नीति आयोग - एक बड़ा प्रश्न चिन्ह ???

नीति आयोग शब्द से कई बार कई लोग भ्रम का शिकार हो सकते हैं | नीति शब्द हिन्दी का नहीं है | न इसका नीति अनीति से कोई लेना देना है | यह तो ...


नीति आयोग शब्द से कई बार कई लोग भ्रम का शिकार हो सकते हैं | नीति शब्द हिन्दी का नहीं है | न इसका नीति अनीति से कोई लेना देना है | यह तो National Institution for Transforming India का संक्षिप्त नाम है, जिसका अर्थ हम मान सकते हैं, इण्डिया को बदलने वाली संस्था | आजादी के 67-68 वर्ष बाद अगर इण्डिया को बदलने की बात देश के भाग्य विधाताओं के मन मस्तिष्क में आई है तो पहला प्रश्न तो यही होगा कि उसका क्या स्वरुप होगा ? इण्डिया को बदलकर क्या बनाया जाना चाहिए ?

वस्तुतः भारत को अंग्रेजों के उपनिवेशवादी व्यवस्था ने इण्डिया बनाया | अब अगर इसका रूपांतरण करना है तो वह केवल पुन्हः भारत बनाकर ही हो सकता है | इसका और कोई स्वरुप संभव नहीं है | भा का अर्थ ज्ञान और भारत अर्थात ज्ञान पिपासु देश | ज्ञानियों का देश | विश्व गुरू भारत | ऐसा भारत बनाना तो केवल आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनकर ही संभव है | विदेशी पूंजी के पीछे अंधी दौड़ लगाने से तो ऐसा भारत बनना संभव है नहीं | 

लेकिन दुर्भाग्य से आजादी के तत्काल बाद वाली स्थिति फिर सामने है | गांधी जी की नजर में विकास का अर्थ था ग्राम का विकास | किन्तु नेहरू पश्चिमी अन्धानुकरण की दिशा में देश को ले गए | गांधी जी ने कहा था - ब्रिटिश सरकार भारत में जिस संस्कृति का प्रदर्शन कर रही है, वह तो शैतान का साम्राज्य है | और मैं स्वयं जिसे जानता और समझता हूँ, वह प्राचीन भारतीय संस्कृति ईश्वर का साम्राज्य है | ब्रिटिश युद्ध के देवता के प्रतिनिधि हैं, जबकि प्राचीन भारत के लोग प्रेम के देवता के |” जरा विचार कर देखें कि जिस संस्कृति को गांधी जी ने शैतानी करार दिया, नेहरू जी ने अपनी नीतियों से वही संस्कृति देश के सर पर लाद दी |

गांधीजी के विचारों तथा स्वतंत्र भारत की रीति नीति विषयक उनकी कल्पना से नेहरू जी की असहमति समय समय पर स्पष्ट परिलक्षित होती रही | सन 1927 में श्री जवाहरलाल नेहरू ने गांधीजी को लिखा था, “ आपने कहीं पर कहा हैकि भारत को पश्चिम से सीखने योग्य कुछ भी नहीं है | भारत प्राचीनकाल में ज्ञान के शिखर पर पहुंचा हुआ था | मैं आपके इस अभिमत से सहमत नहीं हूँ | मैं नहीं मानता कि प्राचीन काल का तथाकथित रामराज्य अच्छा था | आज मुझे वह चाहिए भी नहीं | मैं मानता हूँ कि पाश्चात्य औद्योगिक संस्कृति भारत में आनेवाली ही है |”

इसके उत्तर में गांधी जी ने लिखा कि, “तुम्हारे और मेरे बीच मतभेद इतने बड़े और उग्र है कि हमारे लिए सहमती का कोई आधार दिखाई नहीं देता |” स्वाभाविक रूप से गांधीजी की ग्राम स्वराज की कल्पना पंडित नेहरू को मान्य नहीं थी | और उन्होंने इसे कभी छुपाया भी नहीं | पंडित नेहरू की धारणा उनके ही शब्दों में, “यह मेरी समझ से परे है कि गाँव सत्य और अहिंसा का प्रतीक कैसे हो सकता है ? सामान्य रूप से तो गाँव बौद्धिक और सांस्कृतिक रूप से पिछड़े ही होते हैं | तो फिर ऐसे पिछड़े वातावरण में कोई प्रगति कैसे हो सकती है ? संकुचित मानस के लोग तो झूठ बोलने वाले तथा झगडालू होने की ही संभावना अधिक है |

खैर इस समय नेहरू और गांधी की बात करना व्यर्थ है, गढ़े मुर्दे उखाड़ने जैसा है | इस समय तो देश की जनता का ध्यान वर्तमान मोदी सरकार के काम काज पर है | योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग गठन किया गया है | जैसा कि लेख के प्रारम्भ में वर्णन किया गया कि इसके पीछे इण्डिया को बदलने की इच्छा दर्शाई गई है | किन्तु विशेष बात यह है कि इसके उपाध्यक्ष जो बनाए गए हैं, वे तो उसी पश्चिमी अर्थतंत्र के तज्ञ व प्रशंसक है, जो विगत 67-68 वर्षों से भारत अपनाए हुए है | तो फिर बदलाव कैसे होगा ? 

अभी हाल ही में नीति आयोग के अध्यक्ष श्री अरविन्द पनागडिया के गुरू श्री भगवती ने जिस प्रकार स्वदेशी जागरण मंच व राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की आलोचना के बहाने से ग्रामोन्मुखी विकास अवधारणा का खुला विरोध किया है, उससे तो लगता है, एक बार फिर वही पुराना पश्चिमी अन्धानुकरण का दौर जारी रहने वाला है | विकास अर्थात पूंजीपति और गरीबी की खाई और चौड़ी होना | पूंजी पति का धन और बढ़ना तो दूसरी ओर ग़रीबों की संख्या में और वृद्धि | भारतीय जनसंघ के विचारक मनीषी राष्ट्रीय नेता स्व. दीनदयाल उपाध्याय कहा करते थे - 
आजकल राष्ट्रीय आय का विचार औसत के सिद्धांत के आधार पर किया जाता है | पर यह बहुत बड़ा भ्रम है | राष्ट्रीय आय के बढ़ने का अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति की आय बढे | यह सत्य है कि कम मनुष्यों का उपयोग करने वाली बड़ी मशीनों के द्वारा भी उत्पादन बढ़ सकता है, पर वह हमारे देश के लिए उपयुक्त नहीं | गांधी जी कहा करते थे, “मैं विशाल उत्पादन चाहता हूँ परन्तु विशाल जनसमूह द्वारा उत्पादन चाहता हूँ” |

बड़ी मशीनों के आधार पर जो उत्पादन बढाने का प्रयास चल रहा है, उससे देश में बेकारी तो बढ़ ही रही है, विदेशी ऋण भी बढ़ता जा रहा है | विदेशी मुद्रा विनिमय की समस्या खडी हो गई है | उसके कारण “उत्पादन करो या मर जाओ” के स्थान पर “निर्यात करो या मर जाओ” हो गया है | हमारी भावी योजनायें निर्यात केन्द्रित होने के कारण जो चीज हम पैदा करते हैं, उसका उपभोग भी स्वयं नहीं कर पाते | विदेशी मुद्रा प्राप्त करने के लिए चीनी सस्ते मूल्य पर विदेशों में बेचनी पड़ती है, जबकि देश में महंगे मूल्य पर बेची जाती है | अपनी गाय भेंसों को खली और भूसा न खिलाकर हम विदेशों को भेज रहे हैं और दूध के डिब्बों का आयत कर रहे हैं | इसका विचार कर यदि हम अधिक आदमियों का उपयोग करने वाले छोटे छोटे कुटीर उद्योग अपनाएं तो कम पूंजी तथा मशीनों की आवश्यकता होगी, विदेशी ऋण भी नहीं लेना पडेगा तथा देश की सच्ची प्रगति होगी |

महात्मा गांधी और दीनदयाल जी के वैचारिक आलोक में बदलाव हो तभी आत्मनिर्भर, स्वावलंबी भारत, विश्वगुरू भारत की संकल्पना साकार होगी | किन्तु क्या ऐसा होना संभव है ? लगातार आग्रह तो हम करते रह ही सकते हैं | शायद विचार का यह बीज कभी अंकुरित होकर पल्लवित पुष्पित हो सके |

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