भारत, भारतवर्ष, भारतमाता और भारतमाता की जय – भाग 2 – (उमेश कुमार सिंह)

भारतवर्ष  आइये, जरा भारतवर्ष को समझने का प्रयत्न करें ! १५ अगस्त १९४७, आहत भारत का इंडिया में रूपांतरण हो गया ! १९५० में भारत इंडिया म...

भारतवर्ष 

आइये, जरा भारतवर्ष को समझने का प्रयत्न करें ! १५ अगस्त १९४७, आहत भारत का इंडिया में रूपांतरण हो गया ! १९५० में भारत इंडिया में परिवर्तित होकर संतुष्ट था ! भारत को सत्ता मिली ! भारत को इंडिया मानने वालों को भोगभूमि मिली ! आत्मतुष्टि मिली ! सत्ता का सपना पूरा हुआ ! लाभ-हानि का उद्योग प्रारंभ हुआ ! नवाचार प्रारंभ हुआ ! भारत भौतिक सुख-सुविधाओं में जुट गया ! आचरण की प्रतिबद्धता समाप्त होना प्रारम्भ हुई ! वसुधा का भोग भूमि में परिवर्तन हुआ ! भारतवर्ष ‘इंडिया’ होने के साथ अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना भूलने लगा ! भारतमाता के सपूतों कि आत्महुती की लम्बी परंपरा ठगी गयी ! आपाधापी में खंडित स्वतंत्रता का श्रेय लेने की होड़ में घायल भारतमाता के कराहने की आवाज दब गयी ! बटवारे के उत्पीडित सुतो की चिंता बेमानी हो गयी ! हुतात्माओं का बलिदान सत्ता की भूखी आत्माओं ने हरण कर लिया ! बदहवास, आतंकित वातावरण में एक नए ‘राष्ट्र-राज्य’ की स्थापना कर इन यूरोसेंट्रिक आदमों न भारतवर्ष को ‘इंडिया’ बना दिया; संविधान में मुद्रित कर दिया; कर्मभूमि भारतवर्ष को भोगभूमि में बदल दिया !

स्वतंत्रता के ७० साल में भी हम अपने ‘स्व’ को नहीं पहचान सके है ! ... क्या इंडिया ही भारत है ? इंडिया क्या है ? जवाहर लाल नेहरु द्वारा लिखित ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ के बारे में प्रख्यात इतिहास लेखक पैट्रिक फ्रेंच की राय उनसे विपरीत है ! वे लिखते है, “भारत ऐतिहासिकता के ठोस स्तंभों पर टिकी ऐसी संस्कृति है, जिसकी जडें इंडिया से पीछे भी है, और भविष्य में मानवता की जरूरतें पूरी करने के लिए आगे तक भी जाती है !” इसे तात्कालिक सत्ताधीशों ने समझने का प्रयत्न न कर ‘जम्बूद्वीपे, भरतखंडे, .... भारतवर्षे’ के चेहरे से वर्ष को काट कर पहले भारत बना दिया ताकि भारतवासी अपने स्थान और काल के बोध से परिचित न हो सकें और अबोध की स्थिति में भारत को सहज ही ‘इंडिया’ बना लिया ! वस्तुतः हम यह देख समझ ही नहीं सके कि भारत और इंडिया दोनों के गुणसूत्र अलग है !

