अरहर मोदी !

भारत में पिछले 40 वर्षों में दाल के उत्पादन में कम से कम 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई ! किन्तु हैरतअंगेज तथ्य यह भी है कि 1950 के दशक...



भारत में पिछले 40 वर्षों में दाल के उत्पादन में कम से कम 40 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई ! किन्तु हैरतअंगेज तथ्य यह भी है कि 1950 के दशक में जहाँ इसकी प्रति व्यक्ति उपलब्धता 60 ग्राम थी, आज यह घटकर 35 ग्राम रह गई है ! अर्थात इसका उत्पादन निरंतर कम होता गया !
भारत में दालों का उच्चतम उत्पादन है, खपत भी विश्व में सबसे ज्यादा है और साथ साथ यह दालों का सबसे बड़ा आयातक भी है।

इसी स्थिति का वर्णन करते हुए वित्त मंत्री श्री अरुण जेटली ने गुरुवार को संसद में कहा: "जबकि दाल की मांग 23 लाख टन है, इसका उत्पादन महज 17 लाख टन है ! जरूरत की पूर्ति के लिए शेष छह लाख टन दाल म्यांमार, मोजाम्बिक और तंजानिया से आयात की जाती है ।" उन्होंने यह भी कहा कि सरकार 20 लाख टन दाल का बफर स्टाक बनाने जा रही है, ताकि कीमतों पर अंकुश रखा जा सके ।

मांग और आपूर्ति के बीच अंतर के कई कारण हैं ! सबसे पहला और तात्कालिक कारण तो लगातार बुरा मानसून रहा, जिसने उत्पादन को प्रभावित किया है ! और दूसरा कारण लंबे समय से चला आ रहा दुर्लक्ष्य भी है । लोकसभा में जब राहुल गांधी जी ने “अरहर मोदी” का व्यंगवाण छोड़ा, तो यह एक प्रकार से बूमरेंग भी साबित हो सकता है, क्योंकि मांग और पूर्ति का यह अंतर विगत 40 वर्षों का है, और इसमें सर्वाधिक दोष अगर किसी को दिया जा सकता है तो वह कांग्रेस ही है, जिसका लगातार शासन रहा था !

अगर भविष्य की दृष्टि से विचार किया जाए तो 2030 आते आते भारत में दाल की लगभग 30 लाख टन की अनुमानित मांग होगी, जिसकी पूर्ति सुनिश्चित करने के लिए उत्पादन में 4.2 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि आवश्यक है।

सरकार की मौजूदा प्रोत्साहन संरचना में खाद, बिजली और सिंचाई आदि के लिए 10,000 रुपये प्रति हेक्टेयर से कुछ अधिक सब्सिडी किसानों को दी जाती है ! लेकिन किसानों का रुझान चावल, गेहूं और गन्ना आदि पर अधिक है ! दरअसल दालों की खरीदी, विपणन के लिए समर्थन तंत्र की कमी दालों के प्रसार के लिए एक प्रमुख बाधा है ! सरकारें चावल और गेहूं की खरीद तो करती हैं, लेकिन दालों के लिए अभी तक ऎसी कोई व्यवस्था नहीं है ।

इसके अतिरिक्त भारतीय दालों की कम उपज और आनुवंशिक कीट और रोगों की जोखिम किसानों को हतोत्साहित करती है ! सूखे की स्थिति में तो यह जोखिम और बढ़ जाता है क्योंकि भारतीय कृषि मूलतः वर्षा आश्रित ही है । पहले से ही आर्थिक रूप से जर्जर किसान कैसे यह रिस्क उठा सकते हैं ?

इस स्थिति को लगातार नजरअंदाज करने वाली कांग्रेस केवल सस्ते नारे के सहारे कैसे भाजपा को कठघरे में खड़ा कर सकती है ? यदि नरेंद्र मोदी ने जिद्द ठान ली और आने वाले वर्षों में सचमुच किसानों के खोये आत्मविश्वास को जगा दिया तो न केवल दालों के उत्पादन में ऐतिहासिक वृद्धि हो सकती है, सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था का ही कायाकल्प हो सकता है ! आवश्यकता है तो केवल दृढ संकल्पित इच्छा शक्ति की । क्या मोदी यह चमत्कार कर सकेंगे ? अरहर मोदी व्यंग के स्थान पर मोदी जी का वास्तविक विशेषण बने, कमसेकम मेंरी तो यही इच्छा है !

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क्रांतिदूत: अरहर मोदी !
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क्रांतिदूत
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