अंतरिक्ष बाज़ार पर भारत की पकड़ सबसे आगे “वाह इसरो” - संजय तिवारी

दुनिया भौचक्क है। आज से ३६ वर्ष पहले जब भारत ने अपना पहला रॉकेट लांच किया था तो कोई उम्मीद भी नहीं कर सकता था कि महज़ साढ़े तीन दशक की य...

दुनिया भौचक्क है। आज से ३६ वर्ष पहले जब भारत ने अपना पहला रॉकेट लांच किया था तो कोई उम्मीद भी नहीं कर सकता था कि महज़ साढ़े तीन दशक की यात्रा में ही वही भारत अंतरिक्ष का सबसे बड़ा खिलाड़ी बन सकता है। भारत की संकल्पशक्ति और भारत की मेधा ने आज यह साबित कर के दुनिया को विवश कर दिया कि भारत के बिना इस दुनिया का कोई वज़ूद नहीं। एक ही रॉकेट से रिकॉर्ड 104 उपग्रहों का प्रक्षेपण कर इसरो ने ना सिर्फ अंतरिक्ष में भारत की धाक जमा दी है बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को एक बड़ा और सफल वैज्ञानिक देश साबित करने का काम भी किया है। जिस देश की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संपेरों और भूखे-नंगों की बनायी गयी थी आज वह ना सिर्फ अपने बल्कि अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश के उपग्रह भी सफलता के साथ प्रक्षेपित कर रहा है। इसरो ने अपने इस अभियान के साथ रूस के एक साथ 37 उपग्रह प्रक्षेपित करने के रिकॉर्ड को भी ध्वस्त कर दिया है। निश्चित रूप से फागुन का यह बुधवार भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के इतिहास में इस दिन को ‘‘युगांतकारी दिन’’ के तौर पर जाना जायेगा। पीएसएलवी-सी37 की कक्षा में रिकॉर्ड 104 उपग्रहों के सफल प्रक्षेपण पर इसरो की पूरी टीम बधाई की पात्र है। इसरो के वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रौद्योगिकीविदों और इस महान अभियान से जुड़े अन्य लोगों ने देश के हर नागरिक को गौरवान्वित करने का काम किया है।

हाल ही में रक्षा मंत्रालय से सम्मानित हुए प्रसिद्ध रक्षा विशेषज्ञ और गोरखपुर विश्वविद्यालय में रक्षा एवं स्ट्रेटेजिक विभाग के प्रो हर्ष कुमार सिन्हा बताते हैं कि अब तक इसरो 226 उपग्रह प्रक्षेपित कर चुका है, जिनमें से 179 उपग्रह विदेशी हैं। तकनीकी लिहाज से देखा जाए तो एक ही रॉकेट के जरिए 104 उपग्रहों को प्रक्षेपित कर देना एक जटिल मिशन था। लेकिन इसरो की टीम ने मुश्किल और चुनौती भरे काम को सफल कर दिखाया। इस प्रक्षेपण ने निश्चित तौर पर जटिल अभियानों को पेशेवर तरीके से पूरा करने की इसरो की क्षमता को दोहराया है। यह इसरो द्वारा अब तक अंजाम दिए गए कठिनतम अभियानों में से एक है। इसरो का यह कहना कि ‘‘पीएसएलवी के जरिये हम अंतरिक्ष प्रक्षेपण के बाजार के एक खास हिस्से पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं’’, देश को गर्व से भर देता है।

