“क्या हिन्दू मिट जायेंगे ?” – सच्चिदानंद चतुर्वेदी

“हर शाख पर उल्लू बैठे है, अंजाम – ए – गुलिस्तां क्या होगा ?” अगर किसी फुलवारी में से हर पौधे की शाखाओं पर उल्लू बैठे हो, तो उस फुल...

“हर शाख पर उल्लू बैठे है,
अंजाम – ए – गुलिस्तां क्या होगा ?”

अगर किसी फुलवारी में से हर पौधे की शाखाओं पर उल्लू बैठे हो, तो उस फुलवारी का क्या होगा ? उन उल्लुओं की तरफ देखो तो चिंता पैदा होती है ! भारत में कुछ ऐसा ही हुआ ! बुद्धिहीनता के हाथ में भारत की पतवार है ! जड़ता के हाथ में भारत का भाग्य है ! नासमझियों का लम्बा इतिहास है ! अंधविश्वासों की पुरानी परंपरा है ! अंधेपन की सनातन आदत है और उन सबके हाथ में भारत का भाग्य है ! – ओशो 

क्या हिन्दू मिट जायेंगे ?

एक अत्यंत गंभीर सवाल – अस्तित्व का सवाल – आज हिन्दू मानस में तीव्रता के साथ घूम रहा है ! इस विषय में यथा क्रम और सांगोपांग अध्यन करनेवालों के चिंतन के परिणाम एक भयानक प्रश्न खड़ा कर रहे है – क्या हिन्दू मिट जायेंगे ? 

हिन्दू अर्थात सनातनी, बोद्ध, जैन, सिक्ख, सरना आदि ! क्या देश दारूल इस्लाम बन जाएगा जिसमे सिर्फ मुसलमान होंगे और थोड़े से दबे कुचले, स्तरहीन, अपमानित जजिया देने वाले मिमियाते ईसाई ? क्या आजके ये लफ्फाजी और शेखी बघारने वाले राजनीतिज्ञ भयानक विस्फोटों के धुंए में खो जायेंगे ? धर्म निरपेक्षता की डींग हांकने वाले, भ्रष्टाचरण द्वारा जनता के धन की लूट से तिजोरियां भरने वाले, सत्ता लोलुप दृष्टिहीन और पतित नेताओं का अंतिम हश्र यही होगा ? हिन्दू धर्म गुरुओं, महात्माओं, संतों, पुरोहितों आदि के रूप में हिन्दू समाज के कल्याणार्थ त्याग और समर्पण के साथ प्रवात्तिवाद के प्रचार की जगह आश्रमों में भौतिक जीवन का आनंद उठाने वाले मस्जिदों में नमाज पढ़ाएंगे ? 

सेक्युलरिज्म के समर्थन में लम्बे लेख लिखने वाले और स्वयं को निष्पक्षता का प्रतीक बताने वाले, अरब के पैगम्बर के यशोगान में अपनी लेखनी का कमाल दिखाएँगे ? वामपंथी विचारक, सांस्कृतिक और सैद्धांतिक संसार में त्रिशंकू की भूमिका निभाते निभाते अंत में भौंचक्के होकर पुनः एक भयंकर भूल की स्वीकारोक्ति के बाद माथा धुन लेंगे ? क्या कवियों, लेखकों और विचारकों के पुस्तकालयों से वैसी पुस्तकें निकाल बाहर फैक दी जायेंगी जो इस्लामी ईमान पर असर डालती है ? क्या बुद्धिजीवियों की बुद्धि तभी खुलेगी जब बौद्धिक स्वछंदता का अंत हो जाएगा ? 

जीवन का नैसर्गिक एवं सर्वाधिक आहूलाद्कारी जन्मसिद्ध अधिकार स्वतंत्रता, मस्जिदों और बुर्कों में सिमट कर रह जायेगी ? क्या मूर्ती निर्माण की गहनतम शिल्पकला का लोप हो जाएगा ? धर्म के आवरण में लिपटी बर्बरता (लूट, क़त्ल, अपहरण, बलात्कार) विजयी होकर ही रहेगी ? क्या लौकिक-पारलौकिक स्वार्थ में अँधा बना, आत्मकेंद्रित, सैद्धांतिक मदिरा के नशे में डूबा सम्पूर्ण हिन्दू समाज अपनी संवेदनहीनता का परिणाम भुगत कर ही रहेगा ?