लग्न, मूहर्त के आधार पर व्यक्तियों की कुंडली बनाने वाला देश नवोदित देश की कुंडली राष्ट्रीय काल गणना के आधार पर क्योँ नहीं बना पाया ! हम १९४७ में स्वतंत्र हुए ! और युगाब्द का विस्मरण कर बैठे, विक्रमी सम्वत नहीं चला सके और अंग्रेजों के अस्पष्ट, खंडित कालगणना को स्वीकार कर लिया ! यदि हम काल के वैदिक सूत्र को ले सके होते तो भारत कभी इंडिया नही बनाया जा सकता था ! परिणाम यह हुआ कि हम अपने गौरवशाली अतीत को भुला बैठे ! हमने यह पता लगाने का सूत्र ही छोड़ दिया कि यह देश क्या था, क्या है और क्या होगा ? हमने सारे शिक्षा तंत्र, इतिहास ज्ञान को ऐसे काल में विभाजित किया जिसके अन्दर भारतवर्ष आता ही नहीं है ! ऐतिहासिक संघर्ष से पार निकलने की जिजीविषा, जो इस राष्ट्र की पूँजी है, धीरे-धीरे समाप्त होने लगी ! भारतवर्ष से कटे भारत को इंडिया बताने और प्राचीन सांस्कृतिक राष्ट्र की बांह पर गंगा-जमुनी ‘तहजीब’ का ताबीज बांधनेवालों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है ! भारत ‘इंडिया’ बनते ही स्वतंत्रता के नाम पर अभिव्यक्ति की ‘स्वछंदता’ पा गया ! यही अभिव्यक्ति की आजादी प्राप्त इंडिया जे.एन.यू. के साथ अनेक विश्वविद्यालयों, शिक्षा संस्थानों, एन.जी.ओ. में साहित्य, रंगमंच, कला, पत्रकारिता या मीडिया आदि के माध्यम से बेधड़क देश की परंपरा, संस्कृति को तिलांजलि देने का कार्य कर रहा है !

वस्तुतः जहाँ से ‘स्व’ की हदें टूटती है, वहीँ से प्रारंभ होता है – इंडिया ! परिणाम : शिवाजी, संभा जी, अहल्या, गुरु गोविन्द सिंह, बन्दा बहादुर, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, नेताजी सुभाष विस्मृत कर दिए गए और चंगेज, टीपू, बाबर, अकबर और औरंगजेब, जैसों को महान बताया गया ! ‘आर्य बाहर से आये, झूठ को हवा देकर आर्य-द्रविण को आमने सामने खड़ा कर दिया ! भारतवर्ष का अर्थ ‘सोने की चिड़िया’ आजादी के बाद इंडिया ‘कटोरे वाला देश’ बन गया ! ईसाई मिशनरियों के हथकंडों का इंडिया हमने स्वीकार कर लिया ! आखिर ऐसा कौन हुआ ! हमने भुलाया क्या ?

ज़रा भारतवर्ष को अपने इतिहास से समझने का प्रयत्न करें ! वायु पुराण कहता है – भारतवर्ष का नाम ‘हिमवर्ष’ था ! इसी तरह भागवत पुराण में इसका पुराना नाम ‘अजनाभवर्ष’ बताया गया है ! भागवत पुराण ( स्कंध-५, अध्याय-४) कहता है कि भगवान् रिषभ को अपनी कर्मभूमि ‘अजनाभवर्ष’ में १०० पुत्र प्राप्त हुए, जिनमे से श्रेष्ठ पुत्र महायोगी भारत को उन्होंने अपना राज्य दिया ! उन्ही के नाम से लोग इन्हें भारत वर्ष कहने लगे – ‘येंषा खलु महायोगी भरतो ज्येष्ठः श्रेष्ठ्गुण आसीद येनेदं वर्ष भारतमिति व्यपदिशन्ति |’ ! विष्णु पुराण (अंश २, अध्याय – १) कहता है कि जब ऋषभदेव ने नग्न होकर गले में बाँट बांधकर वन प्रस्थान किया तो अपने ज्येष्ठ पुत्र भरत को उत्तराधिकार दिया जिससे इस देश का नाम भारतवर्ष पड गया – ‘ऋषभाद भरतो जज्ञे ज्येष्ठः पुत्रशतस्य सः (श्लोक २८), अभिषिज्य सुतं वीरं भारतं पृथ्वीपतिः (२९), नग्नो वीतां मुखे कृत्वा वीराध्वानं ततो गतः (३१), ततश्च भारतं वर्षम एतद लोकेषु गीयते (३२) |’ लिंग पुराण में इसी बात को दुसरे शब्दों में दोहराया गया है – ‘सोभिचिन्त्याथ ऋषभो भारतं पुत्रवत्सलः | ज्ञानवैराग्यमाश्रित्य जित्वेंद्रिय महोरगान | हिमाद्रेर्दक्षिण वर्षं भरतस्य न्यवेदयत्। तस्मात्तु भारतं वर्ष तस्य नाम्ना विदुर्बुधाः।‘ अर्थात इन्द्रीय रुपी साँपों पर विजय पाकर ऋषभ ने हिमालय के दक्षिण में जो राज्य भरत को दिया तो इस देश का नाम तबसे ‘भारतवर्ष’ पड गया ! इस तरह भारतवर्ष का भव्य और भावुकता से सराबोर विवरण हमारे पुराण साहित्य में मिलता है, जिसमे ‘वन्देमातरम’ और ‘सारे जहाँ से अच्छा’ गीतों जैसी अद्भुत ममता भरी पड़ी है ! वर्णन मिलता है कि ययाति हों या अम्बरीष; मान्धाता रहे हों या नहुष; मुचुकुन्द, शिबि, ऋषभ या महाराज नृग रहे हों; इन सभी राजाओं को तथा इनके अलावा जितने भी महान और बलवान राजा इस देश में हुए, उन सबको भारतवर्ष बहुत प्रिय रहा है !

