श्री नारायण प्रसाद गुप्ता - एक विलक्षण व्यक्तित्व

हरसूद में १ जुलाई १९२८ को जन्मे श्री नारायण प्रसाद गुप्ता उपाख्य नानाजी का परिवार १९४३ में भोपाल आकर बसा तथा १९४६ से श्री नारायण प्रसाद गु...


हरसूद में १ जुलाई १९२८ को जन्मे श्री नारायण प्रसाद गुप्ता उपाख्य नानाजी का परिवार १९४३ में भोपाल आकर बसा तथा १९४६ से श्री नारायण प्रसाद गुप्ता रा.स्व.संघ से सक्रिय रूप से जुड गए ! तत्कालीन प्रचारक श्री दिगंबर राव तिजारे, श्री भैयाजी कस्तूरे, श्री बाबा साहब नातू के मार्गदर्शन में कार्य करते हुए गट नायक, गण शिक्षक, मुख्य शिक्षक, भोपाल नगर प्रचारक तदुपरांत सीहोर जिला प्रचारक के रूप में कार्य किया ! संघ पर लगे पहले प्रतिवंध के विरुद्ध हुए सत्याग्रह में श्री नारायण प्रसाद गुप्ता भी गिरफ्तार हुए थे !
११ अक्टूबर १९५१ को जेल रोड इंदौर पर जनसंघ के गठन को हुई पहली बैठक में सीहोर के प्रतिष्ठित वकील श्री प्रभाकर राव बडनेरकर तथा अपने बड़े भाई श्री गोपीकृष्ण गुप्ता के साथ नानाजी सम्मिलित हुए ! यहाँ से ही नानाजी का राजनैतिक जीवन प्रारम्भ हुआ ! वे जनसंघ के संगठन मंत्री नियुक्त हुए !
१९५३ में हुए कश्मीर आंदोलन के दौरान सत्याग्रह कर श्री प्यारेलाल खंडेलवाल के साथ दो बार दिल्ली की तिहाड जेल में डेढ़ डेढ़ महीने रहे ! इसके बाद १७ लोगो के जत्थे ने रावी पारकर कठुआ में गिरफ्तारी दी ! इस जत्थे में अन्य लोगों के अतिरिक्त श्री खुमान सिंह शिवाजी तथा मंदसौर के गुरू भी सम्मिलित थे ! कठुआ जेल में जीवन अत्यंत कष्टप्रद रहा ! १७ लोगों के लिए बनी बैरक में ७० सत्याग्रही को ठूंसा गया ! इतना ही नहीं तो भोजन हेतु दिए जाने बाले आटे में इन लोगों की आँखों के सामने संतरी गण रेत मिलाया करते थे ! आपत्ति करने पर इन्हें माफी मांग कर छूटने की सलाह दी जाती ! इस दुस्सह स्थिति से निबटने के लिए तीन कार्यकर्ताओं ने मरने का नाटक किया ! परिणामस्वरूप इन लोगों को जम्मू जेल में स्थानांतरित किया गया ! दो दिन बाद ही श्री श्यामाप्रसाद मुखर्जी के स्वर्गवास का समाचार प्राप्त हुआ ! डा. मुखर्जी के वलिदान के बाद सभी कार्यकर्ता मुक्त हुए तथा आंदोलन की मांगे भी मानी गईं ! किन्तु कितनी बड़ी कीमत चुकाकर ?
१९५७ में नानाजी नारायण प्रसाद गुप्ता बुधनी से जनसंघ प्रत्यासी के रूप में चुनाव लड़े ! उस समय वे जेल में थे ! गोरखपुर में गीता जलाने की घटना के विरोध में नानाजी ने अनेकों जन सभाओं को संवोधित किया था ! इन सभाओं में नानाजी के दिए गए भाषणों को भडकाऊ करार देकर प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया ! १० महीने जेल में बिताने के बाद नानाजी जेल से रिहा हुए ! स्वाभाविक ही जेल से चुनाव लडकर उस प्रारंभिक दौर में सफल होना कठिन ही था, नानाजी चुनाव में पराजित हुए !
१९६२ से १९७३ तक जबलपुर संभाग के संगठन मंत्री नियुक्त हुए ! आज का महाकौशल तथा विन्ध्य उसमें समाहित था ! कुछ समय तक इस जिम्मेदारी के साथ साथ छत्तीसगढ़ का संगठन कार्य भी नानाजी ने सम्भाला ! १९७७ में नानाजी जनता पार्टी के टिकिट पर इछावर से विधायक तथा १९९२ से १९९८ तक राज्यसभा सांसद रहे हैं !
संस्मरण –
· १९४६ में नानाजी संघ शिक्षावर्ग जाना चाहते थे किन्तु बड़े भाई श्री गोपीकृष्ण जी ने कहा की तुम जीवन भर ताना दोगे की छोटे होते हुए भी तुमने पहले संघ शिक्षावर्ग किया ! अतः पहले मैं जाऊंगा ! अंततः नानाजी के तीनो संघ शिक्षावर्ग १९४७,१९४९ व १९५० में हुए ! 
· नारायण प्रसाद जी की इच्छा बी.ए. करने के बाद ला करने की थी किन्तु प्रचारक भैयाजी कस्तूरे और राजाभाऊ पातुरकर ने कहा कि पहले जेल जाओ ! अपने खाते में कुछ जमा कराओ तभी तुम्हारे चने बिकेंगे !
· हर व्यक्ति संगठन के लिए उपयोगी होता है ! यही मान्यता थी प्रचारक श्री दिगंबर राव तिजारे जी की ! वे कहते थे चूल्हे में जलने बाली लकड़ी चाहे सीधी हो या टेढी मेढी, खाना तो बना ही देती है ! अगर ज्वलनशील है तो हर लकड़ी उपयोगी है ! हर बह व्यक्ति जिसके मन में राष्ट्रसेवा की लौ है, काम का है ! फिर चाहे उसमें कोई योग्यता हो ना हो !
