भाजपा कार्यसमिति पर त्वरित टिप्पणी : क्या होना था, क्या हुआ - डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने राज्यों से आग्रह किया कि राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक होने के एक सप्ताह बाद सभी प्रदेश अपनी क...


भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय नेतृत्व ने राज्यों से आग्रह किया कि राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक होने के एक सप्ताह बाद सभी प्रदेश अपनी कार्यसमितियों की बैठकें रखें। केंद्र का इस तरह से निर्देशित करने के पीछे संभवत: उद्देश्य यही होगा कि राज्य उन तमाम विषयों को जान लें, जो इस बार भाजपा की राष्ट्रीय कार्यपरिषद की बैठक में आए हैं और उससे प्रेरणा लेकर अपने यहाँ आने वाले प्रस्तावों का निर्माण करें।

इसे मध्यप्रदेश के सागर में दो दिन तक चली भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक से जोडक़र देखना समीचीन होगा। राजनीतिक प्रस्ताव में जरूर प्रधानमंत्री की योजनाओं की तारीफ की गई। किन्तु यहाँ पहले दिन से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का गुणगान शुरू हुआ, वह दूसरे दिन भी बदस्तूर जारी रहा। इन दो दिनों में यही लगता रहा कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की प्रशंसा में चालीसा पढ़ी जा रही है। प्रश्न यह उठता है कि कार्यसमिति में प्रदेश अध्यक्ष नन्दकुमार चौहान का सिर्फ उनकी प्रशंसा में कसीदे गढ़ते जाना कहां तक उचित कहा जा सकता है ? जबकि लोकसेवा तो पार्टी के प्रत्येक कार्यकर्ता का मुख्य कार्य ही है।

कोई भी पार्टी अपना मुख्यमंत्री उसे तय करती है, जो मुख्यमंत्री जैसी वृहद जिम्मेदारी वहन करने के लिए उपयुक्त हो। स्वभाविक है कि मध्यप्रदेश में भी पार्टी ने यदि शिवराज नाम पर भरोसा जताया है तो उसका मुख्य कारण यही है कि वे एक श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ होने के साथ ही जनता जनार्दन से सीधे जुड़े जमीन के नेता हैं। यही वजह है कि वे पिछले 11 साल से प्रदेश के लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं और जैसा कि आगे कि पटकथा लिखी जा चुकी है 2018 के विधानसभा चुनाव भी उन्हीं के नेतृत्व में होने हैं। 

भाजपा को यह समझना होगा कि पार्टी संगठन में और पार्टी की सरकार होने में अंतर है। पार्टी सेवा, त्याग और समर्पण से कार्यकर्ताओं की दम पर चलती हैं, किंतु सरकार लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता द्वारा चुने गए, पार्टी के कुछ चुनिन्दा कार्यकर्ता प्रशासनिक अधिकारियों एवं अन्य कर्मचारियों के भरोसे चलाई जाती हैं। हमारा कार्यकर्ता सरकार में जाकर कितना अच्छा कार्य कर रहा है, इसकी प्रशंसा तो हो, जिससे उसका श्रेष्ठ कार्य करने के लिए सतत मनोबल बढ़ता रहे, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं हो सकता कि सरकार को जो अन्य अच्छे कार्य करने हैं, उनके प्रति भी उसे आगाह न किया जाए?

वस्तुत: कार्यसमितियों के करने का संभवत: उद्देश्य संगठनात्मक स्तर पर यही रखा गया होगा कि यहां से कार्यकर्ता तो प्रेरणा ले हीं साथ ही सरकार के स्तर पर जो कार्य किये गए हैं, उनकी समीक्षा की जाए और प्रदेश स्तर से लेकर नीचे के स्तर तक संगठन कार्य को कितना मजबूत किया जा सकता है, इस पर गहराई से विचार हो। किंतु इस संदर्भ में कहना होगा कि सागर की कार्यकारिणी पहले की कुछ कार्यकारिणियों की तरह ही एक औपचारिकता पूर्ण करती हुई ही दिखी।

