बॉलीवुड, माओवादियों और लुटियन मीडिया का अपवित्र गठबंधन- अनुराग सक्सेना

- 11 फरवरी 2017 संजय लीला भंसाली और धोलकल गणेश प्रकरण - 28 जनवरी, 2017 के दो समाचारों पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है ! पहला प्रकरण संज...


- 11 फरवरी 2017

संजय लीला भंसाली और धोलकल गणेश प्रकरण -

28 जनवरी, 2017 के दो समाचारों पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है ! पहला प्रकरण संजय लीला भंसाली द्वारा राजपूतों के गौरवमय इतिहास को विकृत किये जाने पर उपजा जन आक्रोश और दूसरा छत्तीसगढ़ में नक्सलियों द्वारा नष्ट की गई 1,000 वर्ष प्राचीन भगवान गणेश की मूर्ति ।
फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप, जो शोधपरक क्षमताओं की बनिस्बत कल्पनाशील कथा-लेखन के लिए ज्यादा कुख्यात है, उसे तिलिस्मी इलहाम हुआ कि संजय लीला भंसाली प्रकरण 'हिंदू आतंक' है । जबकि धोलकल गणेश प्रतिमा का नक्सलियों द्वारा हुआ विनाश उसकी नजर में मात्र सामाजिक भेदभाव से उपजी "निराशा’’ का प्रगटीकरण है ।

क्या संजय लीला भंसाली एक बेचारा बलि का बकरा है ?

अगर भारत के सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गौरव को दरकिनार कर लुटियन मीडिया की भीड़ के नजरिये से देखें तो हाँ वह बेचारा बदनसीब शिकार है ! लुटियन मीडिया की नज़रों में धोलकल गणेश तो कोई मुद्दा ही नहीं है ।
अपने वातानुकूलित स्टूडियो से टीवी एंकर कलात्मक अभिव्यक्ति की आजादी पर निरंतर "बहस" चला रहे हैं । उनके सर्वज्ञाता इतिहासकारों का मानना है कि खिलजी तो महज एक "प्यार में डूबा" शासक था, जोकि सहज स्वाभाविक मानवीय स्वभाव है । स्वयंभू कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि भंसाली की फिल्म तो 'एक' जीवंत त्याग की मिसाल है । बॉलीवुड के तथाकथित पीड़ितों का दावा है कि कैसे उन्हें बेईज्जत किया जा रहा है । और इन सबका सामूहिक कोरस जारी है कि कैसे देश में असहिष्णुता फ़ैल रही है, जिसे रोका जाना चाहिए ।
तथाकथित पत्रकार अपनी पूर्व नियोजित कार्य योजना को अमली जामा पहना रहे हैं और भारत की नाकारा दिशाविहीन पीत पत्रकारिता जग जाहिर हो रही है ।
इन दो बुनियादी तथ्यों को भुलाया जा रहा है कि - (क) भंसाली पद्मावती को पुरुष प्रधान व्यवस्था में फंसा रहे हैं और (ख) एक सीरियल बलात्कारी खिलजी को एक प्रेमी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं ।
और स्वाभाविक ही इससे भंसाली को मुफ्त में प्रचार तो मिल ही रहा है ।

आईये अब सामाजिक मीडिया के हम पहरुए धोलकल गणेश की "दुर्भाग्यपूर्ण घटना" पर भी नजर डालें, क्योंकि तथाकथित मुख्यधारा की मीडिया तो यह करने से रही ।

कल्पना कीजिए छत्तीसगढ़ राज्य के बस्तर में घने जंगलों के बीच 13,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित एक विशाल चट्टान पर स्थित 6 फीट ऊंची भगवान श्री गणेश की भव्य प्रस्तर मूर्ति बैठी हुई है । 1,000 साल पुरानी इस मूर्ति की खोज 2012 में हुई और तबसे ही यह धार्मिक और साहसिक दोनों प्रकार के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गई । छत्तीसगढ़ की इस महत्वपूर्ण विरासत के अवलोकन को न केवल भारतीय बल्कि अनेक अंतरराष्ट्रीय पर्यटक भी वहां पहुँचने लगे थे ! न केवल छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल बल्कि और भी कई निजी ऑपरेटरों द्वारा इस भव्य गणेश प्रतिमा के दर्शनों के लिए यात्रियों को लाने ले जाने की व्यवस्था की गई थी ।

