आपातकाल और शिवपुरी के कार्यकर्ताओं की मस्ती - गोपाल डंडौतिया

१९७४ में श्री जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ छात्रों का नव निर्माण आन्दोलन गुजरात वा उसके बाद बिहार से होता हुआ पूरे देश म...


१९७४ में श्री जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में प्रारम्भ हुआ छात्रों का नव निर्माण आन्दोलन गुजरात वा उसके बाद बिहार से होता हुआ पूरे देश में फ़ैल गया ! भ्रष्टाचार, कोटा परमिट राज, लाल फीताशाही के विरुद्ध पूरा देश उठ खड़ा हुआ ! विद्यार्थी परिषद् ने भी इस आन्दोलन में अग्रणी भूमिका निर्वाह की ! देश भर के लाखों देशभक्त राष्ट्र वादी नेताओं के समान शिवपुरी के भी नामचीन राजनैतिक व सामजिक कार्यकर्ता इंदिरा जी की कुर्सी परस्ती की खातिर जेल में पहुँच गए ! 

शिवपुरी में भी सर्व श्री सुशील बहादुर अष्ठाना, घनश्याम भसीन, जगदीश वर्मा, हरदास गुप्ता, भगवान लाल पाराशर, बाबूलाल गुप्ता, दामोदर शर्मा, कृष्ण कान्त रावत, बैजनाथ छिरोलिया, रामजी दास बंसल, चन्द्र भान पटेल, उत्तम चन्द्र जैन, बाबूलाल जी शर्मा, मुन्नालाल गुप्ता, गोपाल सिंघल प्रारम्भिक दौर में ही गिरफ्तार कर लिये गए ! ये तो वे लोग हैं जिन्हें गिरफ्तार कर मीसा में भेजा गया ! उन लोगों की संख्या तो २०० से ज्यादा थी जिन्हें १५१ में गिरफ्तार कर माफीनामा लिखवाकर जमानत पर रिहा किया गया !

जहां एक ओर देवकांत बरुआ इंदिरा इज इण्डिया एंड इण्डिया इस इंदिरा कह कर मां भारती का अपमान कर रहे थे तो सरकारी संत बिनोवा भावे जैसे लोगों ने भी आपातकाल को अनुशासन पर्व की संज्ञा दी !

शिवपुरी महाविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष व विद्यार्थी परिषद् के प्रांतीय महामंत्री होने के नाते मेरा भी वारंट निकला ! मेरे पिताजी तृतीय श्रेणी कर्मचारी संघ के अध्यक्ष थे, अतः पूर्व सूचना मिल जाने के कारण मैं भूमिगत हो गया | एक माह तक पुलिस के हाथ नहीं आया | प्रशासन ने दबाब बनाया कि यदि मैं हाजिर नहीं हुआ तो पिताजी श्री रामचरण लाल जी डंडोतिया को मीसा में बंद कर दिया जाएगा | नौकरी जायेगी सो अलग | विवश होकर गिरफ्तारी देना तो तय किया, साथ ही यह भी तय किया कि सीधे सादे ढंग से गिरफ्तारी नहीं देंगे, गिरफ्तार भी होंगे तो शान से, सम्मान से | सत्याग्रह करके गिरफ्तारी देंगे |

एक अन्य मित्र श्री दिनेश गौतम (अब स्वर्गीय) का भी वारंट था | जब उनके परिवार को पता चला कि मैं गिरफ्तारी दे रहां हूँ, तो उन्होंने आग्रह किया कि दिनेश भी मेरे साथ में ही गिरफ्तारी दे दें | मेरे मित्र हरिहर शर्मा जी के पिताजी शिवपुरी के प्राचीन नीलकंठेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी थे ! दूसरे दिन हम दोनों उसी मंदिर के बगीचे से सत्याग्रह के लिए सर पर काला कपड़ा बांधकर निकले (उसी अवसर का चित्र) !