हाँ, यह जरूर अच्छी बात है कि मध्यप्रदेश के सागर में भारतीय जनता पार्टी की प्रदेश कार्यसमिति में जो 15 बिन्दुओं पर आधारित राजनीतिक प्रस्ताव पारित किया गया, उसके केंद्र में जाग्रत सशक्त भारत, भ्रमित विपक्ष, स्वर्ण‍िम 11 वर्ष, भविष्य के लक्ष्य, शूरता की उपासना, लोकमंथन अभिनव प्रयोग, आवास, स्वच्छ भारत, नई पहल, निवेशक सम्मेलन, विकसित बुन्देलखण्ड,नर्मदा सेवा यात्रा, भाजपा विजय, सक्रिय संगठन, और समृद्ध एवं समर्थ मध्यप्रदेश हमारा लक्ष्य जैसे बिन्दुओं को प्रमुखता से लिया गया। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विमुद्रीकरण एवं केशलेस ट्रान्जेक्शन के लिए किए जा रहे प्रयासों की सराहना की गई। बताया गया कि इससे भ्रष्टाचार विहीन, पारदर्शी, समता मूलक समाज की रचना होगी। भाजपा प्रदेश कार्यसमिति इस निर्णय में प्रधानमंत्री के साथ है। इसी के साथ इस प्रस्ताव में कहा गया कि प्रधानमंत्री के लोकतंत्र में भाई -भतीजावाद से मुक्त एवं दल संचालन करने का आह्वान पारदर्शी एवं सुचितापूर्वक धन संग्रह करने तथा उसका विवरण सार्वजनिक करने का आह्वान भी सामाजिक एवं प्रासंगिक वह मानती है।

राजनीतिक प्रस्ताव में विरोधी दलों के द्वारा सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के मुद्दों पर किए जा रहे विरोध प्रदर्शन की आलोचना करने के साथ ही प्रदेश सरकार द्वारा आतंकवाद और आतंकवादियों के विरुद्ध शून्य सहनशीलता की नीति के तहत भोपाल जेल तोडक़र भागे सिमी आतंकियों को कुछ ही घंटों में समाप्त कर दिए जाने के लिए सरकार की श्रेष्ठता पर वाहवाही भी की गई। साथ में यह भी कहा गया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राजनीतिक शुचिता और वित्तीय पारदर्शिता के संबंध में जो सुझाव दिए हैं, उन पर प्रदेश में अक्षरश: अमल पर चर्चा हुई है और सर्व सहमति बनी है। यहां कृषि पर भी अलग से एक प्रस्‍ताव आया जिसका कुल सार यह था कि आगामी पाँच वर्षों में किसानों की आय दोगुनी कैसे हो सकती है, सरकार इस के लिए प्रयास करेगी।

फिर भी क्या पार्टी स्तर पर यह प्रस्ताव या संकल्प नहीं आना चाहिए कि मध्यप्रदेश में जो कुपोषण है, उसे हमारी सरकार के स्तर पर एक निश्‍चित समय का टार्गेट तय करके दूर करना चाहिए ? क्या इस बात पर संकल्प या प्रस्ताव नहीं आ सकता था कि हमारी सरकार ने अपराध मुक्त करने के लिए अभी तक इतना कार्य किया है और उसके बाद इतना कार्य किया जाना ओर शेष है, हम उसे एक तय समय में पूरा करते हुए प्रदेश को अपराध शून्य बनाने की दिशा में आगे बढऩे का संकल्प लेते हैं ?

प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों से भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने के लिए लगातार जो प्रयास पिछले दिनों किए हैं, उनके परिणाम भी आना शुरू हुए हैं लेकिन यह भ्रष्टाचार मुक्त देश बनाने का अभियान पूरी तरह सार्थक तब तक नहीं हो सकता जब तक कि सभी प्रदेश इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा न लें। ऐसी स्थिति में जबकि प्रदेश में अनेक छोटे बाबू भी करोड़पति एवं अरबपति निकल रहे हों, इस पर चिंतन करना सहज अपेक्षित था ।

वस्तुत: भाजपा से आम जनता आज यही उम्मीद करती है कि वह अपनी सरकार की प्रशंसा करने के साथ आगे उसे जनहित में और क्या करना चाहिए, उसका मार्ग भी दिखाए । अंत में यही कि पार्टी से सरकार है, सरकार से पार्टी नहीं। लोकतंत्र शासन व्यवस्था में राजनीतिक पार्टियाँ सरकार बनाती हैं, सरकारें राजनीतिक पार्टियां नहीं बनातीं।

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