· दत्ताजी उन दिनों विभाग प्रचारक थे तथा नानाजी सीहोर जिला प्रचारक ! एक बार भोजन व्यवस्था के लिए लोहा बाजार स्थित कार्यालय पर दत्ताजी ने एक किलो कोयला लाने का निर्देश नानाजी को दिया ! नानाजी ने सोचा कि एक किलो से क्या होगा और बार बार लाना पडेगा ! अतः वे दस किलो कोयला ले आये ! कस्तूरे जी ने सीधे तो कुछ नही कहा पर तीन दिन तक इनसे बात नहीं की ! कम से कम में काम चलाना उस समय के प्रचारकों की जीवन शैली का अंग था !
· १९४७ में अंग्रेजों से तो भारत मुक्त हुआ किन्तु ८ साल बाद भी देश का एक भूभाग पुर्तागालिओं के कब्जे में था ! १५ अगस्त १९५५ को गोआ मुक्ति आंदोलन प्रारम्भ हुआ ! जनसंघ ने व्यापक आंदोलन महा सत्याग्रह की घोषणा की ! भोपाल से भी नानाजी के नेतृत्व में १७ कार्यकर्ताओं का जत्था रवाना हुआ, जिसमें सर्व श्री बाबूलाल गौर, मानकचंद चौबे, नानूराम दादा, मनोहर चौरसिया आदि सम्मिलित थे ! गोवा की सीमा में प्रवेश हेतु मात्र ८ फुट चौड़ा रास्ता था ! सामने बंदूकें लिए हुए पुर्तगाली सैनिक ! भारतीय सीमा में सत्याग्रहियों की डेढ़ किमी लंबी लाईन ! हजारों कार्यकर्ता दिल में राष्ट्रभक्ति का जज्बा लिए हुए सन्नद्ध ! जनसंघ के अतिरिक्त समाजवादी पार्टी, हिन्दू महासभा, आर्यसमाज जैसे संगठन भी आंदोलन में सहभागी थे ! सामने से गोलियाँ चलनी शुरू हुईं तो आयोजकों ने सबको जमीन पर् लेटकर और सर नीचेकर आगे बढ़ने को कहा ! उज्जैन से आये राजाभाऊ महाकाल को यह गवारा नहीं हुआ ! वे बोले “मैं सर नीचे कर के नहीं चल सकता” ! उन्होंने सर उठाया और सामने से आई गोली उनके सर में जा समाई ! इस आंदोलन के भी ६ साल बाद १९६१ में गोवा मुक्त हो पाया !
· १९५४ में जनसंघ का पहला कार्यालय लखेरापुरा भोपाल में ३४ रु मासिक किराए पर एक माली के मकान में खोला गया ! ऊपर की मंजिल के इस कार्यालय में पानी नीचे से भरना होता था ! स्वयं कुशाभाऊ ठाकरे तथा नारायण प्रसाद गुप्ता आवश्यकता की १८ बाल्टी पानी प्रतिदिन भरते थे ! १९६०-६१ में सौ रुपये मासिक किराए पर कार्यालय पीरगेट स्थानांतरित किया गया !
· १९७३ में गला खराब हो जाने के चलते नानाजी के लिए एसी जिम्मेदारी ढूंढी गई, जिसमें उन्हें कम बोलना पड़े ! तब उन्हें कार्यकर्ताओं से निधि संग्रह का कार्य सोंपा गया ! यह भी तय किया गया कि इस प्रकार संकलित यह धनराशि केवल संगठन कार्य में तथा कार्यालय व्यवस्था में ही व्यय की जायेगी तथा इसका उपयोग चुनाव फंड के रूप में नहीं होगा ! इस योजना की जानकारी देने जब नानाजी तत्कालीन सर संघचालक पूज्य श्री बालासाहब देवरस से मिलने पहुंचे, तब वे अपने पैतृक गाँव कारंदा में थे ! बहां इस योजना को सुनकर उन्होंने सराहा तथा एक नागरिक के रूप में पहली रसीद स्वयं की कटाई ! साथ ही प्रेरणा दी कि वे स्वयं की रसीद भी अवश्य काटें ! उस घटना को स्मरण कर नानाजी अभिभूत हो जाते हैं ! वे कहते हैं कि संघ एकमात्र ऐसा संगठन है जिसने देश को मन्त्र भी दिया और तंत्र भी !

· आपातकाल के दौरान कुछ वरिष्ठ प्रचारकों को बाहर रहकर कार्य करने का आदेश संघ के शीर्ष नेतृत्व ने दिया ! तदनुरूप मोरेश्वर राव गद्रे छत्तीसगढ़ में भूमिगत रहकर कार्य कर रहे थे ! बह जीवन अत्यंत ही कठिन था ! पुलिस की आँखों से बचने के लिए कई बार तो उन्हें घोड़ों के अस्तबल में रात गुजारनी पडी ! कभी भोजन मिलता तो कभी फाकाकशी होती ! शरीर की भी सहन करने की एक सीमा होती है ! अंततः धमतरी में गद्रे जी कोमा में चले गए तथा बहीं उनकी जीवन लीला भी समाप्त हुई ! विडम्बना तो यह कि उस महापुरुष को अंतिम यात्रा को चार कंधे भी नसीब नही हुए ! केवल दो कार्यकर्ता एक रिक्शे में उन्हें लेकर मुक्तिधाम पहुंचे ! उस समय उनकी जेब में मात्र ३ रु. निकले थे !

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