प्रो हर्ष के मुताबिक़ इस बार के अभियान में इसरो ने भारतीय उपग्रहों को कक्षा में प्रवेश कराए जाने के बाद विदेशी ग्राहकों के अन्य 101 नैनो उपग्रहों को श्रृंखलाबद्ध तरीके से कक्षा में प्रवेश कराया। आईएनएस-1ए और आईएनएस-1बी इसरो के स्पेस एप्लीकेशन सेंटर और लेबोरेट्री फॉर इलेक्ट्रो ऑप्टिक्स सिस्टम्स से कुल चार पेलोडों से लैस हैं, जिनका इस्तेमाल विभिन्न प्रयोगों में किया जाना है। काटरेसैट-2 श्रृंखला का उपग्रह ऐसी तस्वीरें भेजेगा, जो तटीय भू प्रयोग एवं नियमन, सड़क तंत्र निरीक्षण, जल वितरण, भू-प्रयोग नक्शों का निर्माण आदि कार्यों में शामिल होंगी। इस मिशन की अवधि पांच साल की है। इस मिशन के तहत भारतीय उपग्रहों के साथ गए 101 सहयात्री उपग्रहों में से 96 उपग्रह अमेरिका के हैं। इसके अलावा पांच उपग्रह इसरो के अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के हैं, जिनमें इजराइल, कजाखस्तान, नीदरलैंड, स्विट्जरलैंड और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के इन नैनो उपग्रहों को इसरो की वाणिज्यिक शाखा एंट्रिक्स कॉरपोरेशन लिमिटेड और अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों के बीच हुए समझौते के तहत प्रक्षेपित किया गया है। इसरो मंगलयान मिशन को ग्रहण की लंबी अवधि में बचे रहने के योग्य बना रहा है, जिसके बाद वह कम से कम दो-तीन साल तक काम कर सकेगा। भारत की अंतरिक्ष व्यापार कंपनी एंट्रिक्स कॉपरेरेशन का कहना है कि कंपनी को अंतरराष्ट्रीय ग्राहकों से 500 से 600 करोड़ रुपये मूल्य के आर्डर मिले हैं। इसरो इसी साल मार्च में सार्क देशों के लिए भी उपग्रह प्रक्षेपित करने जा रहा है। साफ है कि दक्षिण एशिया ही नहीं एशिया में भी भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपनी धाक जमा ली है।

