गुजरात के महाभारत ने दिखाया राजनेताओं को आईना !

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भाजपा, जो भारतीय राजनीति में महज दो दशक पूर्व तक अस्पृश्य समझी जाती थी, आज बुलंदी का आसमान छू रही है | मजेदार हालात यह हो गए हैं कि अगर ...



भाजपा, जो भारतीय राजनीति में महज दो दशक पूर्व तक अस्पृश्य समझी जाती थी, आज बुलंदी का आसमान छू रही है | मजेदार हालात यह हो गए हैं कि अगर वह पिछले चुनावों की तुलना में कुछ कम सीटें भर ले आये, तो वह चर्चा का विषय बन जाता है, जबकि दूसरी ओर लगभग 50 वर्षों तक भारत पर एकछत्र शासन करने वाली कांग्रेस को ऐसे दुर्दिन देखने पड़ रहे हैं कि थोड़ी सी सीटों का लाभ भी उल्लेखनीय प्रदर्शन माना जाता है। भारतीय मीडिया भी कितनी महान है कि वह दो दशक तक राजनीति में रहने के बाद किसी तरह हिम्मत जुटाकर अध्यक्ष बनने वाले राहुल गांधी जैसे अनोखे और बेजोड़ राजनेता की शान में केवल इसलिए कसीदे पढ़ने लगी है, क्योंकि वे एक चुनाव अभियान में गंभीरता से सक्रिय रह लिए | जय पराजय से परे उसे ही उनकी महान उपलब्धि माना जा रहा है!

गुजरात के चुनाव परिणाम का अगर सतही आंकलन किया जाए, तो कहा जा सकता है कि आत्मसंतुष्ट भाजपा के लिए यह एक झंझावात से कम नहीं है । हार्दिक-जिग्नेश-अल्पेश की जातिवादी राजनीति के घालमेल से कांग्रेस ने एंटी इनकम्बेंसी का लाभ उठाकर गुजरात में भाजपा शासन का अंत करने का ख़्वाब संजोया तथा गांधी परिवार की भक्ति में डूबे मीडिया के एक वर्ग ने उसे बढ़चढ़कर प्रचारित भी किया । ऐसे माहौल में वस्तुपरक, तार्किक और स्पष्ट विश्लेषण कठिन हो जाता है । लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि भारतीय लोकतंत्र अब पर्याप्त परिपक्व हो गया है और लोग गुण दोष के आधार पर प्रतिद्वंदी पार्टियों और उम्मीदवारों का चयन करने लगे हैं ।

पिछले कुछ वर्षों से गुजरात में भाजपा का वोट प्रतिशत 48-49% रहता आया है, जो आज भी विद्यमान है, जो बहु-पक्षीय लोकतंत्र में किसी भी पार्टी के लिए एक सुखद स्वप्न रहता है। कांग्रेस को 38-39% वोट मिलते रहे हैं, जिनमें इस वर्ष लगभग 2% की वृद्धि हुई है | 1 99 0 के बाद पहली बार उसे 40% से अधिक वोट प्राप्त हुए हैं । स्वाभाविक ही जहाँ भाजपा अपने समर्थक आधार को यथावत बनाए रखने को लेकर अपने आप को सांत्वना दे सकती है, तो कांग्रेस अपने मत प्रतिशत में वृद्धि को लेकर अपने हाथों से अपनी पीठ थपथपा सकती है ।

वोट शेयर की तुलना में, कांग्रेस की सीटों की संख्या में ज्यादा लाभ हुआ है। कांग्रेस के वोट बढे केवल 2% , किन्तु 2012 की तुलना में सीटें बढी 26% | 2012 में उसकी सीटें थी 61, जो अब बढ़कर 77 हो गईं, अर्थात उसे पहले से 16 सीटें अधिक मिली है।

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग में भाजपा को एक बड़ा नुकसान हुआ प्रतीत होता है। 2012 में भाजपा ने एससी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित 13 में से 10 सीटें जीती थीं। जबकि 2017 में उनमें से केवल 7 ही जीत पाए | इसी प्रकार एसटी उम्मीदवारों के लिए आरक्षित 28 सीटों में, भाजपा को 2012 में 16 सीटें मिलीं थीं, किन्तु 2017 में वह संख्या घटकर 10 सीटों पर आ गई। 9 सीटों का यह नुकसान तो धरातल पर दिखाई देता है. किन्तु साथ साथ यह अधिक महत्वपूर्ण है कि एससीएसटी मतदाताओं के इस रुझान के कारण बीजेपी के कई सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों के भाग्य पर भी असर पड़ा, और वे संकीर्ण मार्जिन से हार गए। भाजपा ने ऐसी लगभग 11 सीटें गंवाई ।