इसका उत्तर निश्चित हाँ के रूप में दिखाई देने लगा है ! तथ्य और विद्वानों की समीक्षा के परिणाम यही उत्तर देते है ! मुजाहिद्दीन (मुस्लिम लड़ाके), मजहबी शिक्षा और संस्कार से प्रभावित पूरे समुदाय के समर्थन से, मजहब की सम्पूर्ण स्थापना हेतु, जेहाद (धर्मयुद्ध) में श्रद्धापूर्वक सम्मिलित होने की स्थिति में है ! 

(पुस्तक में यहाँ कुछ कुरआन के आदेश दिए गए थे इस लेख को प्रकाशित करते समय  हम उन्हें प्रकाशित नहीं कर रहे है )

इन्ही शिक्षाओं और इनके प्रभाव से निर्मित संस्कारों के कारण चौदह सौ वर्षों से जेहाद (क़त्ल, लूट, अपहरण, बलात्कार) का नंगा नाच मानवता झेलती आ रही है ! भारत में सबसे पहले 712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर आक्रमण के पश्चात गवर्नर हज्जाम को भेजे अपने पत्र में जो लिखा था, उससे आक्रमण के मजहबी उद्धेश्य का पता चलता है ! 

“राजा दाहिर, उसके भतीजे, उसके योद्धाओं और बड़े अधिकारियों को मार डाला गया है तथा काफिरों को या तो इस्लाम कबूल करवा दिया गया है या उनका वध करवा दिया गया है ! मूर्तियों वाले मंदिरों के स्थान पर मस्जिदें और अन्य इबादतगाह बना दिए गए है ! खुत्बा पढ़ा जाता है, अजान दी जाती है, ताकि नमाज सही वक़्त पर हो सके ! सुबह शाम तक्वीर और अल्लाह-ओ-अकबर की तारीफ़ अता की जाती है !

(डॉ. आंबेडकर द्वारा “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ़ इंडिया” में टाइटस की पुस्तक “इंडियन इस्लाम” से उद्धत)

यह सन्देश जिसके साथ राजा दाहिर का कटा सर भी था, प्राप्त होने पर अपने सेनापति को यह उत्तर भेजा – खुदा का हुक्म है –“काफिरों को कोई पनाह (शरण) न दो, सिर्फ उनकी गर्दनें काटो ! यह जान लो कि यह महान खुदा का हुक्म है ....! (सन्दर्भ-वही)

इसी मजहबी उन्माद के अंतर्गत महमूद गजनबी ने 17 बार भारत को लूटा ! लाखों लोगों का क़त्ल किया, लाखों औरतों को गुलाम बना कर गजनी के बाजारों में बेचा ! उसके बाद मोहम्मद गौरी, तैमूर, ऐवक, बलवन, खिलजी आदि से होते हुए ओरंगजेब और टीपू तक यही नरसंहार की विनाश लीला चलती रही ! आधुनिक युग में कुख्यात मोपला नरसंहार हुआ जिसमे 5000 हिन्दू क़त्ल कर दिए गए ! अनगिनत, महिलाओं का बलात्कार और अपहरण हुआ ! 20000 हिन्दुओं का बलात धर्म परिवर्तन हुआ !

आजादी की लड़ाई और देश विभाजन के समय मजहबी मानसिकता के कारण अनगिनत लोगों का क़त्ल, अपार संपत्ति की लूट, औरतों का बलात्कार और अपहरण तथा बलपूर्वक धर्म परिवर्तन का नंगा नाच हुआ ! चर्चिल के अनुसार सिर्फ माउंटबेटन के समय बीस लाख लोग मारे गए थे !

सदियों से चले आ रहे इसी अत्याचार की उपज आज के पाकिस्तान, बांग्लादेश और भारत के 95 प्रतिशत मुसलमान है, जो अपने पूर्वजों पर ढाए गए अकथनीय यातनाओं को विस्मृत कर इस्लाम का दास बन चुके है ! अब तो हिन्दुओं को अपना पूर्वज मानने में भी उन्हें शर्म आती है !

