स्टंट प्रचारक - बाबा साहब नातू और श्री अरविंद मोघे !

अत्यंत ही साधारण परिस्थितियों में से जिस असाधारण व्यक्तित्व का निर्माण हुआ, उसका नाम है अरविन्द वासुदेव मोघे | पिताजी एक दूकान पर मुनीम थे...



अत्यंत ही साधारण परिस्थितियों में से जिस असाधारण व्यक्तित्व का निर्माण हुआ, उसका नाम है अरविन्द वासुदेव मोघे | पिताजी एक दूकान पर मुनीम थे, तो माताजी कुछ घरों में भोजन बनाने का कार्य करती थीं | ५ भाईयों में अरविंद जी चोथे भाई थे | ऐसी विपरीत परिस्थितियों में हिन्दू साम्राज्य दिनोत्सव १९५९ को अरविंद जी मोघे का प्रचारक जीवन प्रारम्भ हुआ | उनका प्रचारक बनना अनेक लोगों के लिए प्रेरणा बन गया | गोपाल राव जी यवतीकर का कहना है कि मेरे प्रचारक बनने में भी मोघे जी की प्रेरणा रही | दोनों समवयस्क थे | यवतीकर जी को लगा कि इतनी कठिन परिस्थिति में मोघे जी प्रचारक निकल सकते हैं, तो मैं क्यों नहीं ? यह वह दौर था जब प्रकाश सोलापुरकर, अन्नाजी मुकादम, शितिकंठ गवारीकर, गोपाल राव येवतीकर सर्विस छोडकर प्रचारक निकले !
अरविंद जी सर्व प्रथम रतलाम नगर प्रचारक बने ! प्रांत प्रचारक केशवराव जी गोरे ही सर्वप्रथम उनका परिचय कराने साथ गए ! बाबा साहब नातू विभाग प्रचारक थे ! उन्हें सब लोग स्टंट प्रचारक कहा करते थे ! बाबा साहब का मत था की प्रचारक ढीला ढाला लेंडू नहीं होना चाहिए ! सिनेमा देखने जाओ तो भीड़ में घुसकर टिकिट छीनकर लाओ ! बोक्स में मत बैठो ! उनके आग्रह पर रतलाम से ही बी.ए., एल.एल.बी. भी किया ! कालेज विद्यार्थियों के बीच संघ कार्य बढ़ाने का उत्तरदायित्व था ! कालेज में वाम पंथियों तथा कांग्रेसियों का प्रभाव मिटाने की द्रष्टि से ग्रामीण परिवेश से आने बाले संकोची तथा एकाकी तरुणों से मित्रता के सम्बन्ध बनाए तथा उनका ग्रुप बनाया ! उसी समय वाम पंथियों में दरार आ गई तथा बद्रीलाल जंगलवा नामक नवयुवक उनसे अलग हुआ ! बस फिर क्या था ! इस मौके का फ़ायदा उठाकर ६०-६१ के महाविद्यालयीन चुनाव में एक विद्यार्थी मोर्चा बनाया गया और महासचिव का चुनाव बद्रीलाल को जिताया ! फिर तो लोकप्रियता बहुत बढ़ गई साथ ही संघ का दबदबा बन गया ! चुनावी राजनीति से इतर विभिन्न विचारों के बीच पारस्परिक सद्भाव और सामंजस्य था ! सबके बीच मान्यता तथा लोक प्रियता रही ! जनसंघ का एकाध ही पार्षद जीतता था ! ऐसे समय शांतीलाल लोढा जनसंघ के पार्षद बने ! उनके पिताजी संघ चालक थे ! वकालत का व्यवसाय था ! गुरूजी जब कभी रतलाम आते तो उन्ही के यहाँ ठहरते थे !
रतलाम में जैन सनातनियों का भयंकर झगड़ा था ! यहाँ तक कि एक दूसरे के यहाँ से सामान भी नहीं खरीदते थे ! जनसंघ को उस समय लोग जैनसंघ बोलते थे ! जैन स्वयंसेवक संघ तथा सनातनियों का संघ अलग चलता था ! यहाँ तक कि दोनों के अखबार भी अलग निकलते थे ! कटुता की पराकाष्ठा थी ! इकलौते सनातनी कार्यकर्ता घनश्याम व्यास अलमस्त और फक्कड स्वभाव के स्वयंसेवक थे ! नोबल पढाने के शौकीन व्यास नियमित शाखा तो नहीं जाते थे किन्तु विशेष अभियानों में घर की तरफ भी नहीं देखते थे ! इसी प्रकार शांतीलाल चतर जैन होते हुए भी माहेश्वरी धर्मशाला में शाखा लगाते थे ! उन पर पत्थर फेंके जाते पर वे डटे रहते ! बाबा साहब ने चतुराई से धीरे धीरे स्थिति सामान्य बनाने का प्रयत्न किया !
रतलाम राजनैतिक रूप से पिछडा हुआ था ! बहां ठाकरे जी और बाबा साहब की इच्छा न होते हुए भी जलधारी जी को विधानसभा चुनाव लड़बाया ! भले ही कांग्रेस चुनाव में सफल हुई किन्तु सनातनी होने के कारण चुनाव जीतते रहे पालीवाल तीसरे नंबर पर रहे ! दूसरे नंबर पर जनसंघ प्रत्यासी जलधारी रहे ! इस चुनाव के कारण भी शाख बढ़ी ! एक मिल कर्मचारी पाटिल को धराड भेजा, जहां वे गधों के अस्तबल में रहे ! नियमित भोजन भी उन्हें रतलाम से टिफिन द्वारा भेजा जाता ! इस प्रकार मोघे जी ने ग्रामीण अंचल में संघ कार्य को जो फैलाव दिया यह उसका ही परिणाम था !
१९६६ से १९७५ तक मंदसौर जिला प्रचारक रहे ! १९७१-७२ में इंदौर स्वदेश के शेयर विक्रय किये गए ! राजेन्द्र शर्मा बडनगर के स्वयंसेवक थे ! वे ग्वालियर स्वदेश के लिए भेजे गए ! राजेन्द्र जी विद्यार्थी आंदोलन के कारण लोकप्रिय थे !
संस्मरण –
सोलंकी नामक एक कार्यकर्ता को कुत्ते ने काट लिया ! उसे हाईड्रोफोबिया हो गया ! स्वजन भी उससे दूर भागने लगे ! ऐसे में बाबा साहब ने ही उसे सम्भाला ! उसकी अंतिम सांस तक उसे गोदी में लेकर बैठे रहे ! वे गरीब परिवार के अच्छे कार्यकर्ता थे ! इस घटना के बाद बाबा साहब के प्रति सभी का आदर और बढ़ गया !
प.पू. गुरूजी के रतलाम आगमन पर ग्रामीण अंचल के प्रमुख व्यक्तियों को उनसे विशेष रूप से मिलबाया ! बड़ी सभा हुई ! संचलन देखने भी दूर दूर से ग्रामवासी आये ! उसी समय एक मजेदार प्रसंग हुआ ! संचलन में आगे आगे घोड़े पर बैठकर श्री हुकुमचंद कछवाय चल रहे थे ! तभी आगे चल रही घोड़ी को देखकर घोड़े ने अगले दोनों पैर उठा दिए ! बेचारे कछवाय धडाम से नीचे गिरे ! आयोजकों को ध्यान में आया कि कैसे कार्यक्रमों में छोटी छोटी बातों का ध्यान रखना चाहिए ! 
बाबा साहब नातू एक एक स्वयंसेवक का विचार करते थे ! उसके निजी जीवन का भी ध्यान रखते थे ! किसे डाक्टर बनाना चाहिए और किसे दूकान चलाना चाहिए, इसका पूरा आंकलन उन्हें रहता था ! और इसी प्रकार किसे प्रचारक निकालना है, इस हेतु उसमें क्या गुण समाहित होना चाहिए इसका पूरा लेखा जोखा उनके दिमाग में रहता था ! यही कारण है कि उन्होंने सालिग्राम जी, माखन सिंह जी और सुरेश जी जैसे प्रचारक खोजने में सफलता पाई ! वे कहा करते थे कि व्यक्ति का ध्यान रखो संगठन स्वतः खडा हो जाएगा ! जिस व्यक्ति ने गुरूजी के खिलाफ पेम्पलेट निकाला उसी को बाद में उन्होंने प्रचारक निकाल दिया ! बाबा साहब की कार्य पद्धति थी कि जो गडबड कर सकता है उसी से संपर्क बढाते थे !
इंदौर स्वदेश के शेयर बेचने काकाणी जी नीमच पहुंचे ! एक शराब व्यापारी कन्हैयालाल सर्राफ के यहाँ भी वे इसी द्रष्टि से गए ! उन्ही दिनों उसका एक लड़का चमारन लड़की को लेकर भाग गया था ! इसके कारण घर में तनावपूर्ण माहौल था ! यहाँ तक कि जब उनकी धर्मपत्नी अतिथि के स्वागत हेतु दूध के गिलास लेकर बहां आईं तो दूसरे नंबर के लडके ने गुस्से में वे ग्लास फेंक दिए ! इस के बाद भी काकाणी जी डेढ़ घंटे तक समझाते रहे कि परिवार में सुसंस्कार के लिए अच्छे समाचार पत्र कितने जरूरी हैं और थक हार कर उन महानुभाव को स्वदेश के एक एक हजार के तीन शेयर खरीदने ही पड़े !


मंदसौर में चुनाव के समय दस हजार रुपये कर्जा हो गया ! अटल जी को बुलाकर थैली भेंट कर बह कर्जा चुकाने की योजना बनी ! उसी समय सुदर्शन जी ने एक स्वयंसेवक को विदिशा से उसके घर छोड़ कर आने की जिम्मेदारी मोघे जी को दी ! तथा भोपाल से वापस विदिशा आने को कहा किन्तु वे रतलाम पहुँच गए ! बहां अटलजी की सभा सुनकर थैली की राशि से उधारी चुकाकर वापस आये ! उनके विलम्ब से आने को अनुशासन हीनता मानकर सब लोग नाराज थे ! किन्तु तिजारेजी ने साथ दिया ! कहा कि ऐसे समय में अनुशासन तोडना ही अनुशासन है ! बागड तोडकर निकल जाना चाहिए !

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क्रांतिदूत: स्टंट प्रचारक - बाबा साहब नातू और श्री अरविंद मोघे !
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