इतिहास कोहिनूर हीरे का !

कोहिनूर हीरा अपने पूरे इतिहास में अब तक एक बार भी नहीं बिका है | यह या तो एक राजा द्वारा दूसरे राजा से जीता गया या फिर इनाम में दिया गया...

Kohinoor diamond


कोहिनूर हीरा अपने पूरे इतिहास में अब तक एक बार भी नहीं बिका है | यह या तो एक राजा द्वारा दूसरे राजा से जीता गया या फिर इनाम में दिया गया। इसलिए इसकी कीमत कभी नहीं लग पाई। पर इसकी कीमत क्या हो सकती है इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है कि आज से 60 साल पूर्व हांगकांग में एक ग्राफ पिंक हीरा 46 मिलियन डॉलर में बिका था जोकि मात्र 24.78 कैरेट का था। जबकि कहा जाता है की खदान से निकला कोहिनूर 793 कैरेट का था। अलबत्ता 1852 से पहले तक यह 186 कैरेट का था। पर जब यह ब्रिटेन पहुंचा तो महारानी को यह पसंद नहीं आया इसलिए इसकी दुबारा कटिंग करवाई गई जिसके बाद यह 105.6 कैरेट का रह गया। लेकिन इसके बाद भी कोहिनूर की वर्तमान कीमत कई बिलियन डॉलर मानी जाती है । 

"कोहिनूर का अर्थ होता है रोशनी का पहाड़, लेकिन यह ऐसी रोशनी है जिसने अनेक सल्तनतों का सूर्य अस्त कर दिया” 

इस अनमोल हीरे की खोज वर्तमान आंध्र प्रदेश गुंटूर जिले में स्थित गोलकुंडा की खदानों में खुदाई के दौरान हुई थी। लेकिन यह कब बाहर आया, सबसे पहले किसने इसे देखा, इसका कोई प्रमाण दर्ज नहीं है।

बाबरनामा के अनुसार 1294 के आस-पास यह हीरा ग्वालियर के किसी राजा के पास था हालांकि तब इसका नाम कोहिनूर नहीं था। 14 वीं शताब्दी के प्रारम्भ में यह हीरा काकतीय वंश के पास आया और काकतीय साम्राज्य के पतन के पश्चात यह हीरा 1325 से 1351 ई. तक मोहम्मद बिन तुगलक के पास रहा | 16वीं शताब्दी के मध्य तक यह विभिन्न मुगल सल्तनतों के पास रहा | शाहजहां ने इस कोहिनूर हीरे को अपने मयूर सिंहासन में जड़वाया | 

1739 में फारसी शासक नादिर शाह भारत आया और उसने मुगल सल्तनत पर आक्रमण कर दिया। विजेता नादिर शाह अपने साथ तख्ते ताउस और कोहिनूर हीरों को पर्शिया ले गया। उसने इस हीरे का नाम कोहिनूर रखा। 1747 ई. में नादिरशाह की हत्या हो गयी और कोहिनूर हीरा अफ़गानिस्तान शांहशाह अहमद शाह दुर्रानी के पास पहुंच गया। और उनकी मौत के बाद उनके वंशज शाह शुजा दुर्रानी के पास पहुंचा। पर कुछ समय बाद मो. शाह ने शाह शुजा को अपदस्थ कर दिया। 1813 ई. में, अफ़गानिस्तान का अपदस्थ  शांहशाह शाह शूजा कोहीनूर हीरे के साथ भाग कर लाहौर पहुंचा। उसने कोहिनूर हीरे को पंजाब के राजा रंजीत सिंह को दिया एवं इसके एवज में राजा रंजीत सिंह ने, शाह शूजा को अफ़गानिस्तान का राज-सिंहासन वापस दिलवाया। इस प्रकार कोहिनूर हीरा वापस भारत आया।

अंग्रेजों द्वारा सिख साम्राज्य को अपने अधीन कर लेने के बाद यह हीरा ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा हो गया व महारानी विक्टोरिया को सौप दिया गया | 

लेकिन कई लोगों का मानना है कि यह हीरा वस्तुतः महाभारत काल का है | तब इसका नाम श्यामन्तक मणि था | भगवान श्री कृष्ण पर इसकी चोरी का झूठा आरोप लगने व उसके बाद परमपराक्रमी जाम्बबंत से उनके युद्ध का रोचक वृतांत मिलता है | 

रामायण काल में रावण विजय के उपरांत जाम्बबंत को अहंकार हो गया था कि उनके पराक्रम के कारण ही राम को विजय मिली | उनके उस अहंकार को दूर करने के लिए ही कृष्णावतार में कृष्ण ने उनसे युद्ध में पराजित कर शिक्षा दी | जाम्बबंत ने अपने इष्टदेव को पहचान कर उनसे अपनी पुत्री का विवाह किया व श्यामन्तक मणि लौटाई |

अब सवाल उठता है कि -

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