पैगम्बर की बुद्धि की विलक्षणता का कमाल ही कहेंगे कि आज चौदह सौ वर्ष बाद भी वही लोग उनका झंडा उठाये रखने को विवश है जिनके पूर्वजों का असीम यातना पूर्वक अंत किया गया ! पी. आर. कुडडू की पुस्तक “इम्पेरियलिस्ट केरेक्टर ऑफ़ इस्लाम” में एक प्रसंग उद्धुत है ! पैगम्बर से अपने मतभेदों को सुलझाने के लिए उनके चाचा अबू तालिब के पास मूर्ती पूजक कुरैश सरदार गए हुए थे ! उस समय पैगम्बर ने कहा था – “मैंने इनके सामने ऐसा सिद्धांत रखा है, यदि ये इसे स्वीकार कर लें तो न सिर्फ अरब बल्कि पूरा संसार इनके पैरों के नीचे होगा !”

(तरजमा-ए-कुरान मजीद, बँगला अनुवाद, सैयद अबुल आला मौदूदी पृष्ठ- 775)

उसी विलाक्षणता का परिणाम है कि आज तक, अपने देश को हीन समझकर, अपनी संस्कृति से घृणा कर, अपनी जान और संपत्ति को दांव पर लगाकर और दरिद्रता झेल कर दुनिया के करोडो मुसलमान अरब की महानता को स्वीकार कर नतमस्तक है !

वही कारण है जिससे पाकिस्तान के ब्रिगेडियर एस के मलिक अपनी पुस्तक “कुरानिक कंसेप्ट ऑफ़ वॉर” में कहता है कि “पृथ्वी पर गैर मुस्लिमों द्वारा बनाया गया कोई क़ानून मुसलमानों पर लागू नहीं होता ! कुरान का एक शब्द भी बदला नहीं जा सकता ! इस प्रकार का प्रश्न उठाने की सजा मौत है !”

इसी मजहबी उन्माद से प्रेरित तथाकथित धर्म निरपेक्षता वादी मौलाना अबुल कलाम आजाद तक ने यह उदगार व्यक्त किया था – “एक बार मुस्लिम शासन के अधीन रह चुका भारत देश पुनः इस्लाम के लिए अवश्य जीता जाना चाहिए !”

मजहबी मानसिकता और जेहादी कार्यवाही से ही इस्लाम का विस्तार होता रहा है ! सदियों से, काफिर हिन्दू इसी प्रकार मरते कटते, लुटते पिटते, बलात्कृत और अपमानित होते मुसलमान बनते आ रहे है ! उन पर आई विपत्ति के प्रति हिन्दू समाज की प्रतिक्रिया आत्मघाती ही रही ! उनके दुःख में साथ देने, उन्हें सात्वना देने, उन्हें दौड़कर ह्रदय से लगाने और अपनाने की पहल करने के विपरीत उन्हें जाती बहिष्कृत, अछूत और तिरस्कृत ही किया गया ! परिणाम स्वरुप उनके मन में सम्पूर्ण हिन्दू समाज के प्रति रोष और घृणा का भाव ही पैदा हुआ ! कुछ तो इसके कारण, कुछ बाकी समुदाय को अपनी श्रेणी में लाने और कुछ मजहबी परम्पराओं में घुल मिल जाने के कारण पूरे देश को दारूल इस्लाम बनाने की उनकी इच्छाएं उन्मादी ज्वार का रूप लेती नजर आ रही है !

