का जीवन-यापन चलता है। लेकिन इसके बावजूद भारत में सिंचित क्षेत्र महज 40 फीसदी है, इसलिए खेती की निर्भरता अच्छे मानसून पर टिकी है। बीते दो साल से देश सूखे की चपेट में है। इस कारण दस राज्य सूखाग्रस्त घोषित किए गए हैं और केंद्र ने किसानों की मदद के लिए 10 हजार करोड़ रुपए के सूखा राहत पैकेज भी दिए हैं। अभी-अभी केंद्र सरकार ने सूखाग्रस्त क्षेत्रों में मनरेगा के तहत मजदूरों को 150 दिन काम देना सुनिश्चित किया है। दरअसल हमारे यहां अभी भी मौसम की भविष्यवाणी असलियत के आईने में ठीक नहीं बैठती, इसलिए मौसम विभाग के अनुमानों पर संदेह बना रहता है। 

प्रत्येक साल अप्रैल-मई में मानसून आ जाने की अटकलों का दौर शुरू हो जाता है। यदि औसत मानसून आये तो देश में हरियाली और समृद्धि की संभावना बढ़ती है और औसत से कम आये तो पपड़ाई धरती और अकाल की क्रूर परछाईयां देखने में आती हैं। वर्तमान में यही हाल विदर्भ, मराठावाड़ और बुंदेलखंड में है। मराठावाड़ में तो पानी की दुर्लभता इतनी हो गई है कि राजस्थान के कोटा से रेल द्वारा 350 किमी का सफर तय करके पानी भेजा गया है। 

इस बार मौसम विभाग के महानिदेशक लक्ष्मण सिंह राठौर ने पूर्वानुमान जारी करते हुए कहा है कि दीर्घावधिक औसत के आधार पर मानसून 106 प्रतिशत रहेगा। मसलन 94 फीसदी से लेकर मानसून सामान्य से अधिक बरसेगा। कमोबेश पूरे देश में बारिश अच्छी होगी। हालांकि उत्तर पूर्व तथा दक्षिण पूर्व भारत समेत तमिलनाडू में सामान्य से कम बारिश का अंदाजा लगाया गया है। यह सुकूनदायी खबर है कि सूखाग्रस्त मराठवाड़ में अच्छी बारिश हो सकती है। मौसम मापक यंत्रों की गणना के अनुसार यदि 90 प्रतिशत से कम बारिश होती है तो उसे कमजोर मानसून कहा जाता है। 90-96 फीसदी बारिश इस दायरे में आती है। 96-104 फीसदी बारिश को सामान्य मानसून कहा जाता है। यदि बारिश 104-110 फीसदी होती है तो इसे सामान्य से अच्छा मानसून कहा जाता है। 110 प्रतिशत से ज्यादा बारिश होती है तो इसे अधिकतम मानसून कहा जाता है। 

भारतीय मौसम विभाग की भविष्यवाणियों को सटीक इसलिए नहीं माना जाता, क्योंकि वह अनुमानों पर खरी नहीं उतरती हैं। 2015 में विभाग ने 93 प्रतिशत बारिश होने की भविष्यवाणी की थी, किंतु हुई 86 प्रतिशत। इसी तरह 2014 में 93 प्रतिशत की भविष्यवाणी थी, किंतु रह गई 89 प्रतिशत। 2013 में 98 प्रतिशत की भविष्यवाणी की थी,किंतु बारिश हुई 106 प्रतिशत। पिछले सात साल के आंकड़ों में एक भी साल भविष्यवाणी सटीक नहीं बैठी। इसलिए मौसम विभाग के अनुमान भरोसे के लायक नहीं होते। यदि किसान इन भविष्यवाणियों के आधार पर फसल बोए,तो उसे नाकों चने चबाने पड़ जाएंगे। चूंकि कृषि वैज्ञानिक भी भविष्यवाणी के आधार पर किसानों को फसल उगाने की सलाह देते हैं, लिहाजा उनकी सलाह भी किसान की उम्मीद पर पानी फेरने वाली ही साबित होती है। 