भाजपा ने जीएसटी को लेकर व्यवसाई वर्ग की नाराजी पहले से भांपकर शहरी इलाकों पर ज्यादा ध्यान दिया, नतीजतन वहां वह डमेज कंट्रोल में सफल रही । साथ ही इससे यह भी सिद्ध हुआ कि सूरत और उसके आसपास के क्षेत्रों पर पटेल आंदोलन का तथाकथित प्रभाव महज शिगूफा है।

सामने दिखने वाले इन तथ्यों से भी अधिक महत्वपूर्ण है, कांग्रेस और भाजपा के बीच सीटों की बड़ी संख्या में हुई अदला बदली । अर्थात जहाँ 2012 में भाजपा के विधायक थे, अब वहां कांग्रेस ने विजय का वरण किया है, इसी प्रकार कांग्रेस की सीटों पर भाजपा विधायक चुने गए हैं | ३३ सीटों पर 2012 में भाजपा के विधायक थे, अब वहां कांग्रेस विधायक चुने गए हैं, उसी प्रकार कांग्रेस ने 2012 में अपने विधायकों वाली 18 सीटों पर पराजय का सामना किया है । यह रुझान भी एक प्रकार से एंटीइनकम्बेंसी का प्रभाव ही कहा जायगा । भाजपा ने अपने 75 विधायकों को दोबारा टिकिट दिया था, जिनमें से 20 पराजित हुए | कांग्रेस ने केवल 24 विधायकों को दोबारा आजमाया, उनमें से 8 कांग्रेस विधायक हार गए । इस प्रकार वर्ष 2017 के इन चुनावों में लगभग 1/3 विधायकों को हार का सामना करना पड़ा, जो निश्चय ही एक मजबूत स्थापना विरोधी रुख का संकेत है ।

मतदाताओं ने दिया सभी सुधरने का संदेश -

यह वास्तव में उल्लेखनीय है कि लोगों ने अपने फैसले से कांग्रेस के हार्दिक-अल्पेश-जिग्नेश के त्रिकोणीय जातिवादी राजनीति के खतरनाक खेल को ठुकराया है, और सिद्ध किया है कि जातीय समीकरणों के दिन लद चुके । इससे भले ही कुछ क्षणिक और सीमित लाभ दिखाई दें, किन्तु यह एक दोधारी तलवार है, जिनसे केवल और केवल अशांति और समाज में गहरी खाई ही पैदा होती है। थोड़े से लाभ के लिए दीर्घकालीन बड़े नुक्सान को आमंत्रित करना मूर्खता ही कही जायेगी | कांग्रेस गुजरात को चर्चित रखकर हिमाचल में हुई अपनी करारी शिकस्त पर से ध्यान हटाना चाहती है, जहाँ उसे पूरी तरह ठुकरा दिया गया | कांग्रेस भूल रही है कि आँख बंद करने से रात नहीं हुआ करती | अगर वह वास्तव में वापसी करना चाहती है तो उसे अपनी यह शुतुरमुर्ग जैसी प्रवृत्ति छोड़नी होगी ।

भाजपा ने पिछले 3-4 वर्षों में भारतीय राजनीति में एक चमत्कार किया है। विपक्ष इस परिवर्तन को "वे हिंदू राजनीति की वजह से जीत रहे हैं" या "वे हिंदू राजनीति करके जीत नहीं सकते" कहकर परिभाषित करता है, जोकि भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में एक बडे बदलाव का लक्षण है। लेकिन शायद यह चुनाव पहला संकेत है कि अब राजनेताओं को समाज के हर क्षेत्र की आवाज़ सुननी होगी। आवाज जो जनता की आकांक्षाएं व्यक्त करती है और बड़े पैमाने पर जीएसटी सहित सभी परिवर्तनों के प्रति प्रतिक्रियाओं को दर्शाती है | अगर विजेता प्रवृत्ति को स्थायी सफलता में बदलना है, तो गुजरात के ग्रामीण क्षेत्रों में हुई पराजय को गंभीरता से लेना होगा और वह भी अगले साल होने वाले मध्यप्रदेश, राजस्थानऔर छत्तीसगढ़ के चुनाव कार्यक्रम से पहले ।

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क्रांतिदूत: गुजरात के महाभारत ने दिखाया राजनेताओं को आईना !
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