केजरीवाल, संजय निरुपम या कामरेड सथ्यू - आज के मीरजाफर और जयचंदों की तथाकथा !

कामरेड सथ्यू पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भारत की सेना के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर ने जहां कहा है कि ...

कामरेड सथ्यू

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में भारत की सेना के सर्जिकल स्ट्राइक के बाद फिल्म अभिनेता नाना पाटेकर ने जहां कहा है कि असली हीरो तो जवान होते हैं वही इप्टा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एम एस सथ्यू ने अपने भाषण में सर्जिकल स्ट्राइक को शर्मनाक करार दिया। सथ्यू का ऐसा बोलना देश का तो अपमान है ही कलाकार बिरादरी का भी अपमान है।

यह दुर्भाग्यजनक है कि इंदौर में हुए इप्टा के राष्ट्रीय सम्मेलन में कला, कलाकार और कलाधर्मिता पर कोई खास रचनात्मक, सृजनात्मक और परिणामात्मक चर्चा नहीं हुई और उसकी जगह पूरा सम्मेलन राजनीतिक विचारधारा को समर्पित हुआ। देश जानता है कि वामदलों की विचाराधारा में अपने ही देश को कोसा जाता रहा है। राजनीतिक कारणों से वामपंथी भारतीय जनता पार्टी की आलोचना करते हैं तो करते रहे पर सेना को निशाना बनाना कहां तक सही है?

जो अपने देश की सेना द्वारा राष्ट्र की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा के लिए शत्रु देश के विरूद्ध की गई कार्रवाई को शर्मनाक बताता हो, क्या ऐसे व्यक्ति के विरूद्ध राष्ट्रद्रोह का मुकदमा दर्ज नहीं होना चाहिए?

इसमें हैरत की कोई बात नहीं है, सथ्यू जिस राजनीतिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं, उसके डीएनए में ही राष्ट्रद्रोह है। जब चीन ने पंचशील के सिद्धांत को अंगूठा दिखाकर भारत के खिलाफ विश्वासघात करते हुए आक्रमण किया, तो सथ्यू की कम्युनिस्ट पार्टी ने चीन के हमले को सही बताते हुए समर्थन किया। वह दुनिया में पहला मौका था, जब किसी देश का एक राजनीतिक दल अपने देश पर हो रहे हमले का न केवल समर्थन करे, बल्कि हमलावार शत्रु देश का सहयोग भी करे। 1962 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने जिस देशद्रोह की परंपरा के बीज बोये थे, उसी विषैली फ़सल को सथ्यू जैसे कुछ बचे-खुचे लोग आज भी सींचने की कोशिश कर रहे हैं।

कहीं ऐसा तो नहीं कि पाकिस्तान की ख़ुफिया एजेंसी आईएसआई ने नशीले पदार्थों की खेप बेचकर अर्जित की गई काली कमाई से भारत में विभीषणों की एक लंबी श्रृंखला तैयार की हुई है? क्योंकि सथ्यू अकेले नहीं है ! कन्हैया भी वामपंथी है, जो जे.एन.यू. में राष्ट्र विरोधी नारे लगा रहा था। वो भी चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था कि कश्मीर को आजाद कराकर रहेंगे। आतंकवादी अफ़जल की जयंती मना रहा था। याकूब मेमन की फांसी का विरोध कर रहा था। 

वामपंथी तो घोषित रूप से इस देश के आजाद होने के खिलाफ थे। वह भारत को कई राष्ट्रों का संघ मानते थे। जिन्ना व मुस्लिम लीग को धर्मनिरपेक्ष घोषित करने वाले उसके नेताओं का मानना था कि अगर देश आजाद हुआ तो बहुसंख्यक हिंदू से मुसलमानों को खतरा होगा। चीन युद्ध के समय जगह-जगह वामपंथियों का यह नारा लिखा देखा गया कि ‘चेयरमैन माओ हमारे भी चैयरमैन है’। किन्तु जब इन्हें लगा कि भारत की जनता वामपंथी दलों को नापसंद करती है, तब उन्होंने चेहरे बदले और केजरीवाल तथा संजय निरुपम जैसे प्रच्छन्न कम्यूनिस्ट सामने आये !