प्रख्यात रक्षा वैज्ञानिक और प्रयाग राज्य विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो राजेंद्र प्रसाद कहते हैं कि पिछले वर्ष भी अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम में नया कीर्तिमान स्थापित करते हुए भारत ने एक ही मिशन में पीएससलवी-सी34 के माध्यम से 20 उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया था। तब भी 20 में से 17 सैटेलाइट विदेशी थे। वाकई यह गर्व का विषय है कि कभी अंतरिक्ष क्षेत्र में दूसरों पर निर्भर रहा भारत आज दूसरे देशों को सेवा प्रदान करने वाला प्रमुख देश बन गया है। निश्चित रूप से अब यह कहा जा सकता है कि इसरो लगातार नए आयाम गढ़ रहा है। पीएसएलवी यकीनन भारत और इसरो के लिए सफलता का प्रतीक बन गया है। इसरो लगातार अपने पुराने रिकॉर्डों को तोड़ता जा रहा है। आज इसरो ने अपने पिछले साल एक साथ किये गये 20 उपग्रहों के प्रक्षेपण के रिकॉर्ड को तोड़ा और इसी तरह पिछले साल इसरो ने 20 उपग्रहों के प्रक्षेपण के साथ 2008 के अपने उस रिकॉर्ड को तोड़ दिया था जब उसने एक साथ 10 उपग्रहों को कक्षाओं में स्थापित किया था। ख़ास तो यह है कि विश्व के मीडिया में आज केवल भारत की इस महानतम उपलब्धि की ही चर्चा है। विदेशी अखबारों के बड़े बड़े पैन इसरो की कामयाबी की कथा कह रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मीडिया का कहना है कि भारत अंतरिक्ष आधारित सर्विलांस और संचार के तेजी से बढ़ते वैश्विक बाजार में महत्वपूर्ण खिलाड़ी बनकर उभरा है।वॉशिंगटन पोस्ट ने कहा है कि यह प्रक्षेपण ‘‘भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के लिए यह एक और बड़ी सफलता है। कम खर्च में सफल मिशन को लेकर इसरो की साख अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से बढ़ रही है।’’ सफल प्रक्षेपण के संबंध में वाशिंगटन पोस्ट ने यह भी रेखांकित किया है कि भारत पहले भी दर्जनों उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण कर चुका है जिसमें पिछले साल एक बार में 20 उपग्रहों का प्रक्षेपण शामिल है। द न्यूयॉर्क टाइम्स का कहना है कि एक दिन में उपग्रहों के प्रक्षेपण के पिछले रिकॉर्ड के मुकाबले करीब तीन गुना ज्यादा, 104 उपग्रहों को प्रक्षेपण के बाद उनकी कक्षाओं में सफलतापूर्वक स्थापित किया गया है। इसने अंतरिक्ष आधारित सर्विलांस और संचार के बढ़ते व्यावसायिक बाजार में भारत को ‘‘महत्वपूर्ण पक्ष’’ के रूप में स्थापित कर दिया है। अखबार का कहना है, ‘‘प्रक्षेपण में खतरा बहुत ज्यादा था क्योंकि 17,000 मील प्रति घंटा की रफ्तार से जा रहे एक रॉकेट से जिस प्रकार प्रति कुछ सेंकेंड में गोली की रफ्तार से उपग्रहों को उनकी कक्षाओं में स्थापित किया गया है, उसे देखते हुए यदि एक भी उपग्रह गलत कक्षा में चला जाता तो वे एक-दूसरे से टकरा सकते थे।’’ सीएनएन का कहना है, ‘‘अमेरिका और रूस की प्रतिद्वंद्विता को भूल जाएं। अंतरिक्ष के क्षेत्र में वास्तविक दौड़ तो एशिया में हो रही है।’’ लंदन के टाइम्स अखबार का कहना है कि इस कारनामे के साथ ही भारत ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रभावशाली देशों के समूह में शामिल होने के लक्ष्य को स्पष्ट कर दिया है। ब्रिटिश अखबार ने अपने लेख में कहा है कि भारत के कई महत्वपूर्ण मिशन का खर्च उनके रूसी, यूरोपीय और अमेरिकी समकक्षों के मुकाबले बहुत कम रहा है। इसरो के मंगल मिशन का खर्च महज 7.3 करोड़ डॉलर था, जबकि नासा के ‘मावेन मार्स लांच’ में 67.1 करोड़ डॉलर का खर्च आया था। ब्रिटेन के ही गार्जियन अखबार का कहना है कि नया रिकॉर्ड बनाने वाला यह प्रक्षेपण तेजी से बढ़ते निजी अंतरिक्ष बाजार में एक गंभीर पक्ष के रूप में भारत की स्थिति को मजबूत बनाएगा। ब्रिटिश अखबार का कहना है, ‘‘वर्ष 1980 में अपना रॉकेट प्रक्षेपित करने वाला महज छठवां देश बने भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान को बहुत पहले ही अपनी प्राथमिकता बना ली थी। भारत सरकार ने इस वर्ष अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों के लिए बजट बढ़ा दिया है और शुक्र तक मिशन भेजने की घोषणा भी कर दी है।’’ पर्यवेक्षकों के हवाले से बीबीसी का कहना है कि अंतरिक्ष के क्षेत्र में आज की सफलता ‘‘इसका प्रतीक है कि भारत अरबों डॉलर के इस अंतरिक्ष बाजार में बड़ा खिलाड़ी बनकर उभर रहा है।’’ भारत के सबसे बड़े प्रतिद्वंदी होने का दावा करने वाले चीनी मीडिया ने भी अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत की सफलता पर लिखा है। सरकारी संवाद समिति शिन्हुआ के अनुसार, ‘‘एक अंतरिक्ष मिशन में 104 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण कर भारत ने इतिहास बनाया है और वर्ष 2014 में रूस द्वारा एक साथ 37 उपग्रहों का सफल प्रक्षेपण किए जाने का रिकॉर्ड भी तोड़ा है।’’ वास्तव में यह भारत के लिए विज्ञान और अंतरिक्ष की दिशा में बहुत बड़ी उपलब्धि है।

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क्रांतिदूत: अंतरिक्ष बाज़ार पर भारत की पकड़ सबसे आगे “वाह इसरो” - संजय तिवारी
अंतरिक्ष बाज़ार पर भारत की पकड़ सबसे आगे “वाह इसरो” - संजय तिवारी
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