25 जुलाई 1975 प्रातः दस बजे दोनों महादेव गली से सदर बाजार, माधव चौक, कमलागंज आदि में घूमते हुए नारे लगा रहे थे – इंदिरा तेरी तानाशाही नहीं चलेगी, जो हिटलर की चाल चलेगा वो कुत्ते कि मौत मरेगा, नरक से नेहरू करे पुकार मत कर बेटी अत्याचार | हमारे पीछे सेंकडों की संख्या में हुजूम हो गया | उस समय के माहौल में जब यह पता न हो कि गिरफ्तारी के बाद कब छूटेंगे, छूटेंगे भी या नहीं, इस प्रकार स्वयं को गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत करना, शिवपुरी वासियों को द्रवित कर रहा था | कई दूकानदार व नगरवासी उस समय आंसू पोंछते दिखाई दिए | हम लोग पूरे शहर में घूमते रहे, किन्तु कोई गिरफ्तार करने ही नहीं आया | कुछ तो उमड़ा हुआ जन सैलाब, और कुछ पुलिस की भी आतंरिक सहानुभूति | अंततः बहुत देर बाद गिरफ्तार करने पुलिस अधिकारी पहुंचे |

गिरफ्तारी के बाद हम लोगों को शिवपुरी जेल में रखा गया | तीन लोगों के लिए उपयुक्त कमरे में 22 मीसाबंदी ठूंसे गए |रात को सोते समय यदि किसी को करबट लेना हो तो बगल वाले को कहना पड़ता था कि भैया जरा तू भी करबट ले ले |कुछ बुजुर्ग मीसाबंदियों के आग्रह के कारण जेल की मेस में बने भोजन के स्थान पर स्वयं भोजन बनाकर करने का तय हुआ | मेनुअल के अनुसार जो भोजन सामग्री मिलती थी, वह कितनी अपर्याप्त होती थी, इसका एक रोचक उदाहरण है | सबके हिस्से में चार रोटी और दाल आती थी | एक मीसाबंदी की खुराक कुछ अधिक जानकर सर्व श्री मुन्नालाल गुप्ता, अशोक पांडे तथा मैंने अपने हिस्से की एक एक रोटी उनको देना तय किया | कुछ समय पश्चात जब उक्त मीसाबंदी से पूछा कि भैया अब तो पेट भर जाता होगा न ? तो उन्होंने रूहांसे स्वर में जबाब दिया, भाई साहब इनसे क्या होता है, मैं तो इतनी ही और खा सकता हूँ | स्मरणीय है कि उस समय मेरी व अशोक पांडे जी (वर्तमान में आरएसएस प्रांत सहसंघचालक) की आयु भी क्रमशः 24 व 22 वर्ष ही थी |

केवल एक शौचालय था, जिसमें 22 लोगों को जाना होता था, अतः स्वाभाविक ही लाईन लगती थी ! जेल में समय बिताने के लिए नियमित दिनचर्या बनाई गई | सुबह नित्यकर्म उपरांत व्यायाम स्वाध्याय, गीता पाठ फिर भोजन बनाने की सामूहिक तैयारी | दोपहर में कुछ बौद्धिक कार्यक्रम, चर्चा, प्रतियोगिता आदि |

हमारे जेल जीवन की दिनचर्या को देखकर एक राजनैतिक कार्यकर्ता ने तो अपनी निजी दैनन्दिनी में लिखा भी कि लगता है आरएसएस वालों ने इंदिराजी से मिलकर यह योजना बनाई है, ताकि लोग जो ओटीसी (संघ शिक्षा वर्ग) नहीं कर पाते, उन्हें जबरन गोपाल डंडौतिया जैसे लोग, प्रशिक्षित कर दें ! यही क्रम मार्च 1976 तक चला | तब तक कई लोग माफी मांगकर छूट छाट गए और शेष लोग ग्वालियर सेन्ट्रल जेल शिफ्ट कर दिए गए, जहां का जीवन अपेक्षाकृत बेहतर था | 

ग्वालियर पहुँचने के बाद तो हमारे पौबारह हो गए ! मस्ती और मौज का ठिकाना नहीं रहा ! हर दिन होली और रात दीवाली ! शिवपुरी की हमारी टोली की मौजमस्ती जहाँ अन्य लोगों के मनोबल को बनाए रखने में मददगार थी, तो वरिष्ठ जनों को कई बार नागवार भी गुजरती ! प्रसिद्ध साहित्यकार व कवि श्री जगदीश तोमर हम लोगों से प्रभावित होकर, हमारी ही बैरक में रहने आ गए ! हम लोगों ने कहा भी कि आप तो अधिकारी बैरक में ही रहते तो ठीक होता, किन्तु वे नहीं माने ! कुछ समय तक तो हमने भी उनका लिहाज किया, किन्तु आखिर कब तक ? कोई एक दो दिन की बात तो थी नहीं ! जल्द ही शिवपुरी के कार्यकर्ता अपने मूल हुडदंगी रूप में आ गए ! यहाँ तक कि तोमर जी कहने लगे, कि भाई मुझे ऐसा लगता है कि मैंने अपना बिस्तर चौराहे पर लगा लिया है ! इस शिकायत के बाद भी वे रिहाई तक रहे हमारे ही साथ !

हम लोगों की मस्ती को दर्शाता एक रोमांचक अनुभव साझा करता हूँ - 

एक दिन रात को एक बजे बाबूलाल जी शर्मा, हरिहर शर्मा, गोपाल सिंघल, अशोक पांडे, दिनेश गौतम तथा मैं स्वयं पलेंचिट करने बैठे ! एक केरम बोर्ड पर बीच में ॐ लिखा गया व उस पर एक कटोरी रखी गई ! इसके दोनों तरफ yes और noलिखा गया ! केरम बोर्ड के चारों ओर अंग्रेजी के अल्फाबेट तथा अंक लिखे गए थे ! अब केरम के चारों ओर बैठकर चार लोगों ने अपनी उंगली से आहिस्ता से बीच में रखी कटोरी को स्पर्श किया ! सबने मन ही मन यह आव्हान करना प्रारंभ किया कि कोई पवित्र आत्मा आये और हमारा मार्गदर्शन करे ! कुछ समय बाद कटोरी में हलचल होने लगी ! शायद हमारी उँगलियों को किसी आत्मा ने अपना मीडियम बना लिया था ! फिर शुरू हुआ प्रश्नोत्तर का क्रम ! पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में कटोरी अलग अलग शब्दों पर जाकर ठिठकती और इस प्रकार वाक्य समझ में आते, कि उत्तर क्या दिया जा रहा है ! लेकिन कोई सार्थक उत्तर नहीं मिलते देख बाबूलाल जी ने कहा कि अगर हमें भविष्य में झांकना है, तो क्यों न किसी जाने माने ज्योतिषी की आत्मा का आव्हान करें ? 

और सब लोगों ने तय किया कि वराह मिहिर की आत्मा का आव्हान किया जाए ! आपको हँसी आ सकती है, किन्तु उस दिन जो रोंगटे खड़े कर देने वाला अनुभव वहां उपस्थित लोगों को हुआ, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है ! आव्हान के कुछ समय बाद ही कटोरी में अत्यंत तेज हलचल शुरू हुई ! वह केरम बोर्ड के एक कोने से दूसरे कोने तक तेज गति से मानो दौड़ाने लगी ! 

बाबूलाल जी ने पूछा कि क्या आप वराह मिहिर है ?
कटोरी yes पर जाकर ठिठकी और उसके बाद फिर चकरघिन्नी होने लगी !
बाबूलाल जी ने फिर पूछा कि क्या आप हमारा मार्ग दर्शन करेंगे ?
कटोरी एक बार फिर yes पर आकर ठिठकी, किन्तु उसके तुरंत बाद उसने वाक्य बनाया -
but first i want a man.
अब सबकी साँस की गति बढ़ने लगी, लेकिन बाबूलाल जी ने पूछा कि क्या आप बलि चाहते हैं ? कटोरी का मूमेंट रुक गया,किन्तु वह न yes पर गई न no पर ! कुछ समय उपरांत बाबूलाल ने कहा कि क्या आप गोपाल डंडौतिया को स्वीकार करेंगे?
कटोरी तुरंत yes पर जाकर रुक गई !
जेल का माहौल अर्धरात्रि का समय, मन ही मन कुछ सकपकाया तो जरूर, लेकिन चहरे पर मुस्कान ही रही ! बाबूलाल जी के अगले वाक्य ने हम सबको हतप्रभ कर दिया, वे कह रहे थे -
ठीक है हम सहमत हैं आप ले लीजिये गोपाल जी को !
लेकिन न तो कटोरी में कोई मूमेंट हुआ न मुझ पर कोई प्रभाव पड़ा ! कुछ समय प्रतीक्षा के बाद बाबूलाल जी ने फिर कहा -
क्या हम गोपाल जी को लिटा दें ? आप इन्हें कैसे स्वीकार करेंगे ?
पर उसके बाद कटोरी टस से मस नहीं हुई ! 

उस दिन तो केवल इतना ही घटनाक्रम चला, किन्तु जब दूसरे दिन यह चटखारे दार समाचार अन्य मीसाबंदियों ने सुना, फिर तो यह खेल ही बन गया ! जो देखो वह प्लेंचिट करता दिखता !
जेल में जहाँ राजनैतिक बंदी थी, कुख्यात तस्कर हाजी मस्तान भी ग्वालियर के अपराधी बार्ड में रखा गया ! जिससे वकील के नाते मैं भी भेंट करने गया ! तब उसने स्वीकार किया कि उसने कांग्रेस पार्टी को चेक द्वारा एक करोड़ का चंदा दिया है, इसलिए ज्यादा समय गिरफ्तार नहीं रहेगा ! उसकी बात में दम थी, वह हम सबसे पहले रिहा हुआ !

इसी दौरान 1977 में चुनावों की घोषणा हो गई ! लोग क्रमशः जेल से छूटने लगे ! जेल से जब लोग रिहा होते तो उनको विदा करते समय शेष बंदी नारे लगाते “जनता की सरकार बनाने, आप चलो हम आते हैं“ ! संजय इंदिरा को जेल भिजाने आप चलो हम आते हैं ! इंदिरा गांधी भूल न जाना, भारत है यह रूस नहीं ! यहाँ जेल में नेता बंदी, उधर हो रहे आम चुनाव, धोखा है, बेईमानी है | यह कैसी अजब कहानी है !

अंततः जनता सरकार बनने के बाद शिवपुरी के पांच लोग सबसे अंत में रिहा हुए, जिनमें एक मैं भी था ! हमें लेने स्वयं वरिष्ठ नेता शीतला सहाय रात्रि आठ बजे सेन्ट्रल जेल ग्वालियर के द्वार पर उपस्थित थे ! रात्रि विश्राम संघ कार्यालय पर करने के उपरांत सुबह शिवपुरी रवाना हुए ! शिवपुरी में जो स्वागत हुआ वह अविस्मरणीय और ऐतिहासिक था ! न भूतो न भविष्यति ! न किसी का उसके पूर्व हुआ न अभीतक 39 वर्ष में किसी का होते देखा !

जेल से रिहाई के बाद दो मित्रों के साथ (बाईं ओर स्व.अरविन्द सक्सेना "डिप्टी" और दाहिनी ओर स्व.रामसेवक जी जैमिनी)

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आपातकाल और शिवपुरी के कार्यकर्ताओं की मस्ती - गोपाल डंडौतिया
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