विश्लेषण : दलित उफान का सच, लोकसभा की 131 सीटों और 17 फीसद वोटो के लिए हंगामा - संजय तिवारी

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लखनऊ। देश में हंगामा मचा है। इस हंगामे के पीछे कुछ कड़वी सच्चाइयां हैं। लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए 131 सीटें आरक्षित है...

लखनऊ। देश में हंगामा मचा है। इस हंगामे के पीछे कुछ कड़वी सच्चाइयां हैं। लोकसभा में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए 131 सीटें आरक्षित हैं तथा देश की कुल मतदाताओं की इन वर्गों की 20 फीसदी से अधिक है। इसमें भी दलित मतदाता करीब 17 फीसदी हैं। साल 2019 के लोकसभा एवं उससे पहले मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ एवं कुछ अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के साथ खड़ा दिखने में कोई राजनीतिक पार्टी कोई भी कसर नहीं छोड़ना चाहती है। लोकसभा की 545 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इन 131 आरक्षित सीटों में से 67 सीटें भाजपा के पास हैं। कांग्रेस के पास 13 सीटे हैं। इसके अलावा तृणमूल कांग्रेस के पास 12, अन्नाद्रमुक और बीजद के पास सात-सा सीटें हैं। भाजपा जहां इस वर्ग पर अपनी पकड़ मजबूत बनाने का प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर कांग्रेस समेत विपक्षी दलों का प्रयास सामाजिक एवं आर्थिक रूप से इस कमजोर वर्ग को अपने साथ लाने का है।

राहुल गाँधी 

इस पूरे मामले में राजनीतिक पार्टियों ने जिस तरह की बयानबाजी की है वह चिंता में डालने वाली है। एससी-एसटी कानून पर न्यायालय के फैसले के बाद राहुल गाँधी ने कहा, ‘दलितों को भारतीय समाज के सबसे निचले पायदान पर रखना आरएसएस और भाजपा के डीएनए में है। जो इस सोच को चुनौती देता है कि उसे वे हिंसा से दबाते हैं। अब यह कोई कांग्रेस के इस अध्यक्ष से पूछे कि देश पर सबसे ज्यादा समय तक उन्ही के परिवार और पार्टी ने शासन किया है। फिर दोष दूसरों में देखने का क्या मतलब ?

मायावती 

इस बार उत्तर प्रदेश में पहले से कमजोर हो चुकी बसपा प्रमुख मायावती भी न्यायालय के फैसले को लेकर केंद्र सरकार पर हमलावर नजर आ रही हैं।

यह वही मायावती हैं जिन्होंने अपने मुख्यमंत्री के कार्यकाल के दौरान उनकी सरकार ने भी ऐसे ही दो आदेश दिये थे जिसमें कहा गया था कि एक्ट का बेकसूर लोगों के खिलाफ दुरुपयोग किया जा रहा है। उस वक्त चीफ सेक्रेटरी ने कहा था कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी केवल शिकायत के आधार पर नहीं होनी चाहिए बल्कि आरोपी की प्राथमिक जांच में दोषी पाए जाने के बाद होनी चाहिए। 20 मई 2007 को चीफ सेक्रेटरी शंभू नाथ द्वारा जारी किये गए पत्र में कहा गया था कि इस एक्ट में बहुत सारी शिकायतें आईं। आदेश में लिखा गया था कि इस एक्ट में केवल हत्या और रेप जैसे जघन्य अपराध को ही शामिल होना चाहिए। इसके अलावा छोटे-मोटे अपराधों के लिए किसी दूसरे एक्ट के अंतर्गत कार्रवाई की जाए। इसमें यह भी कहा गया था कि अगर किसी एस सी - एस टी द्वारा रेप की शिकायत की जाती है तो पहले मामले की जांच की जाए और प्राथमिक जांच में अगर आरोपी दोषी पाया जाता है तभी उसकी गिरफ्तारी हो। इसके अलावा मायावती सरकार के चीफ सेक्रेटरी प्रशांत कुमार द्वारा 29 अक्टूबर 2007 को पुलिस महानिदेशक को दूसरा पत्र जारी किया गया था जिसमें कहा गया था कि अगर SC-ST एक्ट के अंतर्गत शिकायत गलत पायी जाती है तो ऐसी शिकायतों को सेक्शन 182 के तहत बुक कर दें।

अर्जुन राम मेघवाल 

इस मुद्दे पर केंद्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल की बात पर भी गौर कियाजाना चाहिए। मेघवाल कहते हैं कि अंबेडकर के सपनों को पूरा करने की मोदी सरकार की अडिग प्रतिबद्धताएं हैं और उसके सारे प्रयासों का उद्देश्य दलितों के जीवन में बदलाव लाना है। कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों में दो बार अंबेडकर को हरवाया और इसके पीछे हल्के बहाने पेश किये कि संसद के केंद्रीय कक्ष में उनका चित्र नहीं लग पाए। कांग्रेस ने अंबेडकर को भारत रत्न नहीं मिलने दिया। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2015 के माध्यम से राजग सरकार ने वास्तव में कानून के प्रावधानों को मजबूत बनाया था और यह दलित वर्गों के कल्याण की भाजपा की प्रतिबद्धता के अनुरूप था।

राजनाथ सिंह 

सरकार पर दलित विरोधी होने के विपक्ष के आरोपों के बीच गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को लोकसभा में कहा कि मोदी सरकार एससी-एसटी के हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और एससी-एसटी कानून को कमजोर नहीं किया जाएगा। विपक्ष के आरोपों पर पलटवार करते हुए भाजपा ने यह दलील भी पेश की है कि उसके पास सर्वाधिक एससी-एसटी सांसद हैं। 

