क्या प्राचीन ऋषियों को समानांतर ब्रह्माण्डों का ज्ञान था ?

आज के आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञान की नीव डाली महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने और उसका भरपूर सहयोग किया मैक्स प्लांक, श्रोडिंगर, पॉल डिरा...

आज के आधुनिक ब्रह्माण्ड विज्ञान की नीव डाली महान वैज्ञानिक अलबर्ट आइंस्टीन ने और उसका भरपूर सहयोग किया मैक्स प्लांक, श्रोडिंगर, पॉल डिराक आदि वैज्ञानिकों ने ! आइंस्टाइन के सापेक्षिकता के सिद्धांत ने आधुनिक विज्ञान को आध्यात्म से जोड़ने में सबस महत्वपूर्ण भूमिका निभाई ! जिस समय आइंस्टाइन ने दुनिया को सापेक्षिकता के बारे में बताया, तत्कालीन वैज्ञानिकों को यह स्वीकार करने में कठिनाई महसूस हुई कि ये दुनिया, ब्रह्माण्ड सिर्फ न्यूटन के बताये सिद्धांतों पर नहीं चलती !

आइन्स्टाइन ने अपने सापेक्षिकता के सिद्धांत में बताया कि समय और स्थान एक दुसरे से अलग नहीं है ! जैसे-जैसे समय बीतता गया, आइंस्टाइन के सिद्धांतों कि प्रयोगों द्वारा पुष्टि होती गयी ! वर्तमान समय में जेनेवा में, लार्ज हेड्रान कोलाईडर मशीन पर होने वाले नित नए प्रयोगों के परिणाम विस्मयकारी आँकडे प्रस्तुत कर रहे है !

लेकिन वैज्ञानिकों के लिए जो सबसे ज्यादा चकित करने वाली बात है वो यह कि ये आंकड़े, वैज्ञानिकों को जिन निष्कर्षों पर पहुंचा रहे है वो आज से हजारों वर्षों पूर्व ही हिन्दू धर्म ग्रंथों में विस्तार पूर्वक समझाए जा चुके थे ! इस लेख में हम आपको ऐसी ही एक घटना के बारे में बताने जा रहे है जिसमे ब्रह्माण्ड के समय और स्थान के परस्पर संबंधों की व्याख्या की गयी है !

योगवशिष्ठ में एक बहुत महत्वपूर्ण वर्णन आता है ! यह घटना जीवन के उद्धेश्य, रहस्यों और मृत्यु के बाद की जीवन श्रंखला पर भी प्रकाश डालता है इसलिए विद्वान इसे योगवशिष्ठ की सर्वाधिक उपयोगी आख्यायिकाओं में से एक मानते है ! वर्णन इस प्रकार है – 

किसी समय आर्यावत क्षेत्र में पद्म नाम का राजा राज्य करता था ! लीला नाम की उसकी धर्मशील धर्मपत्नी उसे बहुत प्यार करती थी ! जब कभी वह अपने पति की मृत्यु के बारे में सोचती तो वियोग की कल्पना कर घबरा उठती ! अंत में कोई उपाय न देखकर उसने भगवती सरस्वती की उपासना की और यह वरदान प्राप्त कर लिया कि यदि उसके पति की मृत्यु पहले हो जाती है तो, पति की अंत चेतना राजमहल से नाहर न जाये ! मां सरस्वती ने यह भी आशीर्वाद दिया कि जब तुम चाहोगी अपने पति से भेंट भी कर सकोगी ! कुछ दिन बाद दुर्योग से पद्म का देहांत हो गया ! लीला ने पति का शव महल में ही सुरक्षित रखवा कर भगवती सरस्वती का ध्यान किया ! सरस्वती ने उपस्थित होकर कहा – भद्रे ! दुःख न करो तुम्हारे पति इस समय यहीं है पर वे दूसरी सृष्टि (दुसरे लोक) में है ! उनसे भेंट करने के लिए तुम्हे उसी सृष्टि वाले शरीर (मानसिक ध्यान द्वारा) में प्रवेश करना चाहिए !

लीला ने अपने मन को एकाग्र किया, अपने पति की याद की, उनका ध्यान किया और उस लोक में प्रवेश किया जिसमे पद्म की अंतर्चेतना विद्यमान थी ! लीला ने वहां जा कर, कुछ क्षणों तक जो कुछ दृश्य देखा उससे बड़ी आश्चर्यचकित हुई ! उस समय सम्राट पद्म इस लोक (यानी इस सृष्टि) के १६ वर्ष के महाराज थे और एक विस्तृत क्षेत्र में शासन कर रहे थे ! लीला को अपने ही कमरे में इतना बड़ा साम्राज्य और एक ही दिन के भीतर १६ वर्ष व्यतीत हो गए ये देखकर बड़ा विस्मय हुआ ! उस समय भगवती सरस्वती उनके साथ थी उन्होंने समझाया पुत्री –

हे लीला ! जिस प्रकार केले के तने के अन्दर एक के बाद एक परतें निकलती चली आती है उसी प्रकार प्रत्येक सृष्टि क्रम विद्यमान है इस प्रकार एक के अन्दर अनेक स्रुष्टियों का क्रम चलता है ! संसार में व्याप्त चेतना के प्रत्येक परमाणु में जिस प्रकार स्वप्न लोक विद्यमान है उसी जगत में अनंत द्रव्य के अनंत परमाणुओं के भीतर अनेक प्रकार के जीव और उनके जगत विद्यमान है !

