आत्म स्वरुप का बोध !

मेरे मन ! पञ्च एषणाओं में से केवल - ज्ञानेषणा - ही प्रश्न रूप में प्रस्तुत होती है | वह पूछती है, यह क्या है ? जीव क्या है ? जगत क्या है ?...



मेरे मन ! पञ्च एषणाओं में से केवल - ज्ञानेषणा - ही प्रश्न रूप में प्रस्तुत होती है | वह पूछती है, यह क्या है ? जीव क्या है ? जगत क्या है ? इश्वर कौन है ? वह कहाँ रहता है ? वह सरूप है अथवा अरूप है ? जीव कहाँ से आता है ? कहाँ जाता है ? यह जन्म और म्रत्यु का चक्र कौन और क्यों चलाता है ? यह ज्ञानेषणा - इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए प्रेरित करती है | उसके द्वारा प्राप्त ज्ञान - विद्या के दो रूप हैं | एक है - इस जड़ जगत - की धारणा करने बाले - प्रकृति के नियमों को समझ कर इस जगत में जीव को, जीवन यात्रा को सुखकर बनाने प्रयत्न करने बाली - विद्या जो विद्या का आभास है - अविद्या है | वास्तव में इस जड़ जगत की धारणा करने बाली, प्रकृति के आधारभूत तत्व को - परमात्म तत्व को जान लेना ही विद्या है | इस कारण ही अविद्या - जड़ जगत के पदार्थ मात्र की धारणा के प्रकृतिदत्त नियम - मृत्यु को - इस जगत में जीवन को - पार पाने का साधन है - परन्तु मृत्यु उपरांत के जीवन - परमात्म तत्व को पाने का साधन ही विद्या है - जो अमृत - चिरंजीव आत्मा - का ज्ञान कराती है | मेरे मन - तू अविद्या की साधना को ही सर्वस्व न समझ | विद्या का उपासक बन | प्रभु का उपासक बन !

मेरे मन ! अविद्या - जीवन की अनित्य वस्तुओं को - बांधकर, धारण शक्ति का - नियमों का अध्ययन करने का साधन बुद्धि है - तर्क एवं विश्लेषण शक्ति - का - धारणा एवं चिंतन और निरीक्षण शक्ति का प्रयोग - ही - इन नियमों को जानने के लिए पर्याप्त हैं - परन्तु - विद्या - इन प्रकृति नियमों के - निर्माता - धाता - विधाता को जानने का - साधन रूप में बुद्धि - और बुद्धि की इन शक्तियों का प्रयोग अपर्याप्त - अक्षम, सिद्ध होता है - वहां आवश्यक है - आत्म शक्ति की अनुभूति, श्रद्धा, धृति और समर्पण की समग्रता | जहां श्रद्धा है, पूर्ण समर्पण है - वहां उस परम तत्व की सदा विद्यमानता - सामीप्यता तथा तादात्म्य का अनुभव स्वयं सिद्ध है | मेरे मन - बुद्धि बल को समेट कर आत्म बल में एकरूप कर दे | इससे जो भाव बल पैदा होगा, वही इश्वर साक्षात्कार हेतु आवश्यक ईश्वरीय कृपा होगी | अतएव - मेरे मन ईश आराधना का आश्रय ले | इस संसार के आश्रय को छोड़ |

मेरे मन ! जैसे ही इस संसार के आश्रय को छोड़कर तू, ईशाश्रय पर पूर्णतः निर्भर होता है - तू स्वयं एक असीम, अवर्णनीय, आनंद की अनुभूति करता है | यह अनुभूति सर्व प्रथम जिस क्षण हुई - तब तेरा "अस्तित्व" शून्य में खो गया था | जैसे ही तू लौटकर इस संसार के आश्रय टिकने बाले संयोगजन्य सुखों की ओर पुनः निहारने लगा - तेरे दुखों का प्रारम्भ पुनः हो गया | अतएव - उस चित्शक्ति का साक्षात्कार कर उसे अधिक स्पष्ट देखने, अनुभव करने का लिए - अपने पञ्च भौतिक शरीर से परे, पञ्च भौतिक जगत के परे - तथा उनमे सतत वास करने वाली उस अदभुत चित तत्व से तादात्म्य स्थापित करने के लिए - अपने चित्त को - चमका - अपने मलों का - षडरिपुओं का त्यागकर | नित्य परिमार्जन कर | उस प्रभु के चिंतन से, 'स्व'रूप के चिंतन से ही चित्त का मार्जन होता है | अतएव स्मरण, चिंतन, जप को अपना मेरे मन | आवृत्ति से ही निवृति होगी |

मेरे मन ! तेरे रूप का, गुण का. वृत्ति का, मति का तू ही अध्ययन करता है, तब तुझे, तेरे मल स्वयं दीखते हैं | उन मलों के परे तेरी निर्मल अवस्था का भी तुझे आभास होता है | और उस आभास को भी पारकर जब तू स्वयं स्थिर, शांत और चित तत्व में लीन होता है, तब सत तत्व के वोध की स्थिति आती है तथा उस बोध के साथ - आनंद का प्रादुर्भाव होता है - जो अवर्णनीय है | जिसे तुम वर्णन नहीं कर सकते पर चख चुकने के कारण - संसार की अन्य सब बातें - उसके आगे नीरस - फीकी तथा तुच्छ जान पड़ती है | उस आनंद की प्राप्ति के कारण ही अब तुम्हे सर्वत्र - उसकी कृपा दिखाई देती है | वही और वही तुम्हारे चित्त में विराजता रहे | अतएव अपनी इस निर्मल, शांत अवस्था को - अकाम रूप को - बनाए रखने के लिए - सदैव यत्नशील रहो | जिस साधन ने, सोपान ने तुम्हे यहाँ पहुंचाया - उसे गहे रहो | प्रभु से प्रार्थना करते रहो | जगत का सब सहो, पर प्रभु नाम कहो | तुम निश्चिन्त रहो |

मेरे मन ! आवृत्ति - वाराम्बार उसी बात का, उसी कर्म का दोहराना, अभ्यास करना - उस कार्य को - सहज एवं सरल कर्म बना देता है | आवृत्ति में विद्यमान बल, जड़ को भी संस्कारित करता है | अतएव आवृत्ति किसकी करनी, कितनी करनी, कैसे करनी, कहाँ करनी, क्यों करनी - इन बातों का विचार और निर्णय - विवेक पूर्वक करना होता है | परन्तु प्रभु की सर्व व्यापकता की अनुभूति होने के उपरांत - उसे सदैव, सर्वत्र, सर्वदा अनुभव में रखने के लिए - इन प्रश्नार्थ ककारों - क्यों - कहाँ - कैसे - कितने - आदि के वन्धन समाप्त हो जाते हैं | विवेक और विचार - उसकी ही लहरियां हैं - जो तुम्हे उसकी ओर ले जाती हैं | अतएव प्रभु नाम की आवृत्ति, उसके नाम का जप, उसके दर्शनों की अनुभूति - सदैव करता चल मेरे मन - सभी ओर से निर्विचार होजा - तू समाधिस्थ हो जाएगा | तब एक वही रहेगा | तू और तेरा अस्तित्व उस महत्चेतना में खो जाएगा | तू निवृत्त होगा मेरे मन | अतएव - निवृत्ति हेतु आवृत्ति में डूबा रह मेरे मन | डूबा रह |

मेरे मन ! तू स्वयं वृत्तिमय है | उन वृत्तियों में तदाकार हो अठखेलियाँ करता है - और हर घड़ी नई वृत्ति की टोह में, खोज में खोया रहता है | एक ही वृत्ति को बार बार दोहराना तुझे रास नहीं आता, भाता नहीं है | परन्तु परम प्रभु की कृपा तो उस पर ही होती है - जो मन की सभी वृत्तियों का परित्याग कर - सभी वृत्तियों से निवृत्त हो - आत्म वृत्ति में स्थिर हो जाता है - एक ही की आवृत्ति करता रहता है, कि सब कुछ प्रभु का, सब कुछ प्रभु के लिए और सब कुछ प्रभु ही है | उस की ही ये सब छटाएं हैं | इस एक वृत्ति में स्थिर होना - मतलब - मतलब छोड़ एक प्रभु की तलब होना ही है | तू सर्व प्रथम निवृत्त हो, तभी तुझे पुनः उस आनंद का चिर लाभ होगा - जो संयोगवश हुए उस प्रभु की अनुभूति का हुआ था | मेरे मन - उसकी तड़प और तलब लगी रहे | बाकी सब छूट जावे |

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