थावरचंद गहलोत 

केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री थावरचंद गहलोत ने कहा, ‘अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के हित के संरक्षण के लिए भाजपा कटिबद्ध है। इन वर्गों के उत्थान के लिए सबसे ज्यादा काम भाजपा ने किए हैं। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में इन वर्गों के अधिकारों को मजबूती मिली है।’ भाजपा की कोशिश है दलितों और आदिवासियों के बीच अपने आधार बचाए रखने के साथ और इसे बढ़ाया जाए । वहीं कभी इस वर्ग पर राजनीतिक रूप से मजबूत पकड़ रखने वाली कांग्रेस अपना आधार फिर वापस पाने को प्रयासरत है।

मध्यप्रदेश और राजस्थान 

दरअसल देश में दलित और आदिवासी सामाजिक-आर्थिक रूप से भले ही कमजोर माने जाते हों, लेकिन उनकी सियासी हैसियत इतनी बड़ी है कि देश का कोई भी राजनीतिक दल उनको नजरअंदाज नहीं कर सकता। अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निरोधक कानून पर उच्चतम न्यायालय के हालिया फैसले के बाद खड़े हुए राजनीतिक बवाल से इस बात पर फिर से मुहर लगी है। शायद यही वजह है कि ‘भारत बंद’ का असर उन राज्यों में सबसे ज्यादा देखा गया जहां अगले कुछ महीनों के भीतर चुनाव होने हैं जिनमें मध्य प्रदेश, राजस्थान शामिल हैं।

समाज में विभाजन

ग्वालियर, मुरैना, भिंड, सागर समेत एक दर्जन से अधिक शहरों की सड़कों पर तलवार, लाठी और झंडे लहराते लोगों के हुजूम से समाज में हुआ विभाजन तो साफ तौर पर दिखाई दे गया, लेकिन राजनीतिक स्तर पर वोटों के विभाजन का पता चुनाव के दौरान ही चल पाएगा। सन 2003 के बाद से सूबे का सतरंगी सामाजिक समीकरण भाजपा के पक्ष में रहा है। इससे पहले परंपरागत रूप से अगड़ी जातियों का वोट भाजपा का और पिछड़ा, दलित और आदिवासियों का वोट कांग्रेस का माना जाता रहा है। इसलिए तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा अकेले अगड़ी जातियों के दम पर सरकार बनाने में कामयाब नहीं हो पाई थी।

2003 में बदले हालात

वास्तविकता है कि 2003 में भाजपा ने अपनी प्राथमिकताएं बदलीं, चेहरे बदले और पिछड़ा, दलित व आदिवासियों में यह संदेश पहुंचाया कि वह सिर्फ अगड़ों की प्रतिनिधि नहीं है। इसका असर यह हुआ कि कभी कांग्रेस समर्थित रहा यह वर्ग भाजपा की झोली में आ गया। प्रदेश में भाजपा सरकार की हैट्रिक में दलित, पिछड़ा और आदिवासी वोटरों की निर्णायक भूमिका रही है। सूबे की 35 एससी सीटों में से 28 और 47 एसटी सीटों में से 32 भाजपा के पास हैं। लोकसभा सदस्यों के लिहाज से देखा जाए तो अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित चारों सीटें भाजपा के पास हैं। जबकि अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित छह में से पांच सीटों पर भाजपा का कब्जा है। इससे समझा जा सकता है कि कांग्रेस के मुकाबले भाजपा का जनाधार इन वर्गो में कितना मजबूत है।

जातीय हिंसा के बाद उठे सवाल

सवाल यह है कि क्या इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में भी हालात ऐसे ही रह पाएंगे। सोमवार को हुई जातीय हिंसा के बाद इस सवाल के बड़े मायने हैं। प्रदेश के जिस अंचल में हिंसा हुई वहां के सामाजिक और राजनीतिक समीकरण पर गौर करें तो एक सवाल और खड़ा होता है कि आखिर प्रदेश के इसी अंचल में हिंसा क्यों भड़की? ग्वालियर-चंबल संभाग उत्तरप्रदेश की सीमा से सटा हुआ है। यहां जातिवादी राजनीति का असर रहा है। पूरे प्रदेश में बसपा का यदि सबसे ज्यादा जोर किसी इलाके में है तो वह ग्वालियर-चंबल संभाग ही है। इस इलाके का आरक्षित वोटर नाराज हो कर भाजपा से टूटता है तो समझा जा सकता है कि हालात क्या होंगे। जैसी संभावना है, यदि बसपा और कांग्रेस के बीच समझौता हो जाता है तो भाजपा की चुनावी उम्मीदें कैसे परवान चढ़ पाएंगी? भाजपा के सामने अकेले दलित वोट साधने की चुनौती ही नहीं है, आदिवासी वर्ग में खड़े हो रहे कुछ सामाजिक संगठन भी परेशानी खड़ी कर रहे हैं। सोमवार के दलित आंदोलन में आदिवासी बहुल क्षेत्रों में आदिवासी युवाओं का सड़कों पर उतरना भी भाजपा के लिए शुभ संकेत नहीं है।

संजय तिवारी

संस्थापक – भारत संस्कृति न्यास, नयी दिल्ली

वरिष्ठ पत्रकार 


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