अपने कथन की पुष्टि करने के लिए, एक जगत (सृष्टि) दिखाने के बाद उन्होंने लीला से कहा – देवी तुम्हारे पति की मृत्यु ७० वर्ष की आयु में हुई है ऐसा तुम मानती हो (क्यूंकि इस जन्म और लोक में यह सत्य भी है), इससे पहले तुम्हारे पति एक ब्राह्मण थे और तुम उनकी पत्नी ! ब्राह्मण की कुटिया में उसका मरा हुआ शव अभी भी विद्यमान है चलो तुम्हे दिखाती हूँ, यह कहकर भगवती सरस्वती लीला को और भी सूक्ष्म जगत में ले गयी और लीला ने वहां अपने पति का मृत शरीर देखा – उनकी उस जीवन की स्मृतियाँ भी याद हो गयी और उससे भी बड़ा आश्चर्य लीला को यह हुआ कि जिसे वह ७० वर्षों की आयु समझे हुए थी वह और इतने जीवनकाल में घटित सारी घटना उस सृष्टि (जिसमे उनके पति ब्राह्मण थे और वह उनकी पत्नी) के कुल ७ दिनों के बराबर थी !

लीला ने यह भी देखा कि उस समय उनका नाम अरुंधती था ! एक दिन एक राजा की सवारी निकली ! उसे देखते ही उनको राजसी भोग भोगने की इच्छा हुई ! उसी सांसारिक इच्छा के फलस्वरूप ही उसने लीला का स्वरुप प्राप्त किया और राजा पद्म को प्राप्त हुई ! इसी समय भगवती सरस्वती की प्रेरणा से राजा पद्म जो दूसरी सृष्टि में थे उन्हें अंत समय (वहां की सृष्टि के अनुसार) में फिर से पद्म के रूप में राज्य-भोग की इच्छा जाग उठी, लीला को उसी समय फिर पूर्ववर्ती भोग की इच्छा ने प्रेरित किया और फलस्वरूप वे भी अपने व्यक्त शरीर में आ गयी और राजा पद्म भी अपने शव में प्रविष्ट होकर जी उठे ! कुछ दिन तक उन्होंने राज्य-भोग भोगे और अंत में पुनः मृत्यु को प्राप्त हुए !

इस कथानक में महर्षि वशिष्ठ ने मन की अनंत इच्छाओं के अनुसार जीवन की अनवरत यात्रा, मनुष्येत्तर योनियों में भ्रमण, समय तथा स्थान में निर्मित ब्रह्माण्ड (टाइम एंड स्पेस) में चेतना के अभ्युदय और अस्तित्व तथा प्राण विद्या के गूढ़ रहस्यों पर बड़ा ही रोचक और बोधमय प्रकाश डाला है ! पढने सुनने में यह कथानक परियों कि कथाओं की भांति लगता है लेकिन यह वह विज्ञान है जिसकी सहायता से पूरे ब्रह्माण्ड की व्याख्या की जा सकती है ! 

आज के आधुनिक वैज्ञानिकों के सामने दोहरी समस्या है, पहली ये कि वो ये स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करते है कि हिन्दू धर्म के प्राचीन ऋषि-महर्षि, समय-स्थान, ब्रह्माण्ड (Universe), समानांतर ब्रह्माण्ड (Parallel Universe) आदि की गुत्थी सुलझा चुके थे (क्यूंकि ये स्वीकार करने में इतिहास और दर्शन की सभी प्राचीन मान्यताएं छिन्न-भिन्न होने का खतरा है), और दूसरी समस्या यह है कि अगर वो यह मान भी लें कि ऐसा था तो उन प्राचीन ऋषि-महर्षि के ज्ञान को, उनके आधुनिक विज्ञान की भाषा में उनको समझाएगा कौन ?
यहाँ यक्ष प्रश्न यह भी है कि हमारे पूर्वजों द्वारा अर्जित ज्ञान का हम ही महत्त्व नहीं समझते है ! 

मानवेतर सत्ता का विस्तार असीम है ! उसकी तुलना में बहुत ही सीमित क्षेत्र (Dimension) की दुनिया में हम अपने दैनिक जीवन के क्रिया-कलाप को अंजाम दे रहे है ! इसके परे जो दुनिया है उसे समझने के लिए हमें अपने, स्वयं का विस्तार करना पड़ेगा तभी हम उसे समझ पायेंगे !

साभार – रहस्यमय डॉट कॉम

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क्रांतिदूत: क्या प्राचीन ऋषियों को समानांतर ब्रह्माण्डों का ज्ञान था ?
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