वोट की ताकत से सत्ता पर अधिकार करने के लिए सुनियोजित ढंग से जनसँख्या वृद्धि की जा रही है ! इसके लिए मजहब का ढाल इस्तेमाल हो रहा है ! फिर पाकिस्तान और बांग्लादेश से घुसपैठ करा कर जनसँख्या वृद्धि कराई जा रही है ! हिन्दू समाज की अपनी कुरूतियों तिलक-दहेज़ एवं खुलापन के चलते भारी संख्या में गैर मुस्लिम लडकियां मुसलामानों के घरों में पहुचती रहती है तथा थोडा थोडा धर्मान्तरण भी समय समय पर हो ही जाता है ! गणना के हिसाब से 25-30 वर्षों में ही सत्ता पर इस्लाम का कब्ज़ा हो जायेगा ! तब तक की मुस्लिम आबादी, उनके वोट देने की दर, हिन्दुओं के वोट देने की दर, उनका संगठित वोट और हिन्दुओं के वोट का बिखराव आदि पर ध्यान देने पर यह स्पष्ट हो जाएगा ! सभी दलों के मुस्लिम सांसदों को मिलाने से संसद में बहुमत जिस दिन होगा उसी दिन मिलकर वह सरकार बना लेंगे और शरियत का क़ानून थोप देंगे ! इस योजना में बिकाऊ हिन्दू सांसद सत्ता की साझेदारी के लोभ में एक दुसरे से आज की ही तरह होड़ लेते रहेंगे ! “वन्दे मातरम्” के संसद में गायन के सवाल पर जो कुछ हुआ उससे स्थिति का आंकलन सहज ही किया जा सकता है ! 

लेकिन रणनीति का अंत यहीं नहीं है ! विदेशी धन से बड़े पैमाने पर मदरसों का निर्माण, जेहाद के लिए मुजाहिद्दीनों की ट्रेनिंग और अस्त्र शस्त्रों के भंडारण से सेक्युलरिस्टों को छोड़ कर सभी अवगत है ! तथ्य को प्रकट करने से बुद्धदेव भट्टाचार्य का मूंह बंद भले ही कराया जा सकता है लेकिन उसे बदला तो नहीं जा सकता ! “आईएसआई का आतंक” नामक अपनी पुस्तक में श्री राम नरेश प्र. सिंह, वरिष्ठ अधिकारी, इंटेलिजेंस ब्यूरो, भारत सरकार (सेवा निवृत) द्वारा आइएसआई द्वारा जेहाद में सहयोग हेतु बिछाए गए जाल का विस्तार से वर्णन किया गया है ! जेहाद के विषय में फैलाए गए भ्रम को स्पष्ट करते हुए आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मसूद अजहर ने कहा, “इस्लाम में जेहाद का एकमात्र मतलब है हत्या” ! (दैनिक जागरण, पटना, 8 दिसंबर २००३)

आतंक के वातावरण में मुसलमान बनने और उसी शिक्षा, संस्कार और परंपरा के चलते रहने के कारण, गैर मुसलमानों के साथ हत्या, लूट और व्यभिचार को, अनैतिक, नीच और घिनौना कर्म समझने की जगह, मुसलमान मजहबी फर्ज समझते है ! हिन्दू मानस में सहज ही यह आशंका उत्पन्न होती है कि कश्मीर जैसे छोटे से इलाके में जब भारतीय सेना वहां के हिन्दुओं की रक्षा नहीं कर सकी, जो आज करोड़ों की सम्पति और जवान बेटे-बेटियाँ खोकर शिविर में दिन काट रहे है, तब एक साथ पूरे भारत में जेहाद का बिगुल बजने पर पूरे देश के रक्त में डूब जाने के सिवाय और क्या शेष बचेगा ? 

देश विभाजन के समय के जेहादी अभियानों का ह्रदय विदारक वर्णन न्यायमूर्ति गोपाल दास खोसला ने अपनी पुस्तक “स्टर्न रेकनिंग” में विस्तार से किया है ! जन्म से आज तक के इस्लामी परंपरा पर नजर डालते ही भविष्य की भयानकता साफ़ झलकने लगती है ! किसी समुदाय के अस्तित्व का सवाल उसके जीवन की सभी समस्याओं की तुलना में हजार गुना बड़ा है ! हिन्दू समाज के लोग इस समस्या पर पर्दा डाल कर स्वयं को धोखा दिए चले जा रहे है ! जब कोई समुदाय आत्म केन्द्रित, स्वार्थी, अज्ञानी और कायर बन जाता है तब मिट जाने का स्वयं ही मार्ग तैयार करता है ! फिर भी जब वह किसी के लिए भी अहितकर और आघातकारी नहीं है , तब अपने विश्वास, पंथ, विचार, स्वाभिमान और स्वतंत्रता के साथ जीने के उनके मानवीय अधिकार का दूसरा उदाहरण क्योँ करें ! पर बर्बर सांस्कृतिक परंपरा में न्याय और नैतिकता का कोई मूल्य नहीं होता !

तथ्यों के आलोक में सरकारों, तथाकथित प्रगतिशील पत्रकारों, विचारकों, वामपंथियों और धर्म निरपेक्षतावादियों से यह अपेक्षा है कि वे मुस्लिम समुदाय से कहें कि वे यह फतवा जारी करे कि कुरआन, हदीस, सीरत-अन-नबी आदि जिन्हें संयुक्त रूप से शरियत कहते है, में गैर मुसलमानों के प्रति शत्रुता का जो हुक्म है उसे निरस्त किया जाता है ! साथ ही जेहाद में किसी गैर मुस्लिम का क़त्ल या लूट या औरतों का अपहरण जैसे नीच कर्म को वर्जित कर दिया गया है ! लेकिन बड़ा सवाल यह है कि यह फतवा जारी करना और मुसलमानों के सभी संगठनों के द्वारा उसका समर्थन करना क्या संभव है ? उसके साथ ही क्या वे कभी भी परिवार नियोजन के कार्यक्रम को अपनाना स्वीकार करेंगे ?

जाहिर है यह असंभव है ! वे इस्लाम में संसोधन के लिए कभी तैयार नहीं हो सकते ! रक्त रंजित जेहाद द्वारा देश को दारूल इस्लाम बनाने के अपने फर्ज से वे कभी विमुख नहीं हो सकते ! यही तथ्य है ! यही सच्चाई है !

तब क्या आपका यह फर्ज नहीं बनता है कि सोये हिन्दुओं को जगा कर कहें कि अब भी तो अहिंसा व्रत को त्यागो और आत्मरक्षार्थ जैसे को तैसा करने को तैयार हो जाओ ! हर कसबे, बस्तियों और मुहल्लों में संगठन बना कर आत्म शक्ति में वृद्धि करो ! स्वार्थ के दलदल से निकल कर आत्मरक्षा की भावना से प्रेरित बनों ! क्यूंकि शान्ति के लिए शक्ति का संतुलन आवश्यक शर्त है ! कश्मीर का दृश्य आँखों के सामने है और शासकों का घिनौना रूप भी ! अहिंसा की नौटंकी से मौपलों द्वारा किये गए नर संहार और देश विभाजन काल के समय बीस लाख लोगों के कत्लेआम को देखा जा चुका है !

सरकारों, पत्रकारों, वामपंथियों, सेक्युलरिस्टों से इन आशंकाओं का तथ्यपरक उत्तर चाहिए ! सभी राजनीतिक दल इस विषय पर अपनी स्पष्ट नीति का प्रकाशन करें ! इस समस्या की गंभीरता के अनुरूप अपनी कार्यशैली में बदलाव लायें ! धोखाधड़ी और क्षुद्र राजनीति से ऊपर उठा कर देशव्यापी चर्चा छेड़े और स्थाई समाधान की व्यवस्था करें, चाहे वह कितना ही कठोर क्योँ न हो ! सभी दलों में यह अत्यंत खतरनाक प्रवति बनी है कि वे समस्या को उखाड़ कर उसका स्थाई समाधान निकालने के विपरीत, तात्कालिक लाभ के लिए, उसको ढंकते और उससे बचते रहना चाहते है ! अगर यही क्रम चलता रहा तो आगे इसका परिणाम बहुत भयंकर होगा ! जेहाद द्वारा अर्थात हत्या, लूट, बलात्कार, अपहरण, विध्वंस द्वारा इस्लामी सत्ता स्थापित करने और सभी गैर मुसलमानों को मुसलमान बनाने के इस्लामी फर्ज को पूरा करने की विश्वव्यापी जो कट्टरता दिख रही है, उसे हलके में नहीं लिया जाना चाहिए ! उसका सबसे पहला शिकार भारत ही होने वाला है !  

श्री सच्चीदानंद चतुर्वेदी जी की पुस्तक "क्या हिन्दू मिट जायेंगे से साभार    

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“क्या हिन्दू मिट जायेंगे ?” – सच्चिदानंद चतुर्वेदी
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