आखिर बस्तर के जंगलों पर अपनी खूनी नजरें गडाए बैठे माओवादियों को यह कैसे सहन होता । कहा जाता है कि दो नक्सलियों ने पहाड़ से धक्का देकर गणेश प्रतिमा को खाई में धकेल दिया । स्वाभाविक ही हजार साल पुरानी मूर्ति, गिराने के बाद कहाँ बच सकती थी ? वह मिनटों में चकनाचूर हो गई ।

जहाँ जहाँ ये लाल-सलाम वाले विद्यमान हैं, वहां सभ्यता और संस्कृति के लिए कोई जगह नहीं है ! अगर इस पिछड़े स्थान पर पर्यटन बढेगा, तो न केवल सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण होगा, बल्कि प्रगति भी होगी, आवागमन बढेगा तो व्यापार बढेगा, व्यापार बढेगा तो स्थानीय लोग समृद्ध होंगे; और समृद्धि का अर्थ है उनकी दूकान बंद होना, उनके खुद के व्यावसायिक हितों पर खतरा ।

उनकी रोजी रोटी पर खतरा आया तो उन्होंने अपने प्रतिद्वंदी को ही रास्ते से हटा दिया!

यदि आप इसे महज एक छोटी घटना समझकर नजर अंदाज कर रहे हैं, तो गलती कर रहे हैं । जरा पश्चिम बंगाल और केरल में योजनाबद्ध किये जा रहे हिंदू प्रतीकों और मूर्तियों के विनाश पर नजरें दौड़ाईये । ये केवल आस्था पर प्रहार भर ही नहीं है । वे समृद्धि और विकास के भी धुर विरोधी हैं, क्योंकि इससे उनके अनुयायियों की संख्या घटने की संभावना बढ़ती है, इसीलिए वे पुलों को नष्ट करते हैं, कारखानों पर बम फेंकते हैं और बसों को जलाते हैं । एक ऐतिहासिक-मूर्ति को चट्टान से धक्का देने में भला उन्हें काहेकी नैतिक-दुविधा ? गणेश प्रतिमा को नष्ट करने से तो एक तीर से दो शिकार हुए, विशुद्ध व्यावसायिक लाभ हुआ, साथ ही एक हिंदू प्रतीक को नष्ट कर दिया गया ।

अब गणेश का भंसाली से क्या मतलब है?

महत्व समय का होता है, इन दोनों मामलों में कुछ गहरी और गूढ़ समानताएं हैं।
दोनों ही प्रकरण हिंदुओं पर और हिंदू मान्यताओं पर आक्रमण थे। एक अपेक्षाकृत परिष्कृत था, क्योंकि उसका कर्ता एक प्रगतिशील फिल्मकार था; दूसरा मूर्खतापूर्ण था, क्योंकि उसको अंजाम देने वाले मूर्ख नक्सली थे ।
लेकिन एक बात समान है कि इन दोनों ही मामलों में, मीडिया के हमारे मित्र अपराधियों को ही पीड़ित बताने में अपनी पूरी ताकत लगायेंगे, लगा रहे हैं ।

भंसाली को चांटा पड़ा यह याद रखो, इसे भूल जाओ कि वह रानी पद्मावती की स्मृति के साथ क्या करने जा रहा है ! क्योंकि हिंसा का समर्थन नहीं करना चाहिए !
चूंकि हिंसा का समर्थन नहीं करना चाहिए, इसलिए भले ही माओवादियों द्वारा लगातार भारत के अतीत (विरासत), वर्तमान (बस्तर के गांवों) और भविष्य (विकास परियोजनाओं) को नष्ट किया जाता रहे, उनका सहयोगी बनकर भारत का बॉलीवुड और मीडिया उसका रूमानीकरण करता रहे ।

उत्तेजना भड़काने वाले दोनों ही मामले विशुद्ध आर्थिक लाभ के लिए गढ़े गए हैं । (शायद) दोनों चाहते भी थे कि उन्हें चारों ओर से थप्पड़ पड़ें । आखिर सहानुभूति भी तो एक पूंजी ही है । यह दुखद है, इसे समझने की जरूरत है । खिलजी ने तो पद्मावती के साथ बलात्कार करने का एक बार ही प्रयत्न किया । बॉलीवुड, माओवादियों और मीडिया द्वारा इसे फिर से करने की कोशिश की जा रही है, जिसे रोका जाना जरूरी है ।

अनुराग सक्सेना

लेखक वर्ल्ड एजूकेशन फाउंडेशन के क्षेत्रीय सीईओ है, साथ ही वे इंडिया प्राइड परियोजना के संचालक भी हैं ।

सौजन्य: ऑर्गनाइजर

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