आखिर हमारे मौसम वैज्ञानिकों के पूर्वानुमान आसन्न संकटों की क्यों सटीक जानकारी देने में खरे नहीं उतरते ? क्या हमारे पास तकनीकी ज्ञान अथवा साधन कम हैं अथवा हम उनके संकेत समझने में अक्षम हैं...? मौसम वैज्ञानिकों की बात मानें तो जब , उत्तर-पश्चिमी भारत में मई-जून तपता है और भीषण गर्मी पड़ती है तब कम दाव का क्षेत्र बनता है। इस कम दाव वाले क्षेत्र की ओर दक्षिणी गोलार्ध से भूमध्य रेखा के निकट से हवाएं दौड़ती हैं। दूसरी तरफ धरती की परिक्रमा सूरज के ईद-गिर्द अपनी धुरी पर जारी रहती है। निरंतर चक्कर लगाने की इस प्रक्रिया से हवाओं में मंथन होता है और उन्हें नई दिशा मिलती है। इस तरह दक्षिणी गोलार्ध से आ रही दक्षिणी-पूर्वी हवाएं भूमध्य रेखा को पार करते ही पलटकर कम दबाव वाले क्षेत्र की ओर गतिमान हो जाती हैं। ये हवाएं भारत में प्रवेश करने के बाद हिमालय से टकराकर दो हिस्सों में विभाजित होती हैं। इनमें से एक हिस्सा अरब सागर की ओर से केरल के तट में प्रवेश करता है और दूसरा बंगाल की खाड़ी की ओर से प्रवेश कर उड़ीसा, पश्चिम-बंगाल, बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर-प्रदेश, उत्तराखण्ड, हिमाचल-प्रदेश हरियाणा और पंजाब तक बरसती हैं। अरब सागर से दक्षिण भारत में प्रवेश करने वाली हवाएं आन्ध्र-प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मध्य-प्रदेश और राजस्थान में बरसती हैं। इन मानसूनी हवाओं पर भूमध्य और कश्यप सागर के ऊपर बहने वाली हवाओं के मिजाज का प्रभाव भी पड़ता है। प्रशांत महासागर के ऊपर प्रवाहमान हवाएं भी हमारे मानसून पर असर डालती हैं। वायुमण्डल के इन क्षेत्रों में जब विपरीत परिस्थिति निर्मित होती है तो मानसून के रुख में परिवर्तन होता है और वह कम या ज्यादा बरसात के रूप में भारतीय धरती पर गिरता है। 

महासागरों की सतह पर प्रवाहित वायुमण्डल की हरेक हलचल पर मौसम विज्ञानियों को इनके भिन्न-भिन्न ऊंचाईयों पर निर्मित तापमान और हवा के दबाव, गति और दिशा पर निगाह रखनी होती है। इसके लिये कम्प्यूटरों, गुब्बारों, वायुयानों, समुद्री जहाजों और रडारों से लेकर उपग्रहों तक की सहायता ली जाती है। इनसे जो आंकड़ें इकट्ठे होते हैं उनका विश्लेषण कर मौसम का पूर्वानुमान लगाया जाता है। हमारे देश में 1875 में मौसम विभाग की बुनियाद रखी गई थी। आजादी के बाद से मौसम विभाग में आधुनिक संसाधनों का निरंतर विस्तार होता चला आ रहा है। विभाग के पास 550 भू-वेधशालाएं, 63 गुब्बारा केन्द्र, 32 रेडियो पवन वेधशालायें, 11 तूफान संवेदी, 8 तूफान सचेतक रडार और 8 उपग्रह चित्र प्रेषण एवं ग्राही केन्द्र हैं। इसके अलावा वर्षा दर्ज करने वाले 5 हजार पानी के भाप बनकर हवा होने पर निगाह रखने वाले केन्द्र, 214 पेड़-पौधों की पत्तियों से होने वाले वाष्पीकरण को मापने वाले, 38 विकिरणमापी एवं 48 भूकंपमापी वेधशालाए हैं। लक्षद्वीप,केरल व मंगलुरू में 14 मौसम केंद्रों के डेटा पर सतत निगरानी रखते हुए मौसम की भविष्यवाणियां की जाती हैं। अंतरिक्ष में छोड़े गए उपग्रहों से भी सीधे मौसम की जानकारियां सुपर कम्प्यूटरों में दर्ज होती रहती हैं।

बरसने वाले बादल बनने के लिये गरम हवाओं में नमी का समन्वय जरूरी होता है। हवाएं जैसे-जैसे ऊंची उठती हैं, तापमान गिरता जाता है। अनुमान के मुताबिक प्रति एक हजार मीटर की ऊंचाई पर पारा 6 डिग्री नीचे आ जाता है। यह अनुपात वायुमण्डल की सबसे ऊपरी परत ट्रोपोपॉज तक चलता है। इस परत की ऊंचाई यदि भूमध्य रेखा पर नापें तो करीब 15 हजार मीटर बैठती है। यहां इसका तापमान लगभग शून्य से 85 डिग्री सेन्टीग्रेट नीचे पाया गया है। यही परत ध्रुव प्रदेशों के ऊपर कुल 6 हजार मीटर की ऊंचाई पर भी बन जाती है और तापमान शून्य से 50 डिग्री सेन्टीग्रेट नीचे होता है। इसी परत के नीचे मौसम का गोला या ट्रोपोस्फियर होता है, जिसमें बड़ी मात्रा में भाप होती है। यह भाप ऊपर उठने पर ट्रोपोपॉज के संपर्क में आती है। ठंडी होने पर भाप द्रवित होकर पानी की नन्हीं-नन्हीं बूंदें बनाती है। पृथ्वी से 5-10 किलोमीटर ऊपर तक जो बादल बनते हैं,उनमें बर्फ के बेहद बारीक कण भी होते हैं। पानी की बूंदें और बर्फ के कण मिलकर बड़ी बूंदों में तब्दील होते हैं और बर्षा के रूप में धरती पर टपकना शुरू होते हैं। 

