हिन्दू पदपादशाही - हिन्दू साम्राज्य दिवस (क्षत्रपति शिवाजी का राज्यारोहण)

उन्नीसवीं शताव्दी के अंत में न्यायमूर्ति रानाडे ने “हिस्ट्री ऑफ ग्रेट मराठा” लिखी ! उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना में पुस्तक लिखने का का...


उन्नीसवीं शताव्दी के अंत में न्यायमूर्ति रानाडे ने “हिस्ट्री ऑफ ग्रेट मराठा” लिखी ! उन्होंने पुस्तक की प्रस्तावना में पुस्तक लिखने का कारण भी लिखा कि देश की भावी पीढ़ी में पराजय की हीन भावना की छाया भी नहीं रहना चाहिए ! इस पुस्तक की अंतिम कड़ी है “विजय ही विजय”, जिसमें क्षत्रपति शिवाजी के राज्याभिषेक का वर्णन है ! लोकमान्य तिलक ने भी सार्वजनिक रूप से गुलामी काल में हिन्दू साम्राज्य दिवस के नाम से यह उत्सव प्रारम्भ किया ! आज भी परिवेश भिन्न है, किन्तु समाज में आत्मविश्वास का अभाव है, संकट बरकरार है ! आज भी निराशा का वातावरण है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, हाल ही में उत्तरप्रदेश के कैरोना से हिन्दुओं का पलायन ! सब भयभीत किन्तु प्रतिकार शून्य ! दूसरी जगह जाकर बसने लगे !

जरा कल्पना कीजिए १६७४ ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी को रायगढ़ के विशाल प्रांगण में राजे रजबाडों की सहभागिता तथा जीजा माता एवं शम्भाजी की उपस्थिति में शिवराज का राज्याभिषेक हुआ ! इसके पीछे की एतिहासिक प्रष्ठभूमि के कारण यह एक गौरवपूर्ण क्षण था ! मुहम्मद बिन कासिम सातवीं सदी में आक्रमण करने आया तब से लेकर १७ वीं सदी तक हम पददलित रहे ! महिलाओं का अपमान तो आम बात थी ! पराक्रम की कमी नहीं थी, किन्तु क्षमता होते हुए भी आत्मविश्वास विहीन समाज में उसका चिन्ह दिखाई नहीं देता था ! छुटपुट प्रयास या बड़े प्रयास, यहाँ तक कि महाराणा प्रताप का पराक्रम भी यह दाग धो नहीं सका था ! विजय नगर साम्राज्य एवं देवगिरी साम्राज्य भी अल्पकाल में लुप्त हो गए थे ! निराशाजनक स्थिति थी ! पराक्रम के वाबजूद कुंठा का भाव था ! 

काशी विश्वनाथ मंदिर उखाड फेंकने से व्यथित हुए गागा भट्ट महाराष्ट्र आकर शिवाजी से मिले और बताया कि मंदिरों की मूर्तियों से मस्जिदों की सीढियां बन रही हैं ! आप राजा बनकर समाज को प्रेरणा देने दो ! उत्तर से कवि भूषण आये, जिन्होंने औरंगजेब की नौकरी करते हुए भी कभी उसकी स्तुति नहीं गाई ! उससे कहा आप स्तुति लायक नहीं ! बहां से निकलकर दक्षिण में आये और शिवबा के पराक्रम पर काव्य रचा ! 

और राज्याभिषेक के बाद इतिहास साक्षी है कि उससे प्रेरणा लेकर देश के अन्य भागों में भी सफल प्रयत्न हुए ! राजस्थान में दुर्गादास राठौर ने कलह मिटाकर सब राजाओं को जोड़ा और राज्य कायम किया ! छत्रसाल पिता की मृत्यु के बाद शिवराज से मिले और बाद में शिवाजी महाराज की प्रेरणा से बुंदेला राजा बने ! आसाम में चक्रधर सिंह, कूच बिहार में सत्य सिंह इन सबके प्रेरणा स्त्रोत बने शिवाजी ! प्रयत्न सबको जोडने का ! निजी महत्वाकांक्षा का lesh मात्र भी नहीं ! इसीलिए मिर्जा राजा जयसिंह को पत्र लिखा – चाहो तो आप राजा बन जाओ पर शत्रु की चाकरी मत करो ! 

