राहुल गांधी व उनके चियर लीडर्स द्वारा आरएसएस के विरुद्ध की जा रही कांव कांव पर श्री रतन शारदा का करारा तार्किक तमाचा !

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मल्लिकार्जुन खड़गे के इस बयान ने सभी मर्यादाओं को तार तार कर दिया है कि, "आरएसएस वालों के किसी कुत्ते ने भी स्वतंत्रता संग्राम ...



मल्लिकार्जुन खड़गे के इस बयान ने सभी मर्यादाओं को तार तार कर दिया है कि, "आरएसएस वालों के किसी कुत्ते ने भी स्वतंत्रता संग्राम में अपनी जान नहीं गंवाई"। निश्चय ही इसमें राहुल गांधी की भी सहमति मानी जा सकती है, क्योंकि वह कांग्रेस (आई) के अध्यक्ष हैं, और उनके तेवर भी ऐसे ही हैं । यहाँ ध्यान देने योग्य बात है कि वर्तमान कांग्रेस स्वतंत्रता संग्राम की कांग्रेस है ही नहीं । 1969 में स्वयं राहुल जी की दादी ने मूल कांग्रेस को समाप्त कर स्वतंत्रता संग्राम के सभी दिग्गजों को बाहर फेंक दिया था। सच कहा जाए तो नेहरू जी ने भी राष्ट्रवादियों और अपने से मतभेद रखने वालों को किनारे कर कांग्रेस के गांधीवादी मूल स्वरुप के स्थान पर कम्युनिज्म के अपने विचार को समाजवाद के नाम से अपनाया था । 

उनसे मतभेद के कारण किनारे किये गए लोगों की लंबी श्रंखला है | डॉ अम्बेडकर को केवल इसलिए चुनाव भी नहीं जीतने दिया गया, क्योंकि उन्होंने संविधान के प्रस्ताव में 'समाजवादी' शब्द को जोड़ने से इनकार कर दिया था | राष्ट्रवाद के पुरोधा सर्व श्री पुरुषोत्तमदास टंडन, आचार्य कृपलानी, लोहिया जी का समाजवादी समूह, चौधरी चरण सिंह और अन्य कई लोग उनकी कूटनीति के चलते कांग्रेस में किनारे किये गए । यहाँ तक कि सरदार पटेल को भी दशकों तक सार्वजनिक स्मृति से विलुप्त करने का प्रयास हुआ, जिन्हें नरेंद्र मोदी ने पुन्हः स्थापित किया । सूची बहुत लंबी है। राष्ट्रवादियों के स्थान पर बामपंथी कार्ड होल्डर मोहन कुमारमंगलम जैसे लोग कांग्रेस में प्रभावी होते गए और कांग्रेस का वाम रुझान स्पष्ट दिखाई देने लगा । तो कहने का आशय यह कि वर्तमान कांग्रेस स्वतंत्रता संग्राम वाली कांग्रेस पार्टी तो है ही नहीं । 

स्वतंत्रता की कहानी को केवल नेहरू-गांधी की कहानी बताने वाले क्रांतिकारियों और उन असंख्य हुतात्माओं का अपमान करते हैं, जिन्होंने आजादी की लड़ाई में संघर्ष करते हुए मां भारती के चरणों में अपने आप को बलिदान किया । यह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, स्वातंत्र्य वीर सावरकर, सुब्रमण्य भारती, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह आदि की स्मृतियों का घोर अपमान है जिन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष किया था । नेताजी से सम्बंधित गोपनीय फाइलों से इतना तो स्पष्ट होता ही है कि उन्हें कैसे रास्ते से हटाया गया। यह एक मजबूत सार्वजनिक भावना है जिसने उनकी स्मृति को विलुप्त नहीं होने दिया । गांधी जी और नेहरू जी के प्रतिकूल दबाव के कारण कांग्रेस अध्यक्ष के पद से उन्हें इस्तीफा देना पड़ा, क्या यह घटना कांग्रेस के इतिहास पर एक कलंक नहीं है? 

कांग्रेस का मानना है कि 1942 का भारत छोडो आन्दोलन भारत की स्वतंत्रता का सबसे बड़ा कारण है। लेकिन इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि 1920-21 से लेकर 1931 तक के दस 10 वर्षों में हजारों भारतीयों ने अंग्रेजों को शान्ति से शासन नहीं करने दिया था । 1947 में तो इन आंदोलनों की समाप्ति हुई | हिंसक और अहिंसक संघर्ष के अतिरिक्त आजादी की लड़ाई में स्वामी विवेकानंद और महर्षि अरबिंदो घोष जैसे संतों के आध्यात्मिक आंदोलनों को भी नहीं भुलाया जा सकता । स्वयं तत्कालीन ब्रिटिश प्रधान मंत्री अटली द्वारा यह स्वीकार किया गया है कि गांधीजी या भारत छोड़ो आंदोलन ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया, वस्तुतः नेताजी की आजाद हिन्द फ़ौज और द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1 9 46 में मुंबई के नौसेना विद्रोह ने डरे हुए अंग्रेजों को भारत छोड़ने के लिए विवश किया । 

यहां एक और गंभीर सवाल उठता है - आजादी की घोषणा के बाद विभाजन की विभीषिका में अपनी जान गंवाने वाले, अपनी आबरू लुटाने के बाद बेघरबार हुए विस्थापितों के लिए कांग्रेस ने क्या किया ? उन्हें अनाथ छोड़ दिया? जब पूर्वी पंजाब और सिंध में हिंसा शुरू हुई, तो वे आरएसएस और इसके बहादुर स्वयंसेवक ही थे, जो मुस्लिम लीग के सामने अंतिम सांस तक खड़े रहे। यह आरएसएस ही था जिसने अपने 12 शीर्ष कार्यकर्ताओं को निर्देशित किया कि वे तब तक सिंध न छोड़ें, जब तक कि एक भी हिन्दू असुरक्षित रहे । वे युवा स्वयंसेवक ही थे, जो डोगरा के साथ कंधे के कंधे मिलाकर खड़े थे, जब पाकिस्तानी मुजाहिदीन ने कश्मीर पर हमला किया था । यह वही संगठन था जिसने सिंध, पंजाब, जम्मू-कश्मीर और बंगाल में विस्थापितों के लिए राहत समितियों का गठन कर उनकी सारसंभाल की । विशेष पुनर्वास शिविर बनाए गए थे और उस भीषण परिस्थिति में भी जितना कुछ किया जा सकता था, किया था । उस दौर में आरएसएस ने निःस्वार्थ भाव से बिना किसी भेदभाव के कांग्रेस नेताओं को भी सहारा दिया, कई मुस्लिम महिलाओं को भी पाकिस्तान में अपने परिवारों में वापस लौटने में मदद की | और इस काम में स्वयंसेवकों ने अपने व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन में भारी कीमत चुकाई। एक पंजाबी के रूप में, अपने विस्तारित परिवार में मैंने उस समय की अपमान जनक हिंसा और आरएसएस स्वयंसेवकों के आत्मोत्सर्ग की अनेक गाथाओं को व्यक्तिगत रूप से सुना है । 

तथ्य यह है कि कांग्रेस उस समय पूरे देश का प्रतिनिधित्व कर रही थी और इसमें प्रत्येक राजनीतिक विचारों के सभी प्रकार के नेता थे। किन्तु कांग्रेस ने जिस प्रकार 1946 के लीगी 'डायरेक्ट एक्शन' के समय हुए सांप्रदायिक आक्रमणों को नजर अंदाज किया और विभाजन के लिए सहमति व्यक्त की, क्या वह बुद्धिमानी थी ? आरएसएस को पहले अंग्रेजों द्वारा सांप्रदायिक कहा जाता था, फिर हिंदू-सिख भाइयों के साथ खड़े होने पर कांग्रेस द्वारा भी इसे ही दोहराया जाता रहा । हिंदी में एक पुस्तक है - ज्योति जला निज प्राण की, जिसके 550 पृष्ठों में विश्वसनीय सन्दर्भों के साथ अशांति के उस दौर की दिल दहला देने वाली गाथाओं का वर्णन है । 

अगस्त 1946 के लीगी डायरेक्ट एक्शन का विरोध कर अपने विस्थापित भाइयों के पुनर्वास के स्थान पर कांग्रेस ने उस भीषण साम्प्रदायिक दौर में अपनी ऊर्जा आरएसएस को दबाने पर बर्बाद की, और वही काम वह आज भी कर रही है । उस समय पाकिस्तान में मुस्लिम लीग के मुखपत्र 'डॉन' ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने की मांग की और 1948 में जब आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया तो बहुत खुशी जाहिर की । हम आज भी पाकिस्तान और कांग्रेस के विचारों में एकरूपता देखते हैं। 

आज भी कई सवालों का कोई उत्तर देने वाला नहीं है । 1947 में सीमा पार लायलपुर से आये लाखों शरणार्थियों को सत्ता के लिए बेताब शेख अब्दुल्ला ने अवशोषित होने के लिए छोड़ दिया, जबकि उनमें से ज्यादातर एससी / एसटी के लोग थे? वे 10 लाख लोग अब भी नागरिकता के अधिकारों से वंचित हैं और बदतर परिस्थितियों में जीवन यापन को विवश हैं, उन्हें नातो शैक्षिक संस्थानों में प्रवेश का अधिकार है और ना ही वे सरकारी नौकरियों के पात्र हैं | क्या यह हमारी घटिया और ओछी राजनीति का प्रतिबिंब नहीं है? यह कैसी विडंबना है कि एक लायलपुर वासी ने सौभाग्य से जम्मू की जगह पंजाब का रुख किया, और बाद में वह 10 साल तक इस देश का प्रधान मंत्री बना बैठा रहा, किन्तु उसने जम्मू में रह रहे अपने ही भाइयों के लिए कुछ नहीं किया, जो आज भी भगवान भरोसे हैं, शासन के नहीं। आज जम्मू-कश्मीर जो थोडा बहुत भारत में दिखाई दे रहा, तो वह भी डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान के कारण, जिनकी कथित तौर पर गलत दवायें देकर चिकित्सकीय हत्या कर दी गई थी । 

क्या कोई बताएगा कि 1947 के बाद भी गोवा, दमन, दीव, नगर हवेली और पौंडूचेरी को मुक्त नहीं करने की क्या बाध्यता थी? पुर्तगाली और फ्रेंच उपनिवेशवादियों की दया पर हमारे नागरिक क्यों गुलाम बने रहे? ये आजाद तब हुए जब आरएसएस सत्याग्रहियों के सहित कुछ बहादुरों के दल ने गुजरात के क्षेत्र मुक्त कराये और गोवा में कड़ी मेहनत की? किन्तु इसमें 14 साल बर्बाद हो गए! क्या वे शांति के राजदूत के रूप में अंतरराष्ट्रीय गौरव की तलाश में थे? गोवा के क्रांतिकारी सेनानियों जैसे मोहन रानडे और उनके दोस्त 1969 तक पुर्तगाल की जेलों में एकाकी जंजीरों में जकडे रहे, क्यों और किसके कारण? 

संघर्ष की नींव 1960 के दशक में एक बार फिर रखी गई, जब कांग्रेस ने चुनाव हारने के डर से अकालियों की पंजाबी सुबा की मांग ठुकरा दी, जबकि 1950 के दशक में केंद्र सरकार द्वारा भारत के अन्य सभी राज्यों का पुनर्गठन किया गया । 

ऐसे कई सवाल हैं जिनके उत्तर, अनावश्यक रूप से आरएसएस को किनारे करने की कोशिश में लगी, कांग्रेस को देना चाहिए, जबकि आरएसएस से उसकी कोई प्रतिस्पर्धा भी नहीं है। उसकी प्रतिद्वंद्वी बीजेपी है। 1921 में तो आरएसएस के संस्थापक कांग्रेस के सदस्य ही थे, और आरएसएस के जन्म के बाद भी 1931 में और 1942 में भी आरएसएस ने अपनी भूमिका निभाई। इतना ही नहीं तो 1946-1947 में भी आरएसएस ने जो कुछ किया, वह भारतीय स्वतंत्रता इतिहास में सुनहरे अध्याय के रूप में लिखा जाना चाहिए। आरएसएस को राहुल गांधी और उनके चीअरलीडर की कांव कांव से शर्मिंदा होने का कोई कारण नहीं है | इसके विपरीत कांग्रेस को अनेक वर्षों तक कालीन के नीचे छिपाकर रखे गए कई अधिक शर्मनाक सवालों के जवाब देने की आवश्यकता होगी। 

श्री रतन शारदा के एक अंग्रेजी आलेख पर आधारित -

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क्रांतिदूत: राहुल गांधी व उनके चियर लीडर्स द्वारा आरएसएस के विरुद्ध की जा रही कांव कांव पर श्री रतन शारदा का करारा तार्किक तमाचा !
राहुल गांधी व उनके चियर लीडर्स द्वारा आरएसएस के विरुद्ध की जा रही कांव कांव पर श्री रतन शारदा का करारा तार्किक तमाचा !
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