भारत वर्ष में वर्ष शब्द के दो अर्थ है ! वर्ष जहाँ एक और स्थान बोधक है तो दूसरी ओर वह काल बोधक भी है ! जब स्थान का बोध कराते हुए हम भारत को स्मरण करते है तो ‘ श्वेतवाराह कल्पे....’ भूगोल-भारतीय महाद्वीप अपने आप में एक संसार है ! यदि हम चाणक्य काल का भारत देखें तो इसकी विशालता का हमें बोध होता है ! आज अफगानिस्तान, पकिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, ब्रह्मदेश, श्रीलंका को मिलाकर भारतवर्ष का लगभग आधा हिस्सा हमसे अलग दिखाई देता है ! स्वतंत्रता के बाद भौगोलिक भारतवर्ष हमारी कल्पना से बाहर चला ही गया ! हमने सांस्कृतिक भारतवर्ष को भी छोड़ दिया ! मन्वंतर और राजवंशों का वर्णन वह भारतवर्ष के भीतर का है ! विविध द्वीपों और देशों की चर्चा में राजवंशों का वर्णन भारतीय सीमा में निश्चित है ! महाभारत क संग्राम में चीन, तुर्किस्तान आदि सभी पास के देशों की सेना आई दिख पड़ती है ! पांडवों और कौरवों की दिग्विजय में वर्तमान भारत के बाहर के देश भी सम्मिलित थे, जिनका कर्मक्षेत्र भारत वर्ष की पुण्यभूमि ही है ! इसके पर्वत, वन, नदी-नाले, वृक्ष, पल्लव, ग्राम, नगर, मैदान, यहाँ तक कि टीले भी पवित्र तीर्थ है ! द्वारका से लेकर प्राग्ज्योतिष तक, बद्री-केदार से लेकर कन्याकुमारी या धनुषकोटि तक, अपितु सागर तक आदि सीमा और अंत सीमा, तीर्थ और देव स्थान है ! यहाँ के जलचर, थलचर, गगनचर, सबमे पूज्य और पवित्र भावना वर्तमान है ! लोग देश से प्रेम करते है ! “हिन्दू अपनी मातृभूमि को पूजते है ! भारतीय हिन्दू परंपरा अपना आरम्भ श्रुष्टिकाल से ही मानती है ! उसमे कहीं किसी आख्यान से, किसी चर्चा से, किसी वाक्य से यह सिद्ध नहीं होता कि आर्य जाति कहीं बाहर से इस देश में आयी; अर्थात परम्परानुसार ही इस भारतवर्ष के आदिवासी आर्य है !” (हिन्दूधर्मकोश, राजवली पांडेय)

वस्तुतः भारत के विभाजन का लेखा जोखा लंबा है ! भारत सात बार विभाजित हुआ ! फिर भी उसका नाम भारतवर्ष या भारत ही रहा ! १५ अगस्त १९४७ को जब भारत स्वतंत्र हुआ, तब भारतमाता को अपने शरीर के ५४.४६ प्रतिशत हिस्से को खोना पड़ा ! वह लहू-लुहान हुई ! भारत के लाखों वर्षों के इतिहास में पहली बार जनता की सहमति से विधिवत संधिप-पत्र पर हस्ताक्षर कर्क इस विभाजन को मान्यता दी गयी ! लार्ड वैवेल ने कहा था – “परमात्मा ने इस देश को एक बनाया है ! आप इसे दो भागों में बाँट नहीं सकते !” क्लेमेंट एटली ने कहा था –“आप इसे बाँट नहीं सकते क्यूंकि यह देवताओं का बनया हुआ त्रिभुज है !”