अब जरा विचार कीजिए कि कैसे संभव हुआ यह सब ? राम गणेश गडकरी के मराठी नाटक शिव संभव का एक दृश्य है – गर्भवती जीजामाता से उनकी इच्छा पूछकर होने बाले बच्चे के स्वभाव का पूर्वानुमान लगाया जाता है ! जीजा माता सहेलियों को अपनी इच्छा बताती हैं कि शेर पर सवार, १८ भुजाओं में शस्त्र लेकर बैठी हूँ ! यह उनकी इच्छा किन्तु समाज में साहस नहीं ! समर्थ रामदास रामराय से प्रार्थना करते – जनहित में करो राम दाया, मेरा मन तड़प रहा है ! अवतार लेना होगा ! शिव बा से कहते थे साम्राज्य स्थापित करो, शपथ लो उंगली चीरकर ! जीजा माता भी कहतीं, यही मेरा भी सपना है ! जीजामाता कहतीं थीं चाकरी नहीं राज करने को पैदा हुआ है ! बहां से विजय पथ प्रारम्भ हुआ ! 

क्षत्रपति शिवराय का एक ही प्रयास कि समाज का खोया आत्मविश्वास पुनः जागृत हो ! शुद्ध मन से किया गया प्रयत्न सफल होता है, यही कारण है कि शिवाजी को ऐसे अद्भुत पराक्रमी साथी मिले ! बेटे रायबा की शादी का निमंत्रण देने आये तानाजी, पर सिंहगढ़ जीतना पहले जरूरी मान जा पहुंचे युद्धभूमि में और बलिदान हो गए ! शिवाजी के मुंह से निकला - गढ़ तो आया पर सिंह गया ! बाजी प्रभू देशपांडे ने कहा जान भी चली जाए पर लडता रहूँगा ! शीश कटा पर देह लड़ी थी, कोंडाना पर गाज गिरी थी ! हजारों के साथ २० – २२ रणबांकुरे भिडे ! सर बिहीन धड लडता रहा ! बालाजी निम्बालकर, कान्होजी आंग्रे - पराक्रम की मालिका ! बैदनी नायक औरंगजेब के यहाँ की खबरें निकालकर लाते रहे ! सब तुकाराम के भजन गाते ! ईश्वर को मस्तक पर रखो फिर पराक्रम करो ! स्वयं शिवाजी का आगरा से बापिस आना किसी चमत्कार से कम नहीं था ! 

महान रणनीतिकार ! जिन तुलजा भवानी से तलवार प्राप्त की उनका ही मंदिर ध्वस्त हुआ, पंढरपुर में बिठोबा का मंदिर तोड़ा गया ! लोगों ने कहा, क्या कर रहे हो, कैसे राजा हो ? उनकी योजना में जल्दबाजी को स्थान नहीं था ! अफजल खान के सम्मुख शरण आने का नाटक रचा और उसे पहाड़ प्रतापगढ़ में लाए, जहां उसका वध किया ! निजाम ने हिंदुओं को मारा, पुणे को जलाकर शहर पर गधों से हल चलबाया ! बाद में कोंडदेव और जीजामाता की उपस्थिति में सोने का हल फिरा ! बही पुणे आगे चलकर पेशवाओं की राजधानी बनी ! शाइस्ता खान का प्रसंग भी समाज में आत्म विश्वास पैदा करने बाला हुआ ! 

उस समय हरेक जागीरदार की अपनी सेना हुआ करती थी ! मनसबदार भी हजार दस हजार सेना रखते थे ! शिवराज ने व्यवस्था बदली ! सेना सब केन्द्र की, सिंहासन की, हिन्दवी स्वराज्य की ! समुद्र में विजय दुर्ग, सिंधु दुर्ग बने ! कैसे बने होंगे सोचकर हैरत होती है ! सामान्य लोगों को साथ लेकर उन्हें तज्ञ बनाकर ये असंभव कार्य किये ! चिपलुण में परशुराम मंदिर तोड़ा गया तो बहां जाकर छोटी लड़ाई लड़ी ! बहां के शिलालेख में तारीख एवं प्रसंग अंकित है ! यह सब करते हुए भी और अधिक करने की चुनौती ! क़ुतुब शाह से बीजापुर मिलने गए बहां येशाजी कंक ने उसके पहलवान को परास्त किया ! पुणे के पास रानेगांव का जागीरदार पाटिल अत्याचारी था ! एक महिला के साथ दुर्व्यवहार किया तो पकड़ मंगवाया ! हाथ पाँव दोनों कटवा दिए ! खंडोजी खोपडे के साथ भी यही किया ! खिरकिणी नामक एक गुजरनी महल में दूध बेचने आती थी ! एक बार सूर्यास्त के बाद दरबाजे बंद हो जाने के कारण रात को घर नहीं जा पाई ! घर पर बीमार बच्चा अकेला था ! ममता की मारी किसी प्रकार दीवार फांदकर घर पहुँच गई ! शिवाजी को मालुम हुआ तो उसे बुलाया ! उसकी ममता का तो सम्मान किया किन्तु उससे बह मार्ग भी पूछा जहां से बह गई थी ! जब वो जा सकती है तो शत्रु भी उस मार्ग से आ सकता है ! बहां आज भी खिरकिणी बुर्ज है ! इतनी सतर्क दृष्टि ! 

राज्याभिषेक के समय भी यह स्मरण रहा कि किस विचार को लेकर कार्य कर रहे हैं ! उसे शिव राज्याभिषेक नही कहा, हिन्दवी स्वराज्य कहा ! उत्तर में बादशाह, दक्षिण में ५ सुलतान फिर भी यह राज्य बने यह श्री की इच्छा ! समर्थ रामदास ने पत्र भेजा - शिवराज कैसा चलना, बोलना, निश्चय का महादेश, सबके लिए अवतार, श्रीमंत योगी, उपभोग शून्य स्वामी, म्लेच्छ संहारक ! शिवराय ने आज्ञापत्र जारी किया – कर प्रणाली, शासन के कर्तव्य, गौहत्या बंदी, कम जमीन बाले के लिए कम कर, अधिक जमीन बाले के लिये अधिक कर ! 

आज भी समाज भ्रष्टाचार, लालच, निराशा, पराक्रम और आत्मविश्वास के अभाव से जूझ रहा है ! इसमें परिवर्तन की आवश्यकता है ! पराजय का इतिहास दुहराया न जाए इसलिए इस दिन का स्मरण आवश्यक ! दिल्ली का तख़्त तोडने बाले पेशवा घरभेदी जयचंदों के कारण पानीपत में परास्त हो जाते हैं ! १८५७ में यशस्वी योजना के अभाव के कारण सैनिकों में उठाव होता है किन्तु जन उठाव नही हो पाता ! ब्रिटिश म्यूजियम में एक चित्र है ! ध्वज स्तंभ पर जरीपट ध्वज उतर रहा था और अंग्रेज ध्वज चढ रहा था ! चढाने और उतारने बाले दोनों ही हिन्दू थे ! आज भी बही चक्र चल रहा है ! शिवाजी के समान पराक्रम के लिए समाज संगठन आवश्यक है ! संगठन के अभाव के कारण ही भ्रष्टाचार, सामाजिक विषमता आदि दिखाई देती हैं ! पराक्रमी इतिहास की पुनरावृत्ति हो, बह सदा स्मरण रहे ! 


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क्रांतिदूत: हिन्दू पदपादशाही - हिन्दू साम्राज्य दिवस (क्षत्रपति शिवाजी का राज्यारोहण)
हिन्दू पदपादशाही - हिन्दू साम्राज्य दिवस (क्षत्रपति शिवाजी का राज्यारोहण)
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