मार्कंडेय ऋषि द्वारा की गई अद्भुत शिव स्तुति - महा मृत्युंजय स्तोत्र !

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भावी मेट सकहिं त्रिपुरारी  मार्कंडेय ऋषि की आयु ब्रह्मा द्वारा महज 12 वर्ष निर्धारित थी, किन्तु वे चिरजीवी हुए | उनके द्वारा...



भावी मेट सकहिं त्रिपुरारी 

मार्कंडेय ऋषि की आयु ब्रह्मा द्वारा महज 12 वर्ष निर्धारित थी, किन्तु वे चिरजीवी हुए |

उनके द्वारा की गई शिव स्तुति को महा मृत्युंजय स्तोत्र के नाम से जाना जाता है | स्तोत्र की पंक्तियाँ पढ़ने सुनने से ही आत्म विश्वास पैदा होता है – जिस पर चंद्रशेखर की कृपा हो, उसका यम भी क्या बिगाड़ सकेंगे ? उनको प्रणाम करने वाले का मृत्यु क्या बिगाड़ेगी ?

ॐ अस्य श्री महा मृत्युंजय स्तॊत्र मंत्रस्य । श्री मार्कंडॆय ऋषि: ।

अनुष्टुप छंद: । श्री मृत्युंजयॊ दॆवता । गौरी शक्ति: । मम सर्वारिष्ट समस्त मृत्युशांत्यर्थं

सकलैश्वर्यप्राप्त्यर्थं जपॆ विनियॊग: ॥

॥ अथ ध्यानम्‌ ॥

चंद्रार्काग्नि विलॊचनं स्मितमुखं पद्मद्वयांत: स्थितं
मुद्रापाशमृगाक्ष सूत्रविलसत्पाणिं हिमांशुप्रभम्‌ ।
कॊटींदुप्रगलत्‌ सुधाप्लुततनुं हारातिभूषॊज्वलं
कांतां विश्वविमॊहनं पशुपतिं मृत्युंजयं भावयॆत्‌ ॥


रत्नसानुशरासनं रजताद्रिश्रृंगनिकेतनं शिण्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युतानलसायकम्।

क्षिप्रदग्धपुरत्रयं त्रिदशालयैरभिवन्दितं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम: ।।1।।

पंचपादपपुष्पगन्धिपदाम्बुजव्दयशोभितं भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम्।

भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशिनं भवमव्ययं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम: ।।2।। 
मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं पंकजासनपद्मलोचनपूजिताड़् घ्रिसरोरुहम्।

देवसिद्धतरंगिणीकरसिक्तशीतजटाधरं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम: ।।3।।

कुण्डलीकृतकुण्डलीश्वर कुण्डलं वृषवाहनं नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम्।

अन्धकान्तकमाश्रितामरपादपं शमनान्तकं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:।।4।।

यक्षराजसखं भगाक्षिहरं भुजंगविभूषणं शैलराजसुतापरिष्कृतचारुवामकलेवरम्।

क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:।।5।।

भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं दक्षयज्ञविनाशिनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम्।

भुक्तिमुक्तिफलप्रदं निखिलाघसंघनिबर्हणं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:।।6।।

भक्तवत्सलमर्चतां निधिमक्षयं हरिदम्बरं सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनूपमम्।

भूमिवारिनभोहुताशनसोमपालितस्वाकृतिं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:।।7।।

विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं संहरन्तमथ प्रपंचमशेषलोकनिवासिनम्।

क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथसमावृतं चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यम:।।8।।

रुद्रं पशुपतिं स्थाणुं नीलकण्ठमुमापतिम्।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति।।9।।

कालकण्ठं कलामूर्तिं कालाग्निं कालनाशनम्।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति।।10।।

नीलकण्ठं विरुपाक्षं निर्मलं निरुपद्रवम्।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति।।11।।

वामदेवं महादेवं लोकनाथं जगद्गुरुम्।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति।।12।।

देवदेवं जगन्नाथं देवेशवृषभध्वजम्।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति।।13।।

अनन्तमव्ययं शान्तमक्षमालाधरं हरम्।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति।।14।।

आनन्दं परमं नित्यं कैवल्यपदकारणम्।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति।।15।।

स्वर्गापवर्गदातारं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणम्।

नमामि शिरसा देवं किं नो मृत्यु: करिष्यति।।16।।



फलश्रुति

मार्कंडॆय कृतं स्तॊत्रं य: पठॆत्‌ शिवसन्निधौ ।
तस्य मृत्युभयं नास्ति न अग्निचॊरभयं क्वचित्‌ ॥ २० ॥

शतावृतं प्रकर्तव्यं संकटॆ कष्टनाशनम्‌ ।
शुचिर्भूत्वा पठॆत्‌ स्तॊत्रं सर्वसिद्धिप्रदायकम्‌ ॥ २१ ॥

मृत्युंजय महादॆव त्राहि मां शरणागतम्‌ ।
जन्ममृत्यु जरारॊगै: पीडितं कर्मबंधनै: ॥ २२ ॥

तावकस्त्वद्गतप्राणस्त्व च्चित्तॊऽहं सदा मृड ।
इति विज्ञाप्य दॆवॆशं त्र्यंबकाख्यममं जपॆत्‌ ॥ २३ ॥

नम: शिवाय सांबाय हरयॆ परमात्मनॆ ।
प्रणतक्लॆशनाशाय यॊगिनां पतयॆ नम: ॥ २४ ॥

॥ इती श्री मार्कंडॆयपुराणॆ महा मृत्युंजय स्तॊत्रं संपूर्णम्‌ ॥

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