दुनिया के किसी अन्य देश में मौसम इतना विविध, दिलचस्प, हलचल भरा और प्रभावकारी नहीं है जितना कि भारत में, इसका मुख्य कारण है भारतीय प्रायदीप की विलक्षण भौगोलिक स्थिति। हमारे यहां एक ओर अरब सागर है और दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी है और इन सब के ऊपर हिमालय के शिखर हैं। इस कारण देश का जलवायु विविधतापूर्ण होने के साथ प्राणियों के लिये बेहद हितकारी है। इसीलिए पूरे दुनिया के मौसम वैज्ञानिक भारतीय मौसम को परखने मंे अपनी बुद्धि लगाते रहते हैं। इतने अनूठे मौसम का प्रभाव देश की धरती पर क्या पड़ेगा,इसकी भविष्यवाणी करने में हमारे वैज्ञानिक क्यों अक्षम रहते हैं, इस सिलसिले में ऐसा माना जाता है कि सुपर कम्प्यूटरों की भाषा ’अलगोरिथम’ठीक से नहीं पढ़ पाते हैं। वास्तव में हमें सटीक भविष्यवाणी के लिये दो सुपर कम्प्यूटरों की जरूरत है, लेकिन हमने करोडों रूपये खर्च करके एक्स.एम.जी. के-14 कम्प्यूटर आयात किये हैं। कम्प्यूटर भले ही आयातित हों,लेकिन इनमें मानसून के डाटा स्मरण में डालने के लिये जो भाषा हो, वह देशी हो, हमें सफल भविष्यवाणी के लिये कम्प्यूटर की देशी भाषा विकसित करनी होगी ? क्योंकि अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिमालय भारत में है, अमेरिका अथवा ब्रिटेन में नहीं ? लिहाजा जब हम बर्षा के आधार श्रोत की भाषा पढ़ने व संकेत परखने में सक्षम हो जाएंगे तो मौसम की भविष्यवाणी सटीक बैठेगी ? 

प्रमोद भार्गव
शब्दार्थ 49,श्रीराम कॉलोनी
शिवपुरी म.प्र.
मो. 09425488224
फोन 07492 232007

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार हैं।





COMMENTS

नाम

अखबारों की कतरन अपराध आंतरिक सुरक्षा इतिहास उत्तराखंड ओशोवाणी कहानियां काव्य सुधा खाना खजाना खेल चिकटे जी तकनीक दुनिया रंगविरंगी देश धर्म और अध्यात्म पर्यटन पुस्तक सार प्रेरक प्रसंग बीजेपी बुरा न मानो होली है भगत सिंह भोपाल मध्यप्रदेश मनुस्मृति मनोरंजन महापुरुष जीवन गाथा मेरा भारत महान मेरी राम कहानी राजीव जी दीक्षित लेख विज्ञापन विडियो विदेश वैदिक ज्ञान शिवपुरी संघगाथा संस्मरण समाचार समाचार समीक्षा साक्षात्कार सोशल मीडिया स्वास्थ्य
false
ltr
item
क्रांतिदूत: मौसम का सटीक पूर्वानुमान - कब और कैसे ? - प्रमोद भार्गव
मौसम का सटीक पूर्वानुमान - कब और कैसे ? - प्रमोद भार्गव
https://4.bp.blogspot.com/-RgZhMkZjF5Y/VxDuw2ElztI/AAAAAAAAC2k/RSDThCsw10Qh4ODGgiUwVB9FxredRMifQCLcB/s400/pramod.jpg
https://4.bp.blogspot.com/-RgZhMkZjF5Y/VxDuw2ElztI/AAAAAAAAC2k/RSDThCsw10Qh4ODGgiUwVB9FxredRMifQCLcB/s72-c/pramod.jpg
क्रांतिदूत
http://www.krantidoot.in/2016/04/Accurate-weather-forecasts-when-and-how.html
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/
http://www.krantidoot.in/2016/04/Accurate-weather-forecasts-when-and-how.html
true
8510248389967890617
UTF-8
Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy