देश विभाजन के दौर का आँखों देखा हाल - क्यों नहीं बदली वह मानसिकता ? - सच्चिदानंद चतुर्वेदी

पंजाब स्थित शेखपुरा के एक प्रत्यक्षदर्शी का कथन है :- “दिनांक २६ अगस्त (१९४७ में, लाहौर में) की सुबह ७ बजे में सरदार आत्मा सिंह के मिल प...

पंजाब स्थित शेखपुरा के एक प्रत्यक्षदर्शी का कथन है :- “दिनांक २६ अगस्त (१९४७ में, लाहौर में) की सुबह ७ बजे में सरदार आत्मा सिंह के मिल पर पहुंचा ! करीब सात आठ हजार गैर मुस्लिम शरणार्थी शहर के विभिन्न भागों से आकर वहां जमा हुए ! करीब ८ बजे मुस्लिम ब्लूच मिलिटरी ने मिल को घेर लिया ! उनके द्वारा एक फायर किया गया जिससे मिल के अन्दर एक औरत की मृत्यु हो गयी ! उसके बाद कांग्रेस समिति के अध्यक्ष स्वामी आनंद सिंह मिलिटरी वालों के पास हरा झंडा लेकर गए और पूछा कि आप क्या चाहते है ? उन्होंने कहा कि शहर में पूरी गैर मुस्लिम संपत्ति लूट ली गयी है और जला दी गयी है ! मिलिट्री वालों ने २ हजार ६ सौ रुपये की मांग की, जिसे उन्हें दे दिया गया ! इसके बाद दूसरा फायर किया गया जिससे एक आदमी की मौत हो गयी ! पुनः आनंद सिंह द्वारा अनुरोध करने पर उन्होंने बारह सौ रुपये की मांग की, उसे भी दे दिया गया ! इसके बाद उन लोगों ने कहा कि वे सभी लोगों कि तलाशी लेना चाहते है, इसलिए सभी बाहर निकल जाएँ, जो अन्दर रह जायेंगे उन्हें गोली मार दी जायेगी !

सभी सात आठ हजार शरणार्थी बाहर निकल आये ! तब उन्हें कहा गया कि उनके पास जो भी कीमती सामान और रुपये हो उसे एक जगह जमा करें ! स्वामी आनंद सिंह ने अभागे शरणार्थियों को आदेश का पालन करने की सलाह दी ! थोड़ी ही देर में सात आठ मन सोने का ढेर और करीब तीस चालीस लाख रुपये जमा हो गए ! मिलिट्री के लोगों द्वारा यह सारी दौलत उठा ली गयी !

उसके बाद वह शरणार्थियों में से सुन्दर लड़कियों की छटइयाँ करने लगे ! इस पर स्वामी आनद सिंह जी द्वारा आपत्ति व्यक्त करने पर उन्हें गोली से उड़ा दिया गया ! उसके बाद एक बलूच मुस्लिम सैनिक द्वारा सभी गैर मुस्लिम शरणार्थियों के सामने ही एक लड़की को छेड़ा जाने लगा ! यह असहाय था ! इस पर एक युवक ने बलूच सैनिक पर वार किया ! इसके बाद तो सभी बलूच सैनिक शरणार्थियों पर गोली बरसाने लगे ! शरणार्थियों की अगली पंक्ति के लोग उठकर अपनी लड़कियों की इज्जत बचाने के लिए उनकी हत्या करने लगे ! इस बीच फायरिंग जारी रही जिससे शरणार्थी उसी जगह गिर कर मरने लगे ! 

में एक पेड़ के पीछे जमीन पर पड़ गया ! कुछ देर बार मैंने सोचा कि यहाँ रहने से में बच नहीं सकूँगा, इसीलिए अति विक्षिप्तता में उठा और गोली वर्षा के बीच में ही बगल की दीवार फांद कर उस तरफ चला गया ! इस अंतराल में मेरे सर और पैर के पास गोलियों की बौछार आ रही थी ! में सोच नहीं पा रहा हूँ कि में जीवित कैसे बच गया ? दूसरी तरफ जो बलूच सैनिक पहरे पर था, मुझ पर बन्दूक तान दिया ! में उसके बहुत करीब था ! मैंने झपट कर उसकी बन्दूक छीन ली और कुंडे के जोर से उसके सर पर वार किया, जिससे वह बेहोश हो गया ! पूरे समय मेरे चारों और गोलियों की बौछार हो रही थी ! में पूरी ताकत से दौड़ कर मैदान की और भागा, जहाँ सटे हुए एक मिल में रखे हुए जूट के बोरों के नीचे छिप गया ! 

मिल के अंदर भी बंदूकें चलने की आवाजें सुनाई पड़ रही थी ! दो तीन घंटे बाद इस डर से कि में यहाँ पकड़ा जाऊँगा, मिल के ऊपर के एक कमरे में गया जहाँ दो अभागी हिन्दू लडकियां पहले से ही छिपी हुई थी ! वहां से में देख सकता था कि जिस मिल से में भागा हूँ वहां के अभागे गैर मुसलमानों के साथ क्या हो रहा है ! जो बलूच सैनिकों के हमले से बच निकले थे उन्हें मुस्लिम दंगाई बर्बर तरीके से क़त्ल कर रहे थे ! एक घटना में उन्होंने एक महिला से उसके छोटे बच्चे को छीन कर टुकड़े टुकड़े कर दिया और उसके बाद औरत के पेट में भाला घौप दिया ! अब जहाँ से जीवित बच निकलना असंभव था कि तभी एक मुसलमान सिपाही जो मेरा बहुत पुराना मित्र था, को देखकर उसके पास गया ! मैंने लड़कियों को अपनी बहन बताया ! हम लोगों पर दूसरे दंगाइयों द्वारा हमला होने ही वाला था लेकिन मुसलमान सिपाही पास ही था ! मैंने हाथ देकर उसे पुकारा और बहनों के साथ अपनी रक्षा की भीख मांगी ! सौभाग्य से वह मान गया और हम लोगों को छुपाकर मालियान कलां बस्ती में पहुंचा दिया !” (स्टर्न रेकनिंग – जस्टिस जी.डी. खोसला, पृष्ठ १३३)

खिलपाडा के एक शिक्षक ने बताया कि किस प्रकार उनके घर पर सात भिन्न भिन्न जत्थों द्वारा आक्रमण किया गया ! प्रत्येक जत्थे में तीन सौ से चार सौ मुसलमान होते थे ! उनके घरों में मूर्तियों और देवी देवताओं के चित्रों को तहस नहस कर बल पूर्वक उनको परिवार सहित मुसलमान बनाया गया ! पूरे जिले के लिए यह एक मिसाल है ! लगातार बसे कई बस्तियों में मुसलमान जमा होकर किसी चुने हुए गाँव पर आक्रमण करते थे ! उनके घरों को लूटकर आग लगा देते थे ! उसके बाद मौत की धमकी देकर सामूहिक मुसलमान बनाते थे ! उनकी जवान औरतों को उठा ले जाते थे और मुसलमानों से उनकी शादियाँ कर देते थे ! इस प्रकार से नोआखाली जिले के 95 प्रतिशत हिन्दुओं को मुसलमान बनाने का आंकलन किया गया था जिसमे उनकी औरतों का बलात्कार और अपहरण के बाद मुसलमानों से शादियां होना शामिल था ! धर्मान्तरितों को कलमा पढ़ाया जाता था, उनसे गाय कटवाई जाती थी और उनका मांस खिलाया जाता था, मुसलमानों से निकाह के पहले औरतों की चूड़ियाँ तोड़ कर सिन्दूर मिटा दिया जाता था !

१० अक्टूबर १९४६ को लक्ष्मी पूजा के दिन साहापुर इंग्लिश हाई स्कूल में पंद्रह हजार मुसलमानों की सभा हुई ! पीर, गुलाम सरवर ने मुसलमानों को नारायणपुर के जमींदार बाबू सुरेन्द्र नाथ बोस की कचहरी बाड़ी और राऊ साहब राजेन्द्र नाथ चौधरी, कारापाड़ी के मकान पर धावा बोलने के लिए उकसाया ! उसके तुरंत बाद साहापुर बाजार के हिन्दुओं की दुकाने पुलिस अवर निरीक्षक के सामने ही जला दी गयी ! मुसलमानों ने फिर नारायणपुर कचहरी में धावा बोल कर उसमे आग लगा दी ! जब घर जलने लगे, सुरेन्द्र बाबू ने छत से छलांग लगा दी ! वे मुसलमानों के सामने ही गिरे ! उन्मादी मुसलमानों ने उनके शरीर के टुकड़े टुकड़े कर आग के हवाले कर दिया और उनका सर काट कर पीर साहब के पास ले गए जो पास ही खड़ा था !

उसके बाद राजेन्द्र बाबू के घर पर आक्रमण कर उसमे आग लगा दी ! उनके परिवार के सभी लोग छत पर चढ़ गए ! कुछ बदमाशों ने उन पर गोलियां चलाई ! ऊपरी कमरे के पीछे कुछ ने छिपने का प्रयास किया कि छत टूट गयी ! वे आग में गिर पड़े और जल कर मर गए ! कुछ उपद्रवियों ने एक नारियल का पेड़ काटा ! उसे सीढी की तरह इस्तेमाल कर छत पर चढ़ गए ! एक एक कर मर्दों को नीचे लाया गया और उन्हें कसाई की तरह क्रूरता से काटा गया ! औरतों को नीचे लाकर उन्हें पीर साहब के यहाँ हांक हांक कर ले जाया गया ! जो, कुछ दूरी पर एक नाव में उनका इन्तजार कर रहा था ! उसने किसी दूसरे घर में उनको ले जाने के लिए कहा ! राजेन्द्र बाबू और दूसरों का सिर काट कर पीर साहब को भेंट किया गया ! चौंतीस लोग जिनमे आधा दर्जन अनजान लोग थे, उस स्थान पर काट डाले गए ! (“स्टर्न रेकनिंग” – जस्टिस जी.डी. खोसला, पृष्ठ 71,72)

इन घटनाओं से निष्कर्ष निकालना और अपने बंधू बांधवों को इसकी जानकारी देना हिन्दू विद्वानों और विचारकों का कर्त्तव्य था ! किन्तु इसकी समीक्षा करने के विपरीत इसे ढँक कर ठन्डे बस्ते में डाल दिया गया ! नेहरूवादी सरकार ने कानून बना कर इसकी व्यवस्था कर दी कि कोई इसकी स्पष्टता के साथ समीक्षा प्रकाशित न कर सके ! यह क़ानून बनाया गया कि ऐसी ऐसी कोई सामग्री प्रकाशित न की जाए जिससे उत्तेजना या निराशा प्रकट हो और समाज में शांति भंग होने की आशंका हो !

लेकिन यह तो, और भी बुरा हुआ ! इससे कुछ आगे चलकर बहुत बड़े विध्वंश, बर्बादी, नरसंहार, लूट, नारियों के शीलभंग और अपहरण जैसे जंगली कृत्य के लिए आसानी हो गयी ! जिनके साथ यह हैवानियत होती है और आगे भी होने वाली है उसके बचाव के लिए कोई उपाय नहीं किया गया ! उलटे उससे वह जाति, समुदाय अनभिज्ञ बना रहे इसकी व्यवस्था कर दी गयी ! जिस मजहबी व्यवस्था में यह शैतानियत एक सबाब (पुण्य) माना गया है, ऐसा करना उनका फर्ज बतलाया गया है, उसके विस्तार के लिए तो सरकारी सहूलियत प्रदान की गयी, लेकिन जिसे भुक्त भोगी होना है उसे इस अत्याचार के स्वरुप की समीक्षा और समुदाय को इससे अवगत कराने के लिए इसके प्रकाशन पर ही रोक लगा दी गयी ! यह कैसा दुष्चक्र है ? इस तरह का अन्यायपूर्ण कृत्य करनेवाले की खोजकर उसकी भर्त्सना करनी चाहिए ! वैसे अपवित्र और विश्वासघातियों को अपमानित किया जाना चाहिए, जिससे आगे आनेवाले समय में किसी को भी अपनी सनक, गैर जिम्मेदारी, मूढ़ता या हैवानियत के कारण ऐसा करने का साहस न हो ! अब तो उस महाविनाश का समय निकट आता जा रहा है !

हिन्दुओं को ऐसे क़ानूनों का पालन क्योँ करना चाहिए ? अपनी सुरक्षा की व्यवस्था करने का सबको अधिकार है ! जब हम जान चुके है कि मुसलमानों का मजहब ही जेहाद के नाम पर मूर्ती पूजकों का क़त्ल करने, उनको लूटने, उनकी औरतों को बेइज्जत करने, उनका अपहरण करने, उनको बलपूर्वक गौमांस खिलाकर धर्मान्तरित करने, उनकी पूजा की मूर्तियों को तोड़ने, उनके मंदिरों को ध्वस्त करने, उनके विस्वास के हर चीज को तहस-नहस करने, उनको हर तरह से कुचलकर अपमानित करने, उनसे अकारण झगडा करने, उनके साथ सख्ती से पेश आने और उनसे शत्रुता बनाए रखने का हुक्म देता है तो फिर मूर्ती पूजकों को क्या करना चाहिए ?

चुपचाप रहना चाहिए ? इसकी कोई जानकारी उन्हें न हो इसकी व्यवस्था कर देना चाहिए ? इस विषय की समीक्षा नहीं की जानी चाहिए ? अपने समुदाय के लोगों से इस विषय पर बात नहीं करनी चाहिए ? यदि जानकारी हो भी जाए तो अपने बचाव या शत्रुता रखने वाले से मुकाबले की कोई तैयारी नहीं करनी चाहिए ? अपनी शक्ति नहीं बढानी चाहिए ? मुकाबले के लिए अपने समुदाय के लोगों को प्रेरणा नहीं दी जानी चाहिए ? यदि मुसलमान अपने मजहब का पालन करते हुए शत्रुता का बर्ताव करता है और हिन्दुओं के साथ दुर्व्यवहार पूर्वक और कड़ाई से पेश आता है, तो हिन्दुओं को भी सहिष्णुता के साथ व्यवहार करना चाहिए और सहन करते रहना चाहिए ? हिन्दुओं को हर हालत में अहिंसा का पालन करना ही चाहिए, जब तक कि उनका अंत न हो जाए ? तथाकथित सेक्यूलरों के विचार से तो यही चाहिए ! इसी ‘चाहिए’ के चलते पकिस्तान बना, कश्मीर से हिन्दुओं का सफाया हो चुका है और इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि आगे चलकर पूरे भारत में वही नहीं होगा !

इसलिए मुसलमानों के हिंसात्मक, बर्बर और कुसंस्कृत व्यवहार के पीछे कौन से तत्व है, जो सदियों से ज्यौं के त्यौं चले आ रहे है, इसे जानना हर हिन्दू के लिए आवश्यक है ! जानना इसलिए आवश्यक है कि इतिहास से यह स्पष्ट है कि भारत में पाँव रखने के साथ ही उपर्युक्त व्यवहार द्वारा हिन्दुओं का संहार करने और उनका धर्म और उनकी संस्कृति को मिटाने का जो सिलसिला शुरू किया, वह आज तक जारी है ! निकट भविष्य में ही वह हिन्दुओं के अस्तित्व का ख़तरा बनता नजर आ रहा है ! इसलिए हिन्दुओं को अति गम्भीरता से और सबसे पहले, इस विषय में ध्यान केन्द्रित करना होगा ! यह अस्तित्व के संकट का सवाल है, इसलिए जीवन से सम्बंधित किसी भी समस्या से अधिक महत्वपूर्ण है ! 

हिन्दू अपने सभी महत्वपूर्ण कार्यक्रमों में कुछ क्षण का विराम देकर इस समस्या को समझने हेतु चिंतन मनन करे तथा उदासीनता और असावधानी का त्याग कर हर गाँव मुहल्लों में एकत्र होकर संगठनात्मक कार्यवाही करे ! हर आदमी एक धारणा के साथ जीता है ! आपकी भी कोई धरणा होगी ! पर किसी धारणा को स्थाई नहीं बनाना चाहिए और सत्य की खोज एवं तदनुरूप कार्यवाही हेतु सदा सचेष्ट रहना चाहिए ! निष्पक्षता और सहिष्णुता के दिखावे के झूठे मोह में इस अति गंभीर समस्या से जी चुराने का परिणाम इतना बुरा होने वाला है, जितना शायद ही आप ने कभी सोचा हो ! याद रखिये आपकी यह उदासीनता आपके बच्चों का विनाश का कारण बनने वाली है जिनके भविष्य के लिए आप सारे दुष्कर्म पर उतारू है !

साभार :- सच्चिदानंद चतुर्वेदी की पुस्तक “क्या हिन्दू मिट जायेंगे” पुस्तक के कुछ अंश

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क्रांतिदूत: देश विभाजन के दौर का आँखों देखा हाल - क्यों नहीं बदली वह मानसिकता ? - सच्चिदानंद चतुर्वेदी
देश विभाजन के दौर का आँखों देखा हाल - क्यों नहीं बदली वह मानसिकता ? - सच्चिदानंद चतुर्वेदी
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