भारत के पूर्वी भाग, सीमा प्रान्त, पश्चिम बंगाल, सम्पूर्ण सिंध प्राप्त, सम्पूर्ण बलूचिस्तान एवं पूर्व बंगाल के क्षेत्र मुस्लिम बहुल होने से पाकिस्तान बना ! नौ लाख सैतालिस हजार छः सौ निन्यानवे (९४७६९९) वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हमने खो दिया ! यह मतांतरण से राष्ट्रान्तरण था ! सिन्धु की उप नदियों – वितस्ता (झेलम), चंद्रभागा (चिनाव), विपाशा (बिपास), इरावती (रावी) और शत्रुद (सतलुज) इन पांच अमृत धाराओं के कारण पंजाब को उसका नाम मिला था ! पंच+आब (जल) अर्थात “पंजाब” ! आज भारत का क्या वही नाम सार्थक है, अधूरा नहीं है ! वेदों में उल्लिखित सप्तसिंधवा सात नदियों में एक भी आज भारत में पूर्ण रूपें नहीं है ! सिन्धु नदी पर बना सवत्तर बाँध पाकिस्तान का हो गया ! विभाजन पश्चात भारत ने सतलुज, विपाश और रावी पर क्रमशः नांगल, पोंग और पंडोह बाँध बनाए ! पाकिस्तान ने कश्मीर न हडपा होता तो सिन्धु, चिनाव और झेलम पर भी बाँध बनते ! 

‘जिये सिंध’ के प्रणेता गुलाम मुर्तजा सैयद ने कहा था –“पिछले चालीस वर्ष का इतिहास इस बात का गवाह है कि विभाजन ने किसी को फायदा नहीं पहुंचाया ! अगर आज भारत अपने मूल रूप में अखंडित होता तो न केवल वह दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनता बल्कि दुनिया में अमन चैन कायम करने में उसकी ख़ास भूमिका होती !” तभी तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने कहा था –“ अखंड भारत, मात्र एक विचार न होकर विचार पूर्वक किया हुआ संकल्प है ! कुछ लोग विभाजन को पत्थर की रेखा मानते है ! उनका ऐसा दृष्टिकोण सर्वथा अनुचित है ! मन में मातृभूमि के प्रति उत्कृष्ट भक्ति न होने का ही वह परिचायक है ! ४ जून, १९४७ की प्रार्थना सभा में जब गांधी जी को स्मरण दिलाया गया कि बापू आपने कहा था –‘मातृभूमि के टुकड़े करने से पहले मेरे शरीर के टुकड़े करने होंगे’ ! गांधी का उत्तर था, “मैं तो उस समय जनमत को आवाज दे रहा था ! अब जब जनमत ही बदल गया तो में क्या कर सकता हूँ” !

इसलिए भारतवर्ष नाम खोने का अर्थ है, महाराज रणजीत सिंह का गौरव पंजाब विवादग्रस्त है ! लव-कुश का जन्मस्थल ननकाना साहब पाकिस्तान में है ! सिन्धु नदी- वेदों की रचना का तट आज पाकिस्तान मैं है ! जगत विजेता सिकंदर को जिस सिंध के गणतंत्र ने आहत किया, वह आज हमारा नहीं है ! सिन्धु की कन्याएं सूर्या और परमल ने मुहम्मद बिन कासिम का प्रतिशोध बग़दाद जाकर लिया, उनकी पहचान सिंध कहाँ है ? सम्राट ययाति (वेदपूर्वकाल), सप्तसिंधव : (वैदिककाल), चन्द्रगुप्त मौर्य (सिकंदर का पराभव), महाराज रणजीत सिंह (सन १८४६ से लेकर १९४७) तक सभी कुछ भारतवर्ष में था ! यह भारतवर्ष की सांस्कृतिक विरासत आज कहाँ है ? तात्पर्य यह है कि भारतवर्ष का होना भोगभूमि (इण्डिया) से एक कदम आगे कर्मभूमि की स्वीकृति है जिसे हमने खोया है !
क्रमशः ..............

उमेश कुमार सिंह
निदेशक,साहित्य अकादमी ,भोपाल
umeshksingh58@gmail.com


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क्रांतिदूत: भारत, भारतवर्ष, भारतमाता और भारतमाता की जय – भाग 2 – (उमेश कुमार सिंह)
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