भारत द्वारा पाकिस्तान में सर्जिकल आपरेशन किए जाने के बाद देखने को मिला कि आप पार्टी के नेता व दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से सरकार को घेरा और अपनी ही सेना पर शक जताया उससे वे रातों रात पाकिस्तान में हीरो बन गए हैं। उनका हर शब्द तो मानो अल्लामा इकबाल की नज्म हो गया है। जो व्यक्ति गणतंत्र दिवस की परेड का विरोध करने तक का ऐलान कर सकता है उसके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। दूसरे सज्जन कांग्रेस के नेता व मुंबई प्रदेश अध्यक्ष संजय निरुपम है। उन्होंने तो सरकार पर सीधे फरजीवाड़ा करने का आरोप लगा दिया। वे पहले भी बहुत मामले में दिग्विजय सिंह व अमर सिंह सरीखे नेताओं के साथ प्रतिस्पर्धा करते आए हैं। जरा इनके बारे में भी थोड़ा जान लिया जाए। प्रख्यात पत्रकार श्री विवेक सक्सेना ने संजय निरुपम का चरित्रचित्रण कुछ यूं किया है –

यह बात तब की है जब मैं दिल्ली प्रेस में था व भू भारती पत्रिका का बिहार विशेषांक निकालने के लिए पटना गया हुआ था। वहां के पत्रकार प्रमोद दत्त हमारी पत्रिका से जुड़े हुए थे व उसके संवाददाता थे। उन दिनों प्रमोद दत्त व दूसरे पत्रकारों का मिलन स्थल हुंकार प्रेस हुआ करता था। एक दिन प्रमोद दत्त ने एक सज्जन से मेरी मुलाकात करवायी। उन्होंने कहा कि यह संजय निरुपम है। काफी अच्छा लिखते हैं। आजकल बेरोजगार हैं। उसके जाने के बाद प्रमोद दत्त ने मुझसे कहा कि भाई इससे भी लिखवा लो। भले ही मेरे लेखों में कटौती कर देना। यह बहुत संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। संयोग से अगले दिन जब मैं प्रमोद से मिलने हुंकार प्रेस पहुंचा तो वे वहां नहीं पहुंचे थे पर संजय निरुपम वहां मौजूद थे। उन्होंने लपक कर मेरा स्वागत किया और दौड़कर बाहर से चाय व समौसा ले आए।

फिर पास आकर कान में फुसफुसाते हुए कहने लगे कि क्या आपको पता है कि प्रमोद दत्त कौन है? मैंने कहा वो पत्रकार है। तो बोले नहीं मेरे पूछने का मतलब है कि क्या आपको उसकी जाति का पता है? उनकी यह बात सुनकर मैं अवाक रह गया और उन्हें देखने लगा। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा कि वह तो भूमिहार है और भाई मैं कायस्थ हूं आपकी अपनी बिरादरी का हूं। इसे बाहर निकालिए और मुझे सेवा करने का मौका दीजिए। उसकी बात सुनकर मैं यह तय नहीं कर सका कि इस कतृघ्न व्यक्ति को क्या जवाब दूं।

अगर आज केजरीवाल से लेकर संजय निरुपम तक अपनी सेना पर शक कर रहे है तो उस पर आश्चर्य जताने की जरुरत नहीं है यह लोग तो आज मीर जाफर और जयचंद हैं। चाणक्य ने कहा था कि सीमा पार के दुश्मनों से कहीं ज्यादा खतरनाक होते हैं घर के दुश्मन। जो सेना की राष्ट्रवादी गतिविधियों को शर्मनाक बताए उसे देश का दुश्मन नहीं तो क्या मानें? मैं विनम्रतापूर्वक कहना चाहता हूं कि अगर वामपंथी अपनी राष्ट्रवाद की अवधारणा में परिवर्तन नहीं लाए तो वे भविष्य में यह कहने के लिए भी नहीं बचेंगे ’’कि कामरेड मिस्टेक हो गया।‘‘
साभार आधार - नया इण्डिया में प्रकाशित श्री विवेक सक्सेना और श्री कैलाश विजयवर्